छोटे-छोटे शहरों में ‘तनु वेड्स मनु’

फिल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर भी आम तौर पर महानगरों के दर्शकों की प्रतिक्रियाएं ही आ पाती हैं. हम छोटे शहरों के दर्शकों की राय तक नहीं पहुँच पाते. ‘तनु वेड्स मनु’ पर आज पटना में रहने वाले सुशील कुमार भारद्वाज की टिप्पणी छोटे शहर के दर्शक की प्रतिक्रिया की एक बानगी है जो हम जैसे दर्शकों की राय से बहुत भिन्न है, लेकिन गौरतलब है- मॉडरेटर 
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तनु वेड्स मनु रिटर्न्सइन दिनों सिनेमाघरों में ही दर्शकों को नही खीच रही है, बल्कि सोशल मीडिया में भी खूब छायी हुई है| विभिन्न प्रकार के संवेदनशील प्रतिक्रियाओं को पढने के बाद सिनेमा देखने को विवश हो गया| सिनेमा की कहानी लन्दन में रहने वाले मनु और तनु के गंभीर रिश्ते के पागलखाने पहुँचने, और फिर दिल्ली के आसपास के शहर में पहुँच कर, एक नयी जिंदगी की शुरुआत करने की कोशिश तक में हुई घटनाओं का विवरण है| जहाँ शादी जैसे जिंदगी के अहम हिस्से की समस्या को दिखलाने की कोशिश की गई है| यह सच है कि आज शादी एक भयंकर सामाजिक समस्या के रूप में मौजूद है|

महिलाओं से माफ़ी चाहूँगा लेकिन सच यही है कि आज की अधिकांश शादियाँ उनकी बेकार की जिद्द की वजह से टूट रहीं है| इलीट फैमिली की बात कौन कहे? सामान्य मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां भी थोडा अधिक पढ़ लिख जाने के बाद एक अजीब से पागलपन में जीने लगती है| या तो वह वर्षों से पुरुषों के हाथों सताये जाने का प्रतिशोध अपने परिवार के पुरुष सदस्यों से लेने के फ़िराक में रहती है, या फिर ऐसी काल्पनिक दुनियां अपने चारो ओर बुन लेती है, कि उसके पूरा नही होने पर खुद भी मानसिक रूप से त्रस्त होती है, और अपने पति सहित पूरे परिवार को तबाह कर देती है| इस सिनेमा के लेखक हिमांशु शर्मा ने बहुत ही सराहनीय तरीके से उन क़ानूनी बिन्दुओं का भी इस्तेमाल किया है, जिसके मद में आकार लड़कियां अपने घर को बर्बाद कर लेती हैंलेकिन हिमांशु जी ने एक चूक अंत में आकार कर दी है| मन में एक ही सवाल उठता है कि -क्या यह जरुरी है कि सिनेमा का अंत सुखद ही हो? जिस तरीके से तनु अपने घर वालों की परवाह किये बगैर पागलपन की हद तक हरकत करती रही, क्या उसे वापसी का मौका देना चाहिए था? कुसुम या मनु किसी और की वजह से अपनी जिंदगी क्यों बर्बाद करें? किसी ने वाकई में एक तीखी प्रतिक्रिया दी थी- बेवजह बर्बाद होती जिंदगी का यँ  मजाक उड़ाना सही बात नहीं है| कभी उनके बारें में आप सोचते हैं, जो इस तरह कि त्रासद जिंदगी को झेल रहें हैं?”

क़ानूनी तौर पर भी देखा जाय तो सिनेमा में दो कमी साफ़तौर पर है| सबसे पहली बात ये कि कोर्ट में पतिपत्नी के सशरीर उपस्थित हो, अपना बयान दिए बगैर डिवोर्स संभव नहीं है| दूसरी बात ये कि जब तक डिवोर्स की प्रक्रिया समाप्त ना हो जाय शादी करना संभव नहीं है| शायद हिमांशु जी इस पर ठीक से शोध नहीं कर पाए या फिर कहानी के अधिक कसाव की वजह से इसे सही तरीके से प्रस्तुत करने में चूक हुई है|
एक और विचारणीय बिंदु है जो शायद दर्शकों को भी पसंद नहीं आया हो| बॉलीवुड के सिनेमा में यह परम्परा वर्षों से है कि सिनेमा का अंत सुखद ही हो, और जिसके लिए हर संभव स्वाभाविक स्थिति को उत्पन्न करने की कोशिश भी की जाती है| यहाँ आदतन दर्शक यह ढूंढते भी है कि नायक नायिका का मिलन कब और कैसे होगा? यहाँ आनंद एल राय और हिमांशु शर्मा दोनों ने ही एक नयापन लाने की कोशिश की और छः फेरे लेने के बाद शादी रोक दी गयी| साथ ही दिखाने की कोशिश की कि परिवार को अंत-अंत तक बचाने की जिम्मेवारी पुरुष पर ही होती है| वह पुरुष जो अपनी इच्छाओं को तिलांजली देकर सुबह से शाम तक मेहनतकर घर चलाने की कोशिश करता है| हर संभव तरीके से पत्नी को प्यार देता है| फिर भी पत्नी प्रताड़ित करके उसे पागलखाने में भर्ती करवा देती है, यह जानते हुए भी कि वह पागल नही है| लोग इसे पत्नी का पति प्रेम कह सकते हैं, कि वह देवर को कह पति को पागलखाना से निकलवाने की कोशिश करती है साथ ही जानकारी भी लेती रहती है|

लेकिन उसे क्या कहेंगे?- जब तनु सिर्फ मनु का चेतावनी भरा पत्र सुनकर सारी चूडियाँ निकाल लेती है, माथे से सिंदूर पोछ, अपने पिछले आशिक के पास, किसी कंधे का सहारा लेकर पहुँच जाती है? मनु तो कुसुम की ओर पहले इसलिए झुकता है क्योंकि उसका चेहरा तनु से मिलता है| मशाला फिल्मों के रूप में संवादों की चुस्ती और पैनापन अभिनय से तारतम्य बनाये हुए है| लगभग सभी पात्रों ने अपने तरफ से बेहतर करने की कोशिश की है| लेकिन हंसी और गंभीरता के बीच अत्यधिक कसाव के कारण कुछ चीजों को स्वाभाविक रूप से बढने का मौका नही मिल सका| वैसे सिनेमा की दृष्टि से देखा जाय तो तलाक आदि मामलों पर ही बनी फिल्म ‘जोर लगा के हईशा’ में इसकी तुलना में कहीं अधिक स्वभाभिकता थी|

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