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  • बातचीत
  • शिरीष कुमार मौर्य से दीक्षा मेहरा की बातचीत

    शिरीष कुमार मौर्य कुमाऊँ विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं, विभागाध्यक्ष हैं लेकिन वे मूलतः कवि हैं। उनके कविता संग्रह ‘धर्म वह नाव नहीं’ के बहाने उनकी कविताई को लेकर दीक्षा मेहरा ने उनसे यह बातचीत की है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    दीक्षा मेहरा : धर्म वह नाव नहीं कविता संग्रह के लिए विषय का चुनाव, चर्यापदों को लिखने की शुरुआत और इस शीर्षक के चुनाव के पीछे क्या प्रेरणा रही?

    शिरीष कुमार मौर्य : धर्म वह नाव नहीं का विषय जैसा कुछ नहीं है। वह जो पूरा आख्यान है और विषय का चुनाव जो है उसे लेखक नहीं किया है, वह कोई व्यक्तिगत चुनाव नहीं है। वह चुनाव कवि किस तरह से अपने समाज को देखता है, किस तरह से सामाजिक स्थितियों  को देखता है- जिनमें सामाजिक हैं, आर्थिक हैं, राजनीतिक, सांस्कृतिक हैं और जो पूरी विरासत है। अब हमने ये शब्द तो बोल दिए – सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक-  ये शब्द अपने-आप में पूरे तब होते हैं, जब हम उनको विरासत से जोड़ते हैं। हम कौन थे? कहां से चले थे? कहां तक आए? इस आने में क्या हुआ? अब हम कौन हैं? तो विषय का चुनाव कोई सायास नहीं होता। बहुत लंबी ऊहापोह होती है, आदमी दरअसल इन चीज़ों पर सोचता है। वह ये देखता है कि इन चीज़ो के बारे में विरासत में, परंपरा में कहां किस तरह से बात हुई है, फिर वह उस परंपरा तक पहुँचता है। जब वह उस परंपरा तक पहुँचता है, तो फिर उसको जोड़ता है अपने समकाल से। तो किन परंपराओं को जोड़ पाता है? धर्म वह नाव नहीं उस किताब का शीर्षक है, जो एक पंक्ति से उठा लिया गया है। विषय क्या है उसका? विषय उसका ये है कि जैसे उस किताब में एक जगह पंक्ति आती भी है ये ‘यह राष्ट्र बिना ईश्वर के नहीं रह सकता’, उसने वेदों से लेकर अंग्रेज़ों तक अपने देश का इतिहास जाना है और पाया है कि  दुनिया की हर संस्कृति में ईश्वर की अपनी जगह है। मनुष्‍यता के विकास-क्रम में जब मानव इस स्तर पर पहुँचा कि वह स्वयं के बारे में और जिस पृष्ठभूमि में, जिस परिदृश्‍य में और जिस पर्यावास में वो रह रहा है, के बारे में सोचे कि ये सब क्या है और फिर उसके मन में ये होता है कि चीजे़ं बनाने से बनती हैं। मैंने पहिया बनाया तो पहिया बना। मैंने आग पर अपने हिसाब से नियंत्रण पाना सीखा तो मैंने सीख लिया। मैंने शेल्टर बनाए, पहले मैं उड्यारों में रहता था फिर मैं उन्‍हें बनाने लग गया – पत्थरों से, लकड़ी से, घास-फूस से, मिट्टी से। तो ये चीजे़ बनाने से बनती हैं। तो जिस संसार में, मैं रहता हूँ और जो मैं खुद हूँ, इसको किसने बनाया? किसी ने बनाया होगा? तो ये संवाद- जीव का, जगत का शुरू हुआ तो उसमें एक तीसरा पक्ष आया कि ये सब फिर बनाया किसने? पहिया तो मैंने बनाया है, ये पेड़ किसने बनाया? इस पत्थर से घर या मूर्ति या औज़ार तो मैंने बनाया, ये पत्थर किसने बनाया? और जो मैं खुद हूँ, मुझे किसने बनाया? इस पूरे जीव-जगत को किसने बनाया? जब उसने ये सोचा तो ईश्वर का आगमन होता है। दरअसल ईश्वर के होने  या न होने के बारे में सोचना लॉजिकल थिंकिंग ,एक तार्किक विचार का ही हिस्सा था। अब मैं ये देखता हूं  कि ऐसा कौन सा धर्म था,  जो केवल जनता के लिए हो, जो जनता के काम आए, जनता की भाषा में हो। जब मैं अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक विरासतें देखता हूँ तो मुझे बुद्ध मिलते हैं, जिन्होंने अपने उपदेश सब तरह से शिक्षित होने के बावजूद, सब तरह से शास्त्रीय ज्ञान पाने के बावजूद और जो उनको बोध हुआ, जो उनका स्वयं का ज्ञान है, अंतः प्रेरणा से इस समाज और इस पूरे संसार में रहते हुए, जो उनकी समझ में आया, उसके लिए उन्होंने भाषा का चयन किया पालि। उन्होंने संस्कृत का चयन नहीं किया। तो जाहिर-सी बात है कि संस्कृत विशिष्ट जनों की भाषा थी, उसके जानने वाले सीमित रहे होंगे। आम आदमी बहुसंख्यक लोग  गांव की बोली बोलते होंगे, पालि यानी पल्ली की भाषा, गांव की भाषा। तो उन्होंने उपदेश दिए। उनके धर्म का प्रयोजन, उनका उद्देश्य सिर्फ़ आम आदमी से कनेक्ट करना था। दुख है अगर तो सर्वाधिक दुख तो आम आदमी के ही पास है, वही वहन कर रहा है। समस्याओं का वहन वही करता है। जो वाकई में भौतिक समस्याएँ हैं, खाने-पीने, रहने, मरने-बचने से संबंधित, उनका सामना तो एक ऐसा ही व्यक्ति कर रहा है, जो सबसे अंतिम पंक्ति का व्यक्ति है। तो दुख के समुदय क्या हैं? ऐसा नहीं है कि जो आदमी दुखी है उसके दुख का समुदय उसी में विद्यमान है। कहीं और भी विद्यमान हो सकते हैं। किसी अत्याचार की वजह से भी वह दुखी हो सकता है। किसी अनाचार और शोषण की वजह से भी दुखी हो सकता है। बुद्ध ने उससे उसकी भाषा में बात करनी चाही, उससे उसकी भाषा में संवाद करना चाहा। मोह पर, प्रेम पर, लोभ पर, तृष्‍णा पर तमाम चीज़ो पर, जो भी उन्होंने पाया कि ये समुदय हो सकते हैं, ये कारण हो सकते हैं , उन पर उन्होंने संवाद किया। इन्‍हीं के रूपक लिए…उन्होंने धर्म पर बात की। उन्होंने बहुत सारी बात मुक्ति पर की, उन्होंने बाक़ायदा अज्ञान पर बात की। ये अज्ञान क्या है? तो ये सब उन्होंने आम आदमी की भाषा में किया, तो ये धर्म शायद सबसे ज्यादा आम आदमी के काम आने वाला था, लेकिन बुद्ध के जीवन काल में ही वह सत्‍ताओं के काम आने लगा। अशोक जब सैन्य सामर्थ्य से सब कुछ जीत गया तो बौद्ध हो गया। मैंने लिखा भी है उसके बाद उसके दूत, उसके भिक्षु  सुदूर पूर्व तक गए। तो ये किसका विस्तार था? बुद्ध की करुणा का कि अशोक के साम्राज्य का विस्तार था, जिसे आप आध्यात्मिक धार्मिक विस्तार मान सकते हैं? वहां तक सैन्य विस्तार तो नहीं कर सकते, लेकिन क्‍या इस तरह से यह संभव हुआ? अशोक महान हो गया। आम जनता कहां रही? वहीं रही और बुद्ध धर्म में ईश्वर नहीं है, तो बुद्ध को ही ईश्वर मान लिया उनके अनुयायियों ने, तो इस तरह भी मालूम होता है कि ये देश बिना ईश्वर के नहीं रह सकता। ये जो धर्म, सत्ता और प्रजा किंवा जनता का ये त्रिकोण हैं, इसको समबाहु- समकोणीय होना चाहिए। इस बारे में ये किताब बात करती है और ये बुद्ध से संवाद करती है। बुद्ध की देशनाएं, बुद्ध के उद्देश्य उसे सबसे ज्यादा निकट लगते हैं संवाद करने के। आदमी उससे बात करता है, जिसको वह सबसे ज्यादा आत्‍मीय पाता है।

    दीक्षा :  आज धर्मों और संप्रदायों के बीच फैली नफ़रत और प्रायोजित हिंसा के बीच आपकी यह कथा-गाथा आम जनों के लिए करुणा के साथ सद्भाव का उजास भी है। निजी तौर पर आप धर्म को किस तरह देखते हैं?

    शिरीष कुमार मौर्य :  यह आज फैली नफ़रत नहीं है धर्मों में, मान्‍यताओं में, आस्‍थाओं में। आपसी विद्वेष बहुत पुराना है। ऐसा नहीं है कि वह आज की घटना है। हम आज के दौर में पैदा होकर अगर आज को देख रहे हैं, तो यह जरूरी नहीं वह आज का है। किसी पेड़ को हम आज देख रहे हैं, तो जरूरी नहीं कि वह आज का है। पेड़ सौ साल पुराना, डेढ़ सौ साल पुराना भी हो सकता है। इमारतों को देखते हैं तो वह आज कि नहीं तीन सौ-चार सौ साल पुरानी, बल्कि दो हजार साल पुराने स्‍थापत्‍य भी हैं – यही सामाजिक प्रक्रियाओं का भी है। ये सामाजिक प्रक्रियाएं, जिसमें इस तरह की संरचनाएं, जो सांप्रदायिक और धार्मिक आस्‍थाओं पर आधारित संघर्ष हैं, जो और हिंसक हो गए हैं, ये भी आज के नहीं हैं। जब-जब इन आस्‍थाओं का, पंथों का, विश्‍वासों का जन्‍म हुआ पुराने से संघर्ष हुआ ही हुआ और लोग अपनी आस्‍थाओं को लेकर बहुत कट्टर होते हैं। दुनिया में सबसे खराब चीज़ है कट्टरता। अगर आप बहुत भले काम को भी बहुत कट्टरता से करेंगे तो उसमें चूक हो जाएगी। बजाय बहुत उथले धर्म-संप्रदाय में आने से अच्‍छा है कि हम उस मूल समस्‍या को जाने जिसे हम कहते हैं कट्टरता। भारतीय सांस्‍कृतिक विरासत में ये कट्टरता कमोबेश कम रही है। हमारी सांस्‍कृतिक विरासत में अलग-अलग चीज़ों को मानने वाले पहले भी हुए हैं। बौद्धों से संघर्ष हुआ, पूरे ब्राह्मण धर्म का संघर्ष हुआ, लेकिन वह बाद में हुआ। जब बुद्ध नई दृष्टि को लाए तो ऐसा कोई तात्‍कालिक बड़ा संघर्ष नहीं हुआ। बड़े-बड़े सम्राट और राजा उसको स्‍वीकार करते गए। कथाएं बताती हैं कि चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य ने 67 साल की उम्र में जैन धर्म स्‍वीकार कर लिया था। 67 साल की उम्र तक ही चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य का पता है, जब वे जैन धर्म स्‍वीकार कर निकल गए, उसके बाद उनका नहीं पता। संघर्ष बाद में बढ़ता गया तो कब बढ़ा? जब समावेशी भावना खत्‍म हुई, कट्टरता बढ़ी। जब  परंपरागत धार्मिक पद्धतियों में कट्टरता बढ़ी, उसका जो अभ्‍यास था, वो कट्टरवादी होता गया और वर्ण आधारित होता गया। ये पद्धतियां कुछ लोगों की संपदा बन गई कि क्‍या कैसे किया जाए? कैसे अनुष्‍ठान होंगे? कैसे क्‍या होगा? क्‍या नहीं होगा? जब ये बजाय स्‍किल और ज्ञान के, वर्ण पर स्‍पेश्‍लाइज्‍़ड हो गया, तब संघर्ष बढ़ा। उसके बाद आप देखेंगे, इतिहास उठाइए मुझे कुछ बोलने की आवश्‍यकता नहीं है। कट्टरता बढ़ती गई और बहुत संघर्ष हुए, बौद्धों से भी हुए।  एक मान्‍यता के अंदर की मान्‍याताओं के बीच भी हुए। शैवों और वैष्‍णवों के संघर्षों का बहुत बड़ा इतिहास है। दक्षिण भारत पूरा शैव था। अभी कौन है, जो वैष्‍णव हैं वहां? वर्ण विशेष।  बहुसंख्‍यक शैव हैं और शैव में भी मान्‍यताएं हैं। कट्टरता ही किसी तरह के संघर्ष को जन्‍म देती है। मूल रूप से जब व्‍यक्ति बहुत कट्टर होता जाता है, तभी ये सब होता है। तो आज की स्थिति भी वही है, पहले भी वही थी, तो ये संघर्ष आज का नहीं है। ये मेरी किताब भी कहती है, कट्टरता सबसे पहले तार्किक शक्ति का विरोध करती है विवेक छीन लेती है तर्क छीन लेती है आपसे, ईश्‍वर के होने का जो तर्क दिया मैंने,  ईश्‍वर जितना है, जितना नहीं है, उस ईश्‍वर को नहीं छीन सकते, उसका होना न होना, वह तर्क है। अवतारों के भी तर्क हैं। तुलसी के रामचरित मानस का बहुत बड़ा तर्क है, उस लौकिकता का तर्क है1 जो चीज़ तर्क पर होती है, वह सद्भाव ही पैदा करती है। तुलसी की रामचरित मानस ने किसी प्रकार का वैमनस्‍य उत्‍पन्‍न नहीं किया, न सूर की बाल लीलाओं ने किया। कट्टरता… दुनिया में ईसायत जब आई, जब ईसा मसीह जैसे सहिष्‍णु और करुणावान व्‍यक्ति के उपदेश रोमन साम्राज्‍य के जरिये आगे बढ़े, क्रूसेड होने लगा। आपको भारतीय परंपरा में कहीं मिलता है कि हमारी किसी परंपरा ने किसी दूसरी आस्‍था के विरूद्ध धर्मयुद्ध छेड़ा हो, ईसाइयत से ज्‍यों की त्‍यों कुछ चीजे़ं कमोबेश इस्‍लाम ने उठाई। यहूदियों के और ईसाइयों के महापुरूष इस्‍लाम के पैगंबर भी हैं, ईसा पैगंबर हैं वहां, मूसा पैगंबर हैं, इब्राहिम हैं। उसी क्रूसेड की वज़न पर यहां जिहाद हुआ। किसी भारतीय परंपरा में ये आपको नहीं मिलेगा। संघर्ष मिलेंगे आस्‍थाओं में, पर कोई मेरा धर्म श्रेष्‍ठ है करके धर्मयुद्ध छेड़ देगा, ऐसा नहीं मिलेगा। जो ईश्‍वर तर्क पर आधारित है उसे नकार नहीं सकते। दैवीय अस्तित्‍व के रूप में नहीं, मनुष्‍य की परिकल्‍पना के रूप में ईश्‍वर है, ईश्‍वर रहेगा, वह मानव विकास-क्रम की आवश्‍यकता है, उसके साथ विकसित हुआ है, यह शायद इस पूरी प्रजाति के अंत तक रहेगा। बाघों का ईश्‍वर नहीं है, कुत्‍तों का ईश्‍वर नहीं है, जब ये हमारे जीवन का हिस्‍सा बने तो हमने उनमें भी ईश्‍वर की कल्‍पना की, वहां भी ईश्‍वर के रूप दिए, हमने उनको वाहन बनाया है उनका अवतार भी बनाया है। हमने कछुए को अवतार बनाया, हमने तो वराह तक को अवतार बनाया है। हमने श्‍वान तक को भैरव का रूप दिया है। मानव-जाति से जुड़ी हुई सब चीज़ों को हमने घुला-मिला लिया है हमारी विरासतों में। तो इसलिए उसमें गुंजाइश बनी रहीं। दुनिया के किसी धर्म ने जानवरों को उस तरह मान्‍यता नहीं दी। इस्‍लाम के उलेमा कहते हैं कि जिस घर में कुत्‍ते पले हो वहां रहमत के फ़रिश्‍ते नहीं आते, शानी की एक कहानी भी है इस पर। आपको असहिष्‍णुता सिखाई जा रही है, जानवरों के प्रति भी। कुत्‍तों को दूर रखो, गिरगिट जहां मिले, उसे मार दो क्‍योंकि मोहम्‍मद साहब अपने समय में जब अपने शत्रुओं से छि‍प रहे थे तो एक उड्यार में छि‍पे, वहां एक गिरगिट धूप सेंक रहा था। जब उनके शत्रु उनको मारने गए तो धूप सेंकता जो गिरगिट होता है, उसकी आदत होती है वह अपनी गर्दन को उपर-नीचे करता है, तो उसको प्रतीक मान लिया गया कि वह शत्रुओं को मोहम्‍मद साहब का पता बता रहा है। और एक मकड़ी ने उस उड्यार पर जाला मढ़ दिया तो मकड़ी को अच्‍छा मानते हैं। ये कट्टरता प्रकृति के लिए भी किस्‍से-कहानियों ने पैदा कर दी। शानी के काला जल में मोहसिन गौरैयों का शिकार करता है, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि शानी को अवश्‍य पढ़ें, उनके जैसे लेखक अनमोल होते हैं। हम सौभाग्‍यशाली हैं कि किसी जीव विशेष के लिए ऐसी कट्टरता हमारी किसी पुरानी सांस्‍कृतिक विरासत ने विकसित नहीं की। हां अब इस तरह के झगड़े बढ़े हैं।  हम भी जिस दिन कट्टर हो जाएंगे या हो रहे हैं तो फिर दिक्‍कत हो जाएगी। जो हमारी सबसे बड़ी ताकत है, वो सद्भाव तभी हो सकता है, जब तार्किकता हो। सद्भाव भावनात्‍मक चीज़ लगती है, वह बहुत ही तार्किक चीज़ है।

    दीक्षा मेहरा  :  उत्तर आधुनिक दौर में जहां एक ओर मानव का समाज से संवाद खत्म होता जा रहा है और वह स्वयं भी संवाद नहीं कर पा रहा है ऐसे में इतिहास को जोड़ते हुए आज के उत्तर-आधुनिक अनुभवों को आप भद्रक के संवादों में इतनी सुंदरता से कैसे अभिव्यक्त कर पाए?

    शिरीष कुमार मौर्य : इसके पहले आपको ये देखना पड़ेगा कि आधुनिक दौर क्या है? पोस्ट मॉडर्न और पहले मॉडर्निज्म तक तो तब जाएंगे। भारतीय संदर्भ में आधुनिक हैं हम? चार-पांच मूल सिद्धान्‍तों को मिलाकर आधुनिकता की जो पूरी सैद्धांतिकी है, वो आदमी को आदमी से तोड़ती हो, ऐसा नहीं है। उत्तर-आधुनिक सैद्धांतिकी तो पर्यावरण की चिंता बहुत ही कर रही है। ऐसा भी नहीं कि वो प्रकृति से तोड़ रही है। तो आप जिसको उत्तर-आधुनिक कह रहे हो, दरअसल वो बहुत उथला-उथला उपभोक्तावादी बाजारवादी दौर है। उसका उत्तर-आधुनिकता से एक ही छोर मिलता है टेक्‍नोलॉजी का। जो उत्तर आधुनिकता कहती है कि ग्रैंड नेरेशंस, मेगा नेरेशंस, मेटा नेरेशंस का अंत हो गया है और अब लोकिल का जमाना है महान वृत्तांत नहीं। तो आधुनिकता के दौर के महान वृत्तांत क्या हैं? विज्ञान है, रेनेसां की पूरी हिस्ट्री है। नवजागरण की जो हिस्ट्री है, वही आधुनिकता की हिस्ट्री है, तो एक वृत्‍तांत यह है। यहां विचार है – आधुनिक विचार अस्तित्ववाद है, साम्‍यवाद है, ये वैचारिक आख्यान हैं बड़े, जो दुनिया-जमाने की बात कर रहे होते हैं। एक विचार अस्तित्ववाद मनुष्य के मूल अस्तित्व की बात कर रहा है, दूसरा उसमें अदर को जोड़ता है। वो कह रहा है एक जैसे मनुष्य सब पूरी दुनिया में हैं। तो ये मेगा नेरेशंस अब नहीं हैं, ऐसा उत्तर आधुनिकता कहती है। लोकेल है- विचार में तो समझ में आता है, लेकिन विज्ञान भी है, विज्ञान से ही तो सब कुछ हुआ है। चीजे़ं जो सर के बल खड़ी थी वो अब पाँव पर खड़ी हैं। अब राहु चांद को नहीं खाता, अब हमको पता है कि कुछ है जो चांद और सूरज के बीच आ जाता है, तो चंद्रग्रहण हो जाता है। सूर्यग्रहण हो जाता है तो हमको पता है कि क्यों हो जाता है। हनुमान जी ने नहीं खाया है। विज्ञान एक महान आख्‍यान है। अब तो अगर विचार लोकेल में होगा तो कहाँ जाएगा? समुदाय में जाएगा, सम्‍प्रदायों में जाएगा, स्थानीयताओं में जाएगा। विज्ञान लोकेल होगा तो कहाँ जाएगा? टेक्‍नोलॉजिकल डेवलपमेंट होगा। क्या कोई बड़ी वैज्ञानिक खोज हुई पिछले 50 सालों में, जिसने चीज़ों को बिलकुल आमूल-चूल बदल दिया हो? आधुनिकता के दौर में तो हुई। सापेक्षता का सिद्धांत और पहले से आरंभ करो तो न्यूटन है और पहले जाओ तो गैलीलियो है, कोपरनिकस है। मैथेमेटिक्स का पूरा विकास है। विज्ञान का पूरा विकास है, जिसने दुनिया बदल दी। पिछले 50 सालों में क्या हुआ है? टेक्‍नोलॉजिकल डेवलपमेंट हुआ, टेक्‍नोलॉजी का मूल स्रोत क्या है? विज्ञान, तो मतलब टेक्‍नोलॉजी विज्ञान का लोकेल है। तो टेक्‍नोलॉजिकल डेवलपमेंट से और सामुदायिकता, स्थानीयता पर केंद्रित होने से चीज़ें नष्ट हुई हैं। जो बिखराव आया है, देरिदा ने कह दिया कि यह बेलगाम अलगाव है। इसी वजह से जो ये कंडीशनिंग है आपकी, इसका क्या करोगे? दुनिया ने ये करवट ले ली है। हिन्‍दुस्‍तान की बात करें तो ,जिसने मनुष्य को मनुष्य जैसा नहीं माना है, वो समाज आधुनिक तो नहीं है तो उत्तर-आधुनिकता तो बहुत दूर की बात है। उत्तर-आधुनिकता की जितनी भी नेगेटिविटी हैं, वो तो बाजार से अपने-आप आ जाएंगी। हमारे वहाँ यही हुआ है कि कुछ नकारात्मक चीज़ें तो आई हैं उत्तर-आधुनिकता के साथ-साथ। वो कहाँ से आई है? वो थ्‍योरी के रूप में नहीं आई हैं, वो जीवन-अभ्यास में आई हैं इस बाजार की वजह से। वो पूंजी से आई हैं, पैसे से आई हैं।

    दीक्षा :  हमेशा से मनुष्यता के प्रति आपका गहन सरोकार रहा है क्या यह आपके लेखन की पहली शर्त है या इसकी कोई खास वजह है?

    शिरीष कुमार मौर्य :  ऐसा है कि मेरा मनुष्यता के प्रति गहन सरोकार रहा है लेकिन मेरी ही पंक्ति है पिछले संग्रह में कि हमने पाश्विकता की नीच परिभाषाएँ लिखी हैं और जैसे-जैसे मेरा संसार बढ़ा, जैसे-जैसे मैं और इस संसार को गहराई से जानता गया, मैंने ये पाया कि मनुष्य पाशविक होते गए हैं, तो मनुष्यता और पाशविकता जैसी किसी चीज़ में अब मेरा कोई विश्वास नहीं है। मनुष्य होने से ही हम श्रेष्ठ हैं, ऐसा कुछ नहीं है। हम इतने मनुष्य केंद्रित क्यों हैं? बहुत मनुष्य केंद्रित होने से हमने बाकी संसार को उपभोग की वस्तु मान लिया है। बस मनुष्यता के काम आ जाए। एक पेड़ मनुष्यता के काम आ जाए, एक पशु, एक नदी, एक जंगल काम आ जाए।  सारी प्रकृति दोह ली हमने। अपना पर्यावास, अपना ग्रह खत्म कर दिया। मनुष्यता जो थी मूल रूप में, वो ये थी कि मनुष्यता सबके साथ है, वो प्रकृति से भी प्रेम है, हवा-पानी से भी है, अपनी मिट्टी से भी है, पशुओं से भी है, वृक्षों से भी है, पूरी सराउंडिंग से है। सिर्फ मनुष्य का मनुष्य से प्रेम हो, सिर्फ मनुष्य ही महत्वपूर्ण हो, मनुष्य के लिए ही सारा संसार है, मनुष्य ही सबसे ऊपर है, ऐसी मनुष्यता में मेरा कोई भी विश्वास नहीं है। ऐसी मनुष्यता, जिसमें इतनी हिंसाएँ होती हैं, ऐसी मनुष्यता, जिसमें इतने बलात्कार होते हैं, कहाँ जाती है वो मनुष्यता? कोई पशु बलात्कार नहीं करता, कोई पशु राह चलते अपनी प्रजाति की मादाओं को नहीं छेड़ता, कोई पशु किसी को लूट के ये सब नहीं करता। कोई पशु अन्यथा भंडारण नहीं करता। एक बाघ को भूख लगती है, एक हिरण को मारता है, उसके बाद सात दिन उन्हीं हिरणों के बीच में बिंदास घूमता है, हिरण भी बिंदास रहते हैं। वो जब मार रहा है, तो वो ये नहीं करता है कि छह हिरण मार के एक जगह कर दिए कि बाद में खाऊँगा। जब तक बच्चे खुद शिकार नहीं कर पा रहे, तब तक माँ खिलाती है उनको, बाद में भगा कर भेज देती है कि जाओ अब। हममें संग्रहण है, हममें लालच है, अगर कोई इंसान या ये मनुष्यता जो लालच को, लोभ को, लिप्सा को बढ़ाती है तो ऐसी मनुष्यता में मेरा कोई विश्वास नहीं है।

    दीक्षा मेहरा :  ‘धर्म वह नाव नहीं’ में आख्यान, कथ्य की सघनता, शिल्प की नवीनता और संवेदनात्मक गहराई है, एक साथ ये कैसे संभव हुआ?

    शिरीष कुमार मौर्य :  जब आप अपने विषय के साथ आत्मीय हैं, तो सब कुछ संभव होता है। मैं और आप उदाहरण के लिए जैसे अभी बात कर रहे हैं, क्या आप और कोई बात करते हो ऐसे? हम गंभीर बात कर रहे हैं, सैद्धांतिक बात कर रहे हैं, गंभीर सामाजिक-राजनीतिक बात कर रहे हैं, पर सहज बात कर रहे हैं बतकही कह सकते हैं। हम एक समान भूमि पर बात कर रहे हैं, तो सहजता रहेगी। मैं जो करता हूँ, वो मैं अपनी तरफ़ से कोई ये नहीं बनाता हूँ कि मैं बहुत बड़ा आख्यान लिखने जा रहा हूँ। मैं कुछ विशिष्ट करने जा रहा हूँ। विशिष्ट कुछ नहीं होता। जो साधारण होता है, वही दरअसल असाधारण होता है। जो सामान्य होता है, दरअसल वही विशिष्ट होता है। अंतत: पाओगे कि क्षुद्रताएँ बड़े काम कर जाती हैं, जिनको हम ट्रिविया समझते हैं। महानताओं की बड़ी पोल-पट्टियाँ खुलती हैं। महान से महान व्यक्ति की मूर्ति ऐसे गिरती है धड़ाम से आपके सामने, आपको लगता है अच्छा ये ऐसा था। महानता थोप दी जाती है। महात्मा गाँधी महान थे, सामान्य-सहज होने के नाते महान थे। कई कमजोरियाँ थीं, उनको वे खुद स्‍वीकारते हैं। महात्मा गाँधी महान इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य के प्रयोग लिखे हैं, उन्होंने अपने ऐसे प्रसंग लिखे हैं, जो आदमी कानों-कान खबर नहीं होने देता। रामचरितमानस के राम महान हैं, क्यों? जीवन में उनकी गत ऐसी हुई है, जैसी एक आम आदमी की भी नहीं होती। ऐसे संकट, ऐसी समस्याओं का सामना किया है उन्होंने, जिसका आम जीवन में आम आदमी भी इस हद तक नहीं करता। उस आदमी का परिवार उजाड़ दयिा गया, उस आदमी का जीवन नष्ट हो गया, वो भगवान है। राम ने ये जीवन जिया है, इसलिए महान हैं। राम विष्णु से महान हैं, जिसके वो अवतार हैं। विष्णु मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं। विष्णु का अनुकरण करने को नहीं कहेंगे, राम का अनुकरण करने को कहेंगे, क्योंकि वो सामान्य जमीन पर रहे, आम आदमियों की तरह उन्होंने दुख उठाए, वे लड़े हैं, उनसे कभी पार पाया कभ्‍ज्ञी नहीं पाया और मानवीय कमजोरियाँ उनमें रही हैं। पत्‍नी को घर से निकालने का कलंक उनके सिर पे है, अमर हो गया है उनकी महानता के साथ वो भी। अग्नि परीक्षा लेने का कलंक उनके सि‍र पे है। लेकिन इन सारी कमजोरियों के बावजूद वो एक नायक के रूप में उभरते हैं। वो अनुकरणीय हैं, वो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। जितनी निभाई जा सकती है सर्वोच्च उन्होंने निभा के दिखाई। महानता भी एक बड़ी चीज़ है, विशिष्टता भी बड़ी चीज़ है लेकिन मूल मंत्र तो सहजता में ही है।

    दीक्षा :  आपका लेखन आपके किन पूर्व प्रिय कवियों/रचनाकारों से प्रभावित रहा?

    शिरीष कुमार मौर्य :  देखो जो आदमी पढ़ता है, उसका लेखन पर असर रहता है। भावों पर असर रहा है, ऐसा नहीं है, लेकिन आप एक संरचना में लिखते हैं, तो शिल्प पर असर रहा है, कई बार भाषा पर भी असर रहा है। मुझ पर बहुत आरंभिक दौर में जब मैं 18 साल का था मुझ पर थोड़ा असर केदारनाथ सिंह का रहा है लहजे में। विषयों में, सोचने के ढंग में, मैं अपनी तरह से लॉजिकल हूँ। ऐसा भी नहीं कि मैं उनकी तरह बिंबवादी था, लेकिन कुछ शैली-शिल्प का असर रहा है। बाद में मैंने कभी जब मैं उनसे मुक्त हुआ तो उन्‍हें किशोर सम्मोहन का कवि कहा। जब आप 18-20 के होते हैं, तो आप उनसे प्रभावित होते हैं। जब मैं मूल समाज में चला गया, तो मुझे मुक्तिबोध अच्छे लगने लगे। लेकिन मुक्तिबोध का ऐसा कोई असर तो नहीं रहा। भाषा पर मेरी एक जमाने में कुछ जगह, क्योंकि आप जिस जीवन को जीते हैं, तो वीरेन डंगवाल का असर रहा है और वीरेन डंगवाल पर त्रिलोचन का, शमशेर का, नागार्जुन का असर रहा है, प्रसाद जी का असर रहा है। तो ये मुद्दा तो ऐसा होता है, उसके बाद फिर मैं कई तरह से तोड़-फोड़ करके निकला तो अब आप मेरे हर संग्रह की भाषा आपको अलग मिलेगी। मेरा ख़ुद का ही मुझ पर कोई असर नहीं। फिलहाल मैं किसी असर से मुक्‍त हूँ, लेकिन विरासत साथ रहती है, अब आप उसको असर मान ले या कुछ मान ले, पुरखे साथ चलते हैं। सैकड़ों साल पहले के पुरखे मिथक बन के चलते हैं। कुछ वर्षों के पुरखे स्मृति बन के।

    दीक्षा :  लेखन की आगामी योजनाएँ?

    शिरीष कुमार मौर्य :  मैं योजना बनाकर नहीं लिखता। जैसी दुनिया मेरे आगे खुलेगी वैसा खुद ही लिखना शुरू हो जाएगा, तो योजनाएँ जैसी नहीं हैं। मतलब ऐसा होता है कि आलोचना की, वैचारिक काम की तो कोई योजना हो सकती है, कविताओं की योजना नहीं होती है। कौन सा पहलू बदलेगा संसार, निजी से लेकर सामाजिक तक सामाजिक से लेकर सांसारिक तक, उसमें मैं क्‍या लिखूंगा, तभी पता लगेगा – आपको ही नहीं, मुझे भी।

    दीक्षा :  कवि/आलोचक के तौर पर एक संदेश जो आज युवा पीढ़ी को देना चाहे-

    शिरीष कुमार मौर्य : मैंने जो कुछ लिखा है, जो मैं कहना चाहता हूँ, वो मैंने अपनी किताब में कहा है। अलग से संदेश देना, उपदेशक बनना, सीख देना ये मेरे उसूलों के ख़‍िलाफ़ है। मैं नहीं बता सकता किसी को कि आपको क्या करना चाहिए। संसार देखिए, अपना जीवन देखिए और तर्क कभी मत छोड़िए। कचरे-कूड़े से अलग रहिए सीख तो बहुत हो सकती है। यथार्थ को जानिए अपने भी, संसार के भी और देखिए कि कितने सुंदर स्वप्‍न उसमें देखे जा सकते हैं।

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    डॉ. दीक्षा मेहरा

    असिस्‍टेंट प्रोफेसर(संविदा) – हिंदी

    कुमाऊँ विश्‍वविद्यालय, नैनीताल

    सम्‍पर्क : 9759739015

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