डिम्पल राठौड़ की कुछ कविताएँ

आज पढ़िए डिम्पल राठौड़ की कविताएँ। युवा कविता में डिम्पल की अपनी पहचान है। प्रश्नाकुल मन और स्पष्ट अभिव्यक्ति उनकी कविताओं की शक्ति है। आइये उनकी कुछ कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर 
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जुड़ाव 
॰॰॰
दु:ख
हमें तोड़ता भी है 
दु:ख हमें जोड़ता भी है 
दु:ख के बीच का विसर्ग है
हम दोनों
॰॰॰
प्रेम 
॰॰॰
पेड़ की 
सिर्फ़ ऊपरी ख़ूबसूरती मत देखो 
उसकी जड़ें भी देखो
कितनी गहरी है वे
प्रबल झंझावतो में भी जो
थामें रखती है
जीवन का संगीत
सुनो!
पाना हो प्रेम तो
जड़ों को सींचना 
ताउम्र हरी रहूँगी 
मैं
॰॰॰
रूघबीर की लुगाई 
॰॰॰
गाँव में 
मेरे घर के सामने ही है 
रूघबीर का घर
जाने कैसी है चरभर 
रोज़ एक ही दृश्य वहाँ घटता है
सूरज उगता है,चढ़ता है,ढलता है 
आधा बीघा बाखळ रोज बुहारती है 
घर के फटेहाल को रोज़ संवारती हैं 
पीहर से डोली में नहीं अर्थी में आई है 
भाग की मारी बिन चाह के ब्याही है
किसकी दे दुहाई कौन करे सुनाई 
विधाता की सताई रूघबीर की लुगाई 
तासळा भर गोबर थापती है बटोडे़ पर
गोबर के गोवर्धन से उम्मीद चढ़े घोड़े पर
दस बीस घड़े रोज़ ढोती है पानी
नीरती है भैंसों को सानती है छानी
चूल्हे के धुएँ और आग में खपती है
तब जाकर कहीं सब्ज़ी रोटी पकती है 
रूघबीर नहा, धोकर, होकर भरपेट
दिनभर ताशों का करता है आखेट 
रात को नशे में पीटता है लुगाई 
बेचारी भी क्या भाग लेकर आई
तारों सी डबडबाई 
रूघबीर की लुगाई 
सिसकियों में यूँ ही घुटती है 
मन व देह से रोज टूटती है 
दिन के गुनाह को रात ढक लेती है 
सताई रात फिर कहाँ पनाह लेती है 
हर सुबह उठते ही 
आधा बीघा बाखळ बुहारेगी 
थेपडी थापेगी 
घड़े ढोयेगी 
उम्मीद की रोही में 
ख़्वाब बोयेंगी 
रूघा उर्फ़ रूघबीर 
नहा धोकर होकर भरपेट
ताशों से दिन कर मटियामेट 
शाम को थका हारा ठेके पर जायेगा 
घर आकर लुगाई पर मर्दानगी दिखायेगा
सूरज उगेगा, शाम ढल जायेगी 
ऋतुएँ आयेगी बीत जायेगी
दिन झूरेगा रात भी थकेगी
व्याकुल, उकताहट से ऊबेंगी 
आख़िर को वो चूल्हे में ही जलेगी
जाने ये आग कब बुझेगी
औरत का भाग जहां मर्द लिखता हो
साज़िश उसके लिए वो ही रचता हो
आख़िर ऐसी दुनिया में क्यूं आई
ओह! बेचारी रूघबीर की लुगाई 
॰॰॰
ख्वाहिशें 
॰॰॰
मेरी ख़्वाहिश में है 
धरती का एक छोटा सा टुकड़ा 
जहां उगा सकूँ मैं 
अपने सपने
मेरी ख़्वाहिश में है 
टुकड़ा भर आसमाँ 
जहां उन्मुक्त उड़ान 
भर सकूँ मैं 
मेरी ख़्वाहिश में है 
थोड़ा सा समन्दर 
जिसकी गर्जना में
मिला सकूँ मैं 
अपना स्वर
मेरी ख़्वाहिश में है 
थोड़ा सा थार
जिसकी वीरानी में
भूल जाऊँ मैं 
अकेलापन 
मेरी ख़्वाहिश में है 
थोड़ा सा पहाड़ 
जिसकी चोटी से
बादलों में मिला दूँ मैं 
आँखों की नमी
मेरी ख़्वाहिश में है 
सारी सृष्टि 
जिसमें जरा ज़रा 
घुल जाऊँ 
और फिर मैं
मैं हो जाऊँ
॰॰॰
क़दमताल 
॰॰॰
तुमने सियाह रात को लिखा
लिखा दिन के उजाले को भी
फूलों में ख़ुशबू औ रंग
तुमने ही भरे
सपनों को रोपा
दुख भी हरे
धरती आसमाँ के
क़िस्से कहे
कविताओं में तुम्हारी
बादल गरजे चमकी बिजुरी
बारिश भी बहे
नख से शिख
सर्वांग सौन्दर्य को रचा
दृष्टि से तुम्हारी 
कौन है बचा
मनोभावों को
करते रहे मुखर
शब्दों को पैने 
भावों को प्रखर
तुम्हारी कविता 
संवेदनाओं में पगी
कितनी ही तुमने बातें गढ़ी 
कितनो ने ही कविता पढ़ी 
कवि
तुम गढ़ते रहे
बढ़ते रहे
जिन्होंने तुम्हारी कविता पढ़ी 
वे बताओ कितना बढ़ी 
कवि 
तोड़ो सदियों की कारा
रोको कदमताल 
गढ़ो कुछ हाँ न्यारा गढ़ों 
आधी आबादी के हक़ में 
दो कदम ही सही
आगे बढ़ो
॰॰॰
साँप 
॰॰॰
मेरे सपने में
अक्सर आते हैं 
बहुत सारे साँप 
बचने के लिए बेतहाशा भागती हूँ 
पर धरती कम पड़ जाती हैं 
सिकुड़तीं हूँ 
सिमटतीं हूँ 
दुबकतीं हूँ 
अपने वजूद के अंतिम ज़र्रे तक
फिर भी साँप मेरा पीछा नहीं छोड़ते 
तुमने आस्तीन का सांप 
कहावत ही सुनी है 
मैंने सपनों में ही नहीं 
हक़ीक़त में देखे हैं 
आस्तीनों में साँप 
हर कहीं 
हर रोज़ 
जागरण में
स्वप्न में 
देह और मन के हर छोर पर उनका रेंगना 
भीतर तक गला देने वाला
उनका लिजलिजा 
ज़हरीला स्पर्श महसूस करने के लिए 
तुम्हें औरत होना होगा
इस ज़हर को रोज़ पीने के लिए 
तुम्हें औरत होना होगा
॰॰॰
यंत्रवत 
॰॰॰
सुबह उठते ही
मिठास बन
चाय में घुलती हूँ 
पोचा बन फैल जाती हूँ फ़र्श पर
आटे की लोई सी नरम होती हूँ 
फिर रोटियों सी सिकती हूँ 
परिवार के हर सदस्य की फ़रमाइश में 
डूबती हूँ थोड़ा थोड़ा 
सुबह से शाम तक झकती हूँ 
रात को चद्दर मैं ही बनती हूँ 
औरत है या खिलौना है
सबके सोने के बाद सोना है
दिन भर खटती हूँ 
रोज़ खर्च होती हूँ 
रोज़ कुछ घटती हूँ 
ना कहीं आती हूँ
ना कहीं जाती हूँ 
तुर्रा ये है कि मैं 
कहाँ कमाती हूँ
॰॰॰
उतनी ही नहीं हूँ मैं 
॰॰॰
मैं उतनी ही नहीं हूँ
जितना तुम 
मुझे जानते हो
चन्द्रमा के ना दिखने वाले 
हिस्से की तरह
आधी अदृश्य हूँ मैं 
हवाओ के साथ बहती हूँ
रोशनी के हर क़तरे में घुलती हूँ
पेड़ों से गिरे पत्तों की तरह बीतती हूँ
फिर लौट आती हूँ 
नये पल्लवों में
अंधेरे में घुलती हूँ
रोशनी सी उगती हूँ 
मैं उतनी ही नहीं हूँ
जितना तुम
मुझे जानते हो
मुझमें मेरा बहुत कुछ है
जो बिन जाना
बिन कहा
बिन समझा ही रह जायेगा
जीवन यूँ ही बह जायेगा 

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