धुंधले साये में भी उजाले की उम्मीद

हाल में ही युवा कवि-लेखक श्रीधर करुणानिधि का कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है  ‘दिन की परछाँई धुंधली है’। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षा लिखी है युवा लेखिका अनुरंजनी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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कोई भी लेखक अपने लेखन में किन बातों को शामिल कर रहा है यह सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, उसके बाद बात आती है उसकी शैली की, भाषा की। ‘दिन की परछाँई धुँधली है’, यह श्रीधर करुणानिधि का तीसरा काव्य-संग्रह है जो हाल ही में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह पर  विचार करने के क्रम में शीर्षक कविता उपयुक्त लगती है। इसे पढ़ते हुए श्रीधर करुणानिधि की संवेदना का वह पहलू खुलता है जो पाठकों के सामने उनकी चिंताओं को सामने रखता है कि आखिर कवि के सोचने में क्या शामिल है? इसकी कुछ पंक्तियाँ यह स्पष्ट करने में सहायक होती हैं –

“आदमी घायल है हर तरफ़/जाति-मजहब से/भूख-प्यास से/जमीन से, बाँध से, विकास से…/घायल आदमी के सामने अँधेरे की कहानियाँ बज रही हैं/प्रवचन की तरह”

इस तरह संग्रह की शीर्षक कविता यह स्पष्ट कर देती है कि कवि के सोचने में समाज की वह सारी गड़बड़ियों की ओर इशारा है जहाँ सबकुछ बिखरता-बिगड़ता चला जा रहा है, एक-दूसरे में इतनी भिन्नता व्याप्त हो चुकी है, बनाई भी जा रही है, ऐसे में दिन, जो उजाले का, रोशनी का प्रतीक है वह भी धुँधला चुका है। क्या हमारा समाज ही नहीं धुँधलाता जा रहा है?

इस संग्रह को पढ़ते हुए यह देखना रोचक लगता है कि कवि की संवेदना कहाँ-कहाँ अपना जुड़ाव महसूस कर रही है? उन बिन्दुओं को देख कर, उनका विस्तार देख कर ख़ुशी होती है कि वह सीमित न होकर बेहद व्यापक है जिनमें प्रकृति, वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद से होने वाली क्षति, अपने आप को स्वीकारने की ताकत और अनुरोध भी, निर्जीव से भी सहजीविता आदि मुख्य रूप से शामिल हैं।

स्मृति का भी एक मौसम होता है। यह हमें पता भी नहीं होता या हमारा ध्यान भी नहीं जाता कि आज जो भी हमारी स्मृति में दर्ज़ हो रहा है वह कल को हमें याद आएगा तो उसके साथ आज का मौसम खुद-ब-खुद याद आ जाएगा। जैसे आज मैं इस किताब पर लिख रही हूँ, तो ऐसा हो सकता है कि आगे कभी भी इस किताब के बारे में सोचूँ तो यह मौसम याद आएगा कि इस वक़्त कितनी भयंकर गर्मी थी। प्रकृति और मनुष्य कैसे साथ-साथ चलते हैं, यह इस उदाहरण से समझा जा सकता है। यही जुड़ाव हमें श्रीधर जी की कविता ‘स्मृतियों में मौसम’ पढ़कर महसूस होता है –

“किस्सों में दिन और पहर से अधिक मौसम होते हैं/सुनाते हुए उन्हें ऋतुएँ ही याद आती हैं/कि अमुक-अमुक साल/सुबह या शाम दरवाजे पर मुँह ढके/चादर ओढ़े एक किस्सा/वक्त की शक्ल में/अमुक मौसम की एक ठण्डी सुबह आ धमकता है…”

श्रीधर जी की बहुत सी कविताओं में प्रकृति से जुड़ाव किसी न किसी रूप में मिलता ही है, अधिकतर जगह चाँद के नाम से, तो कभी नदी, पहाड़, हवा आदि के नाम से। उनकी एक कविता हरसिंगार से संबंधित है ‘खुशबू अँधेरे को फूल बनाती है’। इसे पढ़ते हुए यह विशुद्ध प्रकृति सौन्दर्य की कविता ही लगती है फिर यह भी ख्याल आता है कि क्या इससे कोई और बात भी निकल रही है? होने को तो कई तरह की व्याख्याएँ संभव हो जाती हैं लेकिन क्या यह जरूरी होता है? शायद नहीं। यहाँ बिहारी के एक दोहे का संदर्भ याद किया जा सकता है। दोहा है –

 “द्वैज-सुधादीधिति-कला वह लखि, दीठि लगाइ । मनौ   अकास-अगस्तिया  एकै  कली  लखाइ ।।”

जिसका साधारण सा अर्थ यह है कि दृष्टि लगाकर(यानी ध्यान से) उस दूज की चाँद की सुंदरता देखो, जो ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो आकाश रूपी अगस्त्य के वृक्ष में एक कली दिखाई दे रही है। लेकिन रीतिकाव्य के प्रति जो पूर्वग्रह बना हुआ है उससे प्रभावित हो इस छंद को भी नायक-नायिका से ही जोड़ दिया गया है और ‘बिहारी सतसई’ के एक प्रमुख टीकाकार, जगन्नाथदास रत्नाकर द्वारा बताया गया कि नायिका-नायक ने दूज की रात किसी अगस्त्य के वृक्ष के पास मिलना तय किया था। चाँद छिपने वाला था इस लिए नायक के पास नायिका की दूती आकर उसे नियत दिन का संकेत करती है और चंद्रमा की उपमा अगस्त्य की कली से देती है।

         उनकी कविताओं में एक तरफ़ प्रकृति बहुत अधिक उपस्थित है और दूसरी ओर ठीक इससे उलट पूँजीवाद, जिसने आधुनिक युग के क्रमिक विकास के साथ ही मनुष्य और प्रकृति को आमने-सामने खड़ा कर दिया और धीरे-धीरे मनुष्य इतना अधिक स्वकेंद्रित हो गया कि उसे अपने सिवा कुछ भी नहीं दिखने लगा। कहीं कुछ गड़बड़ है भी तो वह उसे नज़रअंदाज़ करने का अभ्यस्त हो गया। इस दृष्टि से ‘गुमाश्ते नींद के’ की यह पंक्तियाँ सटीक वर्णन करती हैं –

“गुमाश्ते अक्सर अपनी जकड़ में लेने के बाद/हाथ-पैर फैलाकर सोने की तसदीक करते हुए/ सरकारी मुलाज़िम की तरह व्यवहार करते हैं/जिसे सिर्फ़ महँगाई भत्तों और वेतन वृद्धि से मतलब होता है/ कौन कहाँ मर रहा ?/ भीड़ की हत्याएँ?/बेरोजगारी?/वे हँसते हैं और कहते हैं/‘बकवास सुनते हुए तुम्हारा कान नहीं पकता?/ मौसम ठण्डा है/चुपचाप सो जाओ/कुछ नहीं हो रहा…’ ”

इसी तरह जब वे ‘कबूतर की बन्द आँखें’ में लिखते हैं कि- “ये इत्तेफाक है कि साजिश/ सारे कैमरे और सारी चौकन्नी आँखें/ बकरी की तरह घास चरने चली गई हैं/सारे कबूतरों ने अपनी-अपनी आँखें बन्द कर ली हैं/ आपस में यह गुटरगूँ करते हुए/ कि नहीं…आँखों के सामने कुछ नहीं हो रहा है…कुछ नहीं/कोई साँड़ फुफकार नहीं रहा/अपने खुरों से रौंद नहीं रहा”

तो इससे भी सबकुछ देख कर चुप रह जाने की, नज़रअंदाज़ कर देने की विकसित प्रवृत्ति को ही दर्ज़ कर रहे हैं। न ही कवि सिर्फ़ इसे दर्ज़ कर रहे हैं बल्कि अपनी कविता ‘सवाल’ में लोगों से चुप्पी तोड़ने का आग्रह भी करते हैं –  “हत्याओं के खिलाफ़/मौन नहीं/ज़िन्दा भाषा ही खड़ी हो सकती है”

इन कविताओं में शामिल विभिन्न विचारों पर एक-एक कर के कई बातें संभव हो सकती हैं लेकिन इन सबमें एक जो सबसे खास बात है उसका उल्लेख न करना इस पूरी किताब को अधूरा बना देता है। इन कविताओं से गुजरते हुए कितनी ही जगहों पर निराशा, उदासी, अँधेरा गाहे-बगाहे आते रहा है लेकिन इन सबमें उम्मीद की एक लौ हमेशा जलती मिलती है। यह देख बार-बार ग़ालिब याद आते हैं और मन ख़ुशी से भर जाता है। ग़ालिब ने जिस तरह से नाउम्मीदी में भी उम्मीद को जगाए रखा है, मसलन –

   “रात दिन गर्दिश में है सात आसमाँ। हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या”

वही उम्मीद श्रीधर करुणानिधि की कविताओं में भी है मिलती है –

 “कौन है उसका साथी?/न हो कोई, क्या फ़र्क पड़ता है…/आओ अकेली उम्मीद को तेरे साथ कर देता हूँ/और कह देता हूँ कि तेरा साथ न छोड़े 

यह सब तो वे विभिन्न पहलू हैं जिनकी ओर श्रीधर जी संकेत करते हैं लेकिन कविताओं के साथ एक सवाल जो निरंतर बना रहता है वह यह है कि ऐसा क्या है जो उसे कविता बनाती है? क्या होने से उसे कविता माना जाएगा? मौजूदा स्थिति में इस पर बहुत कम बात होती है। अब शायद ऐसा हो गया है कि कोई भी रचना कविता की पंक्ति-संरचना के रूप में सामने आती है या बस कह दिया जाता है कि यह कविता-संग्रह है या कहानी संग्रह है या उपन्यास है तो हम वही मान लेते हैं। लेकिन ऐसी कौन सी चीज़ है जो कविता को कविता, कहानी को कहानी या उपन्यास को उपन्यास बनाती है इस पर हम सोच-विचार नहीं करते। श्रीधर जी की कविताओं में वह खास चीज़ है भाषा, वे जिस तरह से भाषा को बरतते हैं वह उनके लिखे को कविता बनाती है। मसलन ‘तुम्हारी हँसी की खातिर चाँद से गुज़ारिश करता हूँ’ कविता में आई एक पंक्ति “पर खिलखिलाहटें ही सन्नाटे को नहलाती है अपनी धुन से” । इसमें नहलाने शब्द से जो भाव मन में उतरते हैं वह शायद इसके किसी समानार्थी शब्द से नहीं संभव होता। जैसे इब्न-ए-इंशा की मशहूर ग़ज़ल ‘कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चेहरा तेरा’, इसमें शब और रात दोनों का अर्थ एक ही है लेकिन दोनों को एक-दूसरे की जगह पर ‘रिप्लेस’ कर दिया जाए तो वह बात बनेगी ही नहीं जो बात उसके मूल रूप में है। इस तरह के और भी उदाहरण इनकी कविताओं में मिलते रहते हैं।

         श्रीधर जी की कविताओं में कई संदर्भ ऐसे मिल जाते हैं जो प्रचलित अर्थ से हटकर सामने आता है और कहीं न कहीं इससे हम स्तब्ध रह जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘इस रात के लिए परिन्दे की तरह’ का यह अंश –

   “जिसे भरोसा कहते हैं/ वो किसी पेड़ से महुए की तरह नहीं टपकता/बस इतना ही पता है कि डर भी एक भरोसा है”

जैसे ही यह अंतिम पंक्ति हम पढ़ते हैं कि डर भी एक भरोसा है, इससे हमारी संवेदना को झटका लगता है। भरोसा, जिसके होने का मतलब ही हम आज तक आश्वस्ति मानते आए हैं जैसे किसी पर भरोसा होना यानी वह कभी हमारा नुकसान नहीं चाहेगा या चाहेगी लेकिन हम में से शायद ही किसी ने कभी भी यह सोचा होगा कि डर की भी आश्वस्ति होती है या हो सकती है। इसी तरह ख़्वाहिश की यह पंक्ति – “अपराध कोई शातिर अपराधी नहीं ख्वाहिशें भी करती हैं…” इसमें ख़्वाहिश द्वारा अपराध का होना जैसे दो छोरों को एक जगह लाकर रख दिया गया है। ख़्वाहिश से हमेशा कुछ ख़ुशनुमा का संबंध जुड़ा रहता है। हम ख़्वाहिश अच्छा सोच कर करते हैं लेकिन जैसे ही ख़्वाहिश द्वारा अपराध होने की बात आती है तो लगता है कि ये क्या हो गया?

          इस तरह से यह काव्य-संग्रह अपनी संवेदना, अपने विचार, अपनी भाषा, अपने अर्थों की विविधता के आधार पर अपनी मजबूत उपस्थिति बनाता है। 

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