तंजानिया के लेखक टोलोलवा मारटी मोल्लेल की कहानी। तंज़ानियाई लेखक मोल्लेल का जन्म 1952 में अरुशा शहर में हुआ। उन्होंने 1972 में यूनिवर्सिटी ऑफ दारुस्सलाम, तंज़ानिया से लिटरेचर एंड ड्रामा में बी.ए., 1979 में कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा से ड्रामा में एम.ए. और 2001 में पी.एचडी की डिग्री हासिल की। 1979 से 1986 की दौरान तंज़ानिया में और उसके बाद कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में ड्रामा के लेक्चरर रहे। ग्रीनफील्ड रिवीव, ओकिके और कुरापीपी आदि संग्रह प्रकाशित होकर काफी ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। बीबीसी रेडियो से भी इन की कहानियां और ड्रामे प्रसारित हो चुके हैं। कहानी का बहुत सुन्दर अनुवाद शहादत खान ने किया है- मॉडरेटर
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काफी देर तक मीका अपने में खोया बैठा रहा। ऐसा लग रहा था जैसे उसका खुद पर से नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका हो। नसों में किसी चिंगारी की तरह दौड़ती शराब भी इस मामले में उसकी कोई मद्द नहीं कर पा रही थी। फिर अचानक उसे अपनी ये बेइत्मीनानी बेवकूफी भरी लगी।
उसने बड़ी ज़ोरदार आवाज़ में खंखार कर अपना गला साफ किया और उससे मुखातिब हुआ, “क्या नाम है तुम्हारा?”
“मामा तुमाइनी (तुमाइनी की माँ)”, उसने उसकी तरफ देखे बगैर कहा और बच्चे को ज़मीन पर बिछी चटाई पर सुलाने लगी।
अचानक बच्चा ज़ोर ज़ोर से खांसने लगा। खांसने की वजह से उसका पूरा शरीर बुरी तरह हिल रहा था।
मीका ने झुककर बच्चे को छुआ। वह बुखार से तप रहा था।
“इसका इलाज हो रहा है?”, उसने पूछा। साथ ही उसे एक किस्म की खुशी भी महसूस हुई कि चलो बातचीत करने के लिए कोई विषय तो मिला।
“डिस्पेंसरी में एक स्परीन की गोली तक नहीं है”, उसने जवाब दिया।
माँ की थपकियों से बच्चा तुमाइनी धीरे धीरे चुप हो गया और आखिरकार सो गया। उसकी सांसें काफी तेज़ चल रही थी। मामा तुमाइनी ने उसे चादर ओढ़ा दी और फिर मच्छरों को भगाने वाली एक लंबी चौकोर पतली टिकिया जला दी। टिकिया के जलते ही धूएं का एक गुबार उठा और चटाई के आस पास फैलने लगा। बच्चा कसमसाया। धूएं की वजह से उसे छींक आ गई। माँ उसके पास बैठ गई और हल्की हल्की थपकियों से उसे फिर सुला दिया।
“खुदा तुम्हें सेहत दे मेरे लाल”, वह बुदबुदाई, “खुदा तुम्हें सेहत और ताकत दे, अपनी माँ के नन्हें फौजी।”
“फौजी क्यूँ…?”, मीका ने पूछा।
“क्योंकि फौजी भूखे नहीं मरते और न ही बीमार पड़ते हैं”, उसने इतने मासूमाना अंदाज़ में जवाब दिया जैसे वह कोई छोटी बच्ची हो।
“हाँ वे भूखे नहीं मरते…”, मीका ने कहा, “…कत्ल होते हैं।”
“हमारी इस बेकसी की ज़िंदगी से तो मौत ही बेहतर”, वह तेज़ लहज़े में बोली, “भूख और बीमारियों में रोज़ तड़प कर तिल तिल मरने से बेहतर है कि एक तेज़ रफ्तार गोली सीने के पार हो जाए।”
“ओह! शायद तुम्हें पता नहीं… फौजी भी भूखे मरते हैं… जब खाने को कुछ नहीं होता…”, मीका ने कहना चाहा, लेकिन वह गहरे ख्यालों में डूबी हुई थी, शायद उसने इसकी बात सुनी न थी। फिर वह खुद से ही बाते करने के अंदाज़ में बोली, जैसे वह उस कमरे में अकेली हो, “तुमाइनी का बाप एक फौजी था…।”
“था…?”, मीका ने चौंक कर पूछा।
“… बेहद ताकतवर था वो… कोई उसके मुकाबले का नहीं था। उसकी मौजूदगी में ज़िंदगी कितनी आसान थी। वह मेरे लिए, मेरी माँ के लिए, हम सब के लिए, एक बाप की तरह मेहरबान था। आज उसके बग़ैर ज़िंदगी कितनी मुश्किल हो गई है। हमें छोटी छोटी चीज़ों को हासिल करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है… हर चीज़… हर चीज़ की कीमत हमें अपने खून पसीने से चुकानी पड़ती है… अगर आज तुमाइनी का बाप मौजूद होता…”, ऐसा लगा जैसे अगले ही पल वह रो देगी, लेकिन फिर वह संभल गई।
“क्यों…? क्या अब वह मौजूद नहीं है?…”, मीका ने पूछा… बस यूँ ही… उसके लहज़े में कोई हमदर्दी नहीं थी, उसकी आवाज़ काफी तेज़ और सपाट थी जिस पर उस औरत के दर्द और दुख-तकलीफ़ों का कोई खास असर नहीं था।
“मैं इस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहती… मुझसे कुछ मत पूछो… प्लीज़।” उसने याचना की और फिर रो पड़ी। “वह लड़ने के लिए युंगाडा गया था… पता नहीं… हो सकता है वह ज़िंदा हो… हो सकता है वह मर चुका हो…”, उसने रोते रोते बताया।
मीका कुछ नहीं बोला। बच्चा तुमाइनी अब बिल्कुल खामोश था, उसकी माँ का हाथ उसके जिस्म पर था। वह बेख्याली में अब भी उसे थपकियाँ दिए जा रही थी। आखिरकार मामा तुमाइनी उसे छोड़कर सीधी हुई, उसने कमरे में जलते टीन के नन्हे से चिराग को बुझा दिया। अंधेरे में उसने अपने आपको खामोशी से मीका के सुपुर्द कर दिया, उस खुद सुपुर्दगी में अपने काम के प्रति जिम्मेदारी भी थी और पेशवराना अंदाज़ भी, लेकिन बाद में जब मीका उससे अलग हुआ तो पूरी तरह संतुष्ट होने के बावजूद उसके मन में जीत या खुशी का कोई भाव नहीं था। वह खामोशी से बिस्तर पर चित हालत में लेटा रहा। चटाई से आने वाली बच्चे की उखड़ी उखड़ी सांसों की आवाज़ उसकी बेइत्मीनानी को बढ़ा रही थी।
पता नहीं कब उसे नींद आ गई थी। अचानक उसकी आँखें खुली, थोड़ी देर के लिए तो उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि वह कहां है? फिर उसने अपनी बगल में पड़े मामा तुमाइनी के नंगे जिस्म को देखा और तब उसे याद आया कि वह कहां है।
उसने बिस्तर से उठकर एक सिगरेट जला ली। मच्छरों को भगाने वाली टिकिया पूरी तरह जलकर खत्म हो चुकी थी और अब मच्छर हर तरफ गुस्से में भिनभिनाते फिर रहे थें। वह अंधेरे में परेशान सा बैठा रहा। कोई बात उसके दिल में चुभ रही थी। अचानक उसका ध्यान कमरें में छाई खामोशी पर गया।
उसका गला सूख रहा था और सिर में धमक सी महसूस हो रही थी। वह उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी सिगरेट बुझाई और चटाई की ओर बढ़ गया। बच्चा बिल्कुल खामोश था। सुबह की शुरुआती रोशनी में उसे बच्चे का जिस्म किसी छोटी कपड़े की पोटली की तरह नज़र आ रहा था। उसने माचिक जलाकर उसे ध्यान से देखने की सोची पर उसकी हिम्मत जवाब दे गई। उसने हाथ बढ़ाकर बच्चे को छुआ और अपनी निगाहें, जो धीरे-धीरे अंधेरे में देखने की आदी हो चुकी थी, बच्चे पर जम गई। वह ठंड़ा और बेजान था।
मामा तुमाइनी करवट बदलते हुए कुछ बड़बड़ाई और फिर गहरी नींद में डूब गई। मीका ने बिस्तर पर वापस बैठने से पहले इंतज़ार किया कि उसकी सांसें फिर से गहरी हो जाए। उसने बहुत एहतियात से दूसरी सिगरेट जलाई। उसका मन अभी भी उलझा हुआ था।
सिगरेट पी चुकने के बाद उसने बिना कोई आवाज़ किए बिना बहुत आराम से अपने कपड़े उठाए, जो फर्श पर एक ढ़ेर की शक्ल में पड़े थें। कपड़े पहनने के बाद वह थोड़ी देर खामोश खड़ा रहा। अनजाने में ही उसकी निगाहें बच्चे के मुर्दा जिस्म पर टिकी हुई थी। “नहीं… उसे वहां से फौरन निकल जाना चाहिए…”, उसने सोचा…, “वरन सुबह को बेवजह रोने पीटने और कफन दफन के चक्कर में पड़ेगा। ये एक बेमकसद बात होगी और बेवजह यूं ही काफी वक्त बर्बाद होगा.. आखिर ये बच्चा उसका कौन था?… उसकी माँ से उसका रिश्ता ही क्या था?…” किसी तुरत फुरत चलती मशीन के अंदाज़ में उसने अपना बटवा निकाला और उसमें से कई नोट निकालकर गिने बगैर, बिस्तर के पास पड़े स्टूल पर रख दिये और चिराग को उनके ऊपर पेपर वेट के तौर पर रख दिया।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, दरवाज़ा ज़ोर से चरमराया। वह रुक गया। उस का दिल तेज़ी से धड़क रहा था, कान बिस्तर की तरफ लगे थे।
मामा तुमाइनी ने करवट बदली, “क्या तुम जा रहे हो?”, उसने पूछा।
“हाँ”, उसने जवाब दिया।
“इतने सवेरे?”
“तुम्हें पता ही है कि यहां ट्रांसपोर्ट का कितना बुरा हाल है और मुझे आज ही रवाना होना है।”
उसे आज जैसे भी हो निकलना था। वह रात तक दारुस्सलाम पहुंच जाना चाहता था। पिछले दो दिनों से वह इस छोटे से अनजान कस्बे में फंसा हुआ था, क्योंकि पेट्रोल की किल्लत की वजह से परिवहन की पूरी व्यवस्था चौपट हो गई थी और इस छोटे से कस्बे में ज़रूरत से ज्यादा मुसाफिर जमा हो गए थें। पसीने से भीगे लोग पूरे कस्बे में सवारी की तलाश में मारे मारे फिर रहे थें। बुरी तरह उकता कर आखिरकार उसने पिछली शाम को बाहर निकलकर खोड़ी आवारगी और मौज-मस्ती करने का प्रोग्राम बनाया था। उस मायूसी और ऊब की हालत में उसे शराब की सख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी, लेकिन बीयर, जो उसकी पसंदीदा शराब थी, कस्बे में ढूँढ़े भी नहीं मिल रही थी। वह सबसे पहले जिस बार में घुसा, वहाँ उसे बताया गया कि बीयर का ट्रक कस्बे की तरफ आते हुए पुल के पास एक हादसे का शिकार हो कर, धातु के एक बेकार ढ़ेर में तब्दील हो चुका था। मीका इस बात पर यकीन नहीं करना चाह रहा था, फिर भी उसे लगा कि शायद से बात सच ही हो। बीयर की तलब इतनी ज़ोरदार थी कि वह उसके लिए कोई भी कीमत देने को तैयार था लेकिन बस स्टाप के आस पास के इलाके में बीयर की एक बूंद भी नहीं थी।
वह पतली, धूल भरी गलियां कस्बे के बीच से होकर गुज़रती थी जिनके दानों तरफ झोंपड़ियों के बेतरतीब झुंड थे। अपनी तलाश में नाकाम होने के बाद उसे ‘पूम्बे’ नामक स्थानीय शराब से ही काम चलाना पड़ा, जो वहां बहुत ज्यादा मात्रा में थी और शुरुआत में उसे बिल्कुल पसंद नहीं आई थी। इसके बावजूद वह बेदिली से ही सही धीरे-धीरे उसके घूंट भरता रहा। धीरे धीरे उसे नशा चढ़ने लगा और कुछ देर के बाद वही शराब उसे अच्छी लगने लगी। वह मस्ती में आकर साथ वाली टेबल पर बैठे स्थानीय शराबियों के एक टोले में शामिल हो गया, लेकिन जैसे ही शाम ढली वह फिर खुद को अकेला महसूस करने लगा। उसके साथी शराबी अपने अपने घरों को या फिर दूसरे शराब ख़ानों को जा चुके थें। वह भी उठा और रात के अंधेरे में लड़खड़ाता हुआ, वहां से चल पड़ा। उसे याद नहीं था कि वह कैसे मामा तुमाइनी के घर पहुंचा, या उसने ऐसा क्यों सोचा कि वह अपने उस कमरे के बिस्तर पर अकेला रात नहीं गुज़ार सकेगा, जो उसने लॉज में किराये पर ले रखा था।
“क्या ये बेवकूफी की बात है?” उसने सोचा…, “कमरे का किराया देने के बाद रात कहीं ओर गुज़ारना… रकम की बर्बादी के सिवा और क्या था!…।”
मामा तुमाइनी बोल रही थी, “तब भी… क्या तुम थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकते कि मैं उठकर तुम्हारे लिए चाय बना दूँ?” वह नहीं चाहता था कि वह उठे और उसे अपने बच्चे की मौत का पता चले। इससे पहले वह वहां से निकल जाना चाहता था।
“नहीं, नहीं!” वह जल्दी से बोला, “मेरा सामान लॉज में पड़ा है, मुझे तैयार होना है। चाय मैं कहीं ओर पी लूंगा।”
“जैसे तुम्हें आसानी हो”, वह करवट बदलते हुए बोली। फिर उसने बहुत धीरे से, तकरीबन न सुने जाने लायक आवाज़ में उसके लिए एक आरामदायक और सुरक्षित सफर की दुआ की।
उसने उसका शुक्रिया अदा किया, और फिर धीरे से, एहसास-ए-जुर्म के बोझ तले दबी आवाज़ में बोला, “तुम्हारी रकम… मैंने तुम्हारी रकम रख दी है… तुम्हारी रकम… उस स्टूल पर”, लेकिन वह शायद फिर गहरी नींद में डूब चुकी थी या फिर अब उससे उकता चुकी थी… उसने कोई जवाब नहीं दिया। मीका ने दरवाज़ा खोला और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया। झोंपड़ियों के छप्पर पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरनें और चूल्हों से उठने वाला धूआं, एक नए दिन की शुरुआत का ऐलान कह रहे थें।
अनुवादक- शहादत। हाल ही में लिखना शुरु किया। ज्ञानोदय, कथादेश, समालोचना, परिवर्तन, हस्ताक्षर, लिटरेचर प्वाइंट और स्वर्ग विभा आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।
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