अमरकंटक की नर्मदा कथा

प्रियंका नारायण मिथकों, पारम्परिक कथाओं पर बहुत खूब लिखती हैं। इससे पहले बनारस पर लिखे उनके गद्यांश हम पढ़ चुके हैं। यह गद्यांश अमरकंटक, नर्मदा नदी को लेकर है। अछूता विषय, निराला गद्य-

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कहते हैं गंगा भी जब अपने पाप से मैली हो जाती है, तब वह दौड़ी हुई नर्मदा के पास पहुंचती है। मैं सोच रही थी कि गंगा ने कौन-सा पाप किया होगा कि वह अपनी पुत्री नर्मदा के पास पवित्रता मांगने जाती है। पाप का स्याह रंग धवल फेन से क्या चाहता है? प्रसाद के संन्यासी नर्मदा तट से घूमकर उज्जैन जा रहे थे और मुझे याद आने लगे नर्मदा तीरे के वन प्रदेश। सांस रोके दम साधे जैसे हठयोग कर रहे हों या फिर काशी के बुनकरों ने नीले आंचल पर काही और काले सूत का की किनारी बुन दी हो।

याद आया लक्ष्मीकर्ण का वैभव और उस वैभव की प्रतिकृति वह मंदिर जो अपने महाराज और अतीत के वैभव में ही जीवित बना हुआ है । मेरा मन सोचने लगा- ‘कालंजराधिपतियों के काल’ कल्चुरियों के वैभव ने किसलिए इस विपन्न वन प्रदेश से आश्रय की मांग की थी? त्रिकलिंगाधिपति, गौड़, पाल, परमार और जेजाकभुक्ति के चंदेलों को ‘कर्णमेरु’ (काशी का शैव मंदिर) के अभिमान तले रौंदने वाला कर्ण- क्या थी कोई वनदेवी, जिसके सौंदर्य के आगे शक्ति और वैभव की एक न चली हो और फिर वह अनयमनस्क, मोहाविष्ट, अर्धरात्रि में ही ऊंघता हुआ यहां चला आया हो।

न…न…कलचुरी…चंदेल… अग्निकुल…चंद्रकुल…मध्यदेश के श्रेष्ठ वीर कुल…ऐसा नहीं था… नहीं हुआ होगा ऐसा…चंदेल विद्याधर…धंग व गंड का वंशज विद्याधर…। गौरवर्ण, मजबूत स्कंधों को स्पर्श करते काले कुंचित केश, चौड़ी छाती, बलिष्ठ भुजाएं, नरशार्दूल- एक ही साथ वैभव,शक्ति और सौंदर्य का पर्याय। भय लेकिन ह्रदय को लिए हुए। साहस इतना कि दे डाली चुनौती गजनी को। उत्तरापथ की अर्गला खोल देने का दंड और हो भी क्या सकता था…कर दिया नष्ट प्रतिहार शासक राज्यपाल को। दौड़ा आया क्रुद्ध संरक्षक गजनी और बंद हो गए द्वार कालिंजर दुर्ग के…  इस तरह शुरु हुई युद्ध की अंतहीन प्रतीक्षा।

लेकिन इधर रण और मृत्यु के नृत्य के मध्य भी विद्याधर देव को हंसी सूझी। फ़िर क्या था… हाथियों के लिए प्रसिद्ध वन प्रदेश में महमूद को चुनौती देते हुए तीन सौ हाथी छोड़ दिए गए और पत्र लिखा गया- पहले इन्हें पकड़कर दिखाओ। गजनी ने भी जान लगा दी। महीनों श्रम करता रहा हाथी पकड़ने के लिए और जब पकड़ लिया तब युद्ध का साहस जवाब दे गया। भेज दिया संधि पत्र मित्रता  और समूचे भारत में केवल चंदेल ही ऐसे रहे जिनसे महमूद ने मित्रता भी निभाई और दूरी भी बना कर रखा।

चंदेल… अजीब- सा सम्मोहन है इस नाम में। जैसे ज्ञात और अज्ञात के मध्य, मूर्त और अमूर्त के मध्य, तारों खचित नीलिमा और और पूर्ण चंद्र के मध्य का कोई रहस्य…। कहते हैं काशी के गाहड़वालों की पुत्री थी हेमावती- अगाध सौंदर्य की स्वामिनी थी किंतु कुंवारी विधवा। वैभव और विलास के मध्य चिर एकांत और संन्यास। लेकिन समय…ग्रीष्म रात्रि और निर्जन ‌सरोवर तट। हेमावती निर्जन देख स्नान के लिए सरोवर में उतरीं। सम्भवत: यह शायद ही किसी के ध्यान में आता हो कि स्थान जनशून्य हो सकता है प्रकृति शून्य नहीं। नक्षत्र खचित आकाश से चंद्रमा तकते रहे। मुग्ध हो आए हेमावती के सौंदर्य पर…उतर आए दप-दप करते धरती पर और लगे करने प्रणय निवेदन। पुरुष की छाया से भी दूर रहने वाली हेमावती के अंदर चन्द्र देव के संग की कामना जगी लेकिन परिणाम…। चंद्रदेव जब अपने लोक जाने लगे, हेमावती विरोध पर उतर आयी।  चंद्रदेव बोलें- देवि! हमारे अंश से उत्पन्न वंश समग्र भारत वर्ष का गौरव बनेगा। सुरा, सुंदरी, ब्रह्म हत्या और उपाधि का पालन करते रहने पर आपके वंश की राजलक्ष्मी सदैव एकनिष्ठ रहेंगी।

देव! लेकिन मैं विधवा…

 देर न करिए देवि! सूर्योदय होने को है आप कालिंजर को प्रस्थान करें। वहीं सरोवर तट पर आपको पुत्र प्राप्ति होगी। चंद्रदेव बीच में ही रोक कर बोले और चलने लगे।

हेमावती सन्न…।

चलते हुए चंद्रदेव अचानक से पीछे घूम पड़े। हेमावती के पास आए और हृदय से लगाकर कहा- साम्राज्य स्थापना के बाद यज्ञ अवश्य करवाइएगा देवि। आपकी ग्लानि पूर्णतया समाप्त हो जाएगी।

हेमावती के प्रेम और अश्रु तले दबी वहीं पचासी यज्ञ वेदियां कलांतर में खजुराहों के भव्य शिल्प का आधार जगत बनीं और खजुराहो बनी राजधानी।

सत्य ही तो है, राजनीति और कला दोनो को ही अश्रुओं का सिंहासन सबसे ज्यादा रुचता है। दोनो ही निभाने वाले के पास  अपना कहां कुछ छोड़ती है। जैसे स्याह के बिना श्वेत स्वयं को परिभाषित नहीं कर सकता वैसे ही अश्रु से आंचल निचोड़ना न पता हो तो सब कुछ हो सकता है राजनीति और सृजन नहीं। अब द्रौपदी हो पाना सबके लिए संभव कहां जो अग्नि की लपलपाती जिह्वा को अपने अंदर धारण कर सके। निरंतर उपहास के मध्य भी लक्ष्य पर केंद्रित रह सके – सर्वनाश, सर्वनाश और केवल सर्वनाश…षोडश महाजनपद की पतित हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था का एकमात्र प्रतिकार और केंद्र… द्रौपदी। नव युग आरम्भ- द्रौपदी।

यहां तो कभी सत्यवती, कभी कुंती तो कभी हेमावती। होंगे कोई चंद्रवंशी, सूर्यवंशी राजकुमार… लेकिन राजकुमारी जो ठहरीं। राजलक्ष्मी को चुनाव का अधिकार भले ही हो, प्रेम करने या चंचला होने का अधिकार कतई नहीं होता। सो उनके प्रेमी बन गए देव, प्रेम बन गया मिथक और जीवन बन गया- धधकता हुआ अग्नि कुण्ड। संतोष के लिये केवल इतना होता कि जीवन लोक-जन व राज्य कल्याण को समर्पित हुआ करता था।

लाख स्त्री अधिकार बांचिए लोक और जन का मनोविज्ञान कभी स्वीकार नहीं करता अपने नेतृत्वकर्ता और उसकी साम्राज्ञी की चंचलता को। राजा भले ही लंपट हो, पट्टमहिषी का चरित्र प्रत्येक स्थिति में केंद्र हुआ करता था… नहीं, था नहीं आज भी केंद्र हुआ करता है। हां, तो चंद्रात्रेय के इसी प्रतापी वंश को रौंदा था कलचुरी डाहरिया लक्ष्मी कर्ण ने और छीन लिया था तीर्थ वैभव अमरकंटक को।

स्मृतियां बुरी तरह कुलबुलाने लगी थीं। आकार ले रही थी… और अब चेतना के गहन स्तरों के अंदर उतर रही थी उस वन प्रदेश की थिरता।

बंधुजनों का कहना है कि अतिशय थिरता में साहित्य नहीं पनपता और उस वन प्रदेश में तो कुछ है ही नहीं। न खजुराहो की कला, न विराट वैभव न कोई हलचल। जड़ी- बूटियों पर निर्भर उस हाड़ कंपा देने वाली आदिवासियों की विपन्नता और दूर तक गोलाकार में फैला हुआ वन प्रदेश और इस गोलाकार के बीच बसा हुआ गोल अमरकंटक। नाम भी कैसा है ऐसा कंटक जो अमर हो गया है । यह अमर होना क्या है, असल में तो यह अटक गया है। पर पता नहीं क्यों मुझे दूर तक सप्तश्रेणियों के बीच अटका हुआ यह कंटक बड़ा भला लगता है। मिट्टी से पुती छोटी-छोटी बस्तियां, साफ़ दिल लोग और उस दिल में शीशे की तरह पारदर्शी भाव। छोटी बस्तियों की हवाएं आपको छूती हैं, मुस्कुराती है और आप उनसे प्रेम करने लगते हैं लेकिन यहां… यहां की हरियाली, उलझती- फलांगती बांय- बांय, सांय- सांय करती हवाएं, खरखराते पत्ते और झरने सब आपसे प्रेम करने लगते हैं। जब आप इनके बीच होते हैं ये आपको सहलाती है, पुचकारती है, कभी ठंढ़क उड़ेल देती है तो कभी चीखती-चिल्लाती, मसखरी करते हुए निकल जाती है। निर्भर करता है उसका मूड क्या है?

चंदेलों के पराभव पर कलचुरी शासकों के बनवाएं सज्जा विहीन शैव मंदिर से घिरी है नर्मदा। ( कहां खजुराहो की भव्यता, होयसलों का शृंगार और कहां कलचुरियों की निराभरण पार्वती… जैसा लोक वैसे राजा वैसे देवता) काशी में गंगा घेरती हैं शिव को लेकिन यहां तो शिव ही घेरते… नहीं…नहीं घेरते नहीं पुचकारते हैं जन्म लेती शिशु नर्मदा को। लेकिन बीत गया वह पौराणिक युग। नर्मदा अब शिशु कहां…

१०६५ मीटर की ऊंचाई पर स्थित नर्मदा कुंड की ठंढ़क पहले तो आपकी आंखों से और फ़िर आपकी सांसों से आपके अंदर उतरती चली जाती है। लेकिन ये क्या… धड़कने रुकने लगती हैं, हृदय कराह उठता है, टीस उठती है, घुटन होने लगती है, आंखों में नमी उतरने लगती है, अंधकार छा जाता है। होंठ फिसफिसाते हुए कहते हैं – नर्मदे! अब तो अपने दुःख का भार उतार जाओ। कब तक यूं जबड़े भींचे, मौन साधे वैरागी बनी फिरोगी? क्या यह चराचर सृष्टि इसके राग- रंग तुम्हें आकर्षित नहीं करते? कितना सुंदर है तुम्हारा यह वन प्रदेश। जब घाटी में देखो तो पता है सूर्योदय के साथ लाल- पीले, हरे- सुनहले पत्तियों वाले पेड़ों पर सोने  के बाॅल लटके हुए मिलते हैं जब रथारुढ़ हो तो ऐसा लगता है जैसे संन्यासी के गेरुए वस्त्रों का आधार पाए लाल मिट्टी के इन वृक्षों से लाखों चांदी की तितलियां चमकती हुई एक साथ उड़ गई हों। जहां देखो वहीं सौंदर्य छिटका हुआ है। अरे मैं भी क्या कह गयी- छिटका नहीं चिंता की अंतिम बूंद तक शोख जाने वाला सौंदर्य ठूंस- ठूंस कर भरा हुआ है और तुम हो कि मुंह फेरे बैठी हो आज तक…।

कपिल और दुर्वासा की तपस्थली पर खेलते- खेलते क्या तुम्हें भी वैराग का भूत सवार हुआ या कि ये जलनकुट्टे देवता तुम्हारा भी सुख न देख पाएं? तुम्हारे इस अमरकंटक में हुआ क्या था तुम्हारे साथ? जानती हो कल संध्या समय सूर्य लाल गोला बना हुआ तुम्हारी उदासी को निरख रहा था, मैं उसे निरख रही थी। तुम्हारे उदास सौंदर्य को देखते- देखते उसका हृदय बैठ गया और फिर वह हड़बड़ा कर डूब गया। बत्तियां जल उठी थीं उसके बाद। तुम्हारे इस गोलघर में बत्तियां भी गोल- गोल होकर जलती हैं। उस तीरे जाकर झुरमुटों के नीचे से देखो तो लगता है हल्की चहल-पहल के बीच रोज ही दीवाली मन रही हो। जानती हो नर्मदे कल का दिन मेरे लिए नकार भरा हुआ था – न चाय मिली न भोजन। तुम्हारे यहां हर दुकान समोसे, आलू बंडा, पोहे और सूखे चने से अटे पड़े रहते हैं लेकिन नर्मदा महोत्सव ख़त्म होते वो भी जैसे ठंढ़े पड़कर टुकुर-टुकुर सुस्ताते हुए उंघ रहे थें। अब ऊंघते को कौन जगाए। तुम्हारी और तुम्हारे मगरमच्छ की वार्षिक पूजा क्या ख़त्म हुई ज्यादातर दुकानें बंद रहने लगीं। कितना विपन्न है तुम्हारा यह प्रदेश। प्रतिदिन का मात्र १५रुपये कर चुकाने को भी तो नहीं है उनके पास। क्या ही खोलेंगे दुकानें…. लेकिन सूखे चने…

राजगोंड दलपतिशाह को भी तो तुम्हारे सूखे चने बहुत पसंद थे न? चंदेलों की प्राणप्रिया आख़िरी संतान वीर दुर्गावती से यहीं तो कहा था न दलपतिशाह ने…। राजकुमारी पितृकुल सहित सूखे चने गिरावें हमारे यहां…। विवश हो गईं योद्धा दुर्गावती।  जातीय परम्परा में राजपूतों के यहां राजगोंडों के लिए स्थान कहां था?

नर्मेदे! तुम्हारे अमरकंटक में ही तो तीर्थ को आए यदुराय ने साम्राज्य स्थापना का स्वप्न देखा था न? कहते हैं तुमने ही यदुराय को स्वप्न में राजगोंड वंश को स्थापित करने के निर्देश दिया था। जो भी हो दुर्गावती तो भुजाओं को पूजने वाली थीं जाति नहीं। थाम लिया हाथ आगे बढ़कर दलपतिशाह का और तब से आख़िरी सांस तक उन्होंने राजगोंडों पर आपत्ति न आने दी। शत्रु हमेशा पराजित होते रहे लेकिन अंत में अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए युद्ध भूमि में ही उन्होंने अपना अंत कर लिया था। शत्रु उन्हें हाथ भी न लगा सके।

रे बाप! कैसा है यह तुम्हारा मध्य देश… शौर्य की खान। पुरुष तो पुरुष स्त्रियों ने भी कसर न छोड़ी।

 कभी लक्ष्मी बाई तो कभी दुर्गावती तो कभी पद्मावती तो कभी अवंतिका बाई और भी न जाने कितनी जानी- अंजानी।

हां तो नर्मदे! तुम्हारे इन ऊंचे चौरस पट्ठारों पर महोत्सव ख़त्म होते यथार्थ अपनी पूरी जटिलता लेकिन जिंदादिली के साथ उभरने लगा था। मैं भटकती रही। न चाय न पानी… धूप में सर के बाल गर्म करती रही। संध्या भी यह देखकर दु:खी हो आई थी। और सूर्य को भी जब इस तरह घबराते हुए जाते देखा तो सहमती हुई अपने सिंदूरी आंचल का खूंटा खोला और अपनी कुल जमा- पूंजी मुझ पर लूटा दी।

गोधूलि का वह अनुपम प्रेम मुझे जीवन भर के लिए बांध गया। शायद उसकी एक झलक के लिए मैं पूरी दुनिया का चक्कर मार आऊं।

तुम्हारा प्यारा गोल कंटक ठंढ़ से सिकुड़ा जा रहा था। दुकानें बढ़ायी जा रही थीं। आग पीली से भभक कर लाल हुई और फिर सिंदूरी होकर ख़ुद को संभाल रही थी। उधर मिट्टी के गंध को समेटे चूल्हे पर चाय खद- बद कर रही थी। लोग- बाग लगभग- लगभग जा चुके थे। दुकानों की बुझी बत्तियों की कमी को पूरा करने के लिए नीलिमा तारों को तेज हो टिमकने के लिए उकसा रही थी तभी सामने की दुकान पर वन प्रदेश का सांवला सौंदर्य उतर आया। लड़की आयी और दुकान बढ़ाने में अपनी मां की मदद करने लगी। आग सेंकते हुए मेरी नज़र अचानक उस पर ठहर गई थी। उसके शरीर का पुलक असाधारण था। मेरे होठ मुस्कुरा उठे और पुतलियां थिर। सर झुकाए वह अपनी मां का हाथ बटाए जा रही थी और इधर चाय की ख़दबदाहट धीमी आंच पर सुस्ता रही थी। उसने एक नज़र दुकान की तरफ़ दौड़ायी और हमारे चाय वाले भाई दुकान बढ़ाने में मदद करने चले गए। लड़की पलट गई। पीठ लड़के की तरफ और सिर झुकने से आगे जाकर गड़ गया। लड़का मां से बाते करता और दुकान समेटता जाता। लड़की का शरीर बीच-बीच में पुलक से कांप जाता और स्मिति प्रवाह बनने को व्याकुल थे। कभी भगवान जी उल्टे हो जाते, कभी टेढ़े… तीन जोड़ी हाथों ने बहुत जल्दी काम निपटा दिया। चलते- चलते लड़के ने लड़की पर सकुचायी, हड़बड़ायी अधखुली नज़र डाली और सिर झुकाकर कहा- अम्मा चाय लाता हूं…पीकर जाना…

अरे बेटा! क्यों परेशान हो रहे हो?

नहीं अम्मा! अब चाय भी क्या इतनी बड़ी चीज हो गयी है … कहते हुए उसने तेजी से सड़क पार की। खदबदाती चाय को ग्लास में जल्दी- जल्दी उड़ेलता पहले हमें दे गया फिर दो ग्लास लेकर दोनों ही अम्मा को पकड़ा आया। और कोई काम हो तो कहना- कहता हुआ सड़क पार कर गया। लड़की सिमटी, सकुचाती पीठ देखने लगी। अबकि दोनों के चेहरे मीठी पीड़ा में डूब गए थे।

जानती हो नर्मदे! कभी हमारे शहरों में आना… नहीं! नहीं! तुम मत आना । कहां तो तुम्हारा पवित्र वैराग और कहां वहां की विकृति। तुम नहीं तो कोई और सही और तुम ही हो तो पहले देह दान फिर प्रेम दान। जानती हो इस वन प्रदेश की एक शाम की पवित्रता के लिए मैं पूरी ज़िंदगी बीता सकती हूं। अक्सरहा मैं सोचती हूं चरम एकांत में किसी पुरुष का संयम उसे देवता बना देता है और उसका मर्यादा तोड़ देना स्त्री हृदय के सिंहासन को रिक्त कर देता है। प्रेम का यह औदात्य अनमोल है। यह भले ही मैले- कुचैले चिथड़े में लिपटे वनवासी का प्रेम था । आप उसका तिरस्कार कर सकते हैं लेकिन वह प्रेम ही क्या जो पूंजी के लिए पनपे और फिर उसी के जाल में दम तोड़ दे। प्रेम की यह पवित्रता , विश्वास और सृष्टि के संचालन का ही तो दूसरा नाम है।

नर्मदे! माई की बगिया गयी थी मैं… इतने समय में पहली बार नर्मदा मुस्कुरा उठी।

वहां तुम खेला करती थी न?

मेरी तरफ़ देखते हुए जोर की किलकारी मारी नर्मदा ने।

फ़िर कुछ देर यूं ही चुप्पी रही। कपिलधारा,दूधधारा, शम्भु, दुर्गा धारा भी देखा। शम्भु धारा तो शम्भु की तरह ही हुंकारती रही और दुर्गा धारा कल- कल करती जीवन का आनंद देती है। शम्भु धारा के पास तो आकाश छूते वन प्रदेश भयावह सौंदर्य…भालू, सांप- बिच्छु, जंगली जानवर…नर्मदा की मुस्कान अब्कि आत्मीयता से भरी थी।

इसके बाद बहुत देर तक हमारे बीच चुप्पी तनी रही।

नर्मदे!

हूँ…

एक बात कहूं…हूँ…

मंडप और सोनमुड़ा भी….

बीच में ही नर्मदा फुफ़कार उठीं…क्रोध में उमड़ते-घुमड़ते मुझे देखा। गर्जन-तर्जन, डूबा देने को उद्यत महावेग… फ़िर अश्रुओं की धार बह चली…

आह नर्मदे! मैं जानती हूं कौन है शोण, क्या है सोनमुड़ा और क्या है मंडप…तुम्हारी प्रजा (आदिवसी समूह) ने मुझे सब कुछ बता दिया है… शांत हो… बाहर आने दो टीस को …मुझे अनुभूति है तुम्हारे दर्द की जो तुम्हें अंदर ही अंदर खुरच रही है।

 राजा मैकाल ( महादेव गिरि पर्वत शृंखला) कितने निराश हो चुके थे तुम्हारी उस अवस्था को देखकर। वो महान प्रताप, अभिमान, ऐश्वर्य, वैभव, अक्षौहिणी सेना सब धरी की धरी रह गई थी। उस दिन जिस उदासी ने आधिपत्य जमाया वह आज तक मिटी नहीं है। घोर एकांत में मैकाल की दास पहाड़ियां आज भी आपस में बतियाती हैं। मैकाल तो विरक्त हो अपना आसन ही आकाश में उठा लाए और वो तैंतीस करोड़ देवी-देवता तुम्हारे दारुण दुःख से पत्थर हो रहें। कैसा वैभव, कैसी तैयारियां, तैंतीस करोड़ देवी-देवता, नौकर- चाकर, गण, भीड़- भड़क्का, धक्कम- धुक्की, रत्नों पर पड़ते सूर्य किरणों की चकमक, पीताम्बरी का इठलाता रुप, चौंधियाती आंखें, रोली कुमकुम से सजी सौभाग्यवती रमणियों के देह से फूटती सुगंधियां, खनकदार हंसी, चुहलबाजियां, देवताओं की रसभींगी मर्यादा, धूप- अगरु और छप्पन भोगों से महमह करता वन प्रदेश …पायस तो नथुने ही फोड़े डाल रही थी।

वेदी सजी, रंगोली बनी, स्वस्तिक चिह्न बधाई गान गा रहे थे और अनंत तक फैले सिलबट्टे पर हल्दी, मेंहदी  मचल-मचल कर पीस रही थी। लाल चंदोवे से छाया तुम से रुप उधार मांगता तुम्हारा विवाह मंडप… कैसे सहन किया होगा तुमने शोणभद्र के कलुष को। ऐन विवाह के समय जब प्रेम और कल्पना में पगी तुम्हारी कुचकुची काली पलकें झिलमिली तान रही थी, सखियों के हंसी- ठिठोली के बीच लुनाई लिए तुम्हारे गालों के गड्ढे लाज से सिंदूरी हो दमक रहे थे ठीक उसी समय शोणभद्र बिहुला को अंक में लिए उसके स्त्रीत्व को पूर्णता दे रहा था…जनवासे पर पहुंचे पिता मैकाल ने देख लिया था सब कुछ…पत्थर हो आए उसी क्षण…सब पत्थर हो आए।

वेदी की धुनी भभकती हुई लपटें फेंकने लगी थी। पवित्र गंध जलकर भागने लगे थे। पीताम्बरी की ठसक दीनता में बदल गई। चकमक रत्न फीके पड़ गए। पवित्र गंध जलकर भागने लगे।  सारे पकवान दुर्गंधि फैलाने लगे। कड़ाहों में पायस काला पड़ गया और उसी क्षण में चंदोवे ने मनहूसियत का तान छेड़ दिया…बारात जनवासे से लौटा दी गई।

जानते हो बंधु ! अमरकंटक उसी दिन थिर हो गया। नहीं सहन कर पाया विवाह मंडप पर बैठी अपनी राजकुमारी का हाहाकार मचा देने वाला दारुण दुःख…

और नर्मदे तुम! वेदी पर बैठी शून्य, अंधकार, हाहाकार…जाना था पूर्व तो मुंह फेर पश्चिम की ओर चली गई।

यही है न तुम्हारा दु:ख…बोलो…

नर्मदा विवश मुझे देखती रही, आज उसकी वर्षों की जमा- पूंजी लूट गयी थी। लेकिन चेहरे पर शांति थी।

लेकिन दो ही बातें आज तक समझ नहीं आई – – इस दारुण दुःख, हाहाकार और पीड़ा में भी तुमने अपना पथ कैसे निर्धारित किया और दूसरा गंगा ने कौन- सा पाप किया…क्या शिव से प्रेम कर पार्वती से अन्याय….?

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