आज से हम पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ कहानियों की व्यापक चर्चा के लिए जानकी पुल पर प्रस्तुत करेंगे। इसी क्रम में यह पहली कहानी है। वनमाली कथा के फ़रवरी अंक में कथाकार लकी राजीव की कहानी आई है ‘शरबत’। कहानी अपने कथानक भाषाई कंट्रास्ट के कारण रोचक लगी। लेखिका कहानी के कहानीपन को अंत तक निभा ले गई। आप लोग भी पढ़ें और राय दें- मॉडरेटर
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बाथरूम से आती हुई वो आवाज़ सीधे उसकी नाभि तक पहुंची, फिर एक पलटी मारकर ऊपर उठी और सीने में कुछ भर गयी ..दोनों तरफ़! नहीं,ये वहम नहीं था..हलचल थी अभी भी, भीतर तक। हल्का भारीपन अभी भी शांता के सीने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। सारी आवाज़ स्पष्ट थी,पहले पूरी ताक़त लगाकर उल्टी करने की, फिर पानी बहाने की,उसके बाद वॉश बेसिन साफ़ करने के लिए ब्रश की खरर खरर! आज पहला दिन नहीं था जब आटे में पानी पड़ते ही मालिनी मेम साहब रसोईं से लगभग दौड़ती हुई बाहर निकली थी..और ये भी पहली बार नहीं हुआ था कि मेम साहब की इस बेचैनी पर वो उतनी ही बेचैन न हुई हो।
“शांता मौसी, पानी दो…”
चेहरा पोंछते हुए मालिनी हांफ रही थी, शांता ने पानी का गिलास थमाते हुए कुछ तो कह ही दिया होता, अगर मालिनी ने गिलास थामते बात को ढक नहीं दिया होता,
“पता नहीं क्या नुकसान कर गया..फूड प्वाइज़निंग हो गई शायद”
पल भर के लिए दोनों की निगाहें मिली, आमने सामने दो दो जोड़ी आंखें,बीच में गिलास,गिलास के अगल बगल एक एक पेट और दोनो पेट के भीतर लगभग एक सी हलचल! शांता के होंठ हिले,
“मंझे काय मेम साहब ?”
“क्या? फूड प्वाइजनिंग?.. मुझे नहीं पता मराठी में क्या बोलेंगे? ..समझो कि कुछ गलत खा लिया हो जो पेट में पॉयज़न,ज़हर जैसी गड़बड़ कर रहा हो”
शांता के भीतर विस्फोट सा हुआ। नहीं मेम साहब , नहीं ये तो अमृत का घड़ा है जो आकर पेट में बैठ गया है। बूंद बूंद छलकेगा, बूंद बूंद तृप्त करेगा, छुपाना हो तो छुपा लो ज़हर तो मत बोलो।
“लिम्बु पाणी देती हूं मेम साहब , अच्छा लगेगा”
शांता पानी में चीनी घोलते हुए एक एक दाने को घुलते हुए देखती रही। दाना कहां जाता है घुलकर? पानी में! पानी मीठा हो जाता है। पानी और दाने को कौन जोड़ता है? चम्मच? चम्मच नहीं हो तो..तो भी दाना घुल जाएगा, पानी मीठा होना होगा तो कैसे भी होगा, उसके लिए चीनी और पानी का मिलना ही तो बहुत है। पानी दानों को धारण करता है, दाने पानी की ओर समर्पित..माँ की कोख में बच्चा और सब कुछ मीठा मीठा! शांता की नाभि में फिर कुछ उमड़ा था, अबकि भारीपन उठकर सीने में नहीं आंखों में जमा हुआ था। पानी और दाना मिलकर जो कुछ मीठा हुआ था,वो सब खत्म हो चुका था..चार बच्चे पेट में ही दम तोड़ गए, पांचवीं लड़की जैसे तैसे बची और फिर ऐसी मीठे दानों में तब्दील हुई कि कितना भी घोलो, मिठास कम न होती। हर दिन शांता छककर मातृत्व का शर्बत पीती,बेटी अगले दिन फिर गिलास भर देती। बच्ची ने पहली बार ‘आई’ यानी माँ बोला, शांता पेड़े बांट बांटकर सबको बताती रही, बच्ची ने जब ‘बाबा’ कहना सीखा, शांता के आदमी ने दारू छोड़ने की कसम उठा ली। शांता बारिश वाला गाना रटाती,
“छकुली, ऐ छकुली..
ये रे, ये रे पावसा,
तुला देतो पइसा,
पइसा झाला खोटा”
छकुली खिलखिलाकर कहती,
“पाउस आला मोटा”
मोटा पाउस यानी ज़ोरदार बारिश आने से पहले शांता के भीतर के बादल उमड़ते,घुमड़ते बारिश ले आते,अंगिया भीग जाती। छकुली झपटकर छाती से लग जाती, शांता के सीने का अमृत बच्ची को पोसता रहता। पड़ोसन टोक देती,
“अब छुड़ा दे न, अढ़ाई साल की मुलगी को कौन दूध पिलाता है रे “
वो साड़ी से बच्ची को सिर से पांव तक ढक लेती,
“तेरे तीन हुए तो मन भरा ,मेरी तो एकच है,मन भरने दे न मेरा”
मन को न भरना था,न भरा।बिटिया बड़ी होती गयी,शांता के भीतर की माँ थोड़ी और अतृप्त होती गयी। कभी रात को चौंककर उठती, बिटिया का चेहरा निहारती रहती, जब कभी बिटिया को स्कूल से आने में देर होती, मजदूरी करते अपने आदमी को घसीट लाती। वो भी जानता था, बिटिया जब तक नहीं आएगी घर में बवाल मचा रहेगा,आस पास खेलती बिटिया को दो तमाचे लगाकर खींचकर लाता,मार खाकर बिटिया बड़ी होने को होती, शांता अपने पेट में उसका मुंह घुसाकर उसे फिर छोटी कर देती। आदमी घूरता, छकुली हँसती, शांता मुंह बिरा देती। आदमी नकली गुस्सा दिखाता,
“अगली बार नहीं ढूंढ़ने को बोलना मेरे को”
“जा रे..”
शांता झटक देती,जानती थी बिना बच्ची को देखे ये भी निवाला नहीं गटक पाएगा। उन दोनों के दिन रात सूरज और धरती के बीच का गणित नहीं,बल्कि उस बच्ची का जागना और सोना तय करता था..किसको पता था कि एक रात ऐसी भी आएगी जब अगले दिन उजाला होगा ही नहीं!
“शांता मौसी..दो न नींबू पानी”
खीजी हुई मेम साहब की आवाज़ गूंजी, गिलास पकड़ाते हाथ थरथरा गए। मेम साहब का गुस्सा शांता के लिए नया नहीं था.. शांता जब काम ढूंढने आयी थी तो कितने सारे नियम कानून समझाए गए थे,तब भी शांता काम करने को तैयार हो गई थी। क्या था जो हाथ पकड़कर रोक रहा था? भारी तनख्वाह, जिससे उसका और घर में खटिया पकड़े आदमी का खर्चा निकले? नहीं,उससे ज़्यादा पैसा तो नीचे वाले फ्लैट में मिल रहा था। फिर क्या रोक रहा था यहां? मेम साहब के हर बात पर चिड़चिड़ाने के बाद भी यहां क्यों टिकना था? शांता ने सांस भीतर रोककर नींबू पानी गटकता चेहरा देखा, ये चेहरा..ये ही तो था असली कारण जिसको देखते ही शांता जड़ रह गयी थी। आज छकुली ज़िंदा होती तो इतनी ही बड़ी होती, बिल्कुल ऐसी, मेम साहब जैसी..पांच साल की ही तो थी,जब बुखार से तपती देह अचानक ठंडी पड़ गयी थी..बीस साल हो गए, आज पच्चीस की ही तो होती। ब्याह हो गया होता, क्या पता शांता दो तीन बच्चों की नानी बन गयी होती ,और वो सब ‘अज्जी अज्जी’ की रट लगाते गले से झूल रहे होते। जिस दिन काम मिला था,घर जाते ही बिस्तर पर पड़े आदमी के बाल ठीक करते कह दिया था,
“नया काम चांगला आहे.. लेकिन तुमको ऐसे दिन भर छोड़कर जाना”
आदमी बात के भीतर छिपी बात पढ़ रहा था, आज ये इतनी मीठी मीठी क्यों थी? बात के गूढ़ में जाना ही था,
“मेरे को चलेगा,थोड़ा बहुत चलने को होता है न अब तो..तू अस्सल बात बोल”
शांता झिझकी,
“एकदम छकुली सारखी दिसते मेम साहब ..सुन ना,आज शीरा करूं का?”
आदमी मुस्कुरा भर दिया था। ठेचा भाखरी खाकर ज़िंदा रहने वाली शांता आज हलवा बनाने की बात कर रही थी, यानी जीवन से रूठी इस औरत ने पलटकर जीवन को देखना शुरू कर दिया था क्या? मेम साहब की शक्ल छकुली से मिलती है,इस भ्रम से ही अगर ये दुनिया बच जानी थी,तो यही सही! वो याद करता रहा, छकुली के जाने के बाद से घर में मीठा बनना बंद हो गया था, पता नहीं भगवान से रूठी माँ चीनी से क्यों बैर पाल बैठी थी? बस नाम भर को ज़िंदा रही, उस पर भी सवाल उठाती रही,
“कोई कोई माँ तो बचतीईच नहीं, मैं बची रह गयी..कायको बची रही?”
आदमी छत ताकता रहता। वो तो खुलकर रो भी नहीं पाया था, भीतर उठे सैकड़ों सवाल उसको खुद नहीं सोने देते थे, इस सवाल का जवाब कहाँ से खोजकर लाता? लेकिन उस दिन वो हलवे की कटोरी के साथ जवाब भी लिए खड़ी थी,
“छकुली को फिर से आना था मेरे पास, तभी मैं बची रही, उधर चार बाई लोग काम ढूंढने को आई थी, मेरे को ही रखा गया”
आदमी ने कटोरी थाम ली थी, उससे ज़्यादा कुछ संभालना उसके बस का था ही नहीं। शांता के चेहरे पर एक बल्ब टिमटिमा रहा था, सौ वाट का। नयी मेम साहब की बातें, छकुली से उनकी साम्यता, शांता की खाली गोद को भरता एक आकार, सब कुछ वहीं कुछ पलों में सामने आ चुका था। आदमी के भीतर पानी घुमड़ रहा था, पहले पेट में,फिर सीने में, आंखों तक आते-आते ठहर गया। वो सामने बैठा दिप दिप करता बल्ब, आंखों का पानी देखकर बुझ तो नहीं जाएगा? पानी रुका रहा,बल्ब जलता रहा..
फिर तो वो बल्ब कभी बुझा ही नहीं,हर दिन चमक बढ़ती रही। शांता के भीतर मानो एक सोलर पैनल फिट हो गया था, दिन भर मेम साहब को देखकर ऊर्जा संचित करती ,रात को अपने आदमी को सब बताते हुए रौशन हो जाती। बात तब तक भी नियंत्रित थी, लेकिन आज बल्ब ऐसा जगमग हुआ था कि आदमी को रोशनी चुभने लगी थी, शांता घर लौटकर सुबक पड़ी थी,
“मी देवाला सांगितले कि मला अज्जी व्हायचे आहे”
आदमी हड़बड़ा गया था! भगवान से ‘अज्जी’ यानी नानी बनने की मन्नत मांगी इसने? दोनों कंधे पकड़ कर शांता का सिर ऊपर उठाया,वो आंसू पोंछते हँस रही थी,
“मेम साहब को चक्कर आ रहा,उल्टी कर रही.. मैं बन जाएगी अज्जी”
लंबी बीमारी से जूझते आदमी में बहस करने की शक्ति नहीं बची थी, बची भी होती तो शांता
को न साध पाता। एक खिलंदड़ बछड़े में तब्दील हो चुकी वो औरत ज़मीन खोद खोदकर धरती आकाश एक कर चुकी थी। मेम साहब के लिए क्या अच्छा है,क्या नहीं, क्या करना है क्या नहीं, इसकी एक लिस्ट उसके दिमाग़ में मौजूद थी। मालिनी मेम साहब दिन भर चाय मांगती तो शांता चिढ़ जाती, एकाध बार टाल भी गयी और एक दिन तो खालिस दूध में पत्ती खौलाकर थमा आयी,वो बात अलग थी कि इस पर उसकी जमकर क्लास ली गयी। शांता तब भी रुकी नहीं,नियम से बादाम भिगोकर घर जाती, सुबह छीलकर मिश्री के साथ देती ! पहले दिन मिश्री देखकर मालिनी ने कंधे उचका दिए थे,
“अब ये क्या? केवल बादाम दो”
दिमाग़ ठंडा होने का बहाना करके शांता ने वो नियम ज़ारी रखा था। खाने में चुपचाप कितनी तब्दीली कर दी थी,गरम तासीर के फल-मसालों का प्रवेश घर में बंद हो चुका था। मालिनी के ‘वर्क फ्रॉम होम’ वाले दिनों में शांता के हाथ लॉटरी लग जाती, क्या क्या नही खिलाती पिलाती! इस बीच दो दिनों के लिए मेम साहब बाहर गई तो शांता ने एक पोस्टर खरीद कर रख लिया,नंग धड़ंग गोल मटोल बच्चे का। मेम साहब लौटेंगी तो पोस्टर उनके कमरे में लगा देगी। कितने दिन बात छुपेगी, बाहर आता पेट कुछ छुपने देगा ही नहीं! तब सब कुछ समझाना होगा खुलकर,इतनी भागा दौड़ी ठीक नहीं। साहब भी कितने कितने दिनों में घर पे आते हैं, मेम साहब को ये भी बोलना होगा कि ऐसे में पति के साथ में रहने का..
बच्चे का पोस्टर फिलहाल शांता के घर में ही था। आदमी से छुपकर शांता उसको देखती रही, मोटा गुलगुला बच्चा, अंगूठा चूसता हुआ। साल भर का होगा, या उससे कम..शांता उसकी उम्र गिनते गिनते किसी और हिसाब में डूबने लगी! तीसरा महीना होगा मेम साहब को, नहीं कुछ भी उठा नही दिखता, अभी ही पता चला होगा,दूसरा होगा..शांता ने अंगुली के पोर पर तीसरा चौथा गिनते गिनते कैलेंडर के महीनों से मिलान किया, यानी दीवाली तक? बच्चे का पोस्टर सामने था..यानी दीवाली तक ऐसा ही एक मेम साहब के घर में! शांता उसका चेहरा अपने पास लाई, बच्चे की आंखों में झांकते हुए उसको एक गहरा तालाब दिखा, बड़ा सा! इतना बड़ा कि नदी ही हो मानो। पानी में छकुली तैर रही थी, दोनो हाथ तेज तेज चलाते, शांता किनारे खड़े उसको देखती रही..अचानक हाथ पैर सब गायब, पूरी की पूरी छकुली गायब! शांता चीख रही थी, भाग रही थी नदी के किनारे किनारे..सब खत्म हो चुका था मानो..तब तक दूसरे किनारे कोई पानी से निकलते दिखाई दिया था! शांता पूरी ताकत लगाकर उस तरफ दौड़ पड़ी थी..अरे! ये तो मेम साहब थी,पूरे बाल गीले, कपड़े गीले और ..और उभरा पेट..
शांता को किसी ने खींचकर उस दृश्य से बाहर निकाला! पोस्टर अभी भी उसके हाथ में था, बच्चा उसी तरह अंगूठा चूसता हुआ। शांता ने पोस्टर अपनी छाती से लगा लिया, बच्चा छाती से लगा “अज्जी अज्जी” कहता रहा, शांता घुटना मोड़े पोस्टर चिपकाए सोती रही। चीनी की गठरी मेम साहब के भीतर है,खुलेगी घुलेगी.. मिठास सबमें बंटेगी।
“ऐ शांता! आज कामाला नहीं जाइचे?”
अगली सुबह आदमी खाट पर पड़ा चिल्ला रहा था, शांता ने आंखें खोलकर बगल में सिकुड़ा मिकुड़ा पोस्टर देखा.. वहीं से चीखी,
“मेम साहब बाहर गांव गयी है, दोन दिवसाची सुट्टी आहे”
दो दिनों की छुट्टी बस कहने को थी..शांता ने अड़तालीस घंटों के मिनट गिन गिनकर, ये दो दिन ख़ूब लंबे खींच दिए थे। कहीं भी चैन नहीं, कुछ भी नहीं सुहाता रहा। आदमी ने टीवी देखने को कहा,वो कमर दर्द की बात करके उठ खड़ी हुई। पड़ोसन भेलपूरी दे गयी तो ‘कचरा’ बोलकर फेंक आयी..इतनी चिड़ चिड़ तो भी आदमी झेल गया, पानी तो तब सिर के ऊपर गुजरा जब वो रात को कपड़े धोने बैठी और घंटे भर बाद भी उसी पटरे पर बैठी एक एक कपड़ा चार चार बार धोती रहे। आदमी ने एक गिलास फेंककर निशाना लगाया, उसको लगा नहीं.. शांता को मारने के लिए निशाना था भी नहीं!
“ऐ..कपड़े धोने दे न”
पांचवीं बार वही कपड़े बाल्टी में डालते ही शांता चार महीने बाद का हिसाब लगाकर फिर डूबने लगी। मेम साहब की ओटी भरने में खूब भीड़ होगी, क्या बोलते टी वी में,गोद भराई बोलते हैं,वही वही। हरी साड़ी में फूलों का ज़ेवर पहने मेम साहब , बगल में फूलों का धनुष लिए साहब, मेम साहब हंसकर देखेगी, साहब धनुष थमाएंगे, दोनों साथ में धनुष पकड़े हुए। ख़्याल को झटका दिया,ऐसे थोड़ी होगा,ऐसा तो इधर होता था, महाराष्ट्र में, कुछ और होता होगा उनके में! चलो,जो भी होता होगा, बच्चे के लिए अच्छा होता होगा। कितने लोग आएंगे, सब आशीर्वाद देकर जाएंगे..मेम साहब का अमृत कलश भरता रहेगा, पल पल जीवन की ओर बढ़ता हुआ..मन कहीं पीछे जाकर अटक गया, शांता की गोद भराई में कैसे तैसे तो वो खड़ी हो पायी थी। इतनी तकलीफ़,पैर पूरे सूजे हुए, पड़ोसन आकर फुसफुसा गयी थी,
“मुलगी है तेरे को..मुलगी आती है तो ऐसेईच तकलीफ़ देती है”
बाल्टी में घूमते,पानी में गोला बनाते शांता के हाथ थम गए, कहां तकलीफ़ दी छकुली ने आकर? वो तो जब तक रही घर में चौबीस घंटे सब चकमक रहा, जाने के बाद ही तो तकलीफ़ बढ़ा गयी। उसके बाद घर रोगों का डेरा बन गया था,एक के बाद एक बीमारी दोनों को घेरती रही..चार कदम चलते ही शांता की सांस फूल जाती, आदमी को अक्सर चक्कर आ जाता। उस दिन भी तो, सिर पर ईंटे लिए हुए दो मंजिल से ऐसा गिरा कि उठा ही नहीं। फिर पड़ोसन ने दो तीन घर पकड़वाए, झाड़ू पोंछा बर्तन के..फिर कई सालों बाद ये फुल टाईम बाई बनने का काम। दर्द की एक लंबी पारी खेलकर दोनों थके बैठे थे, कभी तो कुछ ठीक होना ही था। कितना कुछ तो ठीक हुआ ,बाकी बचा भी धीरे धीरे ठीक होगा। पड़ोसन को भी तो पता चल ही जाएगा,उसी बिल्डिंग में कचरा उठाने का काम करती है। ख़ुद बता दे जाकर? नहीं, ये तो घर के भीतर की बात है.. उसके और मेम साहब के बीच की। जब पता चलना होगा,तब चलेगा।
तीसरे दिन शांता फ्लैट पहुंची तो मालिनी देखते ही भड़क गयी,
“क्या मौसी! मैं नहीं थी तो तुम भी नहीं आयी? झाड़ू पोंछा तो करती,हालत देखो घर की”
शांता ने पोस्टर वाली थैली शू रैक पर रखी,
“मेम साहब ,चाभी नहीं दी थी इस बार”
“ओह शिट..एक स्ट्रांग कॉफी दो जल्दी, मेरी मीटिंग है..एक बात और भी थी”
तब तक उनका फोन बजने लगा था। शांता ने पोस्टर को भीतर ही रहने दिया,उसी थैली में। पहले वो बात बाहर आयेगी, फिर पोस्टर। यही तो बोलेगी कि अब काम बढ़ने वाला है,छुट्टी मत लेना। शांता हँसकर पोस्टर दिखा देगी, मुझे पता था मेम साहब ! नहीं,हंसेगी नहीं, बोलेगी कि आप टेंशन मत लो, सब अच्छे से हो जाएगा। मेम साहब ये भी बोलेगी कि अभी किसी को बताना नहीं,शांता तब तो तुरंत कह देगी, घर की बात मैं बाहर क्यों बोलूंगी? कॉफी फेंटते शांता के हाथ रुक गए, कॉफी की महक रसोई में फ़ैल रही थी..बोल दूं क्या कि कॉफी पीना बंद करो मेम साहब, ठीक नहीं ऐसे में!
“शांता मौसी! थोड़ा और काम था”
कप थमाते शांता चौकन्नी हो गई,
“बच्चे की मालिश,नहलाने के लिए किसी को जानती हो ?”
शांता ने धड़ धड़ करती साँस रोकी,
“मैं ईच करती न मेम साहब “
मालिनी ने तसल्ली से घूंट भरा,
“गुड! नीचे वाला फ्लैट है न, उनके यहां बेबी हुआ है लास्ट वीक, उनसे बात कर लेना आज ही”
शांता ने शू रैक पर रखी थैली को घूरकर देखा,
धत तेरे की! अभी भी नहीं बताया। ऐसा क्या छुपाना?
“नक्को मेम साहब..और घर नहीं पकड़ना मेरे को”
मालिनी उसके इनकार पर सवाल करती,उससे पहले ही कचरे की गाड़ी आकर सायरन बजा चुकी थी। दो दिनों की छुट्टी थी, गीले कचरे का डस्टबिन खाली था, न खाना बना न फल कटे। दो-चार पेपर,पन्नी बटोरकर शांता ने सूखे कचरे के डस्टबिन में डाला, दरवाजे की कुंडी खोली ही थी कि कर्कश आवाज़ किरकिरा गयी,
“शांता मौसी, कितनी बार कहा है,पूछ तो लिया करो कचरा डालने से पहले”
लाल डस्टबिन हाथ में लिए मालिनी दांत पीसती हुई चली आ रही थी, शांता ने लपककर पकड़ा, भारी था..क्या होगा इसमें? इसमें तो कभी टूटा कांच, कभी बाल, कभी बिजली का फालतू सामान होता है..या फ़िर वो? नहीं, वो नहीं हो सकता, जब मेम साहब को महीना होना ही नहीं,तो वो कैसे होगा? कांच ही होगा, कोई बोतल टूटी होगी। हे देवा! शांता ने आंखें मूंद लीं, ऐसी हालत में भी दारू? कोई बड़ा बूढ़ा है ही नहीं समझाने को, ऐसे में ये सब नहीं पीने का न! दोनों डस्टबिन बाहर रखते शांता ने फ़िर वज़न आंका..बोतल ही होगी, खोलकर झांक लेना चाहिए क्या? डिब्बे का ढक्कन खोला ही था कि तभी फिर से एक आदेश गूंजा..वो हड़बड़ाकर भीतर भाग आयी!
“डस्टबिन रख दिए दोनों? पत्थर रखा उस पर?”
“नक्को मेम साहब ..मी विसरली, अभी रखती जाकर”
“मत भूला करो, कबूतर कौए आकर ढक्कन हटाकर सब फैला देते हैं..तुम ठीक से नहीं काम कर रही हो आजकल, काम छोड़ने का मूड है क्या?”
शांता चुपचाप जाकर ढक्कन पर पत्थर रख आयी। फिर लगा उससे भी भारी पत्थर आकर सीने पर जम गया हो! मैं काम छोड़ेगी? ये काम? इस घर का काम? जब मेम साहब ने पहले दिन पूछा था कि क्या बोलूं शांता ताई, या शांता मौसी, तब कहते कहते रुक गयी थी कि ‘आई’ बोलो न…घर के भीतर आते आते नीचे वाले घर से बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी थी,शांता के पांव पीछे पलटे। एक झलक दिख जाती तो..धक्का मारकर अपने को घर के भीतर ढकेला, क्या रे? दूसरे के घर से तार खींचकर उजाला थोड़ी होगा, आ तो रहा है इधर भी..हाथ पैर मारकर कोएं कोएं करके रोने वाला! मुलगा आया तो दत्ता बोलूंगी, मुलगी आयी तो शिउली!गाजर छीलते छीलते,चार-चार बार दोनों नाम बोले.. दत्तात्रेय भगवान के नाम पर लड़के का नाम, अक्टूबर में आने वाली लड़की तो शिउली ही होगी! दो रंगों का फूल, सफेद पत्ती,नारंगी डंडी.. हल्की-फुल्की, महकती, इधर-उधर भागती फिरती। मेम साहब ऑफिस जायेगी तो मेरे को ही तो देखना होगा, बच्चे ने अपनी मां की देखा देखी “शांता मौसी” कहना शुरू कर दिया तो? मना कर दूंगी, मेम साहब को बोलूंगी.. मैं इसकी अज्जी जैसी हूं, अज्जी बोलने को बोलो!
“शांता मौसी..तुमको होली की कितने दिन की छुट्टी चाहिए?”
चाकू अंगुली में घुसकर खून निकाल लायी। दूसरे हाथ से घाव को दबाकर सिर हिला दिया,
“सुट्टी नको पाहिजे.. मैं इस उमर में होली खेलेगी क्या?”
एक सवाल तो मन में धरा ही रह गया, मेम साहब,ऐसी हालत में तुम रंग खेलोगी क्या?
“ठीक है फिर, दो तीन दोस्त आएंगे.. यहीं रुकेंगे,खाने वाने का काम ज़्यादा रहेगा”
दबा रुका खून फिर बह चला। पिछले सारे जमघट याद आते गए..दोस्त आएंगे,रात भर का हंसी ठठ्ठा, खाना वाना नहीं,खाना पीना, नहीं वो भी नहीं..खाना कम पीना ज़्यादा! पिछली बार कितना हल्ला मचा रहता था, साहब भी कुछ नहीं बोलते। अरे ऐसा सीधा आदमी होकर क्या फायदा, औरत पेट से है तो ये सब पार्टी बीर्टी साइड में रखने का न! शुरु में ही तो बच्चा जमता है, अभी इतनी धींगा मस्ती काय को? शांता की अंगुली का ख़ून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था, रसोईं में पड़ा एक कपड़ा फाड़कर कसकर बांधा, गांठ लगाते लगाते भी खून का रंग उभरकर कपड़े पर आ जमा। चार बच्चे ऐसे ही तो ख़राब हुए, बिल्कुल ऐसा ही ख़ून का निशान सफेद पेटीकोट पर छोड़ छोड़कर चारों गए..ऐसे कैसे गए? पहली बार मन नहीं माना था, बच्चा था खून थोड़ी था कि बहकर निकल गया,फिर दूसरी तीसरी चौथी बार वही सब होता गया, मानो या न मानो, खून बनकर ही सब बहते चले गए..फिर जब छकुली पेट में आयी तो आदमी उसका गला पकड़ कर दहाड़ा था,
“इस बार एकदम नहीं हिलना है तेरे को, बैठकर खाएगी…समझी? कुछ गड़बड़ हुआ न इस बार,तो देख फिर”
खटिया पर पड़े निरीह आदमी की ये बहादुरी याद आते ही सिर से पांव तक झुरझुरी दौड़ गयी। कितना ध्यान रखा उसने, खाना,फल ,पानी पूरी और हर दिन सास से छुपाकर पान का बीड़ा,”खा ले,खा ले..इसको अच्छा लगेगा” कहता हुआ बीड़ा मुंह में ठूंसता, पेट थपथपा देता था।शांता का मन एक बार पान की महक से भरा,फिर कसैला हो गया..और साहब को देखो! कोई मतलब नहीं कि औरत गरोदर है। कितना पैसा,रुपया है, रोज़ चार पान खिला सकते लेकिन पान खिलाने के लिए इधर होने को मांगता न!
मेम साहब को बोलूं क्या कि ऐसे में पान खाने का, लेकर आने को पूछूं क्या? न नारियल पानी, न जूस, कुछ भी ढंग का नहीं आता घर में..बस दवा के ये बड़े बड़े पैकेट, मेज भरी रहती है। उस दिन सफाई करते समय शांता ने सारी दवाई एक डिब्बे में भर दी थी, मेम साहब फट पड़ी थीं,
“अपनी अक्ल मत लगाया करो,फैले रहने दो.. तुम्हारी सफाई के चक्कर में दवा मिस हो जाएगी”
शांता शीशे में मेमसाहब को देर तक देखती रही थी,देखो न, बच्चे की चिंता क्या क्या नहीं कराती!
अच्छा है , ख़ूब अच्छा है, लाल पीली टेबलेट ,खून बढ़ाने वाली सारे डॉक्टर लोग देते हैं। ओ देवा! छकुली के टाइम कितनी खानी पड़ी, खून बढ़ता था कि नही वो मालूम नही पड़ा, लेकिन गोद में तो आई थी एक गुलाबी गुड़िया, हाथ पैर चेहरा सब गुलाबी। आदमी ने देखते ही अपना सिर पकड़ लिया था,
“इत्ती छान मुलगी! कौन बोलेगा हम गरीब लोग के घर की है..छुपा कर रख, निगाह लगेगी सबकी”
निगाह लगने को कोई एक वजह थी क्या? इतनी सुंदर लड़की, उससे भी ज़्यादा सुंदर तो उसके आई बाबा हो गए थे। एक दमकते रोशनी के गोले के इर्द गिर्द बैठे ये दोनो भी तो हर समय चमचमाते रहते थे.. लेकिन पांच साल भर की ही रोशनी भर कर भेजा क्यों था उसको? वो भी फीकी होते होते नहीं,एक दिन खट्ट से बुझ गयी थी..सब अंधेरा अंधेरा करके! दो दिनों तक तो शांता को होश ही नहीं आया था, आदमी ने पत्थर बनकर सारे संस्कार निपटाए थे और तीसरे दिन शांता को होश आते ही वो खुद पत्थर में तब्दील हो गया था..शांता रात में बुदबुदाती थी,
“ऐ सुन..छकुली कुठे गेली?”
आदमी के पास जवाब नहीं था, उसको ख़ुद ही नहीं पता था कि चुन चुन करती चिड़िया अचानक कहां फुर्र हो गयी थी? साईट पर काम करने जाता तो आसपास खेलते बच्चे में कुछ न कुछ अपनी बच्ची का ढूंढ़ता, किसी की नाक उसके जैसी नुकीली दिखती,किसी के लल्छ कान उसकी याद दिलाते। शांता को आज तक नहीं पता कि सिर पर ईंटे लिए वो उस दिन ऐसे ही नहीं गिरा था..बालू के ऊंचे टीले पर चढ़ी एक बच्ची बस गिरने को ही थी,उसको देखते हुए “ऐ छकुली,ध्यान से! गिरेगी अभी” कहकर पीछे देखता हुआ आगे बढ़ा ही था कि ईंटे समेत भड़भड़ाकर दो मंजिल से औंधे मुंह ज़मीन पर आ धंसा था। रीढ़ की हड्डी में लगी चोट आकर बिस्तर से लगा गयी थी, ऐसा सबको लगता था..बाकी वो असलियत जानता था, न भी गिरता तो कुछ तो हो ही जाता, जीवन से मोह खत्म हो जाए तो जीवन भी एकतरफा रिश्ता निभाता नहीं है..ला पटकता है, एक बड़ी बीमारी का नाम माथे पर चिपकाकर! तब से कितने साल बीत गए, इसी बिस्तर पर पड़े पड़े..आदमी के भीतर छकुली जाने का दुख नहीं कुलबुलाता था,वो दुख तो खून में मिलकर दौड़ता रहता था, रात-दिन। वो दुख तो ऐसा था जैसे शरीर का अंग हो, दो हाथ दो पैर,एक दुखती रीढ़! वो दुख कमरे का हिस्सा था,जैसे एक बिस्तर,शांता का जमीन पर पड़ा गद्दा, सामने टंगा टीवी! वो दुख पूरी दुनिया का एक भाग था जैसे एक सूरज,एक चांद,कुछ तारे.. आदमी का असली दुख तो शांता का सूखा चेहरा था, एक आंख थोड़ी ज़्यादा भीतर धंसती जा रही थी, एक पैर थोड़ा ज़ोर देकर उठने लगा था और भीतर भीतर वो सूखती हुई, अधजली टेढ़ी लकड़ी.. सालों बीत गए, ऐसे तो शांता खाना खिला देती,नहला देती, लादकर ले जाती बाथरूम में बिठा आती लेकिन उसके बाद? उसके बाद फिर लकड़ी अकड़ जाती। कभी आदमी बगल में बैठने को कहता तो भिनक जाती, कभी गद्दे पर हाथ थपथपाकर लेटने को कहता तो बनियान को देखकर नाक पर हाथ रख लेती,
“नक्को..बास येते”
“संडास ले जाती थी मेरे को, तब नहीं बास आती थी ?”
टेढ़ी लकड़ी थोड़ी और अकड़ जाती।
“तुम्हाला का पाहिजे?”
शांता रोष में पूछती, आदमी सिर हिलाकर मना कर देता, कुछ नहीं चाहिए! शरीर में दम होता तो झपटकर उसको अपने पास खींच लाता, बोलता तू चाहिए मेरे को!लिपटकर रो ले ,जितना रोना है।आंखों के भीतर का पानी सूख जाएगा,तो ऐंठकर,जलने लायक बचेगी बस! वो लकड़ी सचमुच तीन चौथाई सूखकर बस ऐंठने को ही थी कि ये नया काम उसमें जीवन के छींटें डाल गया था, उस पर से मेम साहब के बच्चे की आहट.. लकड़ी में बेचैनी भरने लगी थी,नया पत्ता आने की तड़प! अकड़ी भूरी से लचीली हरी होती वो लकड़ी जीवन के आधार खोजने लगी थी..धूप, खाद, पानी। शांता हँसने लगी थी, भर पेट खाने लगी थी और उस दिन तो लाकर चेहरे पर आटा लगा गयी थी..आदमी ने जान बूझकर एक गाली दी थी, फिर मुँह घुमा लिया था, छोटी सी कोंपल को माली ही नज़रा दे तो?
माली की ही एक नज़र लगने को होती तो काहे को बाज़ार में इतने नज़रबट्टू बिकते फिरते? उस दिन शांता काम के लिए निकली ही थी कि पड़ोसन ने आकर रोक लिया था,
“ऐ रुक, मेरी बात सुन! मेरे को जानाईच नहीं उधर..सुपरवाइज़र कुत्रया साला”
शांता गली के मोड़ पर रुकी रही,पड़ोसन आग उगल रही थी,
“वो सुपरवाइजर मेरे को क्या बोलता कि मैं कचरा मिक्स करती! तू बता मेरे को, मैं अलग-अलग डिब्बे का अलग-अलग रखती कि नहीं? ओला कचरा अलग,सूक्खा अलग, लाल अलग..बोलता है पगार काटेगा मेरी..भडवा साला”
गाली देते वो पिच्च से थूकी! शांता ने पूरा मामला सोचा, ठहरकर बोली,
“वो तो फ्लैट वाले मिला देते न, तेरी क्या ग़लती,
तेरी पगार क्यों काटने का?”
“वहीच बोली मैं! अब देख, किसी ने महीने का गंदा कपड़ा सब्जी वाले डिब्बे में रखा तो मैं क्या करेगी? खोल खोल कर देखेगी क्या? सिखाया तो है, पिशवी में डालकर लाल कट्टम लगाकर, लाल डिब्बे में डालने का..मेम साहब लोग किधर भी फेंके, ग़लती मेरीईच होगी क्या?”
चीखते-चिल्लाते पड़ोसन की आवाज़ धंस गयी थी, उसी धंसी आवाज़ में शांता को राज़ बता गयी,
“बस्स! एक तारीख को पगार मिली आणि मैं निकली इधर से..छोटे बच्चे वाला स्कूल होता न,क्या नाम..डे केयर बोलते,उधर ही! तू भी चल”
शांता पीछे हट गयी,
“नक्को बाबा! मुझे मेम साहब का काम नहीं छोड़ना “
पड़ोसन एक कदम आगे बढ़ी, भवें नचाकर सवाल किया, शांता पहले सिकुड़ी फिर तनी,
“वो पेट से है,ऐसे में क्या अकेले छोड़ने का?”
पड़ोसन की आंखें फैलीं, उसके चेहरे पर भीतर तक धंसी, फिर सामान्य हुईं। ब्लाउज़ से एक पुड़िया निकालकर मसाला हथेली पर धरा,
“तेरे को कौन बोला?”
“मैं नहीं जानेगी क्या? मैं दिन भर उधर रहती है..उल्टी बिल्टी..”
इधर शांता आत्मविश्वास से लबालब,उधर पड़ोसन मसाला मुंह के कोने में ठूंसकर जवाबी हमले के लिए तैयार,
“पहले आती होएंगी, अभी भी उल्टी बिल्टी आती है क्या?”
मसाले का गर्दा झाड़ती पड़ोसन इतना ही पूछकर नहीं रुक गयी थी, सब बताती चली गयी थी! शांता ने एक तिहाई हिस्सा अचरज में सुना, दूसरा दुख में और तीसरा हिस्सा आधी बेहोशी में..चौथा भी था, सुनना किसको था? बड़े बड़े कदम नापती, लड़खड़ाती शांता ख़ुद से बात करती चली जा रही थी..झूठी है ये! अइसा कइसे होईंगा? मेम साहब का लगन नहीं हुआ,बिना लगन कैसे साहब आते जाते? साथ में रुकते,सोते! पड़ोसन के शब्द कान में कीड़े की तरह रेंग रहे थे,
“तभी तो सफाई कराकर आयी तेरी मेम साहब, लगन हुआ रहता तो रखती न बच्चा”
एक बड़े पत्थर के ऊपर गिरते गिरते बची शांता, आसमान देखकर पड़ोसन को कोसा, कचरा उठाती है न, वइसा ही भेजा हो गया है! इतनी बातें बना गई ? क्या क्या तो बोली अभी, कि मेम साहब दो दिनों के लिए इसी काम से गई थी, ड्राइवर ने बताया उसको…और क्या बोली ,ये भी कि उसके बाद से लाल डस्टबिन में खून से सने पैड फेंके गए! बगल से निकलता ऑटो रिक्शा बदहवास शांता को गरियाता हुआ निकल गया। शांता साड़ी समेटकर बची, रुकी..विचार भी थमे, कुछ याद आया। छुट्टी के बाद का वो लाल भारी डस्टबिन, यानी उसमें बोतल नहीं थी, क्या था? वो था? चप्पल की चुभती कील किसी नस को दबाकर सिर तक पीड़ा दौड़ा गयी… जोड़ घटाना चालू रहा। जब से मेम साहब लौटीं,तब से उल्टी बंद है। शांता ने लिफ्ट से बाहर आते ड्राइवर को देखा, इसीको पकड़ कर पूछ ले क्या कि काय को फालतू बात फैला रहा है? न न, मेम साहब से ही पूछ लेगी..
हांफती लपकती शांता चाभी खोलकर घर में दाखिल हुई। मेम साहब लैपटॉप में सिर घुसाए अपनी दुनिया में थी। शांता ने डस्टिंग का कपड़ा उठाकर सीधे बेडरूम में कदम रखा..इधर उधर, कहीं भी, साहब के साथ शादी का फोटो नहीं। एक बड़ा सा थूक पूरी ताक़त से उसने गटका। मेज पर कपड़ा मारते दवाएं दिखी, उलट पलट कर देखा..पढ़ना आता तो सब पता चल जाता। अरे हट,पड़ोसन के मुंह में मिट्टी.. मेम साहब से पूछती न मैं!
“मेम साहब पोहा करूं? ब्रेड भी रखी है”
“कुछ भी.. कम मिर्च का,अच्छा सुनो शांता, एक साड़ी रखी है ले जाना”
मालिनी मेमसाहब का मूड अच्छा था, शांता ने पसीजी हथेलियां साड़ी में पोंछ लीं,
“मेम साहब! लग्नाचा कित्ते वर्ष झाले?….मंझे शादी को कितना टाइम हुआ?”
मालिनी ने हँसते हुए चश्मा उतार दिया,
“अभी हुई कहाँ मौसी? करूंगी तो तुमको भी पता चलेगा..”
पैर में चुभी कील ठहाका मारकर हँस पड़ी थी। शांता ने पैर की ओर देखा, किसी और की भी हँसी सुनायी दी, मेम साहब के ठीक पीछे पड़ोसन की झलक दिखायी दी, मसाला चबाते हुए वो भी हँस रही थी,
“मेरी बात नहीं मानी न,अब ख़ुद सुन ले..अक्कल नहीं तेरे को”
उसके मुँह से मसाले के लाल छींटें निकलकर सब जगह गिरे..मेम साहब के लैपटॉप पर, उनके पेट पर, शांता के मुंह पर,थैली के भीतर रखे पोस्टर पर..सब कुछ लाल लाल! खून वाला लाल रंग, दाग वाला लाल रंग, सफेद पेटीकोट पर उभरा लाल रंग और वो नदी,जिसमे मेम साहब तैर रही थीं,उसका पूरा पानी लाल..
शांता को याद नहीं कि क्या बहाना बनाकर वो वहां से निकली थी,उसको तो ये भी याद नहीं कि लौटते वक्त वो कील वाली चप्पल भी पहनी थी कि नहीं, पता नहीं वो बड़ा पत्थर रास्ते में था भी या नहीं और था तो शांता उससे भिड़कर गिरी थी भी कि नहीं..बस याद रहा तो इतना कि घर आते ही कमरे में जाने की बजाय,बाथरूम जाकर एक बाल्टी पानी उठाकर अपने ऊपर डाल लिया था। गीले कपड़ों में शांता वहीं ज़मीन पर बैठी रही, कितनी देर.. उतनी देर कि साड़ी सूख जाती, या फिर उतनी देर कि जब तक आँखें सूख नहीं जातीं या फिर थोड़ी और देर कि जब तक वो आदमी के सामने जाने लायक हालत में हो जाती।
“कहां से आ रही है? नहाकर आयी,अभी? कायको? काम पर गई थी न?”
आदमी एक एक कदम नाप नाप कर रखती शांता को अपनी ओर बढ़ते देख रहा था!
“बोल न! काय झ़ाला? अंगोल कायको किया?”
शांता चुपचाप नीचे गद्दे पर आकर बैठ गयी थी,
“कोई मर गया था उधर..आकर नहाएगी नहीं क्या?”
“कौन?”
शांता के भीतर तक नाम उतरते चले गए! क्या मालूम कौन था? दत्ता या शिउली, जो भी था, चला गया था वो भी..शांता ने भरी आंखें लिए स्टूल के पीछे छिपा बच्चे का पोस्टर ढूँढ़ा,वो तो वहीं रह गया। आंखें उठाकर ऊपर टंगी छकुली की तस्वीर देखी,ये, वो ,पोस्टर वाला बच्चा..सब चले गए!
आदमी ने इशारा करके ऊपर अपने बिस्तर पर उसको बुला लिया। शांता बिना गाली दिए, बिना लड़े आकर बैठ गयी। गद्दे पर हाथ थपथपाया, शांता चुपचाप आकर लेट गयी। आदमी ने अपनी कसम चढ़ाते हुए ,उसका हाथ अपने सिर पर रख लिया,
“अब अस्सल बात बता मेरे को”
शांता ने झपटकर हाथ हटा लिया, लेकिन ख़ुद नहीं हटी। देर तक आदमी का चेहरा देखती रही..आंखें, नाक, माथा, होंठ..किसकी तरह दिखता है ये? वही क्या,जो आकर चली गयी। लेकिन इससे पहले तो कभी भी इसमें छकुली की झलक नहीं दिखी! शांता ने आदमी के चेहरे पर हाथ फिराते हुए उसके सीने के बाल छुए, बच्ची के नरम घुंघराले बाल एकदम ऐसे ही तो थे..हैरानी से एक बार फिर उसके चेहरे पर आंखें गड़ा दीं, इधर सब कुछ छकुली जैसा ही है! मन को और सुबूत चाहिए थे तो उसकी बनियान में सिर घुसा दिया, महक भी वही थी, नवजात बच्ची की सोंधी महक। कौन कहता है कि बच्चा आकर चला जाता है,पूरा थोड़ी जाता है..थोड़ा थोड़ा रह जाता है न दोनों के भीतर ! इसके भीतर रह गयी है वो, शांता ने अचानक सिर उठाया..आदमी रो रहा था,शांता कसकर लिपट गयी। रोती रही, जी भरकर रोती रही..इसके भीतर रह गयी है तो क्या मेरे भीतर नहीं होगी? होगी न,इससे ज़्यादा होगी, मैंने तो इधर पेट में रखा था उसको इतने महीने, वहां भी होगी। नाभि में फिर मरोड़ उठी, पलटकर सीने तक आयी, सब कुछ भारी भारी! यहां भी रह गयी होगी, सीने के दोनों तरफ़.. यहीं तो मुंह लगाए रहती थी,चुपुर चुपुर! शांता के पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गयी, छकुली है..अभी भी है..सब जगह है, मेरे भीतर,आदमी के भीतर! शक्कर के मीठे दाने एक बार भीतर आकर, कहीं नहीं जाते! शांता कितने सालों बाद आदमी से लिपटकर पड़ी रही, दिन के इस वक्त भी नींद आ रही थी,और नींद तो कैसी जैसे हवा में उड़ रही हो..और सपना? सपने में वही सब!
छकुली तैर रही है, दोनों हाथ पैर फैलाए..अचानक ग़ायब ! शांता चीखने लगी है, वो कहीं नहीं दिख रही है, अचानक दूसरी ओर पानी में कुछ हलचल हुई है, नहीं..इस बार बड़ा पेट लिए मालिनी मेम साहब नहीं बाहर आयी हैं, एक मटका बाहर आया है,मीठे पानी से लबालब..
शांता ने खुद पीकर देखा है, पानी में शक्कर घुली हुई है। मटके को लिए शांता आगे बढ़ रही है, पेड़ों के बीच रास्ता बनता जा रहा है ,डे केयर सेंटर की ओर.. बच्चों ने आकर घेर लिया है,छोटे छोटे बच्चे चिल्ला रहे हैं,
“शर्बत दो न अज्जी.. जल्दी दो”
शांता ने एक बार पलटकर नदी की ओर देखा है, पूरी नदी ही मीठी हो गयी होगी! वो मटका पलट देती है, बच्चे अंजुरी में भरभरकर पी रहे हैं.. बच्चे खिलखिला रहे हैं,शांता सोते सोते भी रो रही है..आदमी की बनियान भी उसी मीठे पानी से तर हो चुकी है।