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वे मेरे भाई-दोस्त नहीं,सिर्फ रामभक्त थे

छह दिसंबर की तारीख एक ऐसे दुस्स्वप्न की तरह है जो हमारी स्मृतियों में टंगा रह गया है. विनीत कुमार याद कर रहे हैं छह दिसंबर १९९२ की उस सुबह को जिसने हिन्दुस्तान की तारीख बदल दी, कुछ-कुछ हम सबकी भी- जानकी पुल.
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6 दिसंबर की सुबह. बिहारशरीफ, मेरे बचपन का, बाबा-पापा का घर. मैं हमेशा की तरह दोबारा सोकर उठने के बाद स्कूल के लिए तैयार होना चाह रहा था. मां ने हाथ खींचकर वापस चौकी पर पटक दिया- सुतो चुपचाप.( सो जाओ,चुपचाप), आज कौन करेजावाला मास्टर तुमरे लिए स्कूल खोल के बैठा होगा, बेकार हैरान होगे. अभी बनाएंगे आलू-पूड़ी खाना इत्मिनान से. इतना कहकर मां ने सातवीं क्लास के इस बच्चे को अपनी आसमानी साड़ी का आंचल उपर से ओढ़ा दिया था.

कोढ़ी होता है इ भुजगल्ला सब,पिल्लू पड़ेगा इ सबको. सुने हैं महजिद(मस्जिद) तोड़ेगा है, इ हिन्दुअल के माय बिआयी है जो अभिए से एतना पड़ाका छोड़ रहा है. आप( मेरे पापा) क्या बैठे-बैठे मुंह देख रहे हैं, आज कौन खरख्वाह सब बुश्शर्ट सिलावेगा आपसे कपड़ा खरीद के, दोकान थोड़े जाना है. मां लगातार बड़बड़ाती जा रही थी और कमरे के बाहर के फर्श जो जहां-तहां से टूट गए थे, उसमें जमे पानी को नारियल झाडू से उलीचने में लगी थी.  मां को मैंने इससे पहले इस तरह हिन्दुओं को कोसते कभी नहीं देखा था बल्कि अक्सर हिन्दू-मुसलमानों के बीच झड़प होते रहते तो मां का सपाट बयान होता- अलगे से इ मुसलमनवन सबके नेहरुजी देस दे दिए,तबहीओ पेट के पानी नहीं पचता है. हमही हिन्दुअन सबके करेजा दूहने में लगा रहता है. रोज नियम से तुलसी में पानी देनेवाली,सूर्य की पूजा करनेवाली,रामचरितमानस का एक हिस्सा पढ़नेवाली मेरी मां इस बात से बिल्कुल खुश नहीं थी कि मस्जिद टूटकर एक ऐसा राममंदिर बनेगा जिसे वो खुद देखेगी तो जिंदगी भर के पाप कट जाएंगे और उसके आसपास पूजा-पाठ की ऑरिजिनल चीजें मिला करेगी. तीज-त्योंहारों और व्रतों में आकंठ डूबी मेरी मां, बजरंगबली को लंगोट पहनानेनावी मां जिस पर मैं ठहाके लगाकर कहता- तुम कहां परेशान हो लंगोट सिलवाने के लिए मां, रुपा डिस्की खरीदकर दे दो न पंडिजी को, वही पहना देंगे..वो तुरंत कान छूती और कहती- माफ करिहौ इ लड़बहेरा के ठाकुरजी,भोलानाथ, बेलुरा है, कुछौ से कुछौ बक देता है. वो मां आज हम नास्तिकों से भी कहीं ज्यादा और क्या पता मुस्लिमों से भी ज्यादा दुखी और नाराज लग रही थी.

मेरी मां ये सब असगर अली इंजीनियर या राजगोपाल गुरु की साम्प्रदायिकता विरोधी किताबें पढ़कर नहीं कर रही थी. वो तो अखबार और वो भी ज्यादातर ठोंगे से के अलावे कुछ पढ़ती भी नहीं थी. उसके पीछे उसका अपना स्वार्थ था.

बिहारशरीफ में हमारा वो आखिरी हिन्दू का घर था. उसके बाद एक भी घर हिन्दुओं का नहीं था. ठीक इसके उलट, मेरे घर से एक घर भी पहले मुस्लिमों का घर नहीं था. बनियों-व्यापारियों के इस मोहल्ले में पैसे की ठसक थी और उनके मुकाबले मुसलमानों का परिवार आर्थिक रुप से उतना समपन्न नहीं था. हां, हाल में जो मुसलमान बसने शुरु हुए थे, उनमें से कुछ पैसेवाले थे. मुसलमानों को लेकर बनियों के इस मोहल्ले में एक से एक दंतकथाएं प्रचलित थी जिनमें सबों का अरब,कुबैत से संबंध बताया जाना कॉमन था. सारे मुसलमान स्मगलिंग करते हैं, चरस-गांजा के धंधे में लगे रहते हैं और यहां तक कि लड़कियों की दूसरी जगहों पर सप्लाय करते हैं, प्रचारित था. नतीजा, मेरे घर हिन्दू परिवारों से बहत कम ही लड़कियां,भाभियां आती. मां जब भी बुलाती तो वो खुद ही मां को बुलाने लग जाती. बहुत जोर देने पर कहती- जानते हैं चाची, उस दिन आपके यहां गए थे न तो छत से असलमा ऐसे घूर रहा था कि खा ही जाएगा. हम तो एकदम से कांप गए. एक के ऐसा कहने के बाद सबों की दंतकथाएं शुरु हो जाती. नतीजा, आखिर में आकर हमारा घर हिन्दू परिवारों के बीच ने केवल अलग किस्म से अछूत करार दे दिया गया जहां जाने पर शरीफ हिन्दु परिवार की लड़कियों की इज्जत-आबरु सुरक्षित नहीं रह जाती हमलोगों को हमारे हिन्दू पड़ोसी कहते- इ लोग तो आधा मुसलमान है. इसकी एक वजह ये भी थी. मेरे चचेरे धर्मेश भइया को आझ दिन तक बच्चा नहीं हुआ और वो शुरु से ही पड़ोस जाहिर है मुसलमान के बच्चे से खूब खेलते-खिलाते. उनके बॉल,साड़ी,सूट औऱ पता नहीं क्या-क्या हमारे घर उड़कर-गिरकर आ जाता और वोलोग अक्सर लेने आते. भीतरी डर जो कि घर का कोई भी शख्स जाहिर नहीं करता, उन्हें लौटाने जाते या बुलाकर दे देते. इस क्रम में कभी किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं हुई. ये अलग बात है कि मैंने उसी घर से अपनी तीन दीदी और 3 चचेरी दीदी की परवरिश से लेकर शादी तक के बहुत ही खूबसूरत नजारे देखे और कई प्यारी यादें. घर में आयी तमाम लड़कियां की गिनती कभी कम नहीं हुई. खैर

मां सुबह ही फूल लाने के बहाने घर के बाहर का नजारा भांप चुकी थी. बनियों के इस मोहल्ले में जश्न का माहौल था. सब रेडियो में कान टिकाए,एक्टिव थे. मीरा दीदी की मां जिन्हें हम सब बीबीसी कहते से सारा मामला जान चुकी थी और इस बात को लेकर डरी हुई थी कि जिस तरह से ये हिन्दू तैल-फैल( चिढ़ाने के अंदाज में सक्रिय हो जाना) हो रहे हैं, मुसलमान लोग छोड़ नहीं देगा. उलोग भी कुछ न कुछ जरुर करेगा. नतीजा, बाकी हिन्दू घरों में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद जहां जश्न का माहौल था और यहां तक कि एक ने जो शुरु से ही संघ की दादागिरी करते थे,हमारे घर आकर कहा- आज खाना मत बनाइए चाची, साथे बनेगा, हमारे घर में अजीब किस्म का भय और खौफनाक माहौल. मां एक ही बात कह रही थी- मुसलमान सब कुछौ करेगा तो सबसे पहिले हमही सबको. इ बाकी सब जो माय बिआय जैसा खुशी मना रहा है, कुछ नहीं होगा इ सबको.

सुबह की चाय पीने के बाद पापा कयूम अंसारी,नईम,मोइन, रफत के अब्बू से लेकर उन दर्जनों मुस्लिम परिवारों का ध्यान कर रहे थे जिनसे अच्छे संबंध थे. होली-ईद में आना-जाना था. मेरे अपने और इकलौते चाचा सीपीआई में शुरु से ही सक्रिय रहे थे तो उनका अपना लंबा-चौड़ा दायरा था और हिन्दु परिवारों जिनमे से ज्यादा के घरों से बच्चे शाखा भी जाते थे, खटकते भी थे. मेरे अपने यहां नानीघर का ज्यादा प्रभाव था इसलिए चाचा के कम्युनिस्ट पार्टी में होने के बावजूद संघ और शाखा के प्रति मां का सम्मान था. मां बाबरी मस्जिद को लेकर कहती भी थी कि जबरदस्ती कब्जाके रामजी के जगह पर कोई महजिद बना लेगा तो उसको क्या ऐसे ही छोड़ देंगे..लेकिन उस दिन कहा था- भइयाजी(मेरे चाचा) ठीके कहते हैं- घर में भुंजी भांग नय औ सराय पर डेरा. दू टैम के रोटी जुटता ही नहीं है औ चला है कोढ़िया सब ठूठ होके मंदिर बनावे. मां उनलोगों को ध्यान करके ज्यादा गरिआ रही थी जो अक्सर घर आकर कहते- चाची कुछ काम दिला दीजिए हो तो.

मां के लाख मना करने के बाद मैं अपनी चचेरी बहन रीना के साथ स्कूल चला गया था. तब हम बच्चों का घर के कपड़े और बाहर जानेवाले के बीच फर्क नहीं होता था. पापा की सख्ती के कारण अपने वैसे ही सीमित कपड़े होते और चाचाजी के कम्युनिस्ट होने के कारण रीना के बचपन पर सादगी का मुलम्मा चढ़ा था. हम घर से बाहर निकले हैं और तैयार होकर निकले हैं ये कपड़े बदलकर तैयार होने से कहीं ज्यादा प्रतीकात्मक होता. हम जैसे लड़के शर्ट को हाफ पैंट के अंदर कर लेते और रीना जैसी लड़कियां चोटी खोलकर दोबारा से बांध लेती और आइने के पास लक्मे पेस पाउडर का डब्बा होता, एक बार फाहों को गाल पर फिरा लेती,बस.

स्कूल पर बड़ी सी नोटिस लगी थी. मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन अंग्रेजी के जानकार प्रिंसिपल ने ये जरुर लिखा था- ड्यू टू पॉलिटिकल टेंशन्स, ऑवर स्कूल विल वी क्लोज्ड….. हम वापस आने लगे थे. रास्ते में दर्जनों हिन्दुओं का घर और जमावड़ा. हमउम्र लौंडे से लेकर बड़ों के सिर पर भगवा रंग पर ब्लू से जय श्री राम की लिखी पट्टी बंधी थी और मां की भाषा में कहूं तो तैल-फैल हो रहे थे. हम बच्चों को देखकर और रीना को देखकर कुछ ज्यादा हरामीपने पर उतर आए थे,नारे लगाने लगे- जय श्री राम, सीता माता की जय. हम बस बढ़े जा रहे थे और रीना कह रही थी, पापा को घर चलकर बताएंगे कि इ बबलुआ हरामीगिरी कर रहा था, घर आता है और पापा डांटते हैं तो पैंट में मूत देता है और यहां सीता माता की जय कह रहा है. रास्ते से गुजरने के दौरान हमने महसूस किया कि हमारे बहुत सारे दोस्त,दूरदराज से लगनेवाले चचेरे भाई, मुंहबोले भइया और कभी-कभार मैथ्स बतानेवाले टीचर सबके सब दोस्त,भाई,टीचर नहीं रह गए हैं- सिर्फ और सिर्फ रामभक्त हो गए हैं. माथे पर बंधी पट्टी का रंग आंखों में उतरकर और गाढ़ा हो जा रहा था. वो किसी की हत्या नहीं कर रहे थे लेकिन इस काम के लिए इतने तैयार लग रहे थे कि क्या पता जरुरत पड़ती तो समय की बचत ही होती उनकी. मैं आज सुबह उन दृश्यों को याद करता हूं तो सोचता हूं कि जब ये रामभक्त मुझे ही इतने खतरनाक लग रहे थे तो हिन्दुओं को क्या पता कितने खतरनाक लगते..और क्या पता मेरे उम्र के उन बच्चों में तब प्लास्टिक के गदे और तलवार थे, अब असल में हो गए हों.

बिहारशरीफ में मुस्लिमों की आबादी शुरु से अपेक्षाकृत ज्यादा रही है और इस बात को ये मेरे मोहल्ले के तैल-फैल करनेवाले लोग बेहतर जानते थे. लिहाजा शहर के दूसरे हिस्से में तो खुला शौर्य( ?)प्रदर्शन फिर भी किया लेकिन मेरे मोहल्ले में इनहाउस सिलेब्रेशन टाइप का चलता रहा. मुस्लिम इस दिन मोहल्ले से होकर नहीं गुजर रहे थे और बनावट भी ऐसी थी कि वो बाहर-बाहर भी जा सकते थे.

घर लौटने पर मां से सीधा कहा- स्कूल बंद है मां,पता नहीं कब खुलेगा. मां पहले से झल्लायी और सशंकित थी- बोले थे कि बंद है तो कान में रांगा डालकर चले गए, अब बंद है स्कूल है तो तुम भी फहराओं हियां(यहां) रामजी का झंड़ा. मैं गदहा,पूछ लिया- फहराए मां, दो न तुम भी लायी हो ? तुम पगला गए हो, किसी दिन प्रभाकर पंडिजी के यहां ले जाके औखा झरवा देंगे.

शाम होते-होते पूरे इलाके में एक अजीब किस्म की वीरानगी थी. पुलिस जीपों की दस्त लगने लगी थी और आनन-फानन में सबों के घरों से एक-एक सदस्य को बुलाकर एक सुरक्षा कमेटी गठित करने की बात की जाने लगी थी. इसमें हिन्दू और मुसलमान के बराबर से शामिल होने की बात थी जो मोहल्ले में अपने स्तर से शांति बनाए रखने की अपील करते. घर में कुछ खास सामान नहीं था.मां हिसाब लगा रही थी,कुछ नहीं तो दू बोरा गेहूं और एक बोरी चावल है. बहुत बड़े बागान में सब्जियों की किल्लत नहीं थी लेकिन मां इतनी डरी थी कि दिनभर में जितना तोड़ सकती थी,तोड़कर रख लिए थे. सेम,पपीते,लौकी,कुंदरी,अमरुद,शरीफा..सारे दूध का खोआ बना लिया था, कुछ नहीं तो बुतरु( मुझे) को पूड़ी बनाकर खिला देंगे..मां ने अपनी छाती से सटा लिया था और लगातार कह रही थी- अब कल भी देखने मत चल जाना स्कूल, सब शांत होगा तो हेडमास्टर अपने बोलावेगा…   

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