आज प्रसिद्ध शायर, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की जयंती है। इस अवसर पर पढ़िए शायर, पुलिस अधिकारी सुहैब अहमद फ़ारूक़ी का यह दिलचस्प लेख- मॉडरेटर
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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
मजरूह लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह
हज़रात, आज मजरूह सुल्तानपुरी साहब का जन्मदिन है। इस मुबारक मौक़े पर, ख़ाकसार, सबसे पहले आपको उनकी मशहूर-ए-ज़माना ग़ज़ल के मतला और मक़्ता को मेरे नज़रिए से समझाने की कोशिश करना चाहता है।
पहले मुश्किल शब्दों को समझते हैं: मता मतलब संपत्ति, वस्तु या पूंजी, कूचा मानी गली, कुल मिलाकर मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार का अर्थ हुआ बिक्री हेतु बाज़ार और गली में डिसप्लेड माल, मजरूह=उपनाम और अहले वफ़ा= विश्वास पात्र।
अब मतला देखते हैं: “हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह—उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह।” इस शेर से मैंने यह समझा है कि मजरूह साहब खुद को बाज़ार की दुकान में सेल पर लगी उस चीज़ की तरह समझ रहे हैं, जिस पर हर आता-जाता ख़रीदार नज़र डालकर आगे बढ़ जाता है। यानी, न कोई पूछता है, न ख़रीदता है—बस देखकर कीमत पूछ ली, और फिर अगले स्टॉल की तरफ़ चल दिए। गोया उनका दिल भी अब “Buy 1 Get 1 Free” की ऑफ़र का मुन्तज़िर है!
अब आइए मक़्ता को खाकसार की समझ से समझने की कोशिश करते हैं: “मजरूह लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम—हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।” मजरूह साहब बताना चाहते हैं कि वफ़ादारों की लिस्ट बन रही है, और वो भी उम्मीदवारों की इस क़तार में खड़े तो हैं, मगर उस “गुनहगार” की तरह जिसका नाम कभी नहीं पुकारा जाता। यानी “क्लास मॉनीटर” अच्छे बच्चों के नाम लिख रहा है, और मजरूह साहब उन अच्छे बच्चों के पीछे खड़े हाथ उठा-उठाकर कह रहे हैं: “सर! मेरा नाम भी लिख लें!” मगर उस्ताद साहब (यहां ज़माना भी समझ सकते हैं) सिर्फ़ अच्छे बच्चों के नाम लिख रहा है, मजरूह साहब का नाम “ब्लैक लिस्ट” में डाल दिया गया है!
इस बेदर्द समाज का नज़रिया हम पुलिस वालों के साथ भी ऐसा ही कुछ रहता है, न? आ प कहेंगे कि मजरूह साहब के ज़िक्र के साथ पुलिस वालों का क्या काम। तो साहेबान, बात दरअसल यूं है कि मुहम्मद सुल्तान उर्फ़ मजरूह सुल्तानपुरी साहब के वालिद साहब जनाब असरारुल हसन खान पुलिस विभाग में नौकर थे, और इसलिए मजरूह साहब इस अहल-ए-वफ़ा वाली तर्ज़-ए-ज़िंदगी—यानी ब्लैकलिस्टेड अनुशासन में जीना—बख़ूबी जानते थे।
खैर, यह तो पुलिसिया व्याख्या हो गई, जिसे कोई संजीदगी से लेना पसंद नहीं करेगा। लेकिन अगर कोई संजीदा मजरूह-शनास इन अशआर की तशरीह करे, तो यूं करेगा कि मजरूह साहब को अपनी क़द्र व कीमत का एहसास तो है, मगर ज़माना सिर्फ़ तमाशा देख रहा है—दिल को कोई नहीं ख़रीदता। हर निगाह में “ख़रीदार” की हवस है, मगर कोई सच्चा ख़रीदार नहीं। उनकी ख़लिश यह है कि उनकी मोहब्बत और ज़ात बाज़ार की चीज़ बनकर रह गई है, जिसे हर कोई देखता है, पर अपनाता कोई नहीं। और चाहत व वफ़ा के बावजूद उनका नाम इज़्ज़त की फेहरिस्त में नहीं आता, बस मुजरिमों की क़तार में खड़ा रह जाता है। नतीजा कुल मिलाकर यूं निकाला जा सकता है कि ये अशआर ब-ज़ाहिर मज़ाह और तंज़ में लिपटे हैं, मगर अस्ल में एक हसास दिल की बे-क़द्री, समाज की बे-एतिनाई और मोहब्बत की ना-क़द्री का नौहा हैं। ये हंसी में छुपा वो दर्द है जो सबसे ज़्यादा गहरा और अकेला होता है।
साहेबान! मेरे नज़दीक मजरूह सुल्तानपुरी केवल एक गीतकार और शायर नहीं थे। वे हमारी ज़िंदगी, हमारी मुहब्बत और हमारे मुआशरे के जज़्बात का अक्कास थे। उनके गीत और शेर आज भी उतने ही रिलेटेबल और जीवन से भरपूर हैं, जितने उनकी ज़िंदगी में रहे होंगे। विद्रोह एक कलमकार का नैसर्गिक गुण है, जो आजकल के कलमकारों में नहीं मिलता। अगर मिलता भी है, तो सिर्फ़ टीआरपी बटोरने या वायरल होने की शर्त तक ही। मजरूह सुल्तानपुरी की आज़ाद हिंदुस्तान में गिरफ़्तारी किसी कलमकार या कलाकार की अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा बुलंद करने वाली गिरफ़्तारी थी।
इस लेख का उद्देश्य मजरूह साहब की जीवनी का लेखन कतई नहीं है। वह सब तो उन पर पीएचडी करने वालों ने अपने नामों से पेटेंट करवा ही रखा है। यह सब तो आपको किताबों व इंटरनेट पर दानिश्वरों और ब्लॉगर्स के उनकी इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी(?) टैग के साथ मिल जाएगा। मैंने जो पुलिस के नजरिए से उनको पढ़ा और समझा है, वो आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। लेकिन खाकसार की पुलिसिया नज़र का बुरा न मानिएगा। जहाँ आपको तंज़ नज़र आता हो, शायद वहाँ कोई सच्चाई छुपी हो—क्योंकि साहेबान, जीवन की FIR में सच्चाई ही आखिरी गवाह होती है।
उनके जीवन, उनके योगदान और उनकी अमर विरासत को समझने में हासिल होने वाली पहली बात जो मुझे अपील करती है, वो उनका विद्रोही स्वभाव है। पिता ने एडमिशन एक मदरसे में कराया था, जहां से उन्होंने उर्दू, अरबी और फारसी की तालीम हासिल की। बचपन से गानों का शौक था, इसलिए उन्होंने गाने की क्लास भी जॉइन कर ली थी। मगर उनके पिता बहुत सख्त थे। गाना छुड़वाकर उनका यूनानी कॉलेज में दाखिला भी करवा दिया। सख्त पिता और हकीमी की पढ़ाई के बावजूद, उनके विद्रोही और शौकीन स्वभाव का प्रमाण है कि उन्होंने बचपन से शायरी और गाने में अपनी रुचि को नहीं छोड़ा। उन्होंने ‘नासेह’ के बाद ‘मजरूह’ तखल्लुस अपनाया और हकीमी को कम महत्व देते हुए पूरे हिंदुस्तान में मुशायरों के जरिए अपनी पहचान बनाई।
जैसे बाज़ार में कोई सस्ती चीज़ रखी हो—हर कोई देख लेता है, छू भी लेता है, लेकिन खरीदने की हिम्मत कम ही करता है। मजरूह साहब ने अपने गीतों और शेरों में ठीक इसी तरह आम आदमी की छुई-अनछुई भावनाओं को उठाया। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे साधारण जीवन की मामूली घटनाओं को भी शायरी और गीतों में ऐसे पिरो देते थे कि अचानक वही मामूली बात गहरे अर्थ का आईना बन जाती। यही वजह थी कि उनकी रचनाएँ हर वर्ग के दिल में जगह बना लेतीं—गोया उनके गीत किसी वीआईपी पास से नहीं, बल्कि जनरल डिब्बे की टिकट से सफ़र करते थे।
उनके फिल्मी गीतों में प्यार भी था, दर्द भी, हंसी-मज़ाक भी और समाज को आईना दिखाता संदेश भी। सुनने वाला चाहे आशिक़ हो, आशिक़ा हो या फिर कोई बस स्टैंड पर खड़ा टिकट-चेकिंग इंस्पेक्टर—हर किसी को लगता था कि ये गीत उसी के लिए लिखा गया है।
और यही तो मज़ा था—उनके गीत महज़ गीत नहीं होते थे, बल्कि मौखिक चार्जशीट की तरह होते थे। गोया, मजरूह साहब शब्दों के थाने में बैठे एसएचओ थे—जहाँ हर गीत में एक “एफ़आईआर ऑफ़ सबक़” दर्ज कर दी जाती थी। फर्क बस इतना था कि ये एफआईआर सुनकर लोग थाने से भागते नहीं थे, बल्कि गुनगुनाते हुए घर ले जाते थे!
बानगी देखिए तनिक:
“तेरे मेरे मिलन की ये रैना”: यह गीत दरअसल वही क्षण है जब नाइट ड्यूटी वाला अफ़सर थकी हुई आँखों से चार्ज लिस्ट पढ़कर कहता है, “अब तेरे हवाले वतन, साथियो”, और नई शिफ़्ट वाला अफ़सर हल्की जम्हाई के साथ “ठीक है, आगे मैं देख लूँगा” कहकर साइन कर देता है। इश्क़ का मिलन और पुलिस का ड्यूटी-हैंडओवर—दोनों में राहत भी है, बोझ भी है, और एक अदृश्य सी थकान भी जो गुनगुनी धूप की तरह हर नस में उतरती है।
“चुरा लिया है तुमने जो दिल को”: अब ये गीत तो पूरा-पूरा आईपीसी 379 (Theft) का मामला है। सोचिए, अगर पुलिस इस केस को हैंडल करती तो रपट कुछ यूँ होती—शिकायतकर्ता कहता है, मुल्ज़िमा ने माल (दिल) लौटाने से इंकार कर दिया और बस “कसम से” की रट लगा दी। अब इस पर कोर्ट भी यही कहेगा: “Evidence is circumstantial but song is evergreen.”
यानी, मजरूह साहब के गीत महज़ फिल्मी नग़मे नहीं थे, बल्कि पुलिस डायरी में दर्ज अलग-अलग केस स्टडी जैसे थे। फ़र्क बस इतना था कि यहाँ चालान नहीं कटता था, बल्कि लोग गुनगुनाते-गुनगुनाते दिल के कैदी बन जाते थे।
अब ज़रा उनकी शैली की तीन बड़ी ख़ासियतों को पुलिसिया चश्मे से देखिए:
1. सादगी: मजरूह की सबसे बड़ी ताक़त यही थी—कठिन शब्दों का दिखावा नहीं। बिल्कुल उसी तरह जैसे पुलिस की भाषा होती है: “नाम बताओ, पता बताओ, सच बोलो।” साधारण लफ़्ज़, मगर असर बिजली की तरह। न कोई उलझन, न कोई कानूनी दफ़ा—बस सीधे दिल पर चोट।
2. भावनात्मक गहराई: हर शेर और गीत में प्रेम, दर्द और ज़िंदगी की सच्चाई का संगम। ये वैसा ही है जैसे किसी केस की फाइल में ऊपर-ऊपर हँसी-ठिठोली दर्ज हो, लेकिन पन्ने पलटते ही अंदर से अधूरी मोहब्बत, टूटा भरोसा या इंसाफ़ की पुकार निकल आए। यानी हँसी में लिपटा हुआ रोना—जिसे मजरूह साहब बख़ूबी जानते थे।
3. सांस्कृतिक प्रतिबद्धता: उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति और परंपरा की खुशबू थी। जैसे कोई दरोग़ा ये कहे कि “विरासत सिर्फ़ पैतृक जायदाद से नहीं बनती, बल्कि ड्यूटी के पसीने से कमाई जाती है।” मजरूह भी यही मानते थे—कि असली साहित्य वही है, जो जनता के दिलों में खुद की मेहनत से जगह बनाए।
मजरूह की विरासत हमारे बीच हमेशा बनी रहेगी, और आने वाली पीढ़ियाँ भी उनके गीतों और शेरों के माध्यम से जीवन की सुंदरता को महसूस करेंगी। उनके नग़मे हमें बार-बार यह याद दिलाते हैं कि सच्ची महानता केवल प्रतिभा की बुलंदियों में नहीं, बल्कि समाज और जीवन के प्रति उस जज़्बे में छुपी होती है, जो शब्दों को इंसानियत की ख़िदमत का ज़रिया बना दे।
और जनाब, यही उनकी सबसे बड़ी “चार्जशीट” है—जिसमें उनके ख़िलाफ़ कोई इल्ज़ाम नहीं, बल्कि सिर्फ़ तारीफ़ दर्ज है। शब्दों का जादू अमर है, और मजरूह सुल्तानपुरी उस जादू के सबसे उज्ज्वल सितारे हैं।
यानी—“केस फ़ाइल बंद, लेकिन सबूत हमेशा ज़िंदा रहेंगे।”

