झील के पानी में एक नाव में बैठा एक आदमी_ढाका डायरी
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  • मधु कांकरिया की किताब ‘मेरी ढाका डायरी’ का एक अंश

    वरिष्ठ लेखिका मधु कांकरिया की किताब आई है ‘मेरी ढाका डायरी’। इस डायरी की एक ख़ासियत यह लगी कि इसमें बाग्लादेश की राजनीतिक परतों को उघाड़ने की कोशिश की गई है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का एक अंश पढ़िए- मॉडरेटर 

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    मेरे ढाका प्रेम का आलम यह था कि हर जगह इतिहास दरिया के पानी की तरह मेरे सामने बहता रहता, कहीं भी ठहरकर मैं अंजलि भर लेती। सच है कि बीत कर भी इतिहास कभी नहीं बीतता, वरन वर्तमान के कानों में फुसफुसाने लगता है – देखो! देखो! हिन्दू आत्मा! मुझे देखो! कभी मैंने रसूल हमजातोव से शब्द उधार लेते हुए कहा था- ईश्वर मुझे लिखने के लिए विषय मत दो, देखने के लिए आँखें दो। ईश्वर ने लगता था शिद्दत से मेरी प्रार्थना सुन ली थी और मेरे शरीर में आँखें ही आँखें रही थी। मैं सौ-सौ आँखों से देखती और हजार-हज़ार कानों से सुनती। मुझे हर जगह कृष्ण की बाँसुरी की तरह अल्लाह मियाँ की टेर सुनाई पड़ती। अल्लाह और इनसान हमेशा साथ-साथ रहते थे। यहाँ की सुबह बनारस की याद दिलाती। हर सुबह अजान उठाती, हर मस्जिद के माईक से आती संगीत की सी लयवाली अज़ान की रूहानी गूँज। लगभग हर ऑटो के पीछे लिखा मिलता ‘अल्लाह सर्व शक्तिमान’। एक बस की पीठ पर लिखा था ‘आपनार सन्तान के क़ुरानेर शिक्खा ‘दिन’ (अपनी सन्तान को क़ुरान की शिक्षा दीजिए)। एक ऑटो की पीठ पर लिखा था ‘नमाज़ कायम रख़ून’। एक दुकान के बाहर देखा अंग्रेज़ी में लिखा था जिसका आशय यह था— मेरे बिना भी अल्लाह अल्लाह है, पर मैं अल्लाह बिना कुछ नहीं हूँ। जगह-जगह खुले हुए ‘इस्लामिक बैंक’। बात-बात में लोग यहाँ अल्लाह को घसीट लेते। कई बार तो यह भी देखा कि ज़िम्मेदार अफ़सर तक बिना बताए नमाज़ के समय ज़रूरी काम छोड़ चुपके से नमाज़ अदा करने सरक जाते। उन्हीं दिनों मेरे बेटे ने अपने जूनियर कलीग से हाथ मिलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, तो उसने विनम्रता से कहा कि इस्लाम में हाथ मिलाने की इज़ाज़त नहीं है।
    सावन के अन्धे की तरह मुझे हर जगह इस्लाम फैलता, पाँव पसारता दिखता। शायद इसका एक कारण यह भी था कि मेरे अवचेतन में पड़ा ढाका मुजीबुर रहमान का लोकतांत्रिक ढाका था, इसलिए दिमाग़ में कहीं यह भी था कि आधुनिक ढाका में सर्व धर्म समभाव की हवा बह रही होगी, कि हिजाब, बुर्का, टोपी, दाढ़ी यहाँ का विरल दृश्य होगा, पर यह तो इतना आम दृश्य था कि मैं हैरान थी। सुबह पहला अहसास तब हुआ, जब मेरी काम करनेवाली बाई सलमा ने घंटी बजाई और जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, मैंने देखा – ऊपर से नीचे तक बुक़, हिजाब और नकाब में ढकी एक काया, सिर्फ़ चमचमाती दो आँखें, मैं उसे पूरी तरह देख भी नहीं पाई थी कि उसने अपनी मधुर आवाज़ में कहा – सलाम वालेकुम। हड़बड़ी में मेरे मुँह से भी निकला ‘सलाम वालेकुम’, जबकि मुझे पता था कि सलाम वालेकुम के जवाब में ‘वालेकुम सलाम’ कहा जाता है। जब भी ऐसे दृश्य सामने आते मेरा हिन्दुस्तानी मन स्विच ऑन हो जाता। एक आज़ाद क़िस्म की फीलिंग से मैं सराबोर हो जाती, क्योंकि हिन्दुस्तान में ऐसा कुछ नहीं होता था। शुरुआती दिनों में मेरा यह स्विच हमेशा ऑन ही रहता। मैंने यह भी नोट किया कि महमूद भाई किसी अनजान बन्दे से रास्ता भी पूछते, तो शुरुआत सलाम वालेकुम से करते।
    लाल सिग्नल पर गाड़ी थोड़ी देर के लिए रुकी हुई थी। सामने मुजीबुर रहमान का बड़ा सा होर्डिंग लगा हुआ था, जिसके नीचे लिखा था, ‘मुजीब शतवर्ष-2020’। बंगबंधु मुजीब का यह शताब्दी वर्ष था, जिसे अवामी लीग बड़ी धूमधाम से मना रही थी। होर्डिंग्स से नज़र हटी भी न थी कि एक बूढ़ा भिखारी खिड़की के पास हथेली फैला कर खड़ा हो गया। मैंने उसकी फैली हथेली पर चन्द सिक्के रखे भर कि जाने कहाँ से फिर एक आ गया। जहाँ-जहाँ गाड़ी रुकती, माँगनेवालों की हथेलियाँ फैल जातीं।
    भिखारियों को लेकर एक मज़ेदार वाकया याद आ रहा है। एक बार कोलकाता में हमारे घर के नीचे ही एक भिखारी चादर डाले और हाथ में कटोरा लिये बैठा था। उसने बेहद करुण शब्दों में मदद की गुहार लगाई। अमूमन हट्टे-कट्टे भिखारी को देख मैं आगे निकल जाती हूँ, पर मुझे लगा उसके पाँव में शायद तकलीफ़ थी, उसने एक पाँव आगे तक फैलाया हुआ था, जिस पर पट्टी बँधी थी। मैंने पर्स खोला, दुर्भाग्य से उसमें छुट्टे रुपये नहीं थे। मैंने अफ़सोस जताते हुए कहा- सॉरी, मेरे पास छुट्टे नहीं हैं। उसने तपाक से थोड़ा हँसते हुए जवाब दिया- कोई बात नहीं, मैं दे देता हूँ छुट्टे! उसने कुछ भी ग़लत नहीं कहा था, लेकिन हमारी अपनी ही मानसिकता, मैं वहाँ से भाग खड़ी हुई कि पास में ही घर है, यदि किसी ने मुझे उससे छुट्टे लेते देख लिया तो?
    यहाँ ढाका में ही मैं एक बार ढेर सारी ख़रीदारी कर रही थी। पास में ही एक भिखारिन हथेली फैलाये खड़ी थी। मेरे पास छुट्टे नहीं थे, लेकिन उससे पिंड छुड़ाने की ग़रज़ से मैंने उसकी हथेली पर पचास का नोट धर दिया। अब ख़ुश होने के बजाय वह पीछे पड़ गई—मैडम, मुझे भी एक ड्रेस दिला दीजिए।
    ऐसे ही एक बार मैंने एक बैलून बेचनेवाली से अपनी पोती के लिए बैलून ख़रीदा और जब उसे पैसे देने लगी, तो मैंने देखा कि उसके पास बांग्लादेशी नोट के साथ दस डॉलर का नोट भी था। मैंने पूछा- यह डॉलर कहाँ से आया? उसने कहा- किसी विदेशी ने दिया था एक बैलून के बदले, कितना मिल जाएगा इसके बदले दस डॉलर का बांग्लादेश टाका 1100 होता, संयोग से मेरे पास थे इतने टाका, मैंने जब उसे दिये 1100 तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ, वह ख़ुशी से अवाक् थी।

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