• बातचीत
  • किरण देसाई से जया भट्टाचार्जी रोज़ की बातचीत

    बुकर पुरस्कार विजेता उपन्यास द इनहेरिटेंस ऑफ़ लॉस (2006) की लेखक किरण देसाई लगभग बीस साल बाद अपने नए उपन्यास ‘द लोनलिनेस ऑफ सोनिया एंड सनी’ के साथ पाठकों के बीच लौटी हैं। उनका यह नया उपन्यास साल 2025 के बुकर पुरस्कार की शॉर्टलिस्ट में पहले ही अपनी जगह बना चुका है। जया भट्टाचार्जी रोज़ के साथ अपनी इस रोचक बातचीत में किरण ने अकेलेपन और कहानियों को आकार देने रिक्त स्थानों(व्हाइट स्पेसेज) के बारे में बताया है। यह बातचीत कल टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुई थी। यह आपके लिए साभार प्रस्तुत है, जिसका हिन्दी अनुवाद किया है कुमारी रोहिणी ने- मॉडरेटर

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    1 प्रश्न: आप अपने इस नये उपन्यास के विषय में संक्षेप में कुछ बताएँ।

     

    उत्तर: मैं हमेशा से अकेलेपन और प्रेम के संदर्भ में आध्यात्मिक लोगों पर आधुनिकता के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में लिखना चाहती थी। दरअसल मूल रूप से मैं अकेलेपन और प्रेम की प्राथमिक अनुभूतियों को पकड़ना चाहती थी। शुरुआत में मैंने हमारे बीच पसरे अकेलेपन पर बात करने के बारे में सोचा था। केवल प्रेम या रोमांस के रिश्ते के संदर्भ में ही नहीं बल्कि राष्ट्रों, नस्लों और वर्गों के बीच की गहरी खाइयों के संदर्भ में। मेरी नज़र में ये सभी अकेलेपन के ही अलग-अलग रूप थे। अंत में मुझे एहसास हुआ कि इसे सशक्त ढंग से व्यक्त करने का सबसे बेहतर माध्यम एक प्रेमकथा ही हो सकती है। इस कथा के केंद्र में सोनिया और सनी हैं। यह एक लंबी अधूरी प्रेमकहानी है जो उन दोनों को दुनिया के कई हिस्सों में लेकर जाती है। यह वास्तव में एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसे हम ग्लोबल देसी कह सकते हैं।

    2प्रश्न: आपके पास देशी और विदेशी, दोनों ही तरह की दृष्टि है। और केवल स्त्रियों या पुरुषों पर ज़ोर न देकर आपने संघर्षों को सामने लाने का काम किया।

    उत्तर: थैंक यू। भारत में पहली बार मुझसे किसी ने ऐसा कुछ कहा है। मुझे इस बात का भी एहसास था कि शायद यह आख़िरी बार था जब मैं भारत को इतनी गहराई से लिख सकती थी। क्योंकि मैं अपने दादा-दादी के समय को पकड़ना और दर्ज करना चाहती थी, इससे पहले कि वे मेरी यादों से ओझल हो जाएँ। हालाँकि आज भी मेरा भारत आना-जाना होता है – मेरा भाई हैदराबाद में रहता है, मेरे कुछ रिश्तेदार कोलकाता और देहरादून में हैं। लेकिन अपना पारिवारिक घर जैसा अब कुछ रह नहीं गया है। मुझे मालूम था कि भारत के बारे में गहराई से लिखने की मेरी योग्यता अब धीरे-धीरे ख़त्म होने जा रही थी। हालाँकि मैं अब भी भारत या प्रवासी जीवन के बारे में लिख सकती हूँ, लेकिन इस गहराई और निकटता से लिखना मुश्किल होता जाएगा।

    3 प्रश्न: आपने प्रेम और अकेलेपन के इतने रंग-रूपों को कैसे एक में ही समेटा?

    उत्तर: इसे मैं आपको एक उदाहरण से समझाती हूँ। जैसे सनी की मुलाकात एक ऐसी महिला से होती है जो एक सत्तावादी शासन में पली-बढ़ी है, जो उसे बताती है कि जब वह अकेलेपन के बारे में बात करता है तो उसे पता नहीं होता कि वह क्या कह रहा है। और उसे लगातार निगरानी के अकेलेपन का एहसास होता रहता है, जहाँ उसे अपने निजी विचारों तक को व्यक्त करने की इजाज़त नहीं होती। एक बेहद व्यस्त दुनिया में, आप अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले अनेक लोगों से मिलते हैं। सोनिया की माँ के लिए एकांत एक चुनाव है। एकमात्र तरीक़ा जिससे वह अपनी शादी से छुटकारा पा सकती है। एक समय आता है, जब वह अपनी बेटी से कहती है कि अकेलापन सबसे बुरा नहीं होता, इससे भी बदतर चीजें हैं, जो कठोर लग सकती हैं, लेकिन ज़िंदगी ने उसे यही सबक़ सिखाया है। और ख़ुद सोनिया के लिए भी, अकेलेपन का मतलब है डर का न होना, क्योंकि वह एक बेहद अपमानजनक रिश्ते की गवाह रही है। इसके अलावा एक ऐसा अकेलापन भी होता है जिसकी ज़रूरत बदलाव के लिए होती है। हम अपनी उस पहचान से भागना चाहते हैं जो हम पर थोप दी गई है। मैं यह भी दिखाना चाहती थी कि अकेलापन हमेशा शर्म का ही पर्याय नहीं होता बल्कि कभी-कभी यह हमारे निर्वाह के लिए भी ज़रूरी तत्व बन जाता है।

    4 प्रश्न: मैंने पाया कि आपके लिए, कला इस कहानी में भी जीवन से उतनी ही गहराई से जुड़ती है जितनी वास्तविक जीवन में। क्या मेरा मानना सही है?

    उत्तर: हाँ आप सही कह रही हैं। ऐसा कई बार हुआ कि मैंने कोई किताब उठाई और मुझे लगने लगा मानो वह मेरे लिए ही लिखी गई है। क्योंकि किताबें मुझे गहरे प्रभावित कर ले जाती हैं। या फिर ऐसा भी होता है कि मैं किसी ख़ास विषय पर लिखने की कोशिश में लगी होती हूँ और उसी दौरान लाइब्रेरी में उससे जुड़ी कई किताबें मुझे मिल जाती हैं। जैसे सही किताब सही समय पर आपसे टकरा ही जाती है। मैं काफ्का की ‘दी कैसल’ पढ़ रही थी, वही किताब जो सोनिया की माँ अपने हनीमून पर पढ़ रही है। और फिर मैं (यासुनारी कावाबाता की) स्नो कंट्री और नायपॉल की द एनीग्मा ऑफ़ अराइवल भी पढ़ रही थी। इन सारी ही किताबों में लोगों के बीच के रिश्तों से ज़्यादा उनके बीच की दूरी और ख़ालीपन के बारे लिखा गया है। और वही व्हाइट स्पेस (रिक्त स्थान) होती है जो किताबों को एक दूसरे से जोड़े रखती है। मैं उनसे सीखते हुए उनके अपने संस्करण लिख रही थी।

    5 प्रश्न: इस कथा में जादू का हल्का-सा स्पर्श भी देखने को मिलता है।

    उत्तर: वयस्कों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में मुझे इस कल्पनाशीलता की कमी खलती है। मैं यह दिखाने का प्रयास कर रही थी कि कैसे लोग, अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से, यथार्थ से बाहर निकलते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे दु:स्वप्न हमारे अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। वे इतने जीवंत और आदिम होते हैं कि हमारे पूर्वजों के पूर्वजों ने भी शायद वही सपने देखे होंगे। क्योंकि न्यू यॉर्क में रहते हुए मुझे साँप और शार्क जैसे भयावह सपने क्यों आते हैं? मैं इस अनजानेपन और रिक्तता को एक यथार्थवादी कहानी में शामिल करना चाहती थी। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और फिर भी एक-दूसरे को नहीं जानते। मेरे लिए, हमारे बीच की विभिन्न खाइयाँ भी एक तरह का अकेलापन थीं। मैं चाहती थी कि उनका एक मानसिक अस्तित्व भी हो, और कभी-कभी वे आकार भी ले लें, क्योंकि सचमुच ऐसा होता है। जब आप कुछ लोगों से बात करते हैं तो आपको लगता है कि भले कोई भी नाम दे दिया जाए लेकिन उनके जीवन को कभी यथार्थ नहीं कहा जा सकता। लोग अमेरिका तक जिन यात्राओं पर निकलते हैं, उनमें कुछ भी यथार्थवादी प्रतीत नहीं होता। इसकी कल्पना कीजिए कि किसी को एलिगेटर अलकाट्राज़ (साउथ फ़्लोरिडा की एक जेल) भेज दिया जाता है – यह कितना बड़ा आघात होगा। शुरुआत में मुझे लगा था कि यह उपन्यास केवल यथार्थवादी होगा। लेकिन बाद में महसूस हुआ कि उस “छाया-जगत” के बिना यह किताब पूरी नहीं होगी, क्योंकि हम सब उसी से जुड़े हुए हैं। परिवारों की कहानियों में भी यह सब देखने को मिलता है – कुछ घटनाएँ बार-बार लौटकर आती हैं। फिर वे गायब हो जाती हैं, पर उनके पीछे अंधकार की एक लकीर बची रह जाती है जो कई पीढ़ियों से होकर गुजरती रहती है।

    6 प्रश्न: आपके उपन्यास में ये काल्पनिक पात्र तो सामने हैं, लेकिन पीछे कहीं न कहीं समय की सटीक धड़कन भी चलती रहती है – एक मेट्रोनोम की तरह।

    उत्तर: मुझे डायरी और नोटबुक लिखने की आदत है। लेकिन, जब हम राजनीति और कला की बात करते हैं – तो यह वास्तव में कला के लिए राजनीति की तरह होती है। मुझे लगातार इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं मैं इस पहलू के बारे में ज़्यादा ना लिख दूँ कि राजनीतिक घटनाएँ लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं।

    दिल्ली के सिख दंगों के समय मैं वहीं मौजूद थी। मुझे कर्फ़्यू और धुएँ की गंध याद है। मुझे अपने दोस्तों का भय याद है। इसी तरह 11 सितम्बर (अमेरिका का आतंकी हमला) भी याद है। यह सब इस देश की चेतना में गहराई तक पैठा हुआ है।

    ये बड़ी राजनीतिक घटनाएँ जिस तरह से किसी एक परिवार को प्रभावित करती हैं, उसे देखना मेरे लिए बहुत ही दिलचस्प होता है। इनसे वे भी प्रभावित हैं जो सीधे तौर पर इसमें शामिल नहीं हैं। जैसे बड़े युद्ध छोटी से छोटी जगह को भी विकृत कर देते हैं। अमेरिका और रूस में जो कुछ भी हो रहा है, उसके असर से धरती का दूसरा छोर भी अछूता नहीं है।

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