• कथा-कहानी
  • अरोध कुमार मंडल की कहानी ‘मुझे भूल मत जाना’

    आज पढ़िए युवा लेखक अरोध कुमार मंडल की कहानी। अरोध को अपनी पहली कहानी पर इस साल ‘हंस युवा सम्मान- दस्तक’ मिला है, जो पहली प्रकाशित रचना पर मिलता है। नेपाल के जनकपुर के रहने वाले अरोध की यह दूसरी कहानी है। आप भी पढ़ सकते हैं। कहानी के साथ जो तस्वीर है लेखक की यही एक तस्वीर उपलब्ध थी- मॉडरेटर

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    जिस दिन चाँद नहीं उगता था हम समझ जाते थे भालू उसे चुराकर भागा होगा।

    वह अक्सर मुझे देखकर सीटी मारा करता है। कई बार क्लास मे भी उसने मुझसे बदतमीजी से बात की है।

    -तुम बहुत हॉट हो- वह मुझे छूकर अपना हाथ झटकता -देखो मेरा हाथ जलने लगा–

    मेरे बाकी फ्रेंड्स उसकी इन हरकतों को मजाक समझते है। मै नहीं। मैंने उसे हमेशा मेरा पीछा करते हुए देखा है। स्कूल के बाद पहाड़ी ढलान पर अक्सर कुछ लड़कों के साथ मुझे वह खड़ा मिल जाता है। सभी साइकिल रोड पर खड़ी करके मेरा रास्ता ब्लॉक कर देते है।

    मै जब दूसरे रास्ते जाने के लिए पलटती हूँ। तब वह अक्सर मुझे छूकर कहता है –तुम बड़ी जल्दी हॉट हो जाती हो!- और फिर साइकिल रोड पर से हटाते हुए सभी लड़के एक खी-खी जैसी बदतमीज़ हँसी  हँसते है।

    अक्सर पहाड़ों के ढलान पर जल्दी ही धुंध की लहर खिंच आती है। दिन के ढलते समय से ही वहाँ कुहासा हो आता है। उन रास्तों से ज्यादा गाड़िया नहीं गुजरती। वे ज्यादातर सूनसान ही रहती है।

    विनय मुझे अक्सर दूसरे रास्ते से चलने को कहता है। जो की सपाट रास्ता है। पर ये रास्ता छोटा है। और पहाड़ी होने के वजह से नीचे उतरने मे बिल्कुल समय नहीं लगता। रास्ते पर कुहासा-सा होते ही जुगनुओ की किर्र-किर्र की तान खिंची रहती है। सड़क के नीचे नदी का झिरझिर बहना स्पष्ट सुनाई पड़ता है। इसलिए भी ये रास्ता मुझे बहुत पसंद है।

    कई बार तो मै विनय को भी अपने साथ इसी रास्ते घसीट लाती हूँ। वह मुझसे बार-बार दूसरे रास्ते चलने को गिड़गिड़ाता रहता है। पर मै उसकी एक नहीं सुनती।

    -पकड़ सको तो पकड़कर दिखाओ- ढलान आते ही धीमे चल रहे मेरे पाँव तेजी से दौड़ पड़ते है। विनय बहुत दब्बू किस्म का है। उसे तेज दौड़ते हुए हमेशा डर लगता है।

    -अगर कही फिसला तो सीधा नीचे गिरूँगा– कहता हुआ वह मुझे भी तेज दौड़ने से मना करता रहता है।

    अक्सर छुट्टी के वक्त हम स्कूल के पीछे की पहाड़ी पर चले जाते है। वहाँ लंबे-लंबे हरे घास है। उसमे हमारे घुटने डूबे हुए रहते है। बैठने पर हम छुप जाते है। हवा जब उन लंबी घाँसो से गुजरती है। तब उसका साँय-साँय और और भी तेज सुन पड़ता है।

    और जब लेटने का मन हो तो हम छोटी-छोटी घासो पर पसर जाते है। उन पर लेटे-लेटे आसमान तकते रहते है। दूर-दूर तक दूध से उजले बादल।

    -अगर तुम बर्ड होते तो क्या करते?- मै पूछती हूँ।

    -तुम्हें लेकर उड़ जाता–

    -ले कहाँ जाते?-

    -दूर पहाड़ों के ऊपर-

    -फिर?-

    -फिर?….- विनय सोचने लगता है –फिर हम बैठकर सारी रात चाँद देखते रहते–

    -और अगर उस दिन चाँद ना निकला होता?-

    -तब हम ऊपर आसमान मे चाँद ढूँढने जाते– विनय कहता है।

    मै उठ बैठती हूँ। नीचे हमारा स्कूल दिखाई पड़ रहा है। शाम होते ही उसके अंदर वाचमैन ने लाइट जला दी है। चारों तरफ एक साँझीला कोहरापन खिंच आया है। मै शून्य मे स्कूल को देखती रह जाती हूँ। स्कूल पानी की लहर सा कांप रहा है। वह धीरे-धीरे घुल रहा है। वह घुल गया है। वह छोटा हो आया है। वह किन्डरगार्डेन बन चुका है। मै किंडरगार्डन मे हूँ।

    -मैम, कभी-कभी चाँद क्यों नहीं दिखाई पड़ता?- वह पूछता है।

    -क्योंकि चाँद को भालू चुराकर ले जाता है-

    -पर भालू चाँद का क्या करेगा?-

    -क्या करेगा?….– मैम पास आ कर उसे गोद मे उठा लेती है –चाँद से भालू फुटबॉल की तरह खेलेगा। देखते नहीं चाँद एक बॉल है-

    -और आधा चाँद?- मै पूछती हूँ।

    -आधा चाँद?….– मैम सोचने लग जाती है –आधा चाँद खेलकर खाने वाली फुटबॉल। जिससे आप पहले खेल भी सकते हो। खेलकर भूख लगे तो खा भी सकते हो- वह अब मुझे गोद मे उठा लेती है –तो बताओ जब भालू चाँद को चुराकर ले जाएगा। तो कौन-कौन मेरे साथ चाँद ढूँढने जाएगा?- मैम पूछती है। हम सब खुशी से चिल्लाते हुए हाथ खड़े करते है। हम सब तालियाँ बजाते है। ताली बजाते हुए वह मुझे झटक देता है। मै उसको एक टुक देखती रह जाती हूँ। उसका चेहरा घुल रहा है। पानी की लहर सा कांप रहा है। उसके चेहरे मे से विनय का चेहरा झांक रहा है।

    -चाँद ढूँढने चली गई?- विनय मुझपर हँसता है। मै सर झटकते हुए नीचे की तरफ अपना बैग उठाए हुए दौड़ पड़ती हूँ।

    मै किसे भूल गई हूँ?

    अब जब उन दिनों के बारे मे सोचती हूँ। तो लगता है जैसे वो सिर्फ मेरा एक वहम है। असल मे वैसा कुछ हुआ ही नहीं था। क्या कभी कभी अपनी ही जिंदगी को याद करते हुए हमे वह एकदम अपरिचित और अनजान नहीं लगता -कल्पना और असलियत के बीच मे डोलता हुआ? क्या इसी तरह, जैसे-जैसे जीवन बीतता जाता है, वह हमसे और अधिक अपरिचित नहीं होता जाता है, हमे छलता हुआ?

    चाँद के पीछे से अब भी मुझे एक चेहरा झाँकता नजर आता है। पर ये भालू का नहीं उसका चेहरा है। उसके बचपन की सूरत। जिसमे वह मुझे अक्सर चिढ़ाया करता था। कई बार तो वह मेरे बाल नोचकर भी भाग जाया करता। मै गुस्से से उससे कभी भी बात ना करने की ठान लेती। अगर वह कहीं दिखता तो अपना मुंह फेरकर चल देती। शुरू-शुरू मे तो वह मेरी इस हरकत को सिर्फ जरा सा गुस्सा हो जाना समझता। पर जब हफ्तों तक ऐसा ही चलता रहता। तब वह रोता हुआ कहीं से आता। और मेरे गले लगकर रोता कि मै उससे बाते क्यों नहीं करती। वह उसी तरह मेरे चुप कराने तक रोता रहता। और जब मेरा दिल पसीजता और मै उसे गले लगा लेती तो फिर उसकी हरकतें वैसी ही रहती। वो मेरे बाल नोचकर और मुंह चिढ़ाकर भाग जाता। उसको लगता था मै उसका पीछा करूंगी, कि मुझे उसका बाल नोचना पसंद नहीं, पर असलियत मे मुझे वह कभी बुरा नहीं लगा। बल्कि जब वह किसी दिन स्कूल नहीं आता तो मुझे सबसे ज्यादा यहीं भ्रम सा लगा रहता कि वह अभी ही कहीं से निकलकर आएगा और मेरे बाल नोचकर भाग जाएगा।

    पर जूनियर स्कूल की वह यादें अब मुझे बिल्कुल झूठी लगती है, लगता है जैसे मैंने वह सब जिया ही नहीं, वह सिर्फ मन बहलाने की मनगढ़ंत  कल्पनाएँ है।

    चाँदनी रातों मे जब मै अपने कमरे की बालकनी मे से शहर के ऊंचे-नीचे घरों से पीली रोशनी के फव्वारों को फूटकर सड़कों पर गिरते देखती रहती हूँ। तो मुझे किसी बच्चे के हंसने की आवाज आती है। किसी बच्चे की परछाई मेरे कमरे मे इधर से उधर डोलती रहती है। वह परछाई कभी कभी मेरे बाल नोचकर भी भाग जाती है और दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है। खी-खी हँसती हुई। रात के अंतहीन अंधेरे मे वैसे भी मुझमे इतनी हिम्मत नहीं होती कि  वाशरूम तक भी चली जाऊँ। उस परछाई के पीछे दौड़ना तो और दूर की बात है। मै ऊपर से नीचे तक कंबल मे अपने को छुपा लेती और कीड़े सी सिकुड़ती ही चली जाती हूँ। बाहर पूरी रात शीत टपाटप टपकती रहती है। हवाएँ साँय-साँय करती हुई सड़क पर फेंके हुए पुराने पीले पेपर इधर से उधर उड़ाती रहती है। मानो पूरे शहर को साफ करने का ठेका हवाओ ने उठाया हो।

    एक शाम जब मै खिड़की के आगे अपने स्टडी टेबल पर बैठी हुई होमवर्क कर रही थी। तो एक पेपर हवा मे लहराता हुआ मेरे स्टडी-टेबल पर आ बैठा। मैंने उसे उठाया। उसमे मे मिट्टी लगी हुई थी। लिखा था : इतनी जल्दी भूल गई?

    क्या? क्या भूल गई? मुझे लगा ये किसी लड़के का किया-धरा है। मैंने खिड़की के आगे, बाहर, देखा कोई है तो नहीं? अगर कोई चाहता कि मै कुछ याद करूँ तो वह पक्का मुझे नीचे खड़ा दिखता। या पूरी बात उस पेपर मे लिखता। पर वहाँ कोई नहीं था। या तो लिखने वाला बहुत ही डरपोक था जो मुझसे नजरे मिलाने की हिम्मत ना होने के कारण भागा था। या फिर ये उन्ही लड़कों मे से किसी लड़के का किया हुआ मजाक था। मैंने वो पेपर अपने कमरे के बिन मे डाल दिया।

    मै उस बात को भूल गई होती अगर उस शाम पहाड़ी ढलान पर उतरते हुए ऐसा ही एक और वाकया ना हुआ होता। रात की पतली परत खिंच आई थी। नदी का झिरझिराना बहुत तेज सुनाई पड़ता था। बहता पानी दूर से ही चमक उठता था। मै ठंड से बचने के लिए बहुत तेज कदमों से चल रही थी। मेरे कदमों की आवाज काफी देर तक उस मौन मे झूल जाती थी।

    मैंने बाये हाथ की पगडंडी पकड़ी तो किसी की परछाई वहाँ डोलती दिखी। मुझे हल्का सा डर लगा। पर मै नजरंदाज किए हुए आगे बढ़ती रही। वह परछाई अब ठीक मेरे बगल मे थी। मेरे उसके पास पहुंचते ही वह उठ खड़ी हुई। उसने अपना पैन्ट झाड़ा।

    -आज इतने लेट?- उसने कहा तो मै उसके तरफ देखने पर मजबूर हो गई। पर वह मेरी तरफ नहीं देख रहा था। उसने सिर झुका रखा था। और न जाने क्यों, मेरे पैर अपने आप ही रुक गए।

    -तुम्हें इतने लेट नहीं जाना चाहिए–

    -मुझे डर नहीं लगता- मैंने झूठ कहा था ताकि उसे लगे कि मै उससे बिल्कुल भी डरी हुई नहीं हूँ।

    -मै डर की नहीं अंधेरे की बात कर रहा हूँ- उसने एक उँगली चारों तरफ घुमाई -देख रही हो कितना अंधेरा है?-

    उसने टॉर्च की रोशनी आगे की सड़क पर फेंकी। आगे का रास्ता अब दिन के उजाले सा हो आया था। वह बिना कुछ कहे चुपचाप चलता रहा, मेरे से आगे। जैसे जैसे मोड आता था उसकी टॉर्च की रोशनी इधर से उधर बिल्ली की तरह छलांग मारती थी। जब बस कुछ दूर रह गया था। तो उसकी आवाज लहराती हुई मुझसे टकराई।

    -क्या तुम उसे भूल गई हो?-

    -किसे?- मै चौंक पड़ी। एक पल को विश्वास ना हुआ कि इस सफर मे उसे कुछ और भी बात करनी थी। लगा जैसे ये आवाज कहीं से भटकती हुई हमारे बीच चली आई है। और जब मेरी खुद की आवाज सुनाई पड़ी, तो मै काँप गई, जैसे वह मेरी आवाज थी ही नहीं।

    वह मेरी तरफ एकदम से पलट गया। टॉर्च की रोशनी सीधे मेरे चेहरे पर चौंधियाती हुई पड़ी। मैंने हाथ आगे किये। कुछ देर तक वह रोशनी वैसे ही रही। जैसे उसने जान-बूझकर मेरे चेहरे पर रोशनी मारकर ये पता करना चाहा था कि वह सही आदमी के साथ तो आया है, कहीं गलती से किसी और की जगह तो मुझे नहीं पकड़ लाया।

    -तुम्हें पता होना चाहिए मै किसकी बात कर रहा हूँ-

    -मुझे नहीं पता, बताओ-

    पर उसने कुछ नहीं कहा। टॉर्च की रोशनी जब मेरे चेहरे पर से हटी तो वह कहीं नहीं था।

    वेल, मै उसके साथ उस रास्ते भर चली थी पर मै उसका चेहरा तक ना देख पाई थी। मुझे लगा उसके बाद भी वह मुझे कभी-न-कभी उस रास्ते पर बैठा मिलेगा। पर उस घटना के बाद मैंने उसे कभी वहाँ बैठे हुए नहीं पाया। और ये बात काफी पुरानी भी है। उस वक्त मुझे सीनियर-स्कूल मे आए हुए ज्यादा दिन भी नहीं हुआ था। और अभी मै अपने सीनियर-स्कूल के दुनिया मे ही इतना खोई हुई थी। कि पुरानी बाते ज्यादा याद नहीं रहती। मै कभी-कभार ही उन दिनों को याद करती थी। खासकर तब जब वर्तमान की कोई चीज से वह जुड़ी हुई होती।

    उम्मीदों के उलट।

    और दिनों की तरह ही उस दिन भी हम लंच के समय सीनियर-स्कूल के पीछे के फील्ड मे टहल रहे थे। वहाँ और लड़कियों के भी ग्रुप थे। नॉर्मली सभी लड़कियां अपने बेस्टी से ऐसे ही बाते शेयर करती है। वहाँ पर भीड़ तो बहुत रहती है, और कभी-कभी हम चाहते भी कि हमारी बात कोई ना सुने, पर वहाँ सब अपने आप मे बिजी होते है। ये बात काफी हास्यास्पद है कि अगर हम छुपकर क्लास के भीतर बैठकर एक दूसरे से अपनी बाते शेयर करते तो वो जरूर औरों के बीच मे लीक हो जाती। कोई न कोई लड़कियों का ग्रुप खिड़कियों के पीछे से या चुपचाप से ऐसे बिहेव करते हुए कि उसे हमारी बातों मे कोई दिलचस्पी नहीं हमारी बातें सुन रहा होता। सो स्कूल फील्ड ही अपनी बातें शेयर करने की बेस्ट जगह थी। ना सिर्फ लड़कियाँ पर लड़के भी यहीं तरीका अपनाते थे। हालांकि मुझे नहीं लगता लड़कों के बीच कुछ खास ऐसी बातें होती होंगी जो वो दूसरों से छिपाते होंगे। लड़कों के ग्रुप मे अक्सर हमसे ज्यादा संख्या होती। वो किसी भी बात को सिरियसली नहीं लेते। मै और आकांक्षा जहां बैठे थे। उससे बस थोड़ी ही दूर, वो जगह थोड़ी ऊँची थी, लड़के हँस-हँस कर बातें कर रहे थे। वो खुद ही इतनी तेज आवाज मे बातें कर रहे थे कि उनकी आवाज ना चाहते हुए भी सुन पड़ती थी। और ये थोड़ा अजीब सा भी लगता था। अगर कोई और हमे वहाँ इस तरह बैठे देखता तो लगता कि हमे लड़कों की बातों मे दिलचस्पी है और हम चोरी चुपके उनकी बातें सुन रहे है। पर वैसा कुछ भी नहीं था। आकांक्षा अपने फैमिली के बारे मे बातें कर रही थी। कि कैसे उसका भाई उसपे शक करता है कि उसका कोई बॉयफ्रेंड है। और किसी भी चीज मे जिद्द करने लगता है वरना कहता है कि वह सबको उसके बॉयफ्रेंड के बारे मे बता देगा। आदि। वेल, मुझे उसकी बात पर बहुत हंसी आ रही थी। और उसके भाई का वो कद्दू सा चेहरा मेरे आँखों के सामने घूमने लगता। उसके शब्द हर जगह आकार लेने लगते। और मुझे दिखता वह मुठ्ठी बांधकर गाल फुलाकर चिल्लाता है। चिल्लाते वक्त उसके आगे के बाल उसके आँखों के ऊपर गिर जाते है। फिर वह उन्हे पीछे समेटता है और दुबारा से चिल्लाता है।

    वो बातें लंबी चली होती, अगर आकांक्षा एकदम से चुप ना हुई होती। वह मेरे पीछे देख रही थी। उसके आँखों मे आश्चर्य और डर का मिला जुला भाव था। मै पलटी। वहाँ वह खड़ा था। उसने हाथ पीछे छुपा रखे थे और आगे को ऐसे झुका हुआ था जैसे हमारे सम्मान मे झुका हो। क्या वह बहुत देर से वहाँ खड़ा था?

    हम बिना उसे टोके उठ गए और चुपचाप क्लास की तरफ बढ़ने लगे। हमने अपनी बाते जारी रखी और पूरी कोशिश की ये दिखाने की कि हमे उसमे कोई दिलचस्पी नहीं। पर वह हमारे पीछे चला आया। और जैसा की वह अक्सर करता है। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मेरा नाम पुकारा। मै उसका हाथ झटककर आगे बढ़ जाना चाहती थी पर मैने अपने आपको अपनी इच्छा के विरुद्ध रुका पाया।

    -क्या है?- मेरी आवाज झिड़कने वाली थी।

    -तुमसे कुछ बात करनी है- वह अबभी अपना हाथ अपने पीछे किये हुए था। और उसके चेहरे पर, जैसा नॉर्मली हर लड़के के चेहरे पर अपनी क्रश से बात करते होता है, डर बिल्कुल नहीं था।

    -कौनसी बात?- मेरी आवाज अब भी तेज थी। मैंने चारों तरफ देखा सभी की नज़रे हम पर टिकी हुई थी। सभी के चेहरों पर हँसी और जिज्ञासा थी। ये शायद इसलिए भी था क्योंकि सभी को पता था कि वह मुझे लाइक करता है। और उस भीड़ मे एक चेहरा विनय का भी था। वह उदास था। मुझे पता है वह मुझे लाइक करता है। उसके बातों से सब पता चलता है। पर मै उसे उस तरह नहीं समझती। मै उसके साथ रहती हूँ क्योंकि उसके साथ रहना एक दोस्त सी खुशी देता है। पर वह मेरा प्यार भी हो सकता ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा।

    -यहाँ नहीं- वह मेरे और नजदीक आ गया -क्या तुम मुझे वहाँ मिलोगी?- उसके गर्म सांस ने मेरे कान के त्वचा पर हल्का सा स्पर्श किया। वह मुझे बुरा नहीं लगा। कहकर वह फिर अपनी जगह खड़ा मेरे जवाब का इंतज़ार करेगा, ऐसा मैंने सोचा था। मै गलत थी। वह वहाँ से दौड़ता हुआ भाग गया। आज उसमे एक बचपना दिखा था। उस आँखों पर पड़ती धूप मे भी मै एकटक उसको देखती रही। जब वह आँखों से अदृश्य हो गया तो मै उस खालीपन को देखती रही। मै उस खालीपन मे घुल गई। घुलती ही चली गई। धीरे-धीरे। जबतक कि मेरे चारों तरफ जूनियर-स्कूल झाँकने ना लगा।

    उस दिन बारिश हुई थी। और मुझे बारिश मे भीगी सड़कों पर चलना बिल्कुल नहीं आता। मिट्टी और पानी के मिश्रण की छीटे मेरे पैर मे ऊपर तक लिपट आई थी। मै ऊँची स्कर्ट पहनती हूँ। पर फिर भी मेरी स्कर्ट खुद को कलंकित होने से ना बचा पाई थी। जितना मुझे याद पड़ता है, उस दिन का मैंने बहुत बेसब्री से इंतज़ार किया था। उस वक्त मै शायद फॉर्थ  क्लास मे थी। और सारी रात जागकर मैंने एक लेटर लिखा था। मै उस रात एक शब्द लिखती और फिर कचर देती। फिर दुबारा से लिखने की कोशिश करती। पर हर शब्द मुझे नीरस जान पड़ता। हर बार लगता, नहीं कुछ और। और आखिरकार लगभग सौ पन्ने फाड़ने के बाद मै कामयाब हो गई थी। उसे देने के लिए घर के पीछे वाली आंटी का गुलाब चुराया था। मै दीवार के इस तरफ से फूल नहीं तोड़ पा रही थी। और मांगने का तो सवाल ही नहीं बनता था। वह पक्का मना कर देती। मैंने कई बार उन्हे दूसरों को फूल न तोड़ने के लेक्चर देते हुए सुना था। एक बार जब चुपके से दरवाजा हल्का सा खोलकर अंदर घुसना चाहा था तो वहाँ बंधा पीला टीनू इतनी जोर से भौका था कि मै रोने लगी थी। वह बार बार अपनी जंजीर खड़खड़ा रहा था। मानो छूटते ही मुझपर टूट पड़ता। मै जब सारे ओर से निरास हो गई थी तभी मैंने देखा था। फूल की एक डाली हमारे पीछे के कमरे की खिड़की से अंदर घुसपैठ करना चाहती थी। पर मै उसे खड़े-खड़े नहीं पा सकती थी। मै पीछे से दौड़ते हुए आई  और कूदकर पाना चाहा। पर बेकार। आखिर मैंने वो एक टूल पर चढ़कर तोड़ी थी।

     खैर, मै उस पूरे दिन स्कूल मे वह गुलाब छुपाये रही।

    आखिरकार लंच हुआ। सभी क्लास से बाहर निकलकर फील्ड मे चले गए। मै मन-ही-मन उस पल को सोचकर मुस्कुरा रही थी। मै खुदको उसे फूल देता हुआ देख रही थी। पर तभी स्कूल मे जोर का साइयरन बजा और हम सब को स्कूल मे जमा होने को कहा गया। हम सभी स्कूल मे जमा हुए तो बताया गया कि मधेशी और पहाड़ियों के बीच आंदोलन शुरू हो गया है।

    जितना मुझे ठीक ठीक याद पड़ता है। मधेशी और पहाड़ियों के बीच की खटर-पटर की चर्चा पहले भी हुआ करती थी। मैंने कई बार सुना था कि काठमांडू मे मधेशीयों को नीचा दिखाया जाता है। उनसे घृणा की जाती है। सड़कों पर चलते हुए भी उन्हे मारा-पीटा और गरियाया जाता है। किसी भी स्कूल, कॉलेज मे एडमिसन लेने के लिए उनसे खूब सारा पैसा ऐठा जाता है। सिर्फ ये जानकर कि वे मधेशी है उनपर किसी भी सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य का धब्बा लगा दिया जाता है। उन्हे वे अधिकार नहीं मिलते जो पहाड़ियों को मिलते है।

    पर उस टाइम मुझे उन बातों मे कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। मुझे तो उनका मतलब भी नहीं पता था। आंदोलन का मतलब मै समझती थी स्कूल बंद हो जाता है और सड़कों पर पुलिस घूमने लगती है। और ये कि कुछ दिनों बाद सबकुछ अपनेआप ठीक हो जाता है।

    पर उस दिन, जूनियर-स्कूल के फील्ड मे इकठ्ठा हुए, मुझे पहली बार लगा था। कि ये उससे बढ़कर कुछ और भी है। कि इसमे गोलियां चलती है। जाने जाती है। पहली बार आंदोलन शब्द सुनकर मै काँपी थी। पहली बार इस शब्द से मुझे डर लगा था।

    मुझे वह सबकुछ अब भी आँखों के आगे चलता हुआ दिखता है। प्रिन्सपल सर के चेहरे पर चिंता और भय थे। उस दिन हमारी वही छुट्टी कर दी गई। स्कूल कब खुलेगा इसका कुछ पता नहीं था।

    मुझे अबभी याद है, स्कूल से घर लौटते वक्त, वो गुलाब मेरे हाथों मे ही था। पर रास्ते मे वह मुझे कहीं नहीं मिला। वह शायद पहले ही निकल गया था। मै वो गुलाब, इस आशा से कि स्कूल जल्दी ही खुल जाएँगे, अपने बैग मे ही रखे हुई थी। मै उसे वो गुलाब देने को बहुत बेकरार थी। मुझसे अब एक पल का भी इंतज़ार नहीं होता था। मै इस आशा मे थी कि कल या परसों मे सब ठीक हो जाएगा। कि स्कूल जल्दी ही खुल जाएंगे। पर जब सबकुछ मेरी उम्मीदों के उलट हुआ तो मुझे पता चला मै कितनी गलत थी!

    मुझे भूल मत जाना!

    उस दिन बारिश सा हो आया था। चारों तरफ तेज हवाएँ चल रही थी। धूल की लहरे सांप की तरह लहराती हुई हमारी साँसों मे भरने लगी थी। ये लहर जब हम क्लास मे थे तभी से शुरू हुई थी। इनसे बचने के लिए हमने खिड़की के ठक-ठक मारते पल्ले बंद कर दिए थे। सारे क्लास मे निरा-अंधेरा सा खिंच आया था। बाहर हवाओं का साँय-साँय चीखना भीतर तक सुन पड़ता था। हमने सोचा था छुट्टी होने तक ये लहरे शांत होकर किसी कोने मे बिला जाएंगी। पर छुट्टी के बाद वे अपने परवान पर चढ़ चुकी थी। लहरे बार बार और लंबी होती जाती थी। सभी बच्चे छुट्टी होते ही घर की तरफ दौड़ पड़े। विनय मेरे ठीक पीछे ही क्लास से बाहर निकला पर उदासी से लटका हुआ उसका चेहरा भीड़ मे ही कहीं खो गया। उसने मुझसे साथ घर चलने को भी नहीं पूछा। आकांक्षा मेरे साथ ही थी। वह मेरा हाथ पकड़े हुए थी। वह मुझे घसीटती हुई अपने साथ दूसरे सपाट वाले रास्ते ले जाना चाहती थी। पर मैंने अपने आपको अपनी इच्छा के अनुकूल अकेला पाया। घर की तरफ नहीं। पहाड़ी के तरफ। स्कूल के पीछे की पहाड़ी। उसने मुझे बुलाया था। मैं इस बारे मे क्लास मे काफी देर तक सोचती रही थी। और हर बार यही निर्णय पर पहुँचती थी कि मै नहीं जाऊँगी। सारे लड़के मेरा पीछा करते हुए चले आएंगे। हो सकता है लड़कियां भी आए और चुपके से हमारी बाते सुने। पर जैसे ही देखा कि इस तूफान मे किसी को मेरी परवाह नहीं, मेरे पैरों को आजादी सी मिल गई। और कब मै आकांक्षा के हाथों मे से अपना हाथ छुड़ा कर इधर की तरफ बढ़ गई थी मुझे खुद पता नहीं चला।

    मै इस चीज को और लंबा नहीं खींचना चाहती थी। आज मै चाहती थी उसे मुझसे जो कहना है कह दे। मुक्त करे मुझे इस रोज के खेल से।

    जैसे-जैसे मै ऊपर चढ़ती गई। मेरे थकान के साथ हवाएँ भी थक कर आराम करने लगी।  मौसम फिर से खुलने लगा था। साफ बादल आसमान से झाकने लगे थे। पर अब कुछ ही देर मे अंधेरा होने वाला था। मै एक जगह अपना बैग रखकर बैठ गई। मेरे पैर आगे को पसरे हुए थे। मै ठीक स्कूल के पीछे थी। जहां से स्कूल के पीछे का हिस्सा दिख रह था। अभी भी स्कूल के अंदर की लाइटस् ऑफ है। कुछ ही देर मे वाचमैन बत्तियाँ जला देगा। मै कुछ देर तक वैसे ही बैठी रही। एक दो बार इधर-उधर नजर डाला कि कहीं वह दूसरी जगह तो नहीं बैठा है। पर हम सबको पता था कि अगर कोई पीछे की पहाड़ी पर बलाये तो कहाँ  मिलना है। फिर वह अभी तक आया क्यों नहीं था? क्या और मजाको की तरह ये भी उसका एक और मजाक था?

    मुझसे थोड़ा ऊपर दो लड़के खेल रहे है। वह किसी चीज को एक पतली सी लकड़ी से साइड कर रहे है। कभी कभी ऊपर से किसी बत्तख की आवाज सुनाई देती है। शायद उनका बत्तख  होगा, सोचकर मै वहीं बैठी रही।

    आधा घंटा होने को आया था। चारों तरफ अंधेरा खिंच आया था। वाचमैन ने स्कूल के अंदर लाइटस् जला दी है। खिड़कियाँ दूर तक चमक रही है। पीले रंग मे। मै वहाँ उसका इंतज़ार करते करते ऊब गई थी। ये भी उसके मज़ाको मे से एक और मजाक था। मै अपना बैग उठाकर जाना चाहती थी। पर ऊपर से बत्तख की आवाज तेज हो आई थी। और वो कोई खेलने जैसी आवाज नहीं थी। वो चीख थी: पीड़ा की। मै अपना बैग वहीं रखकर ऊपर की तरफ चली गई। दोनो लड़के वहीं खड़े थे। एक किसी मरी हुई चिड़ियाँ को अपनी लकड़ी से साइड कर रहा था। दूसरा झाड़ियों मे फंसे एक बत्तख को मार रहा था। मै चीखती हुई उनके पीछे दौड़ी। चिड़ियाँ वाला लड़का दौड़ा नहीं। बत्तख वाला डर कर पीछे हो गया था। बतख का दायें तरफ का पैर झाड़ियों मे फंसा हुआ था। उन लड़कों के चहरे को देखकर साफ पता चलता था वह इतने आसानी से नहीं भागने वाले। मैंने पास मे पड़ा एक डंडा उठाया और चीखती हुई उनके पीछे भागी तो दोनों नीचे की तरफ भागे। चिड़ियाँ वाले की टोपी पीछे छूट गई थी। वह कुछ नीचे जाकर मुझपर देखता रहा। वो दोनों नीचे खड़े हो गए।

     -भाग जाओ यहाँ से- मैंने डंडा हवा मे लहराते हुए कहा।

    पर वो दोनों बिना डरे खड़े रहे। तब मैंने जाना कि वे टोपी के लिए रुके है। मैंने टोपी अपने पैर के पास से उठाई और उसे नीचे फैक दिया। लहराती हुई वो उनके पास चली गई। वे हँसते हुए नीचे भाग गए। मैंने बत्तख का पाँव छुड़ाया। चिड़ियाँ को देखा वो पूरी तरह बेजान थी। पर उसका शरीर अभी गरम ही था। शायद उन्ही दोनों ने इसे अभी मारा था। बत्तख दूसरी जगह जाने के बजाए मेरे पैर के पास खड़ा हो गया। मैंने उसका माथा सहलाया और नीचे की तरफ चिड़ियाँ को हाथ मे लिए हुए उतरने लगी कि तभी मेरी नजर दायें तरफ गई। झाड़ियों के बीच मे एक सफेद चीज वहाँ से झाँक रही थी। वह एक ड्रॉइंग पेपर था। एक गत्ते पर चिपका हुआ और पीछे एक डंडे से बांधा हुआ। मैंने झाड़ियों के उस तरफ देखा वहाँ गुलाब के फूल बिछे हुए थे। मै वहाँ तक गई; वे एकदम ताजे फूल थे। हवा की वजह से इधर से उधर फैले हुए थे। मैंने उस ड्रॉइंग पेपर के ऊपर लिखा हुआ पढ़ा। :

    ‘मुझे माफ कर देना। मैने आज तक जो कुछ भी किया वो सिर्फ तुम्हें हंसाने के लिए, ना कि तुम्हारा दिल दुखाने के लिए’

    मेरा दिल दुखाया? नहीं वह उस चीज के लिए माफी नहीं मांग सकता जो उसने किया ही नही था। मै उसे ढूँढना चाहती थी। वह कहीं यही कहीं छुपा हुआ तो नहीं?

    पर वह उस दिन कहीं नहीं मिला। मैंने चिड़ियाँ को जमीन खोद कर गाड़ दिया। एक गुलाब उसके कब्र पर रखा और उस बत्तख के साथ नीचे की पगडंडी पर चलने लगी।

    जुगनुओ की किर्र-किर्र की तान फिर से खिंच आई थी। आसमान की दीवार के उस पार से तारे झांक रहे थे। आज कुहासे की लहर जल्दी ही खिंच आई थी। चारों तरफ सिर्फ दूधिया कुहासा था। मै जैसे जैसे आगे बढ़ती थी उस दूधिये कुहासे मे घुल रही थी। उस कुहासे मे घुलती ही जा रही थी। धीरे धीरे। कुहासे के चारों तरफ से मेरा जूनियर-स्कूल झाँकने लगा था। मै स्कूल आई थी। तीन महीने बाद।

    इन तीन महीनों मे हमे एक दूसरे के बारे मे कुछ पता नहीं चला था। हमे घर से बाहर भी नहीं निकलने दिया जाता था। दिन रात हमे घर मे बंद होकर रहना पड़ता। अगर थोड़े दिन और इसी तरह रहता तो शायद हम घर मे बैठे-बैठे ही मर जाते। खाने को कुछ नहीं था। महीने-दो महीने दिनों मे ये अफवाहें उड़ती कि सरकार द्वारा पुलिस की गाड़ियों से कुछ खाने के सामान बाँटे जाएंगे। पर वह दिन कभी नहीं आता। लोग दंगों के साथ साथ भूख और बेरोजगारी से भी मर रहे थे। मरने वालों की संख्या लागातर बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग अपने बगीचे या थोड़ी सी जगह मे खाने की चीज उपजाने लगे थे। जो कि जल्दी से जल्दी फल जाए। पर मुख्य श्रोत हमारा जमा किया हुआ अनाज ही था। हम दिन भर रेडियो के सामने बैठे रहते और खबर सुनते कि आज मरने वालों कि संख्या 50। कल 60। परसों 70। और ऐसे ही ये संख्या बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग जो लापता थे उनका कुछ पता नहीं चला था। और उस शाम जब दंगाईयों का एक झुंड हमारे इधर से गुजरा तो हमारे घर के छत पर पटापट पत्थरों की बारिश होने लगी। घर के कांच फोड़ दिए गए। और एक पत्थर मेरे सर पर इतना तेज लगा कि मेरी जान पर बन आई। खून की धार लगातार मेरे सर से बहती हुई मेरे चेहरे और फिर गले तक पहुँच गई। ममी हताश सी खून पोंछती और जोर जोर से चीखे मारती। गरम पानी से मेरा चेहरा धुलकर मुझे होश मे लाने की कोशिश होती रही। पर मेरा होश जाता रहा। पापा किसी भी तरह एम्बुलेंस को बुलाना चाहते थे। पर कर्फ्यू मे उसके आने की कोई संभावना नहीं दिखती थी। लेकिन अस्पताल ले जाना जरूरी था। अगर तुरंत अस्पताल ना ले जाया गया होता तो मेरी जान चली जाती। अंत मे पापा घर के पीछे के रास्ते डॉ. खड्का अंकल के घर गए और उनसे चलने की गुहार लगाई। दोनों छिपते-छिपाते घर के पीछे से आए और अंकल ने मेरी मलहम पट्टी कर दी। थोड़े ही दिन मे मेरी हालत मे सुधार आ गया। पर कहा जाता था कि हमारे साइड तो हालात फिर भी ठीक थे। सिर्फ पत्थरबाजी की गई थी। और जगहों पर तो घर मे आग तक लगा दी गई। और अगर कोई घर के आगे दिख जाता तो उसे बुरी तरह मारा-पीटा जाता। दिन बहुत डरावने और लंबे होते जा रहे थे।….

    मै रात को अपनी डायरी लिखा करती और इस तरह एक-एक दिन गिनती रहती। थोड़े ही दिन मे हम पूरी तरह ऊब चुके थे। हमे नहीं चाहिए था कोई बिशेष अधिकार। जिनको लेना हो वे रहे घर मे बंद। हमसे अब और नहीं सहा जा रहा था। सो मंगलवार की दुपहर रेडियो सुनते हुए कर्फ्यू बंद हो गया के ऐलान से हम बहुत खुश हुए थे। स्कूल खुलने से एक रात पहले मै फिर एक लेटर लिखने बैठी थी। सोचा था जब वह आएगा चुपके से उसके बैग मे सरका दूँगी। पर इतने दिन वह कहाँ था। उसने क्या किया। कैसे बिताया। मुझे कुछ पता नहीं था। और कितने कोशिशों के बाद भी मै उस रात लेटर नहीं लिख पाई।

    कल जब स्कूल गई वह नही आया था। मैंने औरों से भी उसके बारे मे पूछने की कोशिश की पर किसी को कुछ नहीं पता था। मै उस दिन उदास रही। और उदास ही रहती अगर स्कूल जल्दी छुट्टी होने का ऐलान ना होता। मुझे लगा इतने दिनों बाद तो खुला है उसपर भी जल्दी छुट्टी। मै जब क्लास से बाहर निकली तो फील्ड मे सभी बच्चे परेड को खड़े थे। हम एक दूसरे से पूछ रहे थे की क्या हुआ। पर किसी को कुछ पता नहीं था। हर तरफ भीड़ का भिनभिनाना सुन पड़ता था। और वो तब बंद हुआ जब प्रिंसिपल सर भाषण देने को आए। उन्होंने बताया कि हमारे स्कूल से एक टीचर और एक बच्चे के मौत हुई है। और जब बच्चे का नाम लिया गया तो मै उस मौन सन्नाटे मे काँपती रही। वो मौन कब टूटा था मुझे नहीं पता चला। मुझे याद भी नहीं पड़ता कि मै उस दिन रोई थी या नहीं। मै उस दिन बस चुप रही थी। और मुझे अब भी याद है। मै उस दिन घर जाने के बजाए नदी के पास गई थी। मैं वहाँ बहुत देर तक बैठी रही। मै उस दिन बिल्कुल नहीं रोई थी। और कुछ याद आने पर मैंने अपने बैग को तलाशा था। वो गुलाब वहीं मुरझाया हुआ था। मै उसे हाथ मे लिए बैठी रही। और ना जाने क्या सोचकर मैंने उसे नदी मे बहा दिया। नदी के झिरझिराते स्वर के साथ वह दूर-दूर जाता रहा। और आखिर मे एक लहर ने उसे अपने मे समेट लिया।…

    नीचे धुंध नहीं है। ऊपर धुंध है। ऐसा अक्सर होता है। पहाड़ों पर धुंध बहकती सी चली आती है। पर नीचे सब कुछ साफ होता है। मै वहाँ तक चली आई हूँ जहां से रास्ता बँट जाता है। नीचे का सपाट रास्ता एकदम स्पष्ट दिख रहा है। ऊपर के रास्ते पर धुंध है। पर मेरे जिद्दी पैर ऊपर वाले रास्ते पर चल पड़े। मुझे धुंध से होकर गुजरना पड़ेगा।

    दायेँ तरफ बहती नदी की कलकल सुन पड़ती है। जुगनुओं का किरकिराना और मैंढ़कों का टर्रटर्राना एक दूसरे से भिड़ा हुआ है। हर तरफ यही दो आवाज़ें सुन पडती है। ऊपर एकदम खुला आसमान है। मै सीधे चल रही हूँ। कभी कभी इस खुली जगह मे हवा साँय-साँय करते हुए घुस आती है। हवा अपने साथ हर चीज को इधर से उधर फेंक रही है। शहर को साफ करने जिम्मा जो उठाया है। हर चीज हवा के पीछे लगी हुई बहती है। मुझे किसी बच्चे के हंसने की आवाज सुनाई दे रही है। वो आवाज तेज होती जा रही है। मै डर कर बार बार पीछे देखती हूँ। कहीं वो मेरे बाल नोचकर ना भाग जाए। हवा का सफ़ाई अभियान चालू है। बच्चे की आवाज तेज होती जाती है। कहीं से एक पेपर उड़ता हुआ आया। वो मेरे चहरे पर चिपक गया। उसमे मिट्टी की गंध है। मैंने उसे हाथ मे लिया। उस चाँदनी रात मे उसपर लिखे शब्द चमक रहे है: मुझे भूल मत जाना! बच्चे की हंसी चारों ओर गूंज गई।

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