• संस्मरण
  • स्मृति के कटोरदान में पुरखे

    विवेक कुमार शुक्ल पिछले साल अपने उपन्यास ‘अमरपुर’ से चर्चा में आये थे। मूलतः पुरबिया विवेक कुमार शुक्ल आरहुस विश्विद्यालय, डेनमार्क में अध्यापन करते हैं। इस स्मृति लेख में उन्होंने देवरिया-गोरखपुर के अपने जीवन, अपने पुरखों को याद किया है। जो ‘वैश्विक गाँव-प्रवासी पाँव: एक माया’, पुस्तक में संकलित है, जिसका संपादन– हाइंज़ वेसलर, संध्या सिंह, दिव्या माथुर, पद्मेश गुप्त ने किया है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक से यह स्मृति लेख पढ़िए- मॉडरेटर

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    जीवन में बहुत देर से मैंने मृत्यु को देखा। ऐसा नहीं था कि आस पास मृत्यु नही थी पर मैं बहुत छोटा था जहाँ घर में किसी मौत का मतलब सिर्फ ये था कि बारह दिन बिना हल्दी का उबला खाना होगा। हम बचपन में मेरे नाना के यहाँ रहते थे। नाना पांच भाई थे और सबके परिवार एक ही घर में रहते थे जिसे घर की बहुएँ मज़ाक में पंचमहल कहती थी और पुरुष उनकी शिकायतों को पंचमहल की पंचायत। हालाँकि सबके हिस्से अलग थे जिन्हें घर में अलंग कहा जाता था और रसोइयाँ भी जिनका नाम चौका था जिसके फर्श में दरारें थी जिनमें चावल की जूठन अकसर फँस जाती थी और हम झाडू की सींको से उन्हें निकालते रहते थे।

    उस बड़े घर में मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव अक्सर आती रहती थी। नाना के भाइयों में सबसे पहले जो मरे शायद उनके सबसे बड़े भाई थे जिन्हें बबुआ कहा जाता था। माँ और नानी ने हमें लाश नहीं देखने दी थी पर हमारे लिए मृत्यु एक अजीब सा मदारी का खेल था जहाँ आप शुरू से जानते है की मदारी का जादू झूठा है लेकिन आप उसे  देखते रहने के सम्मोहन से बच नहीं पाते हैं। उस घर में मृत्यु की एक छाया सी डोलती  रहती थी। गर्मियों में जब लू चलती तो घर के पिछवाड़े का नीम जोर जोर से हिलता, रातों में हम अक्सर उस नीम की छाया में गये पुरखों की शक्लें बुनने की कोशिश करते। घर के वे लोग जो अब न थे वो घर वालों की कहानियों में थे, हर दूसरे तीसरे कोई किसी गुज़र चुकी चाची, भाभी की पायल खनकते सुनता तो कभी कोई मरा बुज़ुर्ग किसी का दरवाज़ा खटखटा कर पानी माँगता। सब झूठ था या सच पता नहीं पर उस घर में पुरखे और गुज़रे लोगों की कहानियाँ हमारी दिनचर्या का उतना ही नियमित हिस्सा थी जितना स्कूल जाना। 

    इन अदृश्य पुरखों के बीच पलने बढ़ने के बावजूद मृत्यु से मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं था मसलन जो नहीं रहे उनकी कोई खाली जगह थी ही नहीं उनकी खाली जगह में उनकी स्मृतियाँ,किस्से, ठहाके, खाने की आदतें बैठी थी हम कोशिश करते थे कि फर्श की दरारों में फँसे चावल के टुकड़ों की तरह उन्हें सींक से निकाल दें पर वो अपनी जगह छोड़ने को तैयार न थे।  

    मृत्यु जिस अनुपस्थिति को पीछे छोड़ जाती है वो मेरे जीवन में बहुत बाद में आई।

    येषां न विद्या

    साल 2000 की बात है जब बाबा गुज़र गए… दुःखी था या नहीं ठीक से याद नहीं पर बाबा से सालों इतना दूर रहा था कि या तो बचपन की स्मृतियाँ है जहां वो मुझे संस्कृत के श्लोक सुनाने को कहते थे या एक आखिरी उनके मौत के कुछ दिन पहले की।

    मेरी स्मृतियों में गर्मी की वो शामें है जब वो हमारे शहर के किराए के घर आया करते थे जिसे हम क्वाटर और वे डेरा कहते थे। उन शामों में वो अक्सर हमसे गणित के सवाल और श्लोक पूछा करते थे। बाबा जीवन भर गुरु रहे और शिष्याटन करते रहे , खेती बाड़ी ज्यादा थी नहीं। गुरु मतलब जहाँ एक दर्प था कि हम कर्मकांडी पंडित नहीं हैं बल्कि भागवताचार्य हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह समुदाय आजीवका के लिए भागवत की पोथी और उस पुराने विश्वास पर टिका था कि मोक्ष और कन्या दान के लिए गुरुमुख होना ज़रूरी है। बाबा गुरुओं की उसी लम्बी शृंखला के हिस्से थे। 

    बाबा हमारे लिए उस पुरानी दुनिया की तरह थे जो होने को तो मेरे सामने थी पर उसका अर्थ हमें पता नहीं था। बाबा के छोटे बेटे मेरे पिता भारत की उस पीढ़ी के थे जिन्हें लग रहा था कि दुनिया की घुड़दौड़ बहुत तेज़ होने वाली है और वो हमें शहर ले जाना चाहते थे। उनके लिए गाँव का जीवन नॉस्टेलजिक तो था लेकिन वो अपने बच्चो को उस से दूर रखना चाहते थे। हर साल गर्मियों की छुट्टियों में हम गाँव  जाते। माँ सारा सामान बांधती जिसमे हमारी पसंदीदा टाफियों से लेकर  मिल्क पाउडर तक होता था। हम समय की उस दहलीज़ की पैदाइश थे जहाँ चाय पीना शहरी जीवन का हिस्सा भी हो चुका था और पहचान भी। हम टीवी के लिए मचलते और हमारे गाँव में टीवी बहुत देर से आया था। टीवी सिर्फ महाभारत, रंगोली या समाचार के लिए चलता और अक्सर बाहर के बरामदे में रखा जाता ताकि बाकी लोग भी देख सकें। मेरे लिए ये सामूहिकता अनजान थी। हमारे लिए समूह का मतलब नाना का बड़ा घर था जहां मेरे दसेक मामा-मामी, गर्मी की छुट्टियों में आते कजिन्स थे। टीवी जो तब तक बैटरी से चलता था, बैटरी जिसे चार्ज कराने के लिए चार किलोमीटर दूर के गाँव पाकड़डाड़ ले जाना होता था। बिज़ली तब तक घर में नहीं आयी थी और मैं पंखे के लिए रोता था। बाकि लोगों के गाँव में आम का बगीचा था, पोखर या नदी थी जहां वो दिन भर तैरते रहते मेरे लिए गाँव का मतलब सिर्फ उस तांगे की सवारी थी जो हम बस्ती शहर के अफनाए से बस अड्डे से लेते थे। गाँव जो क़स्बा बनने को परेशां था, जहां नीम के पेड़ के नीचे की बातचीत में बड़ा मुद्दा ये था कि किस शिष्य ने किस गुरु को विदाई में कितने पैसे दिए । आस्था चैनल तब तक आया नहीं था और हर कोई मुरारी बापू हो जाना चाहता था जिन्हें चलने को विमान, रहने को मकान सब मिला था क्योंकि वो राम का नाम लेते थे।

    बाबा के लिए पढ़ने का मतलब संस्कृत और गणित था। उनके सवालों में अकसर तीन आमों को पाँच आदमियों में बांटने का ज़िक्र होता। वो हमसे संस्कृत के श्लोक सुनाने को कहते तो हम अपने स्कूल के संस्कृत सिलेबस से “येषां न विद्या” गाने लगते। अब सोचता हूँ तो लगता है कि हमारी पीढ़ी इसी येषां न विद्या और बाबा ब्लैक शीप के छोरों में उलझी थी। वहीं मेरे पिता के लिए अंग्रेजी ज्यादा महत्वपूर्ण थी। पता नहीं वो पीढियों का द्वन्द था या भारत के एक समय से दूसरे समय में सरकते जाने का कोई प्रतीक।

    हमारे दो कमरो के किराए के मकान में बाबा जब भी आते अपना सारा सामान ले आते, पापा जो उनके  छोटे बेटे थे उनसे कहते कि यहाँ बिस्तर नहीं है क्या? बाबा कहते, “जीवन भर ख़ुद के भरोसे रहे, तू आपन खाओ कमाओ ..” वही एक आपरेशन के बाद बिस्तर पर पड़े बाबा! जब माँ उनका पाट बदलती तो थोड़ा ख़ुद में धंस जाने वाले बाबा। बाबा जो पापा के तबला बजाने पर झल्लाते और कहते कि “मास्टर होके पदानिया बनत हौ।” पापा ने तबला सीखा नौकरी में आने के बाद और सालों तक स्कूल से आने के बाद घंटे–दो घंटे तबला बजाते। स्कूल जहाँ जाने के लिए उन्हें चौरीचौरा तक एक सुस्त और कभी न समय पर आने वाली लोकल ट्रेन लेनी पड़ती और फिर आठ किलोमीटर साईकल चलानी होती। “पंचमहल” के उन  कोनों में तबले की आवाज़ गूंजती  रहती और हम उसके बोलों “तिरकित धिन” पर अपने शब्द चढाते रहते। तबला बाबा की परिभाषा में भले घर के लोगों का शौक नहीं था पर गर्मियों में जब हम गाँव जाते बाबा कहते कि मिलन को कहा कि सारंगी ले के आवे और देर रात हम हम उनके साथ तबले और की सारंगी की जुगलबंदी सुनते। सारंगी का मतलब तब मेरे लिए पधारो म्हारे देश की उदास धुन नहीं थी तब सारंगी वाले भर्तृहरि का कोई पद गाते थे जिसका मतलब मुझे पता  नहीं था। अक्सर गा चुकाने के बाद सारंगी वाले एक बच्चे से कहते,

    “ए सरंगी कान कटबू?

    और सारंगी जवाब देती, “हअअअं”

    “एके कि दूनो”

    “दूनो”

    मिलन चाचा सारंगी बजाते,पापा तबला और बाबा अपनी चौकी,जिसे वहां तख्ता कहा जाता, पर लेटे लेटे सर हिलाते रहते और गर्मियों की हवा में झूलता बेला का पौधा अपनी गंध हमारी ओर उछालता रहता।  पर बाबा वो भी थे जो उन्नीस सौ बानबे के आस पास के किसी चुनाव में कुँए की जगत पर बैठ कर हर आने-जाने वाले से पूछते,

    “के के देला”

    बताते,  

    “कमल के दिहे!”

    बाबा के जाने के बाद सालों तक गाँव जाना नहीं हुआ और इस बीच उनका खपड़ेवाला घर भी गिर गया था जो उन्होंने घर के बाहर खुद के लिए बनवाया था। दो साल पहले जब गाँव गया तो देखा कि उनका सामान घर में रखा था जिसमे वह घंटा घड़ियाल भी था जिसे वे शाम की आरती के वक़्त मुझसे बजाने को कहते थे। घंटा घड़ियाल को बजाने का एक तरीका था, लकड़ी के हथौड़े से पीतल के घंटे पर एक बार में दो धीमी चोटें करनी होती थी जब उसकी जुगलबंदी में बाबा के मुंह से आरती के स्वर फूटा करते थे। मेरे लिए घंट घड़ियाल मेरे स्कूल के घंटे की तरह था जो हमारे स्पर्श की परिधि के बाहर था और मैं अचानक मिल गई नेमत के उत्साह में उसे स्कूल की घंटी की तरह जोर जोर से बजाने लगता और उस वक़्त बाबा मुझ पर झल्लाते और कहते, “बौरहा कहीं के, इ पीटत काहे हय!”

    अचानक वक़्त लिखते हुए याद आया बाबा होते तो कहते, “समय कहो इ का अक्त वक़्त लगाए रखन हौ”

    साल था २००० ! मेरे चचेरे भाई की बारात गोरखपुर स्टेशन पर थी, उन्हीं दिनों मेरे बारहवीं के इम्तिहान चल रहे थे। माँ ने कहा एक दिन के लिए चले जाओ गोकि उन दिनों बारात पाँच दिनों की होती थी। मैं बाबा से स्टेशन पर मिला। पता नहीं वो मृत्यु की आसन्न छाया से उपजा स्मृतिभ्रम था या सिर्फ ये कि  उन्होंने मुझे सालों बाद देखा था, वो मुझे पहचान नहीं पाए। बाबा ने पूछा आप कौन?

    मैंने कहा विवेक… और क्या कहा सुना याद नहीं पर बाबा की वो बुज़ुर्ग पनीली आँखे अभी भी स्मृति  में टँकी हैं। मैं अगली शाम लौट आया और सुना कि तीसरे दिन बाबा नहीं रहे।

    मृत्यु से मेरी वो पहली मुलाक़ात होनी थी जहाँ से मैं बच कर भाग आया था। ऐसा नहीं था कि बाबा के होने या न होने का मेरे लिये कोई मतलब नहीं था पर मैं उस अनुपस्थिति से भागना चाहता था जो अपने होने में अभूत संक्रामक थी!

    बाबा आज नहीं है और उनके होने की जगह पर सालों की ढेरों धूल जमा है जिसे मैं हटाना भी नहीं चाहता क्योकि ये उस रिक्तता को भरे रहती है जहां बाबा अपनी चौबंदी पहने बैठे रहते थे।   

    नासाग्रे मोती

    उस रात अचानक नींद खुल गयी। कमरा वही था पर एक उदास छाया में लिपटा। दीवार में गड़ा लैम्प अभी भी पीली रोशनी से आलोकित है लेकिन उसकी रोशनी में निहित सम्मोहन में किसी बीती गर्मी की शाम का रंग घुला है।

    हम चीज़ों को अपनो की उपस्थिति में अक्सर नज़रंदाज़ करते है, जगह अपनो के होने से इतनी भरी होती है कि चीज़े थियटर के प्राप्स भर जान पड़ती हैं। जिस कमरे में सोया हूँ ऐसा नहीं कि वहाँ पहली बार आया हूँ, सालों की पहचान है इस कमरे से पर शायद कभी चीजों को गौर से देखा ही नहीं आज अनुपस्थिति में अचानक चीजों की उपस्थिति बहुत सघन लगने लगी है।

    मेरे लिए ये कमरा सालों तक बुआ का कमरा था। गरमी की छुट्टियों में हम देवरिया से गोरखपुर की बस पकड़ते और रिक्शे से उस मोहल्ले तक पहुंचते जिसका नाम बेतियाहाता था। बेतियाहाता का मतलब गोरखपुर के पुराने लोगो के लिए सरकारी अफसरों, ठेकेदारों का मोहल्ला था पर मेरे लिए स्नेह की छाया में लिपटा एक मायावी लोक था जहाँ वे चीज़े थी जिनसे मैं चमत्कृत हो जाया करता था मसलन फोन, वीसीआर। देवरिया में हम बिज़ली जाने पर मन ही मन गुणा-भाग करते थे कि बिज़ली कब आयेगी पर बेतियाहाता में लोग बिज़ली दफ्तर फोन करते और घर वालों को बताते,“लोकल फाल्ट है,दो घंटे में आएगी”।  जो पुरानी चीज़े मुझे आज भी मुँहज़बानी याद है उनमे बुआ के घर का पुराना फोन नम्बर भी है । देवरिया में हम रंगीन टीवी और वीसीआर किराये पर लाते थे जिसे वीडीओ कहा जाता था। वीडिओ रात भर के लिए आता और हम पूरी रात जाग कर एक के बाद एक तीन फ़िल्में देखते। बुआ के घर रंगीन टीवी और वीसीआर दोनों थे और मेरे लिए ये किसी जादू से कम न था की हम जब चाहे तब फ़िल्में देख सकते हैं। बुआ के घर में एक अजीब सी गंध पसरी होती थी ठीक वैसी ही गंध उनके दोस्तों के घरो में भी थी। ठीक ठीक उस गंध का नाम या पहचान नहीं बता सकता पर सालों बाद अमेरिका जाने पर महसूस किया कि शायद ये समृद्धि में उपजी बेपरवाही की गंध थी।  

    बुआ पापा की बड़ी बहन थी और उनके मन में सरंक्षण से उपजी स्नेह की सघन उपस्थिति थी। ऐसा स्नेह जो आप को भीतर से बांधे रखता है और मिट्टी में फैली जड़ों की तरह आपको संबल दिए रखता है, जिसकी अभिव्यक्ति अक्सर डांट में होती है। बुआ के उस स्नेह का प्रतिबिम्ब मुझ पर हमेशा वैसे ही पड़ता रहा जैसे उस घर में  जाड़ो की धूप आँगन में लगे शीशे से टकरा कर फर्श का कोना रोशन किये रहती थी।

    गर्मियों की उन छुट्टियों में हम दिन भर खेलते रहते और दोपहर में वीसीआर पर कोई फ़िल्म देखते। जब सूरज थोड़ा मद्धम होता, बुआ हरे कांच की खिड़की पर रखे भूरी लकड़ी के फ्रेम वाले शीशे में अपने बाल सँवारती। शाम को हम लॉन में पानी डालते और दिन भर की धूप से तप रहे संगमरमर वाले फर्श को पानी से ठंडा करते। बुआ तब तक बाहर आती और हम डांटते हुए अन्दर आकर चाय पीने को कहती और उनकी आवाज़ के साथ लॉन की सोंधी महक पूरे घर में फ़ैल जाती। 

    बुआ घर में थी या घर बुआ में ये कहना मुश्किल था। वो घर उनमें उतना ही उपस्थित था जितना वो घर में। जब मैं अपने पैतृक गाँव जाता तो ये कल्पना करना मुश्किल था कि बुआ कभी यहाँ रही होंगी। मेरी चचेरी बहनों में होड़ रहती कि शक्लो-सूरत में कौन बुआ पर गया है पर शायद उनके जैसा उस घर में कोई नहीं था। बुआ का घर सबके लिए खुला था। तमाम रिश्तेदार उस घर में अक्सर जमे रहते; कोई दिन भर, कोई हफ्ते तो कोई महीने। बुआ की काया दिन भर उस घर में डोलती रहती और उस घर को एक अदृश्य डोर में बांधे रखती। एक बार दीदी (बुआ की बेटी) ने मुझसे कहा,“ जानते हो, मुझे याद भी नही हैं कि कब हम इस घर में बिना मेहमानों के रहे थे”। तब क्या सोचा था ठीक ठीक याद नहीं पर अब रुककर देखता हूँ तो लगता है कि बुआ ने अपने पारिवारिक एकांत को अब की दुनिया में दुर्लभ सामाजिकता से नीचे रखा था। शायद वो न होती तो वे तमाम रिश्तेदार जो उनके यहाँ रहकर पढ़े या डाक्टर के यहाँ लम्बे इंतजार के बाद जो उनके घर आते थे, वे सब गोरखपुर की उस उजाड़ और तीखी दुपहर में पानी का ठंडा गिलास, जिसके बाहर पानी की छोटी छोटी बूंदे  होती थी, कहाँ तलाशते!

    बुआ को फुआ शब्द पसंद था, बुआ में उन्हें कृत्रिमता लगती। हम उन्हें जब फुआ कहते उनकी आवाज़ की आर्द्रता हमें अपने घेरे में ले लेती। गर्मी की उन दुपहरों में जब बिज़ली चली जाती हम सब बुआ के साथ घर के गलियारे में फर्श पर लेट जाते और परदे के नीचे से आ रही हवा का ठंडापन महसूस करते। शायद ये गाँव का वो टुकड़ा था जिसे बुआ ने उस शहर में भी खुद के भीतर छिपा रखा था। यही वो समय होता जब बुआ मुझे मेरे पिता की तमाम कहानियाँ सुनाती कि कैसे वे जवानी में तकरीबन दबंग किस्म के व्यक्ति थे और मैं हमेशा उस तस्वीर को अपने अध्यापक पिता की वर्तमान तस्वीर से मिला न पाता। बुआ के क़िस्सों में प्रतापगढ़ था जहाँ वह पहले रहीं थी। उन किस्सों में उनके घर में काम करने वाला एक लड़का था, जिसका नाम शायद जीतू था, जो बुआ को बीबी जी कहता और लहसुन के ढेरों ढेर मिनटों में छील देता। उन किस्सों में मुझे लगता था कहीं दाल में नमक भर विषाद की छाया है पर जैसे मैं कभी बुआ के घर के कोठरी कहे जाने वाले कमरे के बेसमेंट में नहीं गया था, ये छाया मेरे लिए प्रवेश निषिद्ध  जैसी थी और इन्ही किस्सों के बीच वो कहती, “समझे पठ्ठे!” और मैं  उस छाया से दूर भाग आता था।

    बाद के दिनों में मैं बुआ के घर रहने लगा था। विश्वविद्यालय जिसे उस शहर में इनवर्सटी कहा जाता था वहाँ से बीए करने के लिए। घर में बुआ सबसे पहले उठती और बाकी लोगों के लिए चाय का पतीला तैयार कर देती, पतीला आज कह रहा हूँ पर उन दिनों मुझे वो चाय का भगौना किसी अक्षय पात्र से कम नहीं लगता था, हम ग्लासों में चाय भरते रहते और वो जस का तस रहता।

    सुबह होने का मतलब उस घर में बुआ की अस्फुट आवाज़ में “ॐ जयंती मंगला काली” गूंजना होता जिसकी परिणिति उनकी कारुणिक आवाज़ में “जय अम्बे गौरी” में होती। उस कारुणिकता में कोई दैन्य न था, उसमे सत्य की एक गूँज सी लगती थी जैसे बुआ सामने बैठे किसी के लिए कह रहीं हो “कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती”। मुझे ईश्वर का नाम पता मालूम नहीं पर बुआ का पूजा घर से लौट कर हमारे हाथों में मिश्री का प्रसाद रखना एक मायावी चीज़ थी जिसे लगता था ईश्वर नाम की चीज ने भेजा है।

    कालेज के दिन थे, मेरी दोस्तें अक्सर मुझे फ़ोन करती थी, बुआ मुझे डांटती कि ये लड़कियों से ही बात करते रहोगे तो इम्तिहान में कभी पास नहीं होगे। ये वही बुआ थी जो दूसरे रिश्तेदारों से मेरी एक भी शिकायत न सुनती और उन्हें तकरीबन डांटते हुए कहती उसकी पढ़ाई देखिये। कुछ सालों बाद  मैं जेएनयू  में पढ़ने चला गया था। एक बार एक लड़की, जिसे मैं प्यार करता था, और कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली से बुआ के घर गया। बुआ हम सब से मिली और बाद में मुझसे बोली, “इससे ही शादी करोगे?” और मैं उनसे सीधे “हाँ” नहीं कह पाया था। वो बोलीं कि अगर करोगे तो वही दिल्ली में करना, मैं नहीं आऊँगी। हम दोनों जानते थे कि ये सच नहीं था, बुआ आतीं मुझे थोडा डाँटती और फिर गोलघर की उनकी पसंदीदा दुकान से ख़रीदा शर्ट का कपड़ा मुझे देतीं। कुछ साल बाद मैं और वो लड़की अलग हो गए पर तब बुआ “जाने दो जी” कहने के लिए नहीं थीं। होने को तमाम चीजें हो सकती थी मसलन होने को तो ये भी हो सकता था कि जब वो गुडगाँव के अस्पताल में भर्ती थीं मैं उनसे मिल पाता और कहता कि बुआ मैं उसी लड़की से शादी कर रहा हूँ और वो रुक जाती हमारी दुनिया में, मुझे डांटने के लिए, “खुश रहो” कहने के लिए।

    आज बुआ नहीं हैं। उनके जाने के बाद एकाध साल तक उनके कमरें में नहीं जा पाया। ख़ुद से कहता रहा कि बुआ बस उर्दू बाज़ार गयी हैं।  सालों बाद उस कमरे में लेटा हूँ जो अब भांजी सिमरन का कमरा है; दीवार में पीली रोशनी वाला लैंप गड़ा है, हरे कांच की खिड़की पर भूरे फ्रेम वाला आईना भी है बस गोल्डन बार्डर वाली लाल साड़ी पहने बुआ नहीं हैं जो नाक में छोटी मोती वाली लौंग पहने रहती थी, जिनके पैर छूता और वो कहतीं, “का पठ्ठे आ गईला”

    हाथी घोड़ा पालकी

    शब्द और स्मृति का संबंध अजीब है। हम अक्सर स्मृतियों को शब्दों में साझा करते है पर कभी कभी ऐसा होता है कि शब्द ख़ुद स्मृति की शक्ल धर लेते हैं। नाना की पहली स्मृति कौंधती है वह इसी शब्द–स्मृति के द्वंद्व की है। पता नहीं वो स्मृति मेरी है या उन शब्दों ने स्मृति का रूप ले लिया है जिन्हें मेरी माँ बार बार दुहराया करती थी कि मेरे बचपन में मैं जब तक नाना के कंधे पर चढ़कर तीन चार चक्कर न लगा लूँ रोना बन्द नहीं करता था। उस पूरे चक्कर में नाना मेरे हाथी घोड़ा पालकी सब थे।

    नाना जिनके नाम की तख़्ती सालों तक घर के बाहर लगी थी। सरकारी काग़ज़ों में उनका नाम जो भी हो उस तख़्ती और आस पड़ोस के लिये वो “पान बाबू” थे। खद्दर की धोती कुर्ते में लिपटे और जाने किस  तीर्थ से लायी मूठ वाली छड़ी लेकर चलते पान बाबू और हम सब पान बाबू के घर के लड़के।

    नाना को जब से मैंने देखा वो घर के अंदर वाले आँगन से लगी दालान में सोते थे। हर रात सोने के पहले हम उनकी चौकी के गिर्द मच्छरदानी लगाते, मच्छरदानी बाँस के फट्टों पर बंधी होती थी और उन फट्टों को चौकी के पायों में अंग्रेज़ी के X की शक्ल में फँसाना होता था। आज जब मैं बार बार स्मृति के गलियारों में चक्कर लगा रहा हूँ निर्मल वर्मा की डायरी में टँगा वाक्य “स्मृति कल्पना का अभाव है” दस्तक देता है।

    तब हम नाना के घर रहते थे। दालान से लगे घर के भीतरी हिस्से वाले कमरे में हमारी चारपाइयाँ रात को किसी प्लेटफ़ार्म पर ट्रेन के इंतज़ार में ऊँघ रहे मुसाफ़िरों की तरह एक दूसरे के साथ लगा दी जाती। घर के हर कोने से आती आवाज़ें जब सुबह होने की मुनादी करती तो रात भर की थकी हारी चारपाइयाँ एक दूसरे का मुँह ताकती दीवार के सहारे खड़ी कर दी जाती। मेरे सिरहाने की दीवार पर लगे चूने में हरा रंग मिला था जिसकी हरियाली सोते जागते गाहे-बगाहे हमारे बालों में लग जाया करती थी। हरे रंग की इसी दीवार के ऊपर घुटनों के बल चलते कृष्ण के बाल गोपाल रूप की एक तस्वीर बूढ़ी लकड़ी के फ़्रेम में जड़ी थी। तस्वीर के बाल गोपाल के एक हाथ में एक लड्डू हुआ करता था जो कमरे के किसी भी कोने से देखने से ऐसा लगता कि वो लड्डू हमारी ओर बढ़ा रहे हैं। इसी तस्वीर के गिर्द एक खेल हुआ करता था जिसे नाना ने शुरू किया था। इस खेल में होता यूँ था कि मुझे रात को जल्दी सो जाना होता था और बिस्तर में आँख मूँदे लेटे लेटे गोपाल भइया से कोई चीज़ माँगनी होती थी और सुबह प्रकट होने वाली चीज़ों के बारे में सोचते सोचते मैं नींद की एक गहरी झील में डूब जाता था। सुबह जब मैं सोकर उठता तो पाता कि पारले जी बिस्कुट का पैकेट या पॉपिंस की मीठी गोलियाँ जो मैंने रात में सोते हुए गोपाल भइया से माँगीं थी वो मेरे सिरहाने बैठी मुस्कुरा रही होती। चमत्कार शब्द के हिज्ज़े जानने या किसी शब्दकोष में उसका मतलब ढूँढने के सालों पहले मेरे जीवन में उगा वो पहला चमत्कार था।

    नाना उस घर में गुज़री पीढ़ी की तरह नहीं बल्कि उस घर की सबसे मज़बूत दीवार की तरह थे जिससे टकराने का साहस उनके प्रोफ़ेसर बेटे तक में नहीं था। एक ख़ासी उमर में आ जाने के बाद भी वो अपने हमउम्र पड़ोसियों की तरह घर का इस्तेमाल में न आने वाला पुराना सामान नहीं हुए थे बल्कि कई पड़ोसियों के लिए सुबह की चाय और कभी कभार खाने का आलम्बन थे। नाना की चौकी के ऊपर की दीवार पर भूरी लकड़ियों में जकड़ी देवताओं की तस्वीरें लगी थी जिनके आलोक की छाया में वो चौकी नाना के आने का रास्ता देखती। उन तस्वीरों में से एक जो अभी भी स्मृति के अंदरखाने की दीवाल पर जस की तस टँगी है वो बाल भरे शरीर वाले ध्यान की मुद्रा में बैठे हनुमान की है। गुज़रे सालों में जब मैंने उग्र हनुमान के स्टिकर दिल्ली की गाड़ियों के शीशे पर लगे देखे तो बेसाख़्ता मुझे वो नाना के हनुमान याद आए। ऐसा लगा कि वो अचानक कह रहें हो, “ई हम नाहीं हई ए बाबु !”  

    घर की सुबह के साथ ही गोरैयाएँ घर के हरी काई वाले आँगन में आ जातीं और चुपचाप फटके चावल के दाने चुगते हुए नाना की दिनचर्या को निर्वाक आत्माओं की मानिंद देखती रहती। नाना अरहर की सूखी डंडियों को जोड़कर बनी झाड़ू से दुआर बुहारते। घर का दरवाज़ा उनके लिए अतीत और वर्तमान एक साथ था। वो अक्सर हमें कहानियाँ सुनाते कि कैसे न जाने किस साल में घर के मेहमानों के ठहरने के लिए बाहर एक बड़ा कमरा बनवाया गया जिसे सब बंगला कहते थे। नाना ख़ुद कभी उस बंगले में नहीं सोये पर उसे साफ़ करना उनकी दिनचर्या में उतना ही अनिवार्य था जितना सुबह की पूजा और शाम का संध्या अर्चन।

    नाना हमारे सामने थे पर कभी कभी लगता था कि वो एक अदृश्य दरवाज़े पर बैठे हैं जो उनके भीतर कहीं खुलता था जिससे होकर हम समय की खिड़की में झाँक सकते थे। इस खिड़की पर बैठकर जब वो हमें गुज़रे समय क़िस्से सुनाते थे तो हमें लगता कि वो हमारे अपने समय में घट रही बातें हैं। नाना को हमारे समय में देखकर ये कल्पना करना लगभग असंभव था कि वो कभी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के कर्मचारी रहे होंगे। हालाँकि जो क़िस्से उन्होंने हमें सुनाये थे उनमें इसका कहीं कोई ज़िक्र न था, बाद में हमने दूसरों से जाना कि कैसे उन्होंने किसी शाम घर लाए सरकारी पैसे किसी किसी दूर की रिश्ते की बहन को दे दिये थे क्योंकि उसके घर में कोई बहुत बीमार था और शहर का बड़ा डॉक्टर बिना और पैसे लिये कोई जान बचाने वाली सुई नहीं लगा रहा था। नतीजा ये हुआ था कि उस नौकरी से उनका संबंध टूट गया था और वो बाद में चुंगी विभाग में नौकरी करने लगे थे। उन्हें देखते हुए हम अक्सर उन्हें किसी सरकारी बस में बैठे कंडक्टर, बस अड्डे की खिड़की के पीछे बैठे बस का समय बताते क्लर्क या चुंगी विभाग की किसी बदरंग कुर्सी में धँसे आदमी की तरह देखने की कोशिश करते पर कई शामों तक अपनी कल्पना शक्ति की सारी रेज़गारी खर्च करने के बाद भी हम उनकी वो शक्ल नहीं गढ़ पाते। हमें हमेशा लगता कि जब वो घर में होते तो समयों के कमरों में आवाजाही करने वाले कोई हरकारे थे जो इस समय की ख़बर उस समय में पहुँचा रहा होता। जब वो घर पर नहीं होते तो अक्सर बद्रीनाथ, केदारनाथ चमोली या रामेश्वरम जैसी किसी जगह होते जहाँ का हमने कभी नाम भर सुना था और उनकी अनुपस्थिति में हम नक़्शे में वो जगहें ढूँढने की कोशिश करते। जब वो इन जगहों से लौटते तो उनके पास क़िस्सों की नयी पोटली होती जो उन्होंने इन यात्राओं में इकट्ठा किए थे। हम जाड़े के दिनों में बोरसी में जली आग के इर्द गिर्द बैठते और वो इस पोटली से हमारे लिए वहाँ मिले लोगों, वहाँ हुई बातों के क़िस्से नये तह किए कपड़ों की तरह निकालते। हम चुप ये कहानियाँ सुन रहे होते और वो आग बढ़ाने के लिए लकड़ी से उसे कुरेदते और बोरसी में अचानक आग की एक  लपट उठती और उस लपट की क्षण में हम उस जगह, उस यात्रा में पहुँच जाते और नाना वहाँ किसी पंडे से बहस करते या उसके पास रखी मैले कपड़े में लिपटी एक पोथी में घर के किसी पुरखे का नाम ढूँढते दिखते। यह सब क्षण भर को उस उठी लपट में होता और जब वो लपट नीचे गिरती हम आग के पास बैठे क़िस्से के किसी मुक़ाम पर हुँकारी भर रहे होते।  

    समयों में इस लगातार आवाजाही के बावजूद ऐसा नहीं था कि नाना वर्तमान में नहीं थे। हम उन्हें बहुत कम ग़ुस्से में देखते पर जब भी वो ग़ुस्से में होते वो हमें बहुत सामान्य, पूरी तरह हमारे समय में धँसे नज़र आते। उनके ग़ुस्सा होने की स्थायी वजहों में उनके एक भाई थे जो सुबह सुबह शहर के सरकारी स्कूल के ड्रेस की पैंट के रंग की हाफ़ पैंट पहने किसी मैदान में लाठी भांजने चले जाते थे। ग़ुस्से की तात्कालिक वजह कोई भी सकती थी मसलन मेरे ममेरे भाइयों का सूरज के विदा लेने के बाद भी क्रिकेट खेलना; नाना ने उन्हें कई बार कहा कि वो सूरज को विदा करते हुए खेल को भी विदा कह दें और अपनी किताबों की दुनिया में चले जायें पर भाइयों ने सोच रखा था कि दुआरे पर बड़े बड़े बल्ब लगाकर वो सूरज की अनुपस्थिति को अप्रासंगिक कर देंगे और रोशनी का एक अपना तालाब उगा लेंगे। एक दिन जब भाई स्कूल से लौटे तो उन्होंने पाया कि उनके क्रिकेट के बैट और स्टंप को नाना ने एक कुल्हाड़ी से शाम की जलावन में बदल दिया है। हमें तब वो बहुत सामान्य लगे थे पर उसी रात जब उन्होंने बैट और स्टंप के जलावन से रची आग की आँच में कोई क़िस्सा सुनाना शुरू किया तो हमने पाया कि हम क्रिकेट की बॉलों में बदल गये है और जलती आग में बैट के टुकड़े हमें किसी और समय की बाउंड्री में पहुँचा रहे हैं।

    बाद के सालों में मैं अपने शहर के परिचय के आकाश से दूर दिल्ली शहर में रहने लगा था। शहर मुझे अक्सर बुलाता था पर मैं साल में एक दो बार ही उससे बात करने पहुँच पाता। ऐसी ही किसी शहर से मुलाक़ात वाली समय में मैं नाना के पास चला गया था कि अब मेरे माता पिता किसी और घर में रहते थे। शाम गाढ़ी ही चुकी थी और कोहरे ने उसे बेवक़्त रात में बदल दिया था। नाना ने बोरसी में आग जलाई और मुझे लगा कि वो जाड़े को लेकर कोई कहावत सुनाएँगे जैसे जाड़ा कहता है कि वो बच्चों को छूता भी नहीं और जवान लोग तो उसके सगे भाई जैसे हैं सो वो उन्हें भी परेशान नहीं करता पर बूढ़ों को खूब परेशान करता है चाहे वो कितनी भी रज़ाइयाँ ओढ़ लें या वह किसी पुराने क़िस्से का सूत कातने लगेंगे। नाना चुप थे उस शाम मैंने ग़ौर किया नाना अब कोई क़िस्सा नहीं सुनाते जैसे वो दरवाज़ा जिससे होकर वो समय में आवाजाही किया करते कहीं विलुप्त हो गया है। मैंने उनसे बात छेड़नी चाही कि उनकी अमुक यात्रा में क्या हुआ था और मुझे लगा कि वो अंदरखाने की आलमारी से कोई क़िस्सा निकालेंगे और उसे सुनते सुनते मैं उस यात्रा में दाख़िल हो जाऊँगा या वो घर के इतिहास का कोई क़िस्सा सुनाने लगेंगे और मैं ख़ुद को गुज़र चुके किसी पुरखे के साथ खड़ा पाऊँगा जिसकी कोई तस्वीर भी घर में नहीं थी। मैं उस अदृश्य समय की खिड़की खटखटा रहा था पर नाना चुप थे, एक लंबी चुप्पी के बाद वो अचानक बोले, “सब (उनके सारे भाई)चले गये, अब हमें भी ले चलो”

    और इतना बोलकर वो चुप हो गये। उनकी आँखें पनीली थी, मुझे नहीं मालूम की क्या वो धुएँ की वजह से था क्योंकि मेरे सारे जतनों के बावजूद मैं उस रात बोरसी में आग की कोई लपट पैदा नहीं कर सका था या वो अपने गुज़र चुके भाइयों को याद कर रहे थे। उस दिन मुझे लगा कि बोरसी से उठ रहे धुएँ के गिर्द सिर्फ़ मैं नहीं मृत्यु भी बैठी थी और वो मुझे नहीं मृत्यु को संबोधित कर रह थे।

    महीनों बाद घर से ख़बर आयी कि नाना नहीं रहे और अंतिम संस्कार बनारस में होगा। मैं और मेरा ममेरा भाई तुरंत बनारस के लिये रवाना हो गये। पसीने में डूबी ट्रेन के डिब्बे में रात गुज़ारने और शहर की चटक धूप में नहाए हम जब तक मणिकर्णिका पहुँचते नाना की चिता जल चुकी थी। नाना आग के पार मृत्यु के साथ किसी और जगह की यात्रा पर निकल चुके थे; मृत्यु जिसकी उपस्थिति मैंने उस दिन उनके साथ बैठे महसूस की थी और मैं चाहकर भी उस जगह को कभी किसी नक़्शे में नहीं ढूँढ सकता था।

    कोइ न रहा, जग रही कहानी

    समय में बीतते नाना का घर अब मामा का घर हो गया है। आँगन से लगे जिस हिस्से में नाना सोते थे वो अब दीवारों से घिरे घर का भीतरी हिस्सा हो चुका है। घर के बाहर लगी उनके नाम की तख़्ती अब सफ़ेद संगमरमर की शक्ल में दीवार में जड़ दी गई है। संगमरमर पर उनका सरकारी नाम दर्ज़ है, उन्हें  पान बाबू कहने वाला वहाँ कोई नहीं रहा। हरी काई वाला आँगन अब पक्के फ़र्श में बदल गया है जहाँ गौरैया आती तो है पर उसकी चोंच की चोटें अब मिट्टी से नहीं सीमेंट से टकराती है जिसकी जाने कितनी परतों के नीचे उस आँगन में मेरी नाल गड़ी है। रसोई के फ़र्श में अब दरारें नहीं रही और पुरखे पंचमहल में अब सिर्फ़ पितृपक्ष में याद किए जाते हैं। उनकी अब कोई जगह न रही, उनकी जगहों में अब नये बने घर,गाड़ी के किसी नये मॉडल या ज़मीन के किसी टुकड़े के बढ़ते भाव की बातें बैठी हैं। मैं पुराने दिनों का मर्सिया पढ़ता हूँ काश! उनके जाने की जगह ख़ाली होती और उनमें उनके क़िस्से, ठहाके रह रहे होते।

    मैं बार बार उस घर के चक्कर लगाता हूँ कि गोपाल भइया से मिल सकूँ जिनकी तस्वीर किसी दिवाली में मंदिर के पोखरे की बाहर के घूरे के सुपुर्द कर दी गई थी, किसी को नहीं पता वो भक्त मुद्रा वाले हनुमान कहाँ हैं। मैं ख़ाली हाथ लौटता हूँ और जायसी की कविता में शरण लेने की कोशिश करता हूँ कि शायद वहाँ वो दरवाज़ा मिल जाय की मैं समय में फिर दाख़िल हो सकूँ! जायसी गयी रात समझाते मिलते हैं

    कहाँ सो रतनसेन अब राजा?। कहाँ सुआ अस बुधि उपराजा?॥
    कहाँ अलाउदीन सुलतानू?। कहँ राघव जेइ कीन्ह बखानू?॥
    कहँ सुरूप पदमावति रानी?। कोइ न रहा, जग रही कहानी ॥

    • विवेक कुमार शुक्ल

    वैश्विक गाँव-प्रवासी पाँव: एक माया: संपादक – हाइंज़ वेसलर, संध्या सिंह, दिव्या माथुर, पद्मेश गुप्त

    वाणी प्रकाशन , २०२५  में संकलित

    परिचय –

    विवेक कुमार शुक्ल   :

    देवरिया में जन्म, बरास्ते गोरखपुर विश्वविद्यालय जे.एन.यू. से हिन्दी अनुवाद में पी एच डी

    पहली कहानी वागर्थ,1999 में. कुछ अन्य कहानियाँ भी प्रकाशित ।

    कवितायें पहल , सदनीरा में प्रकाशित, गद्य समालोचन, इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित

    पहला उपन्यास अमरपुर वाणी प्रकाशन से

    आरहुस विश्विद्यालय, डेनमार्क में अध्यापन

    संपर्क – ई मेल  vivekkumarjnu@gmail.com

    फोन – +45 50 300 698

     

     

     

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