पिछले दिनों दिल्ली रज़ा न्यास द्वारा ‘युवा’ का आयोजन किया गया। जिसमें लेखकों और शहरों के रिश्तों को लेकर पर्चे पढ़े गये। इस दौरान युवा लेखिका प्रज्ञा विश्नोई ने कृष्णा सोबती की दिल्ली पर यह दिलचस्प पर्चा पढ़ा। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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“हिम्मत चाहिए साहिब, तरक़ीब और तरतीब, फिर ख़ुदा के फ़ज़ल से तक़दीर। इन तीनों का जोड़ बस दिल्ली में मुमकिन है।”
-कृष्णा सोबती
पुस्तक : ‘अभी दिल्ली दूर है’ से
अक्सर हिंदी साहित्य से गहराई से परिचित न होने के कारण युवा वर्ग के एक बड़े हिस्से की यह शिकायत रहती है कि किसी भारतीय शहर को साहित्य में इस कदर अमर नहीं किया गया कि किसी उपन्यास अथवा कहानी में उसके विवरण की सुगंध के बल पर कोई अनजान पाठक उसके मोहपाश में बँध जाए। अपने कॉलेज के दिनों में मैं भी ऐसा ही कुछ सोचती थी (हालांकि मालगुड़ी डेज और रस्किन बॉन्ड की कहानियों के कारण मालगुड़ी नामक काल्पनिक कस्बे और पहाड़ों की मोहना से मैं बचपन से ही परिचित थी।) पर उन दिनों मुझ सरलमति ने धर्मवीर भारती जी की गुनाहों के देवता में इलाहाबाद का विवरण नहीं पढ़ा था तो आशा करती हूँ कि सम्मानित श्रोतागण मेरी इस भूल को क्षमा करेंगे।)
मेरा घर कानपुर में है (जी हाँ, वही अपना मण्डी खुली बजाजा बंद, झाड़े रहो कलेक्टरगंज वाला कानपुर) सो अब आगे यह सत्र कैसा चलेगा इसका अनुमान आप अभी से लगा सकते हैं। मेरा घर कानपुर में है, और अपने जीवन के आरंभिक ग्यारह वर्ष मैंने मध्य प्रदेश में बिताये हैं। पर तीन वर्ष की आयु में जिस स्थान की मैंने यात्रा की, जो एक तरह से मेरे जीवन की पहली ट्रिप थी, वो इंद्रप्रस्थ उर्फ़ दिल्ली उर्फ़ देहली नामक नगर था। सो दिल्ली के लिए मेरे मन में एक सॉफ्ट कार्नर ने जन्म ले लिया। फ़िर उम्र बढ़ी, और तरुणाई आयी। और जब मैं बारह वर्ष की थी, तभी आया एक धारावाहिक- धरती का वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान। यदि मेरे हमउम्र साथी यहाँ मुझे सुन रहे हैं, तो वे मेरी इस बात की तस्दीक कर सकते हैं कि आज के समय में किशोर किशोरियों के मन में जो स्थान kpop गायकों, जस्टिन बीबर, one डायरेक्शन नामक संगीत बैंड के गायकों का होता है, वही स्थान २००६ के वर्ष में हम किशोरियों ने दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान को दे रखा था। सो जिस दिल्ली शहर का अर्थ मेरे लिए बचपन में अप्पू घर हुआ करता था, वही दिल्ली मेरे लिए एक रूमानी शहर बन गया. नौकरी के चलते मेरा स्थानांतरण दिल्ली शहर में हुआ पर अब तक दिल्ली शहर का सारा रूमान मेरे मन से उतर चुका था। अब दिल्ली सुनते ही जो तस्वीर बनती उसमें केवल AQI, ट्रैफिक जैम, बारिश होने पर सड़कों पर भरा पानी नज़र आता, अप्पू घर या पृथ्वीराज चौहान के साहसिक कारनामे नहीं।
“गहराता जाड़ा लाल क़िले की महराबों को फलाँग जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर पसर गया। रज़ाइयों, दुलाईयों और निहालियों के ढेर। हवा में झिलमिलाती पतली धूप। रंग-बिरंगी रज़ाइयों में पड़ते डोरे मानो दिल्ली के बाशिन्दों पर आड़ी-तिरछी खींचने लगे।” फ़िर कभी कहीं आप कृष्णा सोबती जी के १९९२ में प्रकाशित उपन्यास दिलोदानिश दिल्ली की ये पंक्तियाँ पढ़ते हैं और आपको एहसास होता है कि दिल्ली का जादू तो अब भी वहीं का वहीं ठहरा हुआ है, बस आपके चश्मे पर ही स्मॉग की परत चढ़ गयी थी।
दिल्ली की एक ख़ास बात है कि दिल्ली में स्थान और समय लीनियर तर्ज पर नहीं चलते। चांदनी चौक में जिस समय पराठे वाली गली में दिल्ली यूनिवर्सिटी के युवा छात्र छात्राएं मक्खन वाले पराठे के साथ अपनी सेल्फी खींच रहे होते हैं, उसी पल वहाँ दरीबा कालां में मिर्ज़ा ग़ालिब का एक जासूस दोस्त एक तवायफ़ के क़त्ल और एक कठपुतली के खेल के बीच की कड़ी को खोज रहा होता है। फ़िरोज़शाह कोटला में जब एक लड़का लाइव व्लॉग बनाता है, उसी वक़्त वहाँ वज़ारत-ए-जिन्नात अपने मानने वालों की दरख़्वास्त पढ़ रही होती है। जो दिल्ली गुनाहों के देवता के इलाहाबाद जैसा रूमान रच सकती है, किसी राजनैतिक थ्रिलर का मकड़जाल खुद में सहेज सकती है, गेब्रियल गार्सिया मार्केस के बुएंदिआ जैसा जादुई यथार्थ बुनकर बिखरा सकती है, वह दिल्ली अपने आप में एक कोस्मोलॉजी है।
कृष्णा जी की दिल्ली न बादशाहों की दिल्ली है, न ही राजनेताओं की। कृष्णा जी की पुरानी दिल्ली घर के मर्दों के काम पर चले जाने के बाद अपने दुपट्टों को परे रख स्त्रियों के कहकहों से गूंजता आँगन है, चांदनी चौक की किसी दुकान पर खुरचन की मिठास के बीच किसी शरणार्थी मांगणियार की कमायचा पर बजते कुरजां लोकगीत का कसैलापन है। इस दिल्ली में युवा आज़ादी के बचकाने सपने और चाहते हैं, वहीं प्रौढ़ पतझड़ से नरसंहार, युद्ध, विभाजन की विभीषिका को अपनी आँखों की खोह में गहरे समेटे का शून्य भी। दिल्ली के बारे में कृष्णा जी लिखती हैं: “यह शहर कई सदियों की जिद से बना है।” दिल्ली न कभी पूरी तरह से इधर की हुई, न कभी उधर की। न दिल्ली में किसी तरुणी सी सरल निश्छलता रही, न ही किसी प्रौढ़ की सब कुछ देख लेने के बाद जन्मी विषादपूर्ण अन्यमनस्कता। दिल्ली के अधर चावड़ी बाज़ार के सुरमे से अँधेरे कोठों के राज़ छिपाकर भी जामा मस्जिद की सीढ़ियां चूमती सहर से पाक रहे।
कृष्णा जी के अनुसार: “यहाँ हर आदमी थोड़ा शहंशाह है और थोड़ा फ़क़ीर।” दिल्ली जितनी सम्राट पृथ्वीराज चौहान की है, उतनी ही कविराज चंदबरदाई और आल्हा गाने वाले बुंदेले हरबोलों की भी। जितनी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की है, उतनी ही ग़ालिब की भी।
“दिल्ली में हर आदमी पहले पूछता है तुम किसके हो।” सोबती जी कहती हैं, पर दिल्ली खुद कभी किसी की नहीं होती। दिल्ली किसी कलाकार की muse बनकर इतराने वालों में से नहीं, बल्कि दिल्ली के कभी नाज़ुक़, कभी खुरदुरे हाथों ने न जाने कितने ही मनुष्यों, सत्ताओं, संस्कृतियों, कलाओं और कलाकारों को गढ़ा है। दिल्ली किसी भी मालिकाना हक़ और अधिकार क्षेत्र से परे है, बिल्कुल सोबती जी की मित्रो मरजानी की मित्रो की तरह।
कृष्णा सोबती जी के लेखन और व्यक्तित्व की ही तरह दिल्ली को आप किसी एक शब्द, चिह्नः, परिभाषा में बाँध नहीं सकते। दिल्ली न नई है, न पुरानी। दिल्ली तो बस दिल्ली है। अभी इसी क्षण हर कालखंड जैसे पूरे जीवन को खुद में समेटने वाली दिल की धड़कन की तरह।

