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  • कुमाऊँ प्रवास: यही है वह दिन के जिसका वादा था

     

    युवा लेखिका प्रदीपिका सारस्वत ने अपने कुमाऊँ प्रवास के अनुभवों को डायरी रूप में दर्ज किया है। उसका एक चुनिंदा अंश उन्होंने जानकी पुल के पाठकों के लिए साझा किया है। आप भी पढ़िए-

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    यह सप्ताहांत बाकी सप्ताहांतों से बहुत अलग बीता. यह पंक्ति टाइप करने के बाद मैं उसे मिटा देना चाहती हूँ. अगर यह किसी कहानी की पहली लाइन होती, तो कितनी ऊबाऊ लगती. पर मैं इसे नहीं मिटाती. न यह कहानी है और न ऊब कोई नई चीज़.

    शुक्रवार की शाम से सामने की पहाड़ियों पर बादल आने लगे थे. साढ़े पाँच-छह के करीब छोड़ी बूँदाबाँदी होने लगी. काम समेट कर मैं अपनी आँगन-नुमा बालकनी में आ बैठी. पर उतना काफ़ी नहीं था. मैं भीगना चाहती थी. सामने की सड़कों और गलियों पर लोग नहीं थे. मैंने घर को ताला लगाया और एक सड़क छोड़कर अगली सड़क के लिए सीढ़ियाँ उतर गई. इतनी हल्की बूँदें थी कि पाँच सौ मीटर चलने के बाद भी टीशर्ट का जामुनी रंग ज़रा ही गहरा हो सका. खैर, ठीक ही हुआ. मैं सोच रही थी कि दीपू अगर यहाँ होती, तो मुझे ये भी न करने देती. कहती कि तुम ज़रा सा भीगी तो बीमार हो जाती हो. मैं वापस लौट आई.कुछ किताबें मंगाई थीं, तीन उपन्यास अलग-अलग लेखिकाओं के, एक उपन्यास एक फिलॉसफ़र का लिखा हुआ और एक कविता संग्रह. दो किताबों पर आँखें टिकी हुई थीं. एक-एक कर दोनों को थोड़ा-थोड़ा पढ़ा.

    सोने से पहले तय करना था कि कल जहाँ मैं जाने वाली थी वहाँ जाना है कि नहीं. कोई 50 किलोमीटर दूर एक गाँव जाने को सोचा था. पर सोते वक्त तक कुछ तय न हो सका. तय करके ज़्यादा कुछ नहीं किया जा सकता. मैं तो इन दिनों तय करके नाश्ता तक नहीं बना पाती. खिड़कियों के बाहर इतने सफेद बादल इकट्ठे हो चुके थे कि सब उन्हीं पर छोड़ देना बेहतर लगा.शनिवार की सुबह भी कुछ साफ़ समझ नहीं आया.

    जाऊँ, न जाऊँ. मैंने किताब उठा ली. रात को दो चैप्टर पढ़े थे जिसके. लाइफ़ बिफ़ोर मैन. आदमी से पहले ज़िंदगी, ये मेरा तर्ज़ुमा है. मतलब क्या हुआ इसका, ये पूरा पढ़कर ही बता सकती हूँ. पर दो मतलब जो इस शीर्शक से निकलते हैं, एक कि आदमी जब आया तो उससे पहले ज़िंदगी क्या थी; दूसरा कि ज़िंदगी आदमी से पहले है यानी ज़िंदगी आदमी से ज़्यादा महत्वपूर्ण है—मैं दूसरे अर्थ से ज़्यादा रिलेटेड कर रही हूँ.

    इन दिनों औरत की कहानी मुझे खूब दिलचस्प लग रही है. सुनना चाहती हूँ कि दुनिया भर की औरतें क्या कह रही हैं. क्या वो एक सी ही बातें करती हैं? क्या उन्हें ठीक से सुना जा रहा है? वो किस से और क्या कहना चाहती हैं?

    कुछ शाम पहले मालरोड पर टहलने जाते हुए मैं अल्मोड़ा किताब घर में चली गई. कितनी सुंदर किताबों की दुकान. अल्मोड़ा में अब भी कुछ तो दुकानें हैं किताबों की. यह भी एक वजह है कि यह शहर पसंद है मुझे. दो तल्ले की इस दुकान में जाना एक अलग ही अनुभव था. किताबों की दुकानें एक अलग देश की तरह होती हैं. एक ऐसा देश जहाँ के क़ायदे-क़ानून बाकी दुनिया के क़ायदे-क़ानूनों से बिलकुल अलग. यहां आकर खो जाना ही नियम है. वही इमीग्रेशन है. मैं तमाम शेल्व्स को उचक कर, झुक कर, उकडूँ बैठ कर देखती रही. शेल्व्ज़ में कई नाम ऐसे भी थे जिन्हें मैं या तो कहीं देख चुकी थी या कहीं मिल चुकी थी. ऐसे नामों को किताबों की शक्ल में देखना भी बड़ा अनोखा अनुभव होता है. बचपन में कोई नाम ऐसा नहीं होता था. अब इन नामों को यहाँ देखकर लगा जैसे कि मैं आधी इस दुनिया की हूँ और आधी पता नहीं किस दुनिया की.

    कुछ देर बाद पहली जो किताब निकाली वो एक कविता की किताब थी. कविता मैं औरत. किताब खोली. औरत की आवाज़ थी. वह गुस्से में कुछ कह रही थी. मैंने किताब को उसी पल बंद किया और वापस रख दी. आगे बढ़ गई. दूसरे तल्ले पर फिर एक किताब निकाली, यह एक संस्मरण, एक डायरी और एक कहानी के बीच का कुछ था. एक ठो शहर: एक गो लड़की. शहर में बनती लड़की और लड़की में उगता शहर: अंतरंग दास्तान. इस किताब को मैं वापस न रख सकी. मतलब कि अनामिका को मेरी दुनिया में सेंध लगानी ही थी, कविता के ज़रिए न सही, तो किसी अंतरंग दास्तान के ज़रिए.

    औरत ने बहुत कुछ झेला है, इतना कुछ कि वो अभी खुद भी ठीक से नहीं जानती. पर मैं अब उसे चिल्लाते हुए नहीं देखना चाहती. मैं यह नहीं कहती कि वह उदात्त होकर मुस्कुराती रहे. जब ज़रूरत हो वह चिल्लाए, पर… पर शायद अभी मैं खुद नहीं जानती कि मैं औरत से क्या चाहती हूँ.

    किताब का दाम चुकाते वक्त काउंटर पर बैठे भद्र पुरुष ने मुझे प्रकाशक के बारे में बताया. कोई ऊँचे अफ़सर थे प्रकाशक, ज़्यादा मुझे याद नहीं.

    किताब  को एक बांसी काग़ज़ के लिफ़ाफ़े में मुझे दिया गया. सुंदर लिफ़ाफ़ा. आगे लिखा था सभी किताबें…एक साथ…एक जगह. पर सारे लिखने वाले एक साथ एक जगह तो कभी नहीं होते. कितनी सुंदर बात, उनकी किताबें एक जगह हो सकती हैं. नीचे प्रभाष जोशी की पंक्तियाँ हैं— “किताब का छपा हुआ शब्द, मनुष्य की कल्पना को जिस तरह मुक्त करता है वैसा कोई साधन मनुष्य आज तक नहीं ढूँढ पाया है.” पीछे कुमाऊँ के लोक कवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की कविता है—जैंता एक दिन तो आलो. मुझे कविता का अर्थ नहीं पता. बस मुझे इतना पता है कि गिरीश तिवारी का नाम यहां आदर से लिया जाता है.

    आलो से मुझे कश्मीर याद आ जाता है. कश्मीर में आलो करान् का मतलब हुआ बुलाया जा रहा है.

    मैं पड़ोस के घर जाकर एक बच्चे से उस कविता का अर्थ बताने को कहती हूँ. वो अपने पिता को बुलाता है. वो मुझे बताने की कोशिश करते हैं. मैं उनके बताए अर्थ को लिख लेना चाहती हूँ। वे कहते हैं कि वे खुद लिखकर बच्चे के हाथ भिजवा देंगे.

    कुछ देर बात अर्थ आ जाता है:

    जैंता (किसी का नाम है) एक दिन ज़रूर आएगा

    इतना दर्द मत लगा

    ऐसे घुटने और सर मत टेक

    जैंता एक दिन तो आएगा, वह दिन इस दुनिया में

    जिस दिन काली रात होगी

    पानी बरसेगा और कौन किनारे लगाएगा

    जैंता एक दिन तो आएगा, वह दिन इस दुनिया में

    जिस दिन चोर उठा-पटक करेगा

    और किसी का भी ज़ोर नहीं चलेगा

    जैंता एक दिन तो आएगा, वह दिन इस दुनिया में

    जिस दिन बड़े-छोटे नहीं रहेंगे

    जिस दिन तेरा-मेरा नहीं रहेगा

    जैंता एक दिन तो आएगा, वह दिन इस दुनिया में

    चाहे हम नहीं ला सकेंगे

    चाहे तुम नहीं ला सकोगे

    मगर कोई न कोई तो लाएगा, वह दिन इस दुनिया में

    उस दिन हम नहीं होंगे शायद

    हम भी वही दिन होंगे

    जैंता एक दिन तो आएगा, वह दिन इस दुनिया में

    एक आदमी को अनुवादक बना दिया मैंने. मेरे अंदर का मैं खुश है. पता नहीं वो कौन सा दिन है, जो आएगा. मेरे अंदर का मनुष्य हो या मेरे अंदर की औरत, दोनों की किसी ऐसे दिन पर विश्वास नहीं करते जिसके लिए फ़ैज़ कहते हैं कि ‘वो दिन के जिसका वादा था.’ मुझे लगता है कि जो दिन है वो यही है.

    उस शाम किताब लेकर मैं और आगे की तरफ बढ़ गई. आकशवाणी कॉलोनी फ़ेज़ II, फिर आकाशवाणी कॉलोनी फ़ेज़ III और फिर विवेकानंद कॉर्नर, जिसे कभी ब्राइटन कॉर्नर भी कहा जाता था. उस कॉर्नर से ज़रा आगे एक पुलिया पर बैठकर मैं सूरज को डूबते देखना चाहती हूँ. सूरज डूबने में अभी वक्त है. सामने घाटी में एक छोटी सी नदी के दो मोड़ दिखाई दे रहे हैं. उसके पानी पर पड़ती ढलते सूरज की रौशनी में ऐसा लगता है जैसे वो नदी चाँदी की बनी हो. मैं अपनी ही इस उपमा से थक जाती हूँ. दिमाग हर वक्त इतना शोर क्यों करता है. हर जगह उसे कुछ और देखना है जो नहीं है. उसे कुमाउँनी शब्द में कश्मीर देखना है और पानी में चाँदी. मेरी नज़र ढलती धूप में लेटे पहाड़ी कुत्तों पर पड़ती है. अब मैं अपने आप को उनसे नाप कर देखने लगती हूँ. क्या ये कुत्ते भी बेवजह की उपमाएँ देते फिरते होंगे एक दूसरे को? आह! कितने बेवजह के खयाल हैं. मैं शांत हो जाना चाहती हूँ. मेरे सामने एक देवदार है. शाम की हवा में भी शांत खड़ा. मैं जान जाती हूँ, मैं वही देवदार होना चाहती हूँ. शांत. आखिरी दम तक शांत. खड़े रहना-खड़े रहना, तब तक, जब तक गिर न जाओ.

    मुझे नहीं पता मैं खड़े रहना कब सीख सकूँगी. कल सुबह यानी शनिवार को आखिरकार मैं अपना बस्ता पैक करके निकली. जागेश्वर के लिए. कई सौ साल पुराने उन मंदिरों को देखने से ज़्यादा मुझे देवदार के जंगलों को देखने की ललक थी. आरतोला सा जागेश्वर, पानी की आवाज़ और देवदार के पेड़ों से घिरी सकड़ के साथ-सात तीन किलोमीटर पैदल चलते हुए मुझे जो मिला वो भीड़ से भरे उन शिव मंदिरों को देखकर नहीं मिल सका. स्थापत्य के लिहाज़ से मंदिर काफी सुंदर हैं. वही कटारमल के सूर्य मंदिर जैसी स्थापत्य कला. दीवारों पर तराशे देव, स्त्री, पुरुष, शीर्श पर पहियानुमा आकृति. सोचकर गई थी कि शनिवार को वहीं रुकूँगी पर इतनी भीड़ देखकर रुकने का साहस न कर सकी. लौट आई. आरतोला से जब निकली थी, तो कोने की एक दुकान पर बैठे लड़के ने कहा था कि लौटते वक्त यहां से खाना खाकर जाना, लकड़ी पर बनता है. मैंने सोचा था कि वैसा ही करूँगी. लेकिन लौटते वक्त सीधे अल्मोड़ा जाने वाली एक टैक्सी मिल गई. मैं उस लड़के से नज़र बचाकर निकल गई. फिर कभी.

    पर अब घर जाकर खाना नहीं बनाना चाहती थी. घर के पास ही एक कैफ़े में चली गई. कैफ़े ज़ीरो वन. प्यारा सा कैफ़े है. वहां जाकर मुझे एसडीए मार्केट का काहवा याद आ जाता है. वहां काहवा ऑन द रॉक्स जैसी एक ड्रिंक भी मिल गई, मोक्ष नाम है ड्रिंक का. लड़की को मोक्ष चाहिए. दालचीनी जैसा होता है क्या मोक्ष? मैं हँसते हुए सोच रही थी. पूरी शाम वहीं पढ़ते हुए गुज़री. फिर वापस घर. घर आकर सप्ताहांत वाली सफ़ाई.  डिनर में कैफ़े से पैक कराया बचा हुआ खाना, दो चार चैप्टर्स और. दस बजे नींद. रविवार की सुबह किचेन में कुछ नया ट्राइ किया. कुछ ठीक नहीं बना. वापस आम-दही-म्यूसली-सीड्स पर लौटना पड़ा. कुछ देर पढ़ने के बाद एक नींद ली. फिर दोपहर में एक दोस्त के लिए घर देखने गई. वो भी कुछ महीने अल्मोड़ा आकर रहना चाहती है. घर पसंद आया. तब तक मौसम फिर से सुहाना हो गया था. बालकनी में बैठकर ठंडी हवा को महसूस करती रही, बादलों को वादियों में बहते हुए देखती रही. अब मैं अपनी टेबल पर हूँ. दाँई तरफ की जो खिड़की वादी की तरफ खुलती है, वहाँ अंधेरा है और दूर के गाँवों की चमकती हुई बत्तियाँ. कल फिर से कॉरपोरेट दिन शुरू हो जाएगा. लेकिन एक अच्छा सप्ताहांत बिताने के बाद अब कॉर्पोरेट सप्ताह डराता हुआ नहीं लगता. डर नहीं होना चाहिए. देवदार होने की पहली शर्त शायद यही है.

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