• कथा-कहानी
  • लकी राजीव की कहानी ‘कहाँ भयो तन बिछुरै’

    आज पढ़िए लकी राजीव की कहानी। वे उन थोड़े से समकालीन लेखकों में हैं जिनकी कहानियों में शिल्प और कथ्य दोनों का संतुलन बहुत अच्छा रहता है। कुछ भी अतिरिक्त नहीं। जैसे यह कहानी- मॉडरेटर

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    ट्रेन को प्लेटफार्म पर‌ खड़े हुए करीब 1 घंटा हो चुका था। चाय पीकर दस मिनट और काटे, उसके बाद तो गाड़ी से उतर कर नीचे देखना ही आखिरी विकल्प रह गया था। सामान के नाम पर तो एक यही छोटा सा हैंडबैग था,सामान का बोझ उतरने से मना नहीं कर‌ रहा था लेकिन दिमाग में जो बोझ था उसको लेकर यहां उतरते बन ही नहीं रहा था…

    “प्रयागराज स्टेशन”, बस नाम बदला था, शहर की शक्ल वही थी।अपनी पूरी शक्ति बटोर कर वो किसी तरह ट्रेन से उतरी, पैरों ने जैसे ही उस जमीन को छुआ ऐसे लगा जैसे पैरों में किसी ने बड़े-बड़े पत्थर बांध दिए‌ हों..लगा कि अभी भड़भड़ाकर वापस ट्रेन में चढ़ जाना ही‌ ठीक होगा, फिर दिमाग ने डपटा,”सुगंधा! चुपचाप आगे बढ़ो और बनारस के लिए टैक्सी पकड़ो, मौनी बाबा बस एक दिन हैं बनारस में, फिर कब  उनका दर्शन कर पाओगी?”

    दिमाग को क्या समझाती? माना कि  टैक्सी ही बेहतर विकल्प था लेकिन उसके लिए  प्लेटफार्म को पार करके शहर में कदम रखना पड़ता… वही शहर, वही रास्ते, वही हवा, वही आसमान, कौन जाने कब किस स्मृति का एक कंकड़ आकर लहूलुहान कर जाए!

    दिमाग तो बनारस की टैक्सी पकड़ने के लिए टैक्सी स्टैंड भेज रहा था लेकिन मन के किसी कोने में दबी ईर्ष्या की चिंगारी कुछ और ही कह रही था,

    “जाओ सुगंधा! एक बार जाकर देख तो आओ …श्रीकांत की पत्नी तुमसे ज्यादा सुंदर है या तुमसे ज्यादा गुणी?”

    उसने वो ख्याल झटका! क्या करना जानकर कि कैसी दिखती है उसकी पत्नी? जिस नाम के साथ उसका नाम नहीं जुड़ पाया.. उस नाम के साथ कोई भी ना जुड़े, कोई फर्क ही नहीं पड़ना चाहिए! क्यों मिलना उसकी पत्नी से? इतनी दूर से जिस काम के लिए निकली है,वो तो पूरा हो..मौनी बाबा का शिविर बनारस में होगा,ये जानते ही टिकट करा ली थी,क्या पता था बीच में ये व्यवधान आ जाएगा? बाबा का ध्यान आते ही सुगंधा के हाथ श्रद्धा से जुड़ गए, दुनिया भर के रिश्ते जब छोड़ गए, ताने उलाहने हिम्मत ही तोड़ गए तब बची खुची सुगंधा, उनके लिखे उपदेश पढ़कर ही तो ज़िन्दगी की तरफ़ लौट पाई थी। सालों से मौन धारण किए बाबा के सिर्फ पोस्टर देखे,आज उनको साक्षात देखने का अवसर मिला तो मन दूसरी ओर क्यों मुड़ा जा रहा था? मन फिर ज़िद करने लगा था,

     “श्रीकांत से तो मिल लो, अच्छा न मिलो.. देख ही लो एक बार,अब फिर कब आना होगा इलाहाबाद?

    सुगंधा ने थक हारकर,कांपती आवाज़ में रिक्शे वाले से पूछ ही लिया था,

    “भइया.. ममफोर्डगंज चलोगे?”

    रिक्शे में बैठते ही सुगंधा को लगा.. घड़ी बहुत तेजी से पीछे घूमते हुए तीस साल पहले जाकर अटक गई थी, चाहे जितनी कोशिश करो,आगे बढ़ने का नाम ही‌ नहीं ले रही थी। अतीत अपने पूरे पंख फैलाकर जैसे खुद में समेट लेने को उतारू था। सुगंधा का मन खराब होने लगा था, तीस साल बीत गए? लेकिन सच में बीते? स्टेशन से ममफोर्डगंज जाने के बीच सब कुछ तो वैसा ही था, जैसा छोड़कर गई थी..पीपल का बूढ़ा पेड़, राम हलवाई की जर्जर दुकान, केसरिया झंडों से सजा हनुमान जी का मंदिर और वो‌ लंबी सी संकरी नहर! आँखें ऐसे भर आईं जैसे कोई पुरानी चोट दुख गयी हो..

    “भइया ,इधर हलवाई की दुकान के पास थोड़ी देर के लिए रिक्शा रोक लेना “

    रुकने को तो रिक्शा रुक गया था, लेकिन दुकान पर उतरना थोड़ी था.. कुरेदना था उस घाव जो कभी सूखा ही नहीं था! कहने को तो दुकान का एक हिस्सा कच्चे से पक्का हो गया था, लेकिन अभी भी सामने का चबूतरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा तब था..जब  सुगंधा और श्रीकांत  पहली बार,घर से बाहर कहीं मिले थे,

    “मुझे यहां क्यों बुलाया है आपने?”

    सुगंधा ने हाथ में समोसे का दोना लिए हुए नजरें नीची करके पूछा था, श्रीकांत ने जवाब देने के बजाय एक सलाह दे दी थी,

    “थोड़ी देर और इसी तरह समोसा पकड़ी रहोगी तो चटनी और समोसे में कोई अंतर नहीं रह जाएगा..खा लो”

    सुगंधा ने चुपचाप समोसा खाना तो शुरू कर दिया था लेकिन सुगंधा के चेहरे पर घूमती, श्रीकांत की निगाहें उसको सहज होकर खाने भी नहीं दे रही थीं।

    “तुम नहीं जानती हो, मैंने तुमको यहां क्यों बुलाया है? घर में तो तुम मुझसे ऐसी भागी फिरती हो जैसे मैं तुम्हें खा जाऊंगा..सोचा यहां  बात तो हो पाएगी”

    सुगंधा ने आधे बचे समोसे को बगल में खड़े कुत्ते की ओर उछाल दिया था,

    ” आप जानते हैं ना घर में बात करो तो आपकी मम्मी कितना चिल्लाती हैं..उस‌ दिन मैं दही लेने आई तो क्या क्या बोल रही थीं”

    श्रीकांत ने मम्मी की बात पर हथियार डाल दिए थे,

    ” मम्मी को समझाना बहुत मुश्किल है सुगंधा ! उनके दिमाग में हमेशा वही सब चलता रहता है.. मकान मालिक ..किराएदार..उनसे क्या बोलूं? उनसे बात करके होगा क्या?”

    “लेकिन किसी ने हम दोनों को यहां बैठे देख लिया तो आपको पता है ना, क्या होगा ?”

    सुगंधा ने चोर नजरों से इधर-उधर देखते हुए पूछा था, श्रीकांत ने एक लंबी सांस लेकर सुगंधा का हाथ थाम लिया था,

    ” चलो फिर.. अभी शादी कर लें”

    तीस साल पहले का वही सवाल आज फिर उसी तीव्रता से सुगंधा को सुनाई दे गया था, सुगंधा ने अपनी‌ गोद पर रखा हाथ तेजी से पीछे खींच लिया था!वो सवाल अब भी गूंज रहा था, इतनी तेज कि लगा जैसे कान की नसें फट जाएंगी!

    “कुछ लेना है दुकान से कि चला जाए?”

    गमछे से चेहरा पोंछते रिक्शेवाले का सवाल सुनकर सुगंधा संभली,

    “नहीं!कुछ नहीं लेना है, चलो”

    रिक्शे के रफ्तार पकड़ते ही सुगंधा ने हिसाब लगाया.. क्या उम्र रही होगी तब उसकी, उन्नीस साल ? नहीं बीस साल रही होगी.. ग्रेजुएशन चल रहा था, और श्रीकांत पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे। पापा के ट्रांसफर के चलते इलाहाबाद शिफ्ट होकर, मम्फोर्डगंज के उस पुराने बने मकान में दो ही परिवार रहते थे और उन दो परिवारों के बीच एक बड़ा अंतर था.. मकान मालिक और किराएदार होने का! आए दिन श्रीकांत की मम्मी इस अंतर को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत भी कर देती थीं, हर लड़ाई में उनका एक वाक्य जरूर आता था,

    ” तुम लोग किराएदार हो, उसी की तरह रहो”

     श्रीकांत के पापा बहुत सालों पहले इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। श्रीकांत के नाना ने इस हादसे के बाद वह बड़ा पुश्तैनी मकान अपनी‌ बेटी के नाम कर दिया था कि बेटी जीवन भर किसी के सामने हाथ न फैलाए और अपने तीन बच्चों को अच्छी तरह से पाल ले जाए। मकान के सबसे नीचे हिस्से में बनी दुकानों से मिलती  किराए की मोटी रकम और मकान मालकिन होने का दंभ,  श्रीकांत की मम्मी को अक्सर उग्र बना जाता था। श्रीकांत के दोनों भाई तो इस बात का भरपूर आनंद लेते थे लेकिन श्रीकांत को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था ..माँ बेटे की लड़ाई सुगंधा के घर‌ तक सुनाई देती,

    “मम्मी यह सब बातें आप मत किया करिए..ले देकर अपने पास केवल एक मकान है,उसका क्या हल्ला करती रहती हो? “

    श्रीकांत की माँ और वज़ह भी गिनवा देतीं,

    “केवल मकान? तीन लड़के भी हैं.. हैं मुहल्ले में इतने लड़के किसी घर में?”

    “और तीनों लड़के एक कौड़ी भी नहीं कमाते..”

    श्रीकांत की ये बात आग में पड़ी लाल मिर्च की तरह खराश कर जाती ,फिर तो वो जो चीख चीखकर पूरे मुहल्ले को अपनी योजना बतातीं,

    “कौड़ी कमाएं हमारे दुश्मन! होने तो तुम्हारी शादी..फिर देखो, ऐसा स्वीट हाउस खुलेगा कि पूरा इलाहाबाद यहीं से मिठाई लेगा..लाईन लगेगी लाईन”

    कमर पर हाथ रखकर,चुटकी  बजा बजाकर वो अपनी बात सिद्ध करने की कोशिश करतीं। श्रीकांत के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचता। शादी,शादी से मिलने वाला दहेज और उससे खुलने वाला स्वीट हाउस..इनके अलावा घर में और कोई बात हो नहीं पाती थी। गर्मियों की रात जब श्रीकांत अपनी छत पर बैठा,आंगन

    में बर्तन धोती सुगंधा को निहार रहा होता था और बर्तन धोती सुगंधा बार-बार चेहरा उठाकर छत से झांकती दो आंखों को देखकर निहाल हुई जाती थी…ठीक उसी वक्त कोई और भी छुपकर इस रस का आनंद लेता रहता था,ये जानने का समय  प्रेमी युगल के पास था ही कहां?

    “सुगंधा! तुम कल उबटन लगा रही‌ थी,ये सब क्यों?तुम तो मुझे ऐसे ही..”

    श्रीकांत ने उस शाम धीमे से फुसफुसाकर कहा था जब दोनों घरों के चारों बच्चे छत पर ओले बिनने आए थे,ओला बटोरते हाथ झेंपकर रुक गए थे,

    “मम्मी ने‌ लगाने को कहा था..कह‌ रही थीं, लड़का देखने आने वाला है “

    ठंडे ओलों के भरा श्रीकांत का हाथ जलने लगा था,

    “तुमको देखने कोई लड़का क्यों आएगा? इधर देखो मेरी ओर.. तुमने मना नहीं किया?”

    कहते हुए श्रीकांत ने सुगंधा का हाथ थाम लिया था। हाथ मिले तो पल‌ भर को,‌ दिखे दुनिया भर को! पहले तो छत की सीढ़ियां चढ़ती हुई श्रीकांत की मम्मी गरजी थीं,

    “वाह‌ बिटिया..बहुत बढ़िया! तुम्हारी मां ने ट्रेनिंग दी है‌ न कि फंसा लो मकान मालकिन के लड़के को..हथिया लो मकान दुकान “

    सवाल पूछते हुए ही एक उन्होंने कसकर एक तमाचा जड़ दिया था! सुगंधा के चेहरे पर छपी पाँचों उंगलियां इस रिश्ते की समाप्ति का बिगुल बजा चुकी थीं। श्रीकांत की मम्मी ने चीख चीखकर सुगंधा के चरित्र हनन का नाटक खेला था, और इस तरह कि पूरा मुहल्ला दर्शक बना देख रहा‌ था।

    “लड़की को खुला छोड़ दिया कि जाओ अमीर लड़का लुभाओ”

    इस स्तर तक बातें उतरीं, सुगंधा के पापा ने चेतावनी दी थी,

    “बस बहुत हुआ..अब‌ आप चुप हो जाइए”

    “ठीक है,हम चुप हो जाएंगे..इसके मुंह से सुनिए आगे”

    कहते हुए उन्होंने अपने छोटे लड़के को आगे धकेल दिया था। मुश्किल से दस साल का रहा होगा बल्लू, लेकिन मुंह खोलते ही बड़े बड़ों की छुट्टी कर गया था।

    “भइया और सुगंधा दीदी हर बखत देखते रहते हैं एक दूसरे को..भइया घर पे चिट्ठी फेंकते हैं और दोनों जने दुकान में समोसा भी खाते हैं”

     जिन दो चेहरों की ओर भीड़ देख रही थी, उनकी चुप्पी बल्लू की बात को सत्य प्रमाणित कर गयी थी। हादसे के अगले दिन सुगंधा का परिवार सिर्फ मुहल्ले वो मकान ही नहीं, बल्कि इलाहाबाद ही छोड़कर चला गया था। पापा ने पूरी ज़िंदगी उससे ठीक से बात नहीं की,मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए भी जैसे उस छत पर हुए अपमान की काली छाया आंखों में मंडराती रही.. माँ जब तक जीवित रहीं,कोसती रहीं,

    “तुम्हारे जैसी औलाद भगवान किसी को न दे… तुम्हारे पापा वही सब सोचते चले गए, हम भी ऐसे ही जाएंगे”

    पापा की मौत तो सुगंधा के मत्थे मढ़ी ही गयी, मां के जाने के बाद उनकी भी मृत्यु का कारण भी वो खुद को मानती रही! सब चले गए, सुगंधा अपनी उम्र के साल गिनती रही,अकेले ही!

    “मम्फोर्डगंज में जाना कहां है?”

    रिक्शे के पैडल पर पैर मारकर रिक्शे वाले ने पूछ लिया था,सुगंधा ने आस पास देखकर ढूंढने की कोशिश की,

    “एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था,उसके पास हैंडपंप, मंदिर था न एक…”

    “वो तो आगे है, बीस रुपया और लगेगा”

    भुनभुनाते हुए वो रिक्शा बढ़ा ले गया था। बरगद के पेड़ को देखते ही,क्या सोचकर सुगंधा ने अपना चेहरा तुरंत ढक लिया था। अपनी ही हरकत पर हैरानी तो हुई ही, अपनी मंद पड़ती बुद्धि पर झुंझलाहट भी हुई! सामने शीशे में खुद को देखो तो पहचानना मुश्किल हो जाता है, सालों पीछे छूटे लोग कहां से पहचानेंगे?

    रिक्शे की रफ्तार रुकने से पहले ज़रा सी धीमी हुई,ठीक इसी वक्त धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली थी। कोई न पहचाने, श्रीकांत तो ये आंखें पढ़ ही लेंगे.. आवाज़, वो तो पहचान में आएगी ही..मन ही मन एक बार फिर मौनी बाबा को याद किया, हे बाबा, आज संभाल लो, कोई भी पहचान न पाए!

    “आ गया मंदिर..बीस रुपए तो कम ही कह रहे,लंबा हो गया रस्ता,बात हुआं की हुई”

    अपने गमछे से चेहरा पोंछते, बड़बड़ाते हुए रिक्शेवाले ने चौंककर  दो सौ का नोट देखा था,जो सुगंधा उसको थमाकर चुपचाप रिक्शे से उतर गयी थी। न बचे रुपए का हिसाब याद रहा,न पहचाने जाने का डर.. कुछ था जो सीधे खींचकर उसी भव्य मिठाई की दुकान के सामने ले आया था,जिस दुकान के नींव कितना कुछ तोड़कर रखी गयी थी।

    “लौंग लता दे दीजिए, एक किलो”

    बस किसी तरह इतना ही वो बोल पाई! काउंटर पर दिखा अजनबी चेहरा पीछे मुड़कर चीखा,

    “ऐ लड़के ,एक किलो लौंग लता तौल दो.. बहनजी और कुछ पैक करा दें? देख लीजिए “

    सुगंधा ने एक भरपूर नज़र से सब कुछ देखा, मिठाइयों और मेवों  की ओर नहीं बल्कि पीछे टंगी मकान मालकिन की तस्वीर, उस पर चढ़ी चंदन माला..मन में कुछ भीतर तक चुभता चला गया। चेहरा तपकर लाल होने लगा,जैसे सालों पहले पड़ा वो तमाचा,अभी अभी  अपनी उपस्थिति जताकर उंगलियां छाप गया हो!

    “ये किसकी फोटो है?”

    पर्स से नोट निकालते हुए सुगंधा के हाथ कांपने लगे थे, काउंटर वाले ने बिना किसी भूमिका बताया,

    “जिन भइया लोग की दुकान है..उनकी माताजी थीं”

    सुगंधा की धड़कनें पहले बढ़ीं,फिर एकदम रुकने पर उतारु हो गयीं.. बहुत ज़ोर लगाकर पूछा,

    “किसकी दुकान है वैसे ये?”

    बचे पैसे वापस करता हुआ वो झुंझलाकर बोला,

    “वैसे तो समझ लीजिए,हमारी ही है..वो लोग कभी कभार आकर झांक जाते हैं , बड़े लोग हैं, काम कम जलवा ज़्यादा”

    सुगंधा के पास इससे ज्यादा शब्द बचे ही नहीं थे..सवाल सारे वैसे ही धरे थे, अनुत्तरित! बाहर जाने के लिए कांच के दरवाज़े पर हाथ रखा, फिर वापस आ गई, शब्दों को तोड़ मरोड़ कर एक झूठ ही सही, कुछ तो निकला,

    “मुझे एक बड़ा ऑर्डर देना था।अगर उनसे मिलना हो जाता,मतलब दुकान जिनकी है..”

    काउंटर वाले ने एक कार्ड आगे बढ़ा दिया,

    “इसमें सब नंबर लिखे हैं,ये बड़े भैया का ये छोटे भैया का”

    कार्ड हाथ में लेते पहले कंपकंपी महसूस हुई..फिर निराशा, कार्ड में कहीं भी श्रीकांत का नाम नहीं था!मन को जैसे किसी ने गहरे कुएं में डाल दिया हो, उनका नाम क्यों नहीं था?गहरी सांस खींचकर हिम्मत बटोरी, फिर आस पास देखकर धीरे से कहा,

    “अच्छा..दो मालिक हैं! ये ..ये जो माताजी,जिनकी फोटो लगी है, उनके दो बेटे हैं..है ना?”

    सवाल पूछते हुए धड़कन ऐसी तेज भागने लगी थी मानो सालों का सफर एकसाथ तय कर लेगी।

    काउंटर वाले लड़के ने एक पल ठिठककर आस पास का माहौल देखा, थोड़ा आगे झुककर बोला,

    “तीन थे..”

    ‘थे’ का क्या मतलब हो‌ सकता था? सुगंधा को लगा जैसे गर्मी सिर पर सवार होकर,नाक से खून बनकर निकलेगी!

    “पूरी बात.. पूरी बात बताओ न भइया”

    “क्या बताएं बहनजी, तीसरा लड़का कब से घर छोड़कर चला गया, प्यार मुहब्बत का चक्कर था कुछ..पहले सब कहते रहे संगम में डूब गया, फिर पता चला…”

    वो हड़बड़ाकर चुप हो गया था, पीछे एक लड़का लौंग लता का डिब्बा लेकर आ गया था!

    “ये लीजिए बहन जी, आपकी लौंगलता”

    सुगंधा का चेहरा पसीने से तर-बतर हो चुका था, पसीजी हुई हथेलियों से किसी तरह डिब्बा थामा,रुकी हुई आवाज़ बड़ी मुश्किल से बाहर निकली,

    “फिर..फिर.. क्या पता चला भइया?”

    काउंटर वाला लड़का  बिल का कागज आगे बढ़ाते हुए फुसफुसाया,

    “फिर पता चला कि वो तो साधु सन्यासी बन गया.. खाना-पीना छोड़ दिया, अरे बोलना चालना छोड़ दिया, आपने सुना होगा मौनी बाबा का नाम बहनजी…वही तो हैं”

    हाथ में पकड़ा लौंग लता का डिब्बा एक झटके में नीचे गिर गया था! हाथ हवा में लटके ही रह गए..न कुछ कहने की सुध रही, न कुछ और सुनने का मन किया। सुगंधा सम्मोहन की अवस्था में दुकान से बाहर निकली,कोई तो चिल्ला रहा था शायद..मिठाई, डिब्बा…पता नहीं और भी कुछ! सुगंधा ने पर्स टटोलकर अंदर रखा कागज़ निकाला, तुड़ा मुड़ा पोस्टर निकालकर खोलने की कोशिश की। पानी भरी आंखें धुंधला रही थीं,मौनी बाबा का चेहरा बहुत गौर से देखा…नाभि तक झूलती दाढ़ी,धूल धूसरित चेहरा,मुंदी हुई आंखें, कोई पहचान ही नहीं सकता था इस चेहरे के पीछे छुपे श्रीकांत को!

    “कहीं चलना है का?”

    दुकान के बाहर अभी भी वही रिक्शे वाला खड़ा था, “बनारस वाले टैक्सी स्टैंड चलो”…ये शब्द बोलना इतना मुश्किल हुआ मानो अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी सुगंधा ये पांच शब्द कह नहीं पाएगी..

    एक गहरी सांस भरी,

    “वहीं वापस,रेलवे स्टेशन चलो “

    लड़खड़ाती आवाज़ में बस इतना कहकर सुगंधा रिक्शे पर बैठ गयी। मुड़कर घर ,दुकान देखना चाहा … कुछ दिखा ही नहीं, आंसुओं के पर्दे से सब धुंधला था‌ । लौटते समय फिर वही पीपल का पेड़ दिखा, हनुमान जी का मंदिर ..और उसी हलवाई की दुकान दिखी, श्रीकांत की आवाज़ कानों में गूंजी,

    “मुझसे बिना मिले वापस जा रही हो सुगंधा! बनारस नहीं आओगी?”

    सुगंधा ने आंसुओं से तर बतर आंखें मूंद लीं,

    “नहीं श्रीकांत…नियति ने हमारे हिस्से सिर्फ मौन लिखा है, चलिए मिलकर स्वीकारें! इतना संतोष बहुत है कि जिस रास्ते आप बढ़ चुके हैं उसका कारण मैं हूँ “

    रिक्शे की रफ्तार धीमी हो गयी थी, स्टेशन आने वाला था, सामने ही एक बड़ा बैनर ‘मौनी बाबा के बनारस शिविर’ की सूचना बताते हुए पेड़ पर टंगा था, सुगंधा ने अपने आंसू पोंछकर, दोनों हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में जोड़कर, सिर झुका लिया था।

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