अयोध्या ने खोया अपना मर्यादा-पुरुष

प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी ने आज अपने स्तंभ में अयोध्या के संकृतिकर्मी, परम्पराविद राजा श्री विमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र को श्रद्धांजलि देते हुए उनको आत्मीयतापूर्वक याद किया है- मॉडरेटर

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अयोध्या की पावन धरा, जिसने न जाने कितनी सदियाँ भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का संदेश दिया है, आज शोकाकुल है। राजपरिवार के मुखिया और अयोध्या की परंपराओं के संरक्षक राजासाहब श्री बिमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र जी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, यह एक युग का अवसान है। उनके जाने से अयोध्या ने अपना मर्यादा-पुरुष खो दिया है। उनका व्यक्तित्व एक दीपक की तरह था— शांति से जलता हुआ, बिना किसी दिखावे के, परंतु अपनी आभा से चारों ओर प्रकाश फैलाता हुआ। वे अयोध्या की आत्मा में रचे-बसे थे। राजसी गरिमा के साथ-साथ उनकी सादगी और सौम्यता हर मिलने वाले के हृदय को छू लेती थी।

बाबा का जीवन इस बात का प्रमाण था कि परंपरा केवल इतिहास की धरोहर नहीं है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का दीप भी है। वे हमेशा कहते थे कि विरासत को सजाने-संवारने से अधिक महत्वपूर्ण है उसे जीना। यही कारण था कि उनके व्यक्तित्व में इतिहास का गर्व और वर्तमान की सहजता, दोनों का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

संस्कृत का यह श्लोक मानो उन्हीं पर सार्थक होता है—

“विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥”

ज्ञान और संस्कार से उपजी उनकी विनम्रता, और उस विनम्रता से जन्मा उनका असली गौरव ही उन्हें अद्वितीय बनाता था। उनका जीवन संदेश देता है कि सादगी ही सबसे बड़ी शक्ति

है। राजसी पृष्ठभूमि के बावजूद उनमें कोई आडंबर नहीं था। वे जिस आत्मीयता से बात करते, उसमें अपनापन झलकता था। यही कारण था कि अयोध्या का हर व्यक्ति उन्हें केवल राजासाहब नहीं, बल्कि अपना मार्गदर्शक और संरक्षक मानता था।

“सादा जीवन, उच्च विचार,

संस्कारों की गाथा अपार।

अयोध्या की पहचान बने,

बाबा आप अमर रहें।”

मुझे स्मरण है, उनसे मेरी पहली मुलाकात एक साधारण-सी बैठक में हुई थी। विषय गंभीर था, माहौल औपचारिक था, परंतु उनके सहज और सौम्य व्यवहार ने सबका मन हल्का कर दिया। चर्चा के दौरान उन्होंने बड़ी सरलता से कहा—

“परंपरा केवल दिखावे के लिए नहीं होती, इसे जिया जाना चाहिए।”

उनके इस वाक्य ने मुझे गहराई से छुआ। यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि उनके पूरे जीवन का सार था। वह क्षण आज भी मेरे हृदय में अंकित है और उनकी स्मृति को और भी जीवंत कर देता है।

उसके बाद दो दशकों तक उन्होंने जैसे मुझे अपनी बेटी के रूप में गोद ले लिया मेरे पिताजी का देहांत हो चुका था और उन्होंने कहा तुम कभी भी यह मत समझना कि तुमारे पिता नहीं है तुम तो मेरी बेटी हो और मेरा परिवार तुम्हारा अपना है। यहां तक कि जब मेरा विवाह हुआ तो उन्होंने कनक भवन मे पूजा कर  सिंदूर खुद लेकर आए उनके पुत्र यतींद्र और बिटिया मंजरी मेरे भाई-बहन समान आज तक उसी रिश्ते को निभाते हैं। और अम्मा उनकी दिवंगत अर्धांगिनी मुझे बिलकुल बेटी मानती रहीं। ये मेरे लिए एक वैयक्तिक क्षति का क्षण है क्योंकि पिछले साल मेरी माँ के देहांत हो जाने के बाद मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि बाबा हैं और मेरे सिर पर एक संरक्षण है अब जैसे वो भी उठ गया और अब जैसे मैं अनाथ हूं।

हर बड़े आयोजन पर होली, दिवाली, राखी पर हमेशा उनके फल-फूल मिठाई और यतींद्र की भेजी हुई साड़ी हमेशा हमेशा के लिए मुझे जैसे उस सूत्र में बाँधती रही। अक्सर जब वो दिल्ली आया करते थे तो आने के पहले फ़ोन खनक उठता था “वाणी मैं दिल्ली आ रहा हूँ, हम भोजन करेंगे,” “वाणी हम शॉपिंग जाएंगे” दिल्ली के खान मार्केट जाकर वहां से चुटुर-पुटुर छोटी-छोटी चीजें खरीदना उन्हें हम सब लोगों में बाँटना जैसे उन्हें बहुत आनन्द देता था। कभी कोई नई किताब पढ़ते तो मुझे फ़ोन करते घंटों उस पर चर्चा होती किताब। चाहे अंग्रेजी की ओर हिन्दी कहो, हम ठहाके लगाते हुए घंटों लोगों के रचे हुए साहित्य पर छिद्रान्वेषण भी करते और उससे बहुत सारी बातें हम सीखते भी आज मुझे ऐसा लगता है न केवल पिता स्वरूप मेरे बाबा बल्कि मेरे बेस्ट फ्रेंड। मेरे सबसे अच्छे मित्र भी मुझे छोड़कर चले गए।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो अयोध्या की गलियों में एक अजीब-सा सन्नाटा उतर आया है। सरयू की लहरें, रामलला की आरतियाँ और मंदिरों की घंटियाँ मानो उन्हें मौन श्रद्धांजलि दे रही हैं। उनकी मुस्कान, उनकी विनम्रता और उनकी गरिमा हर उस स्थान पर स्मरण की जाएगी, जो

अयोध्या की पहचान है।

“क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।”

(जब पुण्य क्षीण होता है तो मनुष्य इस लोक को छोड़कर दिव्य लोक की ओर प्रस्थान करता है।)

वे इस लोक से भले ही विदा हो गए हों, परंतु अयोध्या की आत्मा में उनका स्थान अमर रहेगा। आने वाली पीढ़ियाँ भी उन्हें एक मार्गदर्शक, संरक्षक और आदर्श के रूप में याद करती रहेंगी।

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