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  • पहाड़ की छांह में वापसी

    विजया सती जी ने मरे जैसे न जाने कितने विद्यार्थियों को हिंदू कॉलेज में पढ़ाया था। उनके अध्यापन यात्रा की कई कड़ियाँ हम लोग पढ़ चुके हैं। इस कड़ी में हिंदू कॉलेज से सेवानिवृत्ति के बाद हल्द्वानी जाने का प्रसंग है। आप भी पढ़िए-

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    हिंदू कॉलेज परिसर में हम चौबीस वर्ष रहे. सेवानिवृत्ति के बाद छह महीना और यहां रहना तय किया. इसका कारण मेरा मेडिकल इश्यू था. फरवरी आरम्भ में नी रिप्लेसमेंट सर्जरी हुई. अभी फिजियोथेरेपी चल ही रही थी कि कोरोना की आहट सुनाई पड़ी. मार्च तक तो जैसे-तैसे निभा. किंतु अप्रैल से डॉक्टर सती अत्यंत अनमने हो गए. उन्हें लगा कि इस एकांत से अपना घर भला !

    बहुत जरूरी सामान ले कर गृहनगर हल्द्वानी जाना तय हुआ. लेकिन लॉकडाउन में निकलना इतना आसान भी नहीं था. हिंदू कॉलेज कब-कहां-कैसे मददगार हो जाए ! पुराने हिन्दुआइट कांचन आज़ाद ने ‘रोड पास’ ऑनलाइन बनवा देने में जो सहयोग दिया, वह शब्दों में लिखना मुश्किल. फिर परिसर में सहयोगी इतिहास विभाग के डॉक्टर रतन लाल जी को भुलाना मुश्किल ! पूछने भर से, उन्होंने न केवल अपनी इनोवा गाड़ी दी बल्कि अपने चालक जसवंत जी को भी सौंप दिया. इस तरह उस पहाड़ की छांह में हमारी वापसी हुई जिसे हमने बचपन से सराहा और प्यार किया था.

     ….

    इस श्रृंखला में जब मैंने एक समय अपने जीवन में ‘ह’ वर्ण की व्याप्ति…हिंदी ..हिंदू.. (कॉलेज) हिंदुस्तान…कह कर दर्ज की थी, दरअसल उसके बाद की दुनिया में हरीश सती, हीरा नगर और हल्द्वानी भी जुड़ गए थे !

    अथ वह कथा !

    हमारे सादगी भरे परिवार में पारंपरिक अरेंज्ड विवाह की मान्यता सहज ही व्याप्त थी. परिवार में दूर के संबंधी ने सुझाया – एक पढ़ा-लिखा युवक है, उनके परिवार को बताया गया कि अच्छे कुमाउंनी परिवार में पढ़ी-लिखी लड़की है. एकदम प्रचलित अंदाज़ में बात आगे बढ़ी, अंतर इतना रहा कि मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद में एम डी पैथोलॉजी के छात्र डॉक्टर हरीश सती ने संवाद शुरू किया और घर भी आए. हमने एक-दूसरे को पत्र लिखे. फिर एकदम पारंपरिक विवाह संपन्न हुआ. राजधानी दिल्ली से कॉर्बेट की नगरी कालाढूंगी के लिए विदाई हुई.

    सात घंटे तक का सफर रहा संभवत: – अब इतना ही याद है.

    कालाढूंगी में एक ओर से घिरे नैनीताल के पहाड़, आम-लीची के बगीचे, कटहल से लदे पेड़, खिले हुए गुड़हल और छोटी नहर तो मैंने बाद में देखे, पहले मिला इस छोटे कस्बे का ठेठ कुमाउंनी माहौल ..दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म, जेवर-कपड़े देखने-दिखाने, लेने-देने का दौर, गीत और नृत्य भी !

    सती परिवार की पढ़ने-लिखने वाली कुछ बालिकाएं.. ममता, भावना, दीपिका, पल्लवी, तरुणा मेरे साथ देर तक गपशप करती रही. ममता, भावना के बाबू यानी डॉ सती के नाम राशि चचा जी कुछ समय बाद मुक्त मन से मिलने वाले, ससुराल पक्ष के सबसे पहले संबंधी थे. वरना तो यहां घूंघट भी था और नव वधू की चुप्पी भी !

    हरीश चचा जी (उन्हें ऐसे ही बुलाते थे सब) नैनीताल और आसपास स्कूलों में प्रिंसिपल के पद पर रह कर सेवानिवृत्त हुए. वे बहुत अच्छे चित्रकार थे. इलाके के मान्यताप्राप्त महाराज जी के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त आदेश को मानते हुए वे नियत समय पर केवल दूध पीते थे, अन्य कोई भोजन नहीं करते थे. उनके पास मधुर आवाज थी, बहुत शांत स्वर में बोलते..लेकिन उतनी ही चुलबुली-चंचल थी ममता की इजा यानी तारा चाची ! इन दोनों से उनके  जीवन के अंत तक हमारा खूब संवाद और मिलना-जुलना रहा. चचा जी की बात याद आती है – ‘संयोग तो देखो – मैं हरीश चन्द्र, मुझे मिली तारा और मेरा पुत्र अब रोहित !’

    कालाढूंगी में गर्मियों में जून के महीने में ढेर के ढेर ताज़ा लीची के गुच्छे घर आते और पहले साल मुझे याद है बैलगाड़ी में भरकर आम आए. लोहे की बाल्टी में पानी भर कर आम डाले गए और फिर भोजन के बाद का वह दौर ! किसी को गुठली नहीं गिननी थी, बस आम, आम और आम ! यह अलग बात है कि वहां सबके लिए फल का मतलब सिर्फ अपने बगीचे के आम-लीची का होना ही था.

    कालाढूंगी में कुछ बातें मेरे लिए बिलकुल नई थी. सबसे पहले मैंने सुना .. यह प्याज का चाकू है, इसे अलग ही रखना.

    आज एकादशी है, फलाहार होगा, कल पर्ब की पुन्यौ है, आरती की बत्तियां और बत्तियों के लिए घी घर पर बनेगा, आज गंगा दशहरा है – पंडित जी द्वार पत्र दे गए थे, वह लगाया जाएगा…..ऐसी छोटी-बड़ी कई बातें. गप्प-हंसना-हंसाना यहां की सबसे बड़ी सौगात थी. जीवन का मूल मन्त्र – कुछ न कुछ किया कर !

    बरखा लगी हो और घर में सब जुटे हों तो बड़ी परात भरकर पकौड़ी बनाई और खाई जाती.

    यहां सीधे ब्रंच होता था, उसके बाद रसोई धोई जाती थी रात के भोजन से पहले !

    तीज-त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते – ज्यादा जोर पकवान बनाने की ओर रहता .. बड़े, पुए और पूड़ी जरूर बनेंगे महीने में कम से कम दो बार ..क्योंकि आज नया महीना लग गया, आज संक्रांति है, आज इसका-उसका जनमबार है, आज बसंत है, …होली दिवाली का तो कहना ही क्या !

    कालाढूंगी मुख्य रूप से सती लोगों का गांव था, जो पहाड़ से यहां आकर बस गए. उन्होंने अपने श्रम से खेती को, बाग़-बगीचों को साधा. एक ओर मुस्लिम बहुल बस्ती है. घर के पीछे मंदिर भी है और मस्जिद भी. आम-लीची-कटहल के बड़े बगीचों के ठेकेदार ज्यादतर मुस्लिम हैं आज भी.

    कालाढूंगी से थोड़ी दूरी पर नैनीताल, नौकुचियाताल, भीमताल, सातताल, खुरपाताल का आकर्षण है. बच्चों के अच्छे स्कूल नैनीताल के शेरवुड, सेंट जोसेफ और सेंट मेरी ही माने जाते हैं.

    इन पहाड़ों की आरंभिक यात्रा ने मुझे कभी नहीं उबाया. हरियाली देखते चले जाओ, कहीं नीचे खेत आ जाएंगे, कहीं ऊपर चाय-पकौड़ी के साथ भांग की चटनी की दुकानें. कुछ घंटे में हम अल्मोड़ा, रानीखेत, भुवाली, रामगढ़, मुक्तेश्वर घूम कर आ सकते हैं.

    लेकिन मुझे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की जो फेलोशिप मिली थी, उसके समापन पर कॉलेज में निश्चित वर्ष के लिए पढ़ाना अनिवार्य था. तो विवाह के वर्ष मैं गर्मी की छुट्टियां कालाढूंगी में बिता कर जुलाई में दिल्ली लौट आई. उधर कालाढूंगी के घर से एक चैरिटेबल क्लीनिक में सुबह दो घंटे बैठने के साथ-साथ, डॉक्टर सती ने हल्द्वानी शहर में ‘हल्द्वानी डायग्नोस्टिक सेंटर’ की शुरुआत पर ध्यान दिया. एम डी पैथोलॉजी की पढ़ाई समाप्त होते ही संपन्न हमारा विवाह दरअसल कालाढूंगी में, दूरस्थ विवाह का पहला उदाहरण रहा होगा. तभी मैंने यह कविता लिखी ..

    जैसे पहाड़ पर बादल उमड़ते हैं,

    घाटी में कोहरा उतरता है,

    जैसे किसी सुबह जागने पर

    बर्फ की चुप्पी घिरी मिलती है,

    वैसे ही मेरे मन में

    प्यार, अकेलापन और थोड़ा-सा दुःख

    उमड़ता है, उतरता है, घिरता है.

    जैसे पहाड़ पर बादल बरस जाते हैं

    कोहरा छंट जाता है

    बर्फ भी पिघल जाती है

    वैसे ही मेरे मन का प्यार

     र

      स

    जाता है,

    अकेलापन छंट जाता है,

    और दुःख भी पिघल जाता है

    तुम्हारे पास आकर !

    भली बात यह थी कि पुरानी पद्धति से अक्टूबर में कॉलेज में पंद्रह दिन दशहरे की छुट्टियां होती – (ऑटम ब्रेक), सर्दियों में भी क्रिसमस से नववर्ष के पहले हफ्ते तक पंद्रह दिन अवकाश मिलता. और फिर वार्षिक परीक्षा के बाद, गर्मियों की लम्बी छुट्टियां. मैं साल में तीन बार इन छुट्टियों में और हर त्यौहार पर कालाढूंगी आती, दिल्ली में अभी माता-पिता का घर ही मेरा घर था.

    अज्ञात कारणों से हमारा वैवाहिक जीवन फिर यूं ही व्यवस्थित हो गया, छुट्टियों में मेरा पहाड़ की छांह में जाना, कभी-कभार डॉक्टर सती का दिल्ली आना !

    कालाढूंगी के बाद हल्द्वानी हमारा स्थायी निवास हुआ.

    गुलाबी नगरी ..पीतल नगरी ..महानगरी … से जरा अलग – कुमाऊं का प्रवेशद्वार कही जाने वाली हल्द्वानी नगरी  ग्रीन सिटी है, यहां हल्दू के पेड़ थे – इसलिए हल्द्वानी.

    विकास ने हल्द्वानी को भीड़ दी है, शोर दिया है, चम-चम बाजार दिए हैं. बड़े अस्पताल, मॉल, स्टार बक्स और कैफे कॉफी डे दिए हैं. लेकिन अब वह हल्द्वानी कहां? खेत बिक गए हैं, फ्लैट्स भी बनने लगे हैं. बैंक्वेट हॉल की तो न पूछें, अब घर से शादी-ब्याह नहीं होते. जो कुमाउंनी विवाह घर की देहरी पर ‘धूलिअर्घ्य’ की चूंटाचूंट के लिए विख्यात थे, अब ब्यूटी पार्लर की जगमग में विलीन से हो रहे हैं. (‘धूलिअर्घ्य’ की चूंटाचूंट ..घर के द्वार पर बरात के स्वागत की भीड़ की हलचल..बरात देखने की धक्का-मुक्की)

    हल्द्वानी ऐंपण कला की नगरी है, गीत-संगीत-नृत्य की दुनिया आबाद है यहां ! अब बहुत से सती परिवार कालाढूंगी छोड़ कर हल्द्वानी बस गए हैं, हम भी ! बाग़-बगीचों की ठेकेदारी जारी है – गर्मियों में आम-लीची की बहार रहती ही है – प्रकृति का कहर न बरसे तो !

    वर्तमान समय में हर घर से बच्चे बाहर हैं –  देश या विदेश में – पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले हैं !

    पिछली पीढ़ी का पहले पहाड़ों से पलायन हुआ, फिर बच्चों के कारण यही पीढ़ी या तो अकेली रह गई या बच्चों के लिए बंगलौर, पुणे, चेन्नई, अमेरिका, इंग्लैण्ड और जाने कहां-कहां ! बच्चों का आगमन कभी-कभार की बात !

    लेकिन मुझे हल्द्वानी में रहना पसंद है. दिल्ली का कोई अभाव नहीं खलता. पहाड़ की छांह में जीवन कुछ ऐसा है कि यहां वर्षा नहीं होती – बरखा लग जाती है. सिर्फ हवा नहीं बल्कि पुरवाई चलती है !

    पास आती जा रही है कल्पना, दूर होती जा रही है जिंदगी… …ऐसा ही कुछ लगता है जब नई दिल्ली से चली शताब्दी ट्रेन हल्द्वानी स्टेशन पर ठहरने को आती है –पर्यटकों में पहाड़ दिखाई दे जाने की हलचल व्यापती है और यहां के निवासियों में घर के पास पहुंच जाने का सुख !

    सुबह-शाम ठीक-ठाक ठंडी हवा मिल जाती है हल्द्वानी में. बहुत ही प्रिय मुहावरेदार भाषा में शिवानी की नायिकाओं जैसी सुंदर स्त्रियों की बातचीत की लय चित्त चुरा ले जाती है.

    गर्मियों में पेड़ से टूटकर सीधे आपकी रसोई तक, एक बड़ा-सा कटहल यहां जरूर आएगा. घंटे दो घंटे की मेहनत के बाद जब छिलकर, कटकर तैयार हो जाए यह अद्भुत वस्तु, तो आसपास के घरों में एक-एक टुकड़ा जाएगा ही जाएगा. फिर उस रात के भोजन में, अपने हिस्से के घर के बगीचे के पहले-पहले कटहल का साग जी भर कर खाया जाएगा !

    जब अंधड़ आएगा, बगीचे की हवा में कच्चे आम गिरेंगे तो झोला भर कर कोई न कोई लाएगा ही लाएगा ! और फिर.. आमरस की बहार है …इस विचार से सबके मुंह में पानी भर आएगा !

    जब एक बड़ा-सा थाल भर कर लीची के गुच्छों को सबके बीच लाया जाएगा, तब घर का बच्चा-बूढ़ा-युवा जो भी, गुच्छा उलट-पुलट कर बढ़िया लीची ढूँढने की फिराक में रहेगा, उसे ठेठ बोली में जिस अंदाज में झकोरा जाएगा, उस पर खिलखिलाने का मज़ा केवल पहाड़ की छांह में ही आएगा ! हरियाली के विशेष पर्व पर यहां दिए जाने वाले आशीर्वचन को समझ लेने पर, भला आनंद किसे न आएगा  ..

    जी रया, जागि रया

    अगास बराबर उच्च, धरती बराबर चौड़ है ज या

    दुब जस हरी है ज या, ब्यार जस फई ज या

    स्यावक जैसी बुद्धि, स्योंक जस प्राण है जौ

    पुर दुनि म, तुमर नाम है जौ

    हिमाल म ह्युं छन,

    गंगज्यू म पाणि छन

    यो दिन, यो मास भेंटने रया

    जांठि टेक बेर झाड़ जाया,

    सिल पिसी भात खाया.

    जिसका अर्थ है  …

    जीते रहो, जागृत रहो,

    आकाश के समान ऊँचे बनो,

    धरती जैसा विस्तार पाओ,

    दूब की तरह हरे रहो,

    बेर जैसा फैल जाओ,

    सियार की तरह बुद्धि हो तुम्हारी,

    शेर जैसे प्राण हों,

    पूरी दुनिया में तुम्हारा नाम हो जाए,

    हिमालय में जब तक बर्फ है

    और गंगा में जब तक पानी

    तब तक ये दिन और यह महीना

    तुम्हारे जीवन में आते रहे.

    आयु तुम्हारी इतनी लंबी हो कि

    बाहर जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करो

    और चावल भी सिल में पीस कर खाने पड़ें !

    इसी पहाड़ की छांह में मुझे मिले पद्मश्री यशोधर मठपाल ! मुख्य सड़क से जरा ढलान वाले रास्ते पर जिस शांत-एकांत घर के द्वार पर एक डोर से मंदिर वाली छोटी सी घंटी लटक रही थी, उसकी रुनझुन सुनकर द्वार खोल जो हमारे सामने थे ….वही थे पद्मश्री यशोधर मठपाल ! हरी-भरी सब्जियों से भरी एक छोटी-सी टोकरी सिर पर लिए, नीचे से लकड़ी की सीढ़ी चढ़ते हुए जो भीतर आईं, वे ही श्रीमती यशोधर मठपाल थीं।

    भीमताल में लोक कला संग्रहालय यशोधर मठपाल जी की देन है. जहां पुराने सिक्के, बर्तन, आभूषण, नाप-तोल के उपकरण, औजार हथियार, काठ के बर्तन…एक भरा-पूरा संग्रह मौजूद है ! उनके कलात्मक रंग भरे कैनवस, बोलते हुए से चित्र असंख्य हैं … पेड़ पर चढ़कर दरांती से लकड़ी काटती युवती का चित्र ….दूर बैठे दिख रहे हैं चिलम पीते पुरुष.. शीर्षक है – कटु सत्य !

    सिर पर भेंट की गठरी रखें जंगल की राह में अकेली जाती मां … शीर्षक ..भिटोली ! ( भिटोली .. कुमाऊं अंचल में चैत्र मास में विवाहिताओं को मायके से मिलने वाली भेंट)

    मांगलिक अवसर पर ऐंपण देती महिलाओं का समूह. (ऐंपण – कुमाऊं की पारंपरिक लोककला – रंगोली )

    अधिकांश स्त्री चित्रों में उनकी पत्नी का ही प्रतिबिंब है.

    पहाड़ की छांह में ही जा पाई मुनस्यारी के ट्राइबल हैरिटेज म्यूजियम, जो वहीं के निवासी डॉ शेर सिंह पांगती जी के प्रयासों से बना है. “रं” समाज के जीवन के रहन-सहन, पहनावे, आभूषण, खान-पान, उपयोगी वस्तुओं को दर्शाता जीवंत घर-आंगन ही है यह संग्रहालय ! नक्काशीदार दरवाज़े-चौखटें, परंपरागत मेहराबदार खिड़कियां, एक बिक्री काउंटर, आभूषणों, वस्त्रों का प्रदर्शन करती माटी की मूरतों पर, लोकभाषा में दर्ज पंक्तियां – ‘मै पार ठसक झन लाग्या हां’ … यानी please don’t touch me !

    सुखद है कि अब हम कंक्रीट के जंगल में नहीं, पहाड़ की छांह में रहते हैं !

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