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  • नक्श लायलपुरी की गज़लें

    मैं दुनिया की हक़ीकत जानता हूँ
    किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

    मेरी पहचान है शेरो सुख़न से
    मैं अपनी कद्रो-क़ीमत जानता हूँ

    तेरी यादें हैं, शब बेदारियाँ हैं
    है आँखों को शिकायत जानता हूं

    मैं रुसवा हो गया हूँ शहर-भर में
    मगर ! किसकी बदौलत जानता हूँ

    ग़ज़ल फ़ूलों-सी, दिल सेहराओं जैसा
    मैं अहले फ़न की हालत जानता हूँ

    तड़प कर और तड़पाएगी मुझको
    शबे-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ

    सहर होने को है ऐसा लगे है
    मैं सूरज की सियासत जानता हूँ

    दिया है ‘नक़्श’ जो ग़म ज़िंदगी ने
    उसे मै अपनी दौलत जानता हूँ

    2.
    तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया
    तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया

    तेरे ख़याल ने पहना शफ़क का पैराहन
    मेरी निगाह से रंगों का सिलसिला न गया

    बड़ा अजीब है अफ़साना-ए-मुहब्बत भी
    ज़बाँ से क्या ये निगाहों से भी कहा न गया

    उभर रहे हैं फ़ज़ाओं में सुब्ह के आसार
    ये और बात मेरे दिल का डूबना न गया

    खुले दरीचों से आया न एक झोंका भी
    घुटन बढ़ी तो हवाओं से दोस्ताना गया

    किसी के हिज्र से आगे बढ़ी न उम्र मेरी
    वो रात बीत गई ‘नक्श़’ रतजगा न गया

    5 thoughts on “नक्श लायलपुरी की गज़लें

    1. Pingback: their explanation
    2. Pingback: hellcat pro 9mm

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    मैं दुनिया की हक़ीकत जानता हूँ
    किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

    मेरी पहचान है शेरो सुख़न से
    मैं अपनी कद्रो-क़ीमत जानता हूँ

    तेरी यादें हैं, शब बेदारियाँ हैं
    है आँखों को शिकायत जानता हूं

    मैं रुसवा हो गया हूँ शहर-भर में
    मगर ! किसकी बदौलत जानता हूँ

    ग़ज़ल फ़ूलों-सी, दिल सेहराओं जैसा
    मैं अहले फ़न की हालत जानता हूँ

    तड़प कर और तड़पाएगी मुझको
    शबे-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ

    सहर होने को है ऐसा लगे है
    मैं सूरज की सियासत जानता हूँ

    दिया है ‘नक़्श’ जो ग़म ज़िंदगी ने
    उसे मै अपनी दौलत जानता हूँ

    2.
    तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया
    तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया

    तेरे ख़याल ने पहना शफ़क का पैराहन
    मेरी निगाह से रंगों का सिलसिला न गया

    बड़ा अजीब है अफ़साना-ए-मुहब्बत भी
    ज़बाँ से क्या ये निगाहों से भी कहा न गया

    उभर रहे हैं फ़ज़ाओं में सुब्ह के आसार
    ये और बात मेरे दिल का डूबना न गया

    खुले दरीचों से आया न एक झोंका भी
    घुटन बढ़ी तो हवाओं से दोस्ताना गया

    किसी के हिज्र से आगे बढ़ी न उम्र मेरी
    वो रात बीत गई ‘नक्श़’ रतजगा न गया

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