आज पढ़िए जाने-माने लेखक पंकज सुबीर के कविता संग्रह ‘उम्मीद की तरह लौटना तुम’ पर यह टिप्पणी। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह पर लिखा है वरिष्ठ लेखक प्रकाश कांत ने- मॉडरेटर
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प्रकाश कान्त
यह सही है कि हिंदी में माँ, बेटी, प्रेयसी इत्यादि को लेकर जितनी रचनाएँ हैं, अपेक्षाकृत उतनी पिता को लेकर नहीं हैं। प्रेम और प्रेमिका को तो लेकर हिंदी ही नहीं, विश्व का साहित्य भरा पड़ा है। महाकाव्य तक हैं। माँ को लेकर भी फुटकर कविताओं से लेकर ‘मदर’ (मेक्ज़िम गोर्की) जैसे उपन्यास हैं। बेटियों को लेकर अगर ‘सरोज स्मृति’ (निराला) और ‘उठ मेरी बेटी…’ (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) जैसी कविताएँ हैं तो पत्नियों को लेकर भी ‘तुम्हारे जाने के बाद’ (कृष्णकान्त निलोसे) है। पिता रचनाओं में आये हैं ज़रूर लेकिन कम! वैसे, ‘पिता को पत्र’ (काफ़्का) जैसी विख्यात रचना हुई है। ज्ञान रंजन की ‘पिता’ कहानी भी इसी सिलसिले की कहानी है।
आम तौर पर पिता-पुत्र संबंध हमारे यहाँ एक तरह से तनावपूर्ण माने जाते रहे हैं। जब कि पिता के लिए अपना यौवन त्याग देने और पिता के वचनों का मान रखने के लिए वन जाने वाले पुत्र भी हुए हैं। बहरहाल, इस संग्रह की कविताओं का मूल उत्स पिता की अंतिम रूप से विदाई है। जैसा कि कवि ने प्रारंभ में ख़ुद कहा है। पिता की अस्थियाँ नर्मदा में प्रवाहित करने के तीसरे दिन अचानक इन कविताओं की शुरुआत हुई! लगभग सभी कविताएँ एक ही ट्रांस में लिखी हुई हैं जिनमें से शुरू की पिता के जाने पर हैं बाद की अन्य विषयों पर! संग्रह की सिर्फ़ सात कविताएँ पूर्वलिखित हैं : ‘रबाब – एक मुसलसल इश्क़’, ‘गौतम राजऋषि के लिए’, ‘लिफ़ाफ़ा’, ‘ताना-बाना’, ‘तुम’, ‘पीली और उदास आँखें’ एवं ‘विश्वास’; बाक़ी सारी कविताएँ उसी तीन से चार महीने की अवधि की हैं।
ये अनुभूति के गहरे दबाव में लिखी गयी कविताएँ हैं। कभी वर्ड्सवर्थ ने कहा था, ‘कविता शक्तिशाली भावनाओं का उद्रेक है’ (Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings)। भवानी प्रसाद मिश्र आपातकाल में जब जेल में थे तब रोज़ तीन कविताएँ लिखते रहे। जेल से छूटने के बाद वे ही कविताएँ ‘त्रिकाल संध्या’ संग्रह में संकलित हुईं। बहरहाल, विशेष बात यह कि पंकज प्राथमिक रूप से कथाकार हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ विशेष चर्चित रहे हैं। यूँ उन्होंने ग़ज़लें भी लिखी (कही) हैं। लेकिन, अचानक कविताएँ लिखना उनके रचना कर्म का विशेष पड़ाव है। इसे विधा-परिवर्तन नहीं बल्कि सृजन के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है।
संग्रह में 109 कविताएँ हैं जो 5 उपशीर्षकों में विभक्त हैं। प्रवेश, प्रकृति, प्रेम, प्रारूप और विरोध! यूँ, कविताओं का यह बहुत कुछ स्थूल विभाजन है। इनके बिना भी इन कविताओं को देखा जा सकता है। उनके पीछे की मूल संवेदना एक ही है। विभाजन मोटे तौर पर उनके कंटेंट को लेकर! हालाँकि, कविता अपने कथित कंटेंट के पार या बाहर भी होती है। जैसा कि कहा भी जाता है, कविता विषय पर नहीं होती, वह तो कविता की बाहरी चीज़ होता है।
इन कविताओं में अपनी पचास पार की उम्र का एहसास है। पिता का रोज़ आते-जाते एक दिन अचानक अंतिम रूप से चले जाना है। जाने की उम्र पर भी बात है। जंग लगी संभावनाएँ हैं। और गीली उदास आँखें हैं। हर कवि के मौसम को लेकर अपने रिफ़्लेक्सेस होते हैं। कविता के मौसम भी अपने होते हैं। इन कविताओं में विदा होती फरवरी है, ठण्ड की शामें हैं, मौसम की उदासियाँ है, उनका अवसर है, मार्च-अप्रैल में जो अच्छापन है उसका बीतना है। ‘एक और मौसम का बीत जाना / हमारे हिस्से में आये हुए समय का कुछ और कम हो जाना है।’
‘अगला मौसम कभी-कभी / आकर भी नहीं आता / वस्तुएँ रखी रहती हैं / मौसम बना रहता है / किंतु इंसान बीत चुका होता है।’ संग्रह की कविताओं में इस बीतते चले जाने का भाव है। वास्तव में पिता के चले जाने के अवसाद की परछाई कई कविताओं में मौसम, महीने, रिश्ते वग़ैरह के बीत जाने, खत्म हो जाने में है। ये कविताएँ गहरे अवसाद से निकली हुई कविताएँ हैं। अधिकतर कविताओं के मूल में इस अवसाद को अनुभव किया जा सकता है। चाहे फिर विदा होती फरवरी हो या ठण्ड की शामें! कविताओं की अनुभूति वहाँ कभी-कभी थोड़ा कम हो जाती है जब कविता थोड़ा-थोड़ा समझाने की मुद्रा में आ जाती है, किसी सिद्धांत या प्राकृतिक नियम की लगभग व्याख्या करने लगती है। मौसम और प्रकृति के क्रिया-कलापों की भी! कविताओं की व्याख्या हो सकती है। कविताओं में व्याख्याओं का होना कविता को अपनी वास्तविक भूमि से हटा देता है।
संग्रह की कविताओं के केंद्र में चूँकि पिता हैं, इसलिए वे कई तरह से हैं। अपनी आदतों, नसीहतों, नाराज़गियों, असहमतियों वग़ैरह कई चीज़ों में! उनकी छोड़ी चीज़ों में भी! उनकी उपस्थिति, स्थायी अनुपस्थिति, स्मृति, उनके होने न होने के अर्थ और दुःख! सबसे ख़ास बात, कविताओं में पिता का होना एक कवि के पिता का होना न हो कर एक सामान्य लेकिन वैश्विक पिता के होने में बदल जाता है। वैश्विक अगर नहीं तो भी एक भारतीय पिता तो ज़रूर ही! पिता के जाने – बरसों बरस से जा रहे होने से लेकर उनके जाने के बाद और हयात रहने के दौर के कई पलों में तो! निर्मल वर्मा की कहानी ‘बीच बहस में’ अस्पताल में भर्त्ती पिता से एक असहमत बेटे की असहमतियों की कहानी है। वहाँ भी एक-दूसरे से शिकायतें हैं, असहमतियाँ हैं, नाराज़गियाँ हैं लेकिन, असली कहानी इन सबके पार कही है। जैसे, ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी में है। कहीं-कहीं बहुत मुखर रूप में है! वहाँ सामान्य पिता-पुत्र भी नज़र आते हैं। एक समुद्र जैसा शांत पिता और बिगड़ा हुआ बेटा! माँओं के लिए बेटे कभी बिगड़े हुए नहीं होते – पिताओं के लिए होते हैं। और बाज वक़्त पिता इसके लिए माँओं को ही ज़िम्मेदार भी ठहराते हैं। इसे सामान्य प्रचलित सोच के तहत पितृसत्ता से भी जोड़कर देखा जाता है।
इन कविताओं में केंद्रीय पक्ष बेटे का है। कविताएँ बेटे की ओर से हैं और पिता की अंतिम विदाई के बाद की हैं। कविताएँ हमारे यहाँ पिता की ओर से भी कम हैं। पारंपरिक सामाजिक ढाँचे में जिसमें मध्ययुगीन संयुक्त परिवार के संस्कार और सोच की धुँधली परछाइयाँ मण्डराती रहती हैं और कई बार पिता अपने-आप को बुरी तरह फँसा हुआ पाता है, वह सब सामने नहीं आ पाता! विशेष कर एक बेटे के संदर्भ में! उसकी चिन्ताओं का पता लगता रहता है – उसके ग़ुस्से, हिदायत, शिकायत वग़ैरह से लेकिन, स्नेह का नहीं लगता। जैसा सर्वेश्वर की कविता ‘बिटिया’ में होता है। जिसमें पिता सोयी हुई अपनी नन्ही बेटी को उठाता है। बेटी जिसकी सहेली हवा जो उसी के साथ सो गयी थी और उसके जागने के पहले ही जाग कर जाने किस झरने में नहा कर भी आ गयी है और अपने गीले हाथों से बेटी की तस्वीरों की किताब छू रही है और जिससे ‘जाने कितने-कितने रंग फैल गये हैं।’ एक विराट बिम्ब!
गुज़रे हुए पिता को लेकर लिखी गयीं इन कविताओं में पुत्र का गहरा पश्चाताप है! पिता-पुत्र के बीच के आम शीत युद्ध को लेकर पश्चाताप! तनाव, असहमति, नाराज़गी, विरोध, शिकायत! पुत्र की स्मृति में बार-बार उभर आने वाली तमाम चीज़ें। पश्चाताप से निकली विदाई के साथ निकली अपेक्षा भी, ‘अगले जन्म में मिलना मुझे / पिता बनकर ही / विपक्ष बनकर, गुस्सैल, ज़िद्दी, आक्रामक, वाद-विवाद’ करने वाले बनकर! ‘पिता हो, पिता की तरह रहना।’ इनमें तीसरे दिन से ही पिता के आने और उनके पुकारे जाने का इंतज़ार है। वे एक छलावा लगते हैं, जिनके जाने का डर पिछले तीस सालों से लगता रहा है। वे रंगून क्रीपर की लतर लगते हैं। वे कम्पनी के बंद होने तक अपने बालों में ‘जवा कुसुम’ का तेल लगाते रहे और घर में अपने होने का एहसास करवाते रहे। वे आस्तिक और दुनियादार थे, और बेटे से ऐसा ही होने की अपेक्षा रखते थे। वे बेटे के लिए स्थायी विपक्ष थे। ‘तुम चले गये / मेरा विपक्ष चला गया / यह दुनिया पक्ष से नहीं / विपक्ष से ही होती है।’ वे गुज़रे पिता के समक्ष स्वीकार करते हैं, अपना एक बुरा बेटा होना! जो बहस करता था, उनकी कही बात काटता था और उन्हें ग़लत सिद्ध करने की कोशिश में रहता था। वही पिता से लौट आने का आग्रह करता है ताकि उनसे बहस और वाद-विवाद जारी रह सके और उनकी बातें भी!
पिता घर में छूटी हुई घड़ी जैसी चीज़ों में हैं जो पिता के जाने के साथ दस बजकर छः मिनट पर रुक गयी थी। उनकी कोशिश अपनी दुनिया को घर तक सीमित रखने की थी। वे अपने-आप में अपना खोया हुआ पिता महसूस करते हैं और वे शहरयार में अपना बेटा होने को पाते हैं।
पिता को प्रत्यक्षतः लेकर संग्रह में 15 कविताएँ हैं। हालाँकि, ऐसी और कविताएँ भी हैं जिनमें भी पिता की छाया मौजूद महसूस होती है। लेकिन, सारी कविताएँ इसी तक सीमित नहीं हैं। प्रतिरोध को लेकर बीस से अधिक कविताएँ हैं। और प्रेम को लेकर भी! प्रेम यूँ भी उनकी कई कथा रचनाओं में मौजूद है। उस पर बहसें भी हैं। व्याख्याएँ हैं! इन कविताओं में प्रेम का दूर-पास का एहसास है। ‘मंगल पर होना’ आत्मा से देह तक यात्रा की बात करती है। प्रेम और अवसाद का एहसास, प्रेम की अपने आस-पास मौजूदगी, प्रेम में द्वैत का मिटना, चाँद तक पहुँचने के लिए सीढ़ी लगाना, किसी का साथ होना, प्रेम में ख़ुद का हमेशा देर से पहुँचना! स्त्री-पुरुष को लेकर जो कविताएँ हैं उनमें स्त्री सारे दमन के बावजूद शक्तिशाली होकर उभरी है। वह सारे कामों के बीच अपने सारे काम भी कर लेती है। वह इन कविताओं में माँ के रूप में भी आई है, नानी और बेटी के भी!
इन कविताओं के अगले विस्तार में गुरु नानक की संगत में रवाब बजाता मस्ताना है, इतिहास में दर्ज खलनायकों के कारनामे हैं। कचहरियों के गले न उतरने वाले फ़ैसले हैं। जिनके ताले खो गये उनकी ज़ंग खायी चाबियाँ गुच्छे में लगी हैं। तालों के कभी न कभी मिलने की ज़ंग खायी संभावना के साथ! टेबिल पर पुराने ख़राब पेन, टूटे घिस चुके चश्मे, गति की सार्थकता-निरर्थकता है। तानाशाह को विश्व शांति का पुरस्कार है। प्रतिरोध है। वैसे, कविताओं को लेकर चिंता भी है यह जानकर कि कोई भी कवि कभी शेष नहीं रहता, उसकी कविता रहती है। उसके लिए जो कुछ भी है, सब कविता में है। ‘एक दिन नहीं लिखी जा रही होंगी कविताएँ / कैसा होगा वह समय / बिना कविताओं के’ यह आग्रह भी है कि व्यक्तियों को लेकर कविताओं में आत्मीयता शेष रहे, ख़ुद को बड़े होने से बचाये, आँखों में शरारत बची रहे।
चूँकि, संग्रह की अधिकतर कविताएँ पिता की आसन्न मृत्यु को लेकर है इसलिए ज़ाहिर है उसमें एक ख़ास तरह का निजीपन है। आत्मकथात्मकता के आस-पास का! कविताएँ पिता के (अचानक नहीं धीरे-धीरे) जाने और उससे बने एक ख़ालीपन को लेकर है इसलिए उनमें निजी पीड़ा भी है। प्रेम कविताओं तक आकर यह पीड़ा कम हुई है और प्रकृति, प्रारूप, प्रतिरोध तक आकर वे सार्वजनिक भूमिका में दिखाई देने लगती हैं। ‘बेटी का प्रेम’ बिल्कुल अलग तरह की कविता है। यह ‘अलगपन’ उसे विशेष बनाता है। व्यक्तियों को लेकर लिखी गयीं कविताओं में व्यक्तित्व की बारीक़ बुनावट और मासूम आत्मीयता है। कुछ कविताएँ सैद्धांतिक मसलों पर बात कहने की कोशिश करती हैं तब थोड़ी सपाट गद्य होने लगती हैं! हालाँकि, बाक़ी जगह वे कविता होने की बुनियादी माँग पूरी करती हैं।
यह संग्रह पंकज सुबीर के रचनाकार की भीतरी रचनात्मक खलबली की सूचना देता है।
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