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  • छानी-खरीकों में: यात्रा की संस्कृति संस्कृति की यात्रा

     

    ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ एक ऐसी यात्रा है जो हर दस साल बाद आयोजित की जाती है और जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन करना होता है। पहाड़ संस्था के बैनर तले होने वाली इस यात्रा के दौरान अनेक विद्यार्थी, वैज्ञानिक, लेखक, पत्रकार और सा­माजिक कार्यकर्त्ता लगभग 1150 किलोमीटर पैदल चलते हैं। छानी-खरीकों में’ इसी यात्रा में शामिल लेखक की लगभग एक माह की भागीदारी का जीवन्त, चित्रोमय और विश्लेषणपरक वृत्तान्त है। यह यात्रावृत्त भी है और पहाड़ का सामाजिक अध्ययन भी, जिसमें लेखक ख़ासतौर पर उत्तराखंड के उन ग्रामीण अंचलों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है, जिनके बारे में न हम जानते हैं, न सुनते हैं। लेखक उमेश पंत ने इस यात्रा में लगभग 500 किलोमीटर की यात्रा की। बाद में उस यात्रा पर किताब लिखी- छानी-खरीकों में: जहां रास्ता नहीं होताराजकमल से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है चंदन डांगी ने, जो ह्यूंडई कंपनी में कार्यकारी निदेशक हैं। आइये टिप्पणी पढ़ते हैं और इस यात्रा के आनंद में शामिल होते हैं- मॉडरेटर 

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    “छानी खरीकों में जहां रास्ता नहीं होता” शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक को पढ़ने का मौका मिला—बेहद खुशी हुई, जैसे अपनी ही किसी पुरानी यात्रा से फिर मुलाकात हो गई हो।
    मैं पहली बार 2004 में सम्पन्न हुई चौथी अस्कोट-आराकोट अभियान यात्रा से जुड़ा था। तब करीब एक हफ्ते तक ही चल पाया—कहीं गाड़ी से, तो कहीं पैदल। उस समय कुछ भी लिख नहीं सका। पाँचवीं यात्रा में 16 दिन तक चला, फिर भी कलम नहीं चल पाई। छठी यात्रा, यानी 2024 में, लगातार 32 दिन पैदल चलने का अवसर मिला, लेकिन तब भी किताब तो दूर, उद्यमिता पर लिखने का सपना भी ठीक से साकार नहीं कर पाया।
    इन यात्राओं ने मुझे सैकड़ों लोगों से जोड़ा—यात्री, गाँववासी, कामगार, उद्यमी, विद्यार्थी, काश्तकार, जुझारू महिलाएं। कहीं यायावर मिले, तो कहीं निर्भीक पत्रकार। और सबसे बड़ी बात—ऐसे मनीषियों से साक्षात्कार हुआ, जिन्होंने सच और आम लोगों के हक़ की लड़ाई लड़ने की ताक़त दी।
    यात्रा-वृत्तांत लिख चुके अनेक साथियों को पढ़ा है, लेकिन उमेश पंत की इस किताब को पढ़ते हुए बार-बार यही लगा- यह तो वही है, जो हमने साथ चलते हुए देखा, सुना और महसूस किया। फर्क बस इतना है कि उमेश ने उन अनुभवों को शब्दों में ढाल दिया है। और सच कहूं, उन्हें पढ़ना ऐसा आनंद देता है, जैसे चक्रवृद्धि ब्याज—हर बार पढ़ने पर अनुभव और गहरा हो जाता है।
    यात्रा के दौरान हम अक्सर एक-दूसरे से कहते थे- “जो देखो, उसे लिखो।” कई साथियों ने हामी भी भरी, लेकिन सबसे पहले इस युवा लेखक ने ही उन धड़कनों, बोलियों, लोगों की सादगी, श्रमिकों के पसीने की गंध, और पहाड़ी फसलों तक को अपनी किताब में दर्ज कर दिया। और फिर 2026 के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में उसका लोकार्पण—यह अपने आप में एक प्रेरक उदाहरण है।
    किताब पढ़ते-पढ़ते कई बार ऐसा लगा जैसे मैं फिर उसी यात्रा में लौट गया हूँ। कहीं यात्रा गीत कानों में गूंजने लगते हैं, तो कहीं खुद गुनगुनाने लगता हूँ। माथे पर पसीने की बूंदें महसूस होती हैं, तो कभी इंटर कॉलेज की छात्राओं की रंग-बिरंगी रिबन वाली चोटियां तितलियों की तरह आंखों के सामने उड़ने लगती हैं।
    पाणा गांव की सभा पढ़ते-पढ़ते मैं अचानक विरथी गांव की बसंती बहन की छानी में पहुंच जाता हूँ। बारिश का वर्णन आता है, तो साथी यात्री को संभालने के लिए जैसे खुद खड़ा हो जाता हूँ। गेहूँ के गट्ठरों से दबी गर्दन वाली बहनों के कानों की बालियां देखते-देखते अचानक मन करता है कि मोबाइल निकालकर तस्वीर खींच लूं।
    लोहार की भट्टी से उठता काला धुआं जब आंखों के सामने आता है, तो आंखें नम हो जाती हैं। ऐसे में पुष्पा पूछ बैठती है—“अब किस बहन की याद आ गई?”
    सच कहूं, कई बार तो किताब बंद करके बस चुपचाप बैठ जाना पड़ता है।
    किताब में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें हमने यात्राओं के दौरान साथ जिया था। लेकिन जिस कलात्मकता और संवेदनशीलता से उमेश ने उन्हें शब्दों में पिरोया है, वह काबिल-ए-तारीफ है।
    अपनी पहली ही अस्कोट-आराकोट यात्रा को पुस्तक का रूप देने वाले शायद वे पहले युवा लेखक हैं। अक्सर लोग पहली यात्रा को बस एक अनुभव कहकर छोड़ देते हैं, लेकिन यहाँ लेखक की कलम में एक अलग ही दमखम दिखाई देता है।
    यात्रा के दौरान मैंने उमेश को एक एक्टिविस्ट के रूप में जाना था, लेकिन इस पुस्तक को पढ़कर उनके भीतर की गहरी संवेदनशीलता भी समझ में आई। हाँ, कुछ प्रसंग छूटे हैं—जो स्वाभाविक भी है। और कुछ जगहों पर गांवों की झलक वैसी नहीं है जैसी वास्तव में होती है—लेकिन पहाड़ में बचपन बिताने के कारण उनका दृष्टिकोण अधिकतर सच्चाई के बहुत करीब ही लगता है।
    लेखक उमेश पंत नवीन पंगती के कैमरे से
    पूर्व नियोजित संकल्प के साथ चले गए उमेश पंत के 500 किलोमीटर की पैदल यात्रा, इन 252 पन्नों में सिमटकर एक ऐसी कृति बन गए हैं, जो किसी भी पाठक को चलने, देखने और समझने की प्रेरणा देती है।
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