राहुल तोमर की नई कविताएँ

हिन्दी में कविता ऐसी विधा है जिसमें सबसे अधिक लिखा जाता है लेकिन यह भी सच्चाई है कि इसी विधा में सबसे अधिक प्रयोग होते हैं, अभिव्यक्ति की नवीनता के दर्शन होते हैं। राहुल तोमर की कविताओं में भी ताजगी है, कहने का अंदाज़ नया है। जैसे इन कविताओं में- मॉडरेटर
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बाथरूम के नलके से टपक रहा है पानी बूँद बूँद
प्लास्टिक की बाल्टी से उठती टकटक की ध्वनि
कुछ ही देर में हो जाएगी टपटप में परिवर्तित
तुम सुनोगे और सोचोगे कि कौन सा संगीत
था ज़्यादा बेहतर फिर इस प्रश्न की निरर्थकता
पर हंसोगे और करोगे अन्य कई निरर्थक
प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास
यह जानते हुए कि वहाँ भी हल की जगह आएगी
केवल हँसी
 
तुम्हारे पास प्रश्न बहुत हैं 
इतने कि उत्तर के लिए आरक्षित जगह पर भी
उग आए हैं प्रश्न चिन्ह
 
तुम कामू का द्वार खटखटाते हो और उसके घर के भीतर
कुछ समय गुज़ारकर प्रश्नों को बस एब्सर्ड भर कहना सीख
पाते हो।
 
दर्शन के चूल्हे पर जीवन को चढ़ाते हो और
जीवन के पकने के इंतज़ार करते तुम पाते हो
जली हांडी में चिपका अंधकार
नीचे होम हो चुका सारा दर्शन और
हवा में गुल जीवन की सारी
परिभाषाएं।
उदासी
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उदासी जानती है कि
कैसे लिया जाता है जीवन में प्रवेश
उसे नहीं पड़ती आवश्यकता किसी
किवाड़ को खटखटाने की
न ही वह बाहर से लगाती है आवाज़
दोस्तों और जानने वालों की तरह
उदासी धूल सी है
जो बना लेती है अपनी जगह अपने आप
बिना दिए कोई संकेत
और तब तक रहती है
जब तक कोई बुहारे नहीं
जीवन के कोनों में जमे दुख को
प्रेम की झाड़ू से
झुंड
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हमने खो दी है अपनी आवाज़
हमने खो दिए हैं अपने चेहरे
हम भूल चुके हैं अपना व्यक्तिव
हमें बस याद है अपने समूह का झंडा
हमें कंठस्थ हैं अपने समूह के नारे
हम यह मान चुके हैं कि
शर्मसार करने वाला
काम होता है एक इंसान होना
और भेड़ होने से ज़्यादा गर्वीला
कुछ भी नहीं।
सामान्यीकरण
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संकेतों को समझना कभी आसाँ नहीं रहा
तभी तो हम कभी ठीक से समझ नहीं पाए आँसूओं को
न ही जान पाए कि हँसना
हर बार ख़ुशी का इज़हार नहीं होताहमनें व्यक्ति को जीवित माना नब्ज़ और धड़कन के

शरीर में होने से
और यह उम्मीद रखी कि हमारा माना हुआ जीवित आदमी
करेगा जीवित व्यक्तियों सा बर्ताव
हम चौंके इस बात पर कि एक जीवित व्यक्ति भी हो सकता है
मुर्दे से ज़्यादा मृत
हम गुस्साए, खिसियाए
फिर, फिर हो गए सामान्य…न जाने कितनी लंबी फ़ेहरिस्त है उन चीज़ों की

जो अब इतनी सामान्य हो चलीं हैं कि उनका ज़िक्र करना तक
उबाऊ लगता है।
बारिश
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बारिश में तन गीला हो या न हो 
मन अवश्य ही भींजता है
 
मिट्टी की सौंधी गंध नथुनों में
पड़ते ही खुल जाती है
अतीत के कमरे की कोई खिड़की
जहाँ से दिखते हैं कीच में सने 
मेरे नन्हे पैर
और हँसते हुए मेरे चेहरे पर
झरती बारिश की निर्मल बूंदें
 
जवानी में हो रही इस बारिश का स्पर्श पा
भीगने लगता है मेरे बचपन का कोई कमरा
 
और औचक ही सूखी आँखों में उतर
आती है नमी
एकमात्र विकल्प
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प्रार्थना में उठे हाथ कराहते कराहते
सुन्न पड़ गए हैं
प्रतिक्षा में सूख चुकी है उनकी
आँखों की नमी
पीठ की अकड़न
गर्दन से होते हुए पहुँच चुकि है
ज़ुबान तक।
अब वे जिस भाषा में रिरिया रहे हैं
उसे सुन
उन्हें पागल कह देना ही एकमात्र
विकल्प है
दुख
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दुख वह विशाल सागर है
जो सब कुछ लील लेता है
सुख रूपी नदियाँ भी
हमें दुख नहीं चाहिए
पर जीवन हमारी चाहत के विपरीत
इसी सागर में फलता फूलता है
हम बादलों से गिरतीं ख़ुशी की फुहारों
या किनारों पर मिलती हँसी की सीपियों
या सागर में मिलने से पूर्व खिलखिलाती नदी रूपी
प्रसन्नताओं से कुछ देर को मिल सकते हैं
पर सागर के इस दायरे के बाहर
चाह कर भी जी नहीं सकते
दुख की सीमा के बाहर बस मृत्यु है।

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