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  • दु:स्वप्नों के दिलचस्प और मानीखेज़ किस्से : उदय प्रकाश

    इस साल पुस्तक मेले में अनेक किताबें आईं, लेकिन एक किताब मेरे लिये ख़ास है- संजय छेल का कहानी संग्रह ‘सपनों के साइड इफ़ेक्ट्स’। संजय छेल के नाम से 1990 के दशक की कई यादगार फ़िल्में याद आती हैं- रंगीला, यस बॉस, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी, दौड़, कच्चे धागे… फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। उन्होंने एक से एक फ़िल्में लिखीं और बाद में निर्देशित भी की। लेकिन फ़िल्मों के बड़े लेखक-निर्देशक होने के पहले मैंने उनकी एक कहानी ‘हंस’ में पढ़ी थी- पोस्टर। आज तक याद है। वे एक सफल फ़िल्म लेखक-निर्देशक होने के साथ साथ बहुत गंभीर लेखक भी हैं। अपने साहित्य लेखन के लिये गुजराती और मराठी भाषा में पुरस्कृत भी हो चुके हैं। बहरहाल, बात उनके कहानी संग्रह की हो रही है तो बताता चलूँ कि वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह की भूमिका लिखी है प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश ने। आपके लिये वह भूमिका प्रस्तुत है- मॉडरेटर 

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    संजय छेल की सबसे अलग और विशिष्ट नज़र आने वाली ख़ासियत है भाषा में उनकी दशकों से सतत, निर्बाध, सृजनशील सक्रियता। फिर भाषा की यह चेतना और संवेदना कहीं भी, किसी भी विधा में हो…सिनेमा, टीवी, रंगमंच, अख़बार, साहित्यिक पत्रिका। धूमिल के शब्दों में- ‘आदमी की चौबीस घंटे की खुराक’ या बालज़ाक़ के शब्दों में-‘भाषा में आजीविका’। लैंग्वेज ऐज़ ऑक्यूपेशन। भाषा में रहना, जीना, सांस लेना, देखना, सोचना और सपने देखना। उत्तर-आधुनिक शब्दावली में ‘काग़ज़ का वज़ूद’। और काग़ज़ेतर काल के साइबर स्पेस में ‘भाषिक अस्तित्व’। यानी सिर्फ़ और सिर्फ़ भाषा में ‘होना’।
    अनोखा और अपनी तरह का एक है यह सख्श, जिसका नाम है -संजय छेल।
    संजय छेल को लिखते हुए और उनके लिखे को स्क्रीन पर देखते मैं पिछले दो-ढाई दशकों से गहरी उत्सुकता और कुछ-कुछ आश्चर्य मिश्रित स्पृहा के साथ उसके जीवन के बारे में सोचता रहा हूँ। वे सिर्फ़ प्रिंट, पुस्तक, पत्रिकाओं तक सिमट जाने वाले लेखक नहीं। विधाएँ उन्हें कहीं किसी एक खास जगह स्थिर नहीं कर पातीं। फ़िल्म, वृत्तचित्र, टेलीविजन शो, सीरियल्स, अख़बार। उनका दायरा बड़ा, विविध और अनिर्धारित है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है उनके भीतर अपने लिखे और रचे को लेकर एक गहरा संशय। एक तरह की आत्मविश्वासहीनता। और यही वह बिंदु है जो उन्हें लगातार कुछ और लिखने-रचने को उकसाता रहता है और अपने समय के लेखक के बतौर उन्हें विश्वसनीय भी बनाता है। मेले की भगदड़ में खोया हुआ एक ऐसा बच्चा जो न सिर्फ़ अपनी माँ को खोजता है, बल्कि उस कोख या गर्भ की तलाश में बेचैन है, जहाँ से कथाएँ जन्म लेती हैं, वे कथाएँ, जो स्वयं कथाकार के जन्म का स्थल हैं।
    प्रचलित कहानियों का कोई अभ्यस्त पाठक अगर संजय छेल की कहानियों की ऊपरी सतह पर ठहर जाय तो उसे वहाँ एक निडर, बेपरवाह, बेलौस और वाचाल कथाकार मिलेगा। हर कुछ पर टिप्पणी…मनोरंजन-सा कुछ करता हुआ। आस-पड़ोस का एक कोई आत्मीय किस्सा-गो। इर्द-गिर्द घटित हो रहीं आमफ़हम ज़िंदगी की रोज़मर्रा की ऐसी घटनाएँ, जो इसलिए अनदेखा छूट जाती हैं क्योंकि वे बहुतायत में हैं, क्योंकि समय और स्थान में उनकी उपस्थिति आम है, संजय उन्हीं का औचक बयान करने करने लगते हैं। ब्यौरे या तफ़सील के साथ, अपने में बाँध लेने वाला वृतांत। कथाकार के आत्मसंशय के बावजूद कोई आत्मश्लाघा या आत्ममुग्धता नहीं, जो मुख्यधारा हिंदी के अधिकतर लेखकों का स्वभाव है, बल्कि उसकी जगह एक बिंदास खुलापन, एक पारदर्शी उत्साह, सब कुछ कह डालने की बेताबी से भरी हुई ऊर्जा। समय के हाल और अहवाल का नैरेशन। लेकिन कुछ ही देर में वही कहानी अचानक स्तब्ध कर देती है। बतकही के भीतर एक ऐसा सच, जो कभी मंटो, बार्टोल्ड ब्रेख़्त, फ्रेंज़ फेनन, जेम्स बाल्डविन, असग़र वज़ाहत, राजेंद्र सिंह बेदी, की कहानियों-उपन्यासों में दिखता है। ‘सफेद हाशिए’, ‘बॉडी काउंट’, ‘मैनिक्विन’ जैसी कहानियाँ विभाजन के बाद भी आज तक निरंतर ज़ारी सामाजिक सामुदायिक-सांप्रदायिक विभाजन और उनकी हिंस्र टकराहट के भयावने, मार्मिक और चिंताजनक अमानवीय चौतरफ़ा व्याप्त सच को एक कौंध के साथ सामने उघाड़कर रख देती है।
    ‘मैनिक्विन’ कहानी जिस विद्रूप दहशत का विवरण देती है, वह एंथनी डोयर के उस चर्चित उपन्यास की याद दिलाती है, जिसमें एक अंधी फ्रांसीसी लड़की और एक अनाथ किशोर जर्मन के संबंधों की कहानी है। हांस फलादा के उपन्यास ‘एवरीवन डाईज़ अलोन’ के बारे में तो मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ। सामाजिक मानवीय संबंधों के विनाश के इस डरावने सच तक पहुँचने के लिए संजय कोईं एक नहीं, कई शिल्पों और विन्यासों को अपना माध्यम बनाते हैं। कभी सपाट, एक-रैखिक, दो-टूक, तो कभी अतिरंजित, अति-यथार्थवादी और कभी किसी स्वैर-कहन की फैंटेसी वाली बनावट। ये कहानियाँ पढ़े जाने के बाद आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं। अपने समय के दहशत को आसान भाषा में अर्जित करने का यह हुनर या कथा-कौशल संजय छेल को साधारण आमजन का अपना कथाकार बनाता है। उनकी आवाज़ ‘अपुन की आवाज़’ बन जाती है। यह यूँ ही नहीं है कि संजय एक तरफ़ मराठी के विख्यात नाटककार और पटकथाकार विजय तेंदुलकर को अपनी प्रेरणा का स्रोत बताते हैं और अपना यह संग्रह- ‘सपनों के साइड इफेक्ट्स’ हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करने वाले विख्यात कथाकार और ‘हंस’ के संपादक स्व. राजेंद्र यादव को समर्पित करते हैं। ‘हंस’ में ही पहली बार उनकी कहानी ‘पोस्टर’ 1986 में राजेन्द्र यादव जी ने प्रकाशित की थी। जहाँ तक मुझे स्मरण आता है, संभवत: 1986 में ही राजेंद्र जी ने मेरी कहानी ‘तिरिछ’ ‘हंस’ में प्रकाशित की थी। ‘पोस्टर’ मैंने ‘हंस’ में ही पढ़ी थी और इसकी सिनेमा में संभावना के बारे में अरसे तक सोचता रहा था। यह उम्मीद भी कहीं थी कि शायद संजय छेल स्वयं इस पर कोई स्मरणीय फ़िल्म बनायें।
    मुझे यह भी याद आता है कि जब स्व.संजय चौहान ‘इंडिया टुडे’ छोड़कर मुंबई जा रहे थे, तब मैंने कहा था कि मुंबई जाना तो अपने हमनाम से ज़रूर मिलना। सोप ओपेरा और फ़िल्म के पात्रों की भाषा क्या होती है, संवाद की व्यंजनाएँ और संभावनाएँ क्या हो सकती हैं, यह गुजराती मूल के हिंदी-मराठी लेखक-कथाकार संजय छेल से सीखी जा सकती है। संजय की यह ‘हिंदी’ गढ़ाकोला, उन्नाव, मथुरा, बनारस, प्रयाग जैसे किसी जनपदीय क्षेत्र की सामुदायिक, क्षेत्रीय या परम्परित प्रतिष्ठित ‘हिंदी’ नहीं, बल्कि यह हिंदी नगरों-महानगरों के आम जीवन के संघर्षों, पीड़ाओं, सुख और दुख की ज़मीनी इंसानी ‘हिंदी’ है। ऐसी, जो उतनी ही सब-आल्टर्न और सामाजिक वैभव-लोक के गटर की भाषा है, जैसी करोड़ों बहुजनों के जीवन की सब-आल्टर्न ‘हिंदी’। ‘अपुन की हिंदी’। वही हिंदी, जिसका एस्थेटिक्स बिल्कुल भिन्न है और मुख्यधारा की सम्मानित-संपोषित एलीट हिंदी के सामने एक अन्य वृहत्तर विराट बहुसंख्यक विपरीत ध्रुव को खड़ा करता है। अधिक लोकतांत्रिक, अधिक व्यापक, अधिक समकालीन और बहुव्यापी हिंदी की वह कलात्मकता, जो अपने समय, समाज और किसी भयावह इलाके में धकेल दिए गए नागरिक-अनागरिकों की भाषा का भारतीय एस्थेटिक्स है। मुक्तिबोध के ही शब्दों का सहारा लें तो –‘जो तुम्हारे लिए विष है, हमारे लिए अन्न है’। कभी प्रख्यात चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन ने कहा था-‘मैं जो कुछ अब तक ‘सुंदर’ मान लिया गया है, उसे ‘असुंदर’ बनाता हूँ’। राजधानी दिल्ली के जीवन और कलादीर्घाओं से निकलकर जब वे मध्यप्रदेश के लोक-जीवन और आदिवासी समाज के संपर्क में आए, तो उन्हें अपने कैनवास पर मिट्टी के रंगों के साथ एक नई शुरुआत की। मेरे प्रिय नाटककार, कनाडा के आदिवासी लेखक टॉमसन हाईवे की जैसी भाषा –‘थ्री रेज़ सिस्टर्स’ और ‘आटा मूव तो कैपसकेसिंग’ जैसे स्लम और पटरियों की नागरिकता की भाषा की कलात्मकता।
    यह तो पता नहीं, मैंने कभी पूछा भी नहीं कि संजय चौहान, जिन्होंने ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘आई एम कलाम’ जैसी फ़िल्मों की पटकथा लिखने के लिए राष्ट्रीय सम्मान और ‘पान सिंह तोमर’ के लिए ‘फ़िल्मफ़ेयर’ अवार्ड हासिल किया, ने कभी अपने इस अप्रतिम हमनाम संजय छेल से भेंट की या नहीं लेकिन संजय छेल अभी भी पहले जैसे ही सक्रिय हैं। उन्ही के शब्दों को उद्धृत करें तो : ‘ऐसी कहानी की आदिम परिभाषा अब तक सुनते आ रहे हैं तो उस मायने से मेरी ये कहानियाँ भी मेरे हँसते-रोते जीवन को शांत करने के लिए लिखी गई हैं। शायद कहानी नाम की माँ को ढूँढने के लिए? …और जैसा मेरा जीवन है, वैसी ही मेरी कहानियाँ। इनमें अच्छा-बुरा, सच्चा-झूठा…ये सब मेरे जीवन एवं व्यक्तित्व का आइना हैं’।
    यही संजय छेल के कथा-संसार में दाख़िल होने का दरवाज़ा है। उनकी कला के रहस्यलोक को डिकोड करने या कहानियों के उस अबूझमाड़ के बंद टेल को खिलने वाली कुंजी।
    मैं इस संग्रह के पाठकों से उनकी अद्वितीय या बेजोड़ कहानी –‘पोस्टर’ पढ़ने की गुज़ारिश अवश्य करता हूँ । इस कहानी में एक गुज़रे हुए समय, समाज और सिनेमा की कभी न भुलाई जा सकने वाली एक क्लासिक अनुगूँज है। जैसे कोई अमर शोकगीत। बहुत मंद्र स्वर में पार्श्व में सुनाई पड़ता कोई मर्सिया।
    अगर आप किसी बड़े शहर या महानगर से गुज़र रहे हों और मुख्य चौराहे पर सामने टंगे किसी विशाल होर्डिंग में कोई चमकदार, ग्लैमरस, लुभावना ब्रांड एंबेसडर स्टार की मारक मुस्कान दिखाई पड़े, तो ‘पोस्टर’ पढ़ने के बाद आपको वहाँ या तो अपना चेहरा दिखाई देने लगेगा, या फिर इस कहानी के बदहाल पेंटर ‘मंगल’ का चेहरा।
    नए साल 2026 में संजय छेल के इस कहानी संग्रह के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

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