रविन्द्र कुमार अमेरिका स्थित ‘ओरेगन विश्वविद्यालय’ के इतिहास विभाग में ‘आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास’ के शोध छात्र हैं।उन्होंने इस लेख में जो सवाल उठाए हैं, जिस तरह उनका विश्लेषण किया है वह प्रत्येक ज़िम्मेदार नागरिक को विचलित करता है और यदि हम विचलित नहीं होते हैं, हमें सब कुछ सामान्य लगता है तो हमें ठहर कर सोचना चाहिए। प्रस्तुत है ‘थप्पड़शाही’– अनुरंजनी
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थप्पड़शाही
मेरे लिए सोशल मीडिया, विशेषकर फ़ेसबुक, एक समानांतर ब्रह्मांड की तरह है। देश–विदेश में क्या घट रहा है, कौन-सा प्रोफ़ेसर या साहित्यकार कौन-सी किताब जारी कर रहा है, सामाजिक न्याय का कौन-सा नया विमर्श बाज़ार में आया है, किस गुरुजी को क्या पुरस्कार मिला, किस संपादक को गालियाँ दी जा रही हैं, किस कवि ने शराब पीकर हुड़दंग मचाया, और कौन-सा सम्मानित कवि औरतों की फ़ेसबुक वॉल से बिना इजाज़त उनकी तस्वीरें साझा कर रहा है—सब कुछ यहीं से पता चलता है।
पिछले दो दिनों से इसी समांतर ब्रह्मांड में एक विदेशी मूल की हिंदी शोधकर्ता का ‘एंट्री बैन’ होना चर्चा का विषय बना हुआ था। मैं उनकी किताब लाइब्रेरी से निकालकर दोबारा कुछ अध्याय पढ़ ही रहा था कि एक और ‘लफड़ा’ खुल गया। हिंदुस्तान में जहाँ हर दिन कहीं न कहीं सत्ता, पद और प्रतिष्ठा के नशे में चूर लोगों की हरकतें छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स के रूप में वायरल होती रहती हैं, वहीं कल ही राजस्थान से एक नया वीडियो आया। वीडियो में एक एसडीएम साहब पेट्रोल पंप पर कर्मचारियों से उलझ पड़े और थप्पड़ मारते हुए बोले—“मेरी गाड़ी में पहले पेट्रोल क्यों नहीं डाला?” अपनी आवाज़ का ऐक्सेलरेटर दबाते हुए आगे कहा—“मैं इस इलाके का एसडीएम हूँ!” दूसरा कर्मचारी बीच में आया तो दोबारा बहस हो गई, और एसडीएम साहब ने बिना किसी झिझक के कर्मचारी की माँ-बहन को याद करते हुए उसे भी थप्पड़ रसीद कर दिया। जवाब में, न्यूटन के तीसरे नियम का पालन करते हुए, कर्मचारी ने भी उन्हें थप्पड़ जड़ दिया। वीडियो आग की तरह फैल गया। बाद में एसडीएम की पत्नी ने कर्मचारी पर छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करवाई—हालाँकि सीसीटीवी में ऐसा कुछ दिखा नहीं। सोशल मीडिया पर एक और चिट्ठी भी तैर रही है, जो इतनी भद्दी हैंडराइटिंग और वर्तनी की अशुद्धियों से भरी है कि शक होता है, कहीं वह सच में एसडीएम साहब ने ही तो नहीं लिखी।
जैसा कि सोशल मीडिया पर होता है, लोग इस पर टूट पड़े और एसडीएम साहब का मज़ाक उड़ाने लगे। किसी ने लिखा—“जब कर्मचारियों ने पहले सर्विस नहीं दी तो साहब ने प्यार से याद दिलाया, ‘ओए! मैं यहाँ का एसडीएम हूँ।’ बदतमीज़ स्टाफ ने सैल्यूट ठोके बिना बहस की… तो साहब ने आदरपूर्वक उन्हें थप्पड़ मार दिया।”
ख़ैर, भारत जितना बड़ा देश है, यह सब अब रोज़मर्रा की बातें बन चुकी हैं। यह न पहला मामला है, न आख़िरी। कभी किसी वीडियो में सफेद खद्दर पहने कोई नेता बस ड्राइवर पर पिस्टल तानता दिखता है, तो कहीं कोई अफ़सर ट्रैफिक रोककर अपनी वीआईपी गाड़ी निकाल लेता है। किसी अधिकारी की पत्नी जी सरकारी जीप के बोनट पर बैठकर केक काटती हैं, तो कोई ‘सिंघम’ की एंट्री मारते हुए रील बनाता है। कोई ‘औचक निरीक्षण’ का वीडियो डाल रहा है, तो कोई ‘मोटिवेशनल’ भाषण का; और कोई सिलबट्टे की तस्वीर डालकर पूछ रहा है—“आपके यहाँ इसे क्या कहते हैं?”
लोग टाइप करते हैं—“हमारे यहाँ इसे मिर्च पीसने का सिलबट्टा कहते हैं।” ख़ैर, मेहनत करने वालों की हार नहीं होती वाले बाबाओं जैसे अफ़सरों से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, मगर ये थप्पड़-जूता चलने वाले वाक़ये समाज के लिए थोड़ी मुश्किल ज़रूर खड़ी करते हैं।
अब सवाल यह उठता है—समाज इस दिशा में क्यों भाग रहा है? मेरे ख़याल से यह कोई नई बीमारी नहीं है। यह उस समानांतर ब्रह्मांड का नतीजा है जिसकी नींव सस्ते इंटरनेट और हर आदमी के ‘ब्लॉगर’ बन जाने से पड़ी। इसने हमें हमारा असली चेहरा दिखा दिया है। हम सत्ता-पूजा और अहंकार से भरे हुए समाज हैं, और यह हमारे सामाजिक डीएनए में बहुत गहराई तक मौजूद है—इंटरनेट ने बस उसे कैमरे के सामने ला दिया है।
क्या नेता ख़राब हैं? अफ़सर बेईमान हैं? सिस्टम गंदा है? सिनेमा अश्लील है? — नहीं। असल में “फ़लाँ पार्टी, जाति, भाषा, प्रदेश वाले ख़राब हैं, हम तो ठीक हैं” वाला सिंड्रोम ही असली बीमारी है। मेरा सवाल बस इतना-सा है कि जो इतने सारे ‘ख़राब’ लोग हैं, क्या वे आसमान से टपके हैं? नहीं। ये सब हमारे ही समाज से निकले हैं।
राजनेता, अफ़सर, सेलिब्रिटी—ये किसी मंगल ग्रह से नहीं आए। ये उसी समाज के प्रतिबिंब हैं जिसमें हम रहते हैं। जैसा समाज होगा, वैसा ही नेतृत्व और वैसा ही व्यवहार सामने आएगा।
अमेरिका बनाम भारत
मैं इस बात को कुछ ऐसे शुरू करूँगा—मैं अमेरिका की एक सार्वजनिक यूनिवर्सिटी में इतिहास में पी-एच.डी. कर रहा हूँ। मैं इस देश का कोई cultural ambassador नहीं हूँ, और न ही यहाँ दूध-दही की नदियाँ बहती हैं। अमेरिकी समाज की अपनी जटिलताएँ हैं। मगर जो कुछ मैंने इन तीन वर्षों में देखा और महसूस किया, वह मेरे लिए एक बिल्कुल नया अनुभव रहा।
हर रोज़ की तरह एक सुबह मैं कैंपस की ओर जा रहा था। रास्ते में देखा—हमारी यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट (जो भारत में कुलपति या निदेशक के समान पद पर होते हैं) ईयरफ़ोन लगाए, साधारण कपड़ों में, पैदल ऑफिस जा रहे थे। न कोई बॉडीगार्ड, न तामझाम, न आगे-पीछे गाड़ियों का काफ़िला, जैसे कोई आम इंसान दफ़्तर जाता है। मेरे लिए यह दृश्य अचंभे से कम नहीं था। मैंने चुपके से उनकी तस्वीर खींचकर भारत में अपने कुछ दोस्तों को भेज दी। दोस्त हैरान रह गए—क्योंकि भारत में किसी यूनिवर्सिटी वाइस-चांसलर का आगमन मानो किसी छोटे-मोटे शाही जलसे से कम नहीं होता। बड़ी गाड़ी, लाल बत्ती (भले ही अब सिर्फ़ कागज़ों पर प्रतिबंधित), गार्डों के सलाम, और स्वागत में बिछा लाल कालीन! केवल वाइस-चांसलर ही क्यों—हमारे यहाँ किसी भी पदाधिकारी, नेता, या बड़े आदमी का आगमन जिस अंदाज़ में होता है, लगता है जैसे कोई बादशाह तशरीफ़ ला रहे हों। यहाँ (अमेरिका में) मैंने कई बड़े अफ़सरों, पूर्व नौकरशाहों और नेताओं को बेहद सहजता से घूमते, अपने कुत्ते टहलाते या पार्क में दौड़ लगाते देखा है। मतलब साफ़ है—यह फ़र्क़ सामाजिक से ज़्यादा सांस्कृतिक है। यूरोप और अमेरिका में सादगी को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है।
हाल ही में पूरी दुनिया ने एक दृश्य देखा—नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रुटे को नया गठबंधन बनने की सूचना देने राजा से मिलने जाना था। उन्होंने बख्तरबंद कार छोड़ दी और साइकिल उठाकर महल तक पहुँचे—और वहाँ पहुँचकर साइकिल को ताला लगाना भी नहीं भूले! ज़रा सोचिए, कोई भारतीय मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री आवास से राजभवन तक साइकिल से जाए तो क्या होगा? यह ख़बर नहीं, सनसनी बन जाएगी। कुछ महीने पहले जब मैं भारत में था, मुझे दिल्ली में पीएमएमएल (नेहरू मेमोरियल) जाना था। उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं Rapido वाले का इंतज़ार कर रहा था—वह ठीक सामने की सड़क के उस पार खड़ा था। बस एक गोल चक्कर पार करना था, मगर वह बेचारा आधे घंटे तक भीगता रहा क्योंकि उधर से किसी “माननीय” का काफ़िला जा रहा था, और दिल्ली पुलिस ने पूरी सड़क पर बैरिकेडिंग लगा रखी थी। दोनों ओर फँसे लोग लोकतंत्र को दिल से धन्यवाद दे रहे होंगे।
मुझे नहीं पता कि अमेरिका में सड़कें कभी ब्लॉक होती हैं या नहीं, पर पिछले तीन सालों में मैंने एक बार भी ऐसा नहीं देखा। एक और छोटा उदाहरण—अमेरिका के सभी पूर्व राष्ट्रपतियों को, जिनमें जो बाइडेन भी शामिल हैं, अक्सर अवकाश के दिनों में बीच पर साइकिल चलाते हुए देखा जा सकता है। यहाँ यह कोई हैरत की बात नहीं बल्कि उल्टा है—अगर कोई नेता जनता के बीच सादगी से न दिखे, तब लोग हैरान होते हैं। इसके उलट भारत में सादगी ख़बर बन जाती है। मैं IIT से लेकर BHU तक कई विश्वविद्यालय परिसरों में गया हूँ। लगभग हर जगह उच्च पदों पर बैठे लोग एक अदृश्य प्रोटोकॉल ओढ़े हुए हैं—कपड़ों से लेकर गाड़ी तक, हर चीज़ में एक ठसक है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर का सरकारी आवास किसी आम घर जैसा नहीं, बल्कि एक महलनुमा कोठी है, जिसके द्वार पर मोटे अक्षरों में ‘वाइस-चांसलर निवास’ लिखा है—मानो उस साइनबोर्ड से ही घर को बिजली का कनेक्शन आता हो। भारत में किसी कुलपति या कलेक्टर को पैदल चलते, या अपनी गाड़ी खुद चलाते देख लेना किसी चमत्कार से कम नहीं। कॉलेज कैंपसों में भी ‘मास्टर लोग’ गाड़ी से आना-जाना ही अपने रुतबे की पहचान मानते हैं।
नोबेल विजेता की सादगी और प्रोफ़ेसर की साइकिल
सादगी एक ऐसा गुण है जो दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में सामान्य माना जाता है, मगर भारत में यही असाधारण बन जाता है। कुछ समय पहले एक मशहूर पत्रकार ने नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन के घर की तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट की और लिखा – “देखो, ये कितने साधारण तरीके से रहते हैं।” इसके बाद उनके अनुयायियों ने कमेंट बॉक्स में “वाह!”, “उफ़्फ़!”, “ले सादगी, दे सादगी” जैसे भावनात्मक उद्गारों की झड़ी लगा दी। मेरा मन हुआ कि मैं भी टिप्पणी कर दूँ—“आप क्या चाहते हैं कि वो हैरी पॉटर वाले किसी जादुई हवामहल में रहें?” भारत में ऐसा घर, जहाँ अमर्त्य सेन रहते हैं, करोड़ों लोगों के लिए सपना है—जहाँ लाखों लोग अब भी फ़ुटपाथों, फ़्लाईओवरों के नीचे, झुग्गियों में या नालों के पास रहने को मजबूर हैं, वहाँ एक प्रोफ़ेसर का साधारण मगर आरामदायक घर क्या सच में ‘सेलिब्रेट’ करने लायक बात है?
मुझे सचमुच आश्चर्य होता है कि हमें किसी महान वैज्ञानिक के घर के सोफे ‘साधारण’ क्यों लगते हैं या यह क्यों अचरज की बात हो जाती है कि कोई प्रोफ़ेसर साइकिल से लैब जाता है। होना तो यह चाहिए कि यह सब बिल्कुल सामान्य लगे। लेकिन हमारे समाज में एक प्रोफ़ेसर का साइकिल चलाना या नोबेल विजेता का बिना तामझाम के रहना चौंकाने वाली ख़बर बन जाती है। असल में हमने ‘साधारण’ को ‘असाधारण’ की श्रेणी में डाल दिया है। उदाहरण के लिए—इस साल के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. Robson, जो मेलबर्न यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं, उन्होंने पुरस्कार मिलने के अगले ही दिन अपनी कक्षा में पहले वर्ष के छात्रों को पढ़ाया। ज़रा सोचिए, अगर यही भारत में हुआ होता तो? पॉडकास्ट, इंटरव्यू, माल्यार्पण समारोह, सम्मान सभाएँ, और कुछ लोग उनकी जाति खोजकर पोस्ट डाल देते—“देखो, हमारे समाज का गौरव बढ़ाया!”
मूल समस्या कहीं ज़्यादा गहरी है। भारत की सामाजिक संरचना ऐसी रही है कि हम एक साथ व्यक्ति-पूजक भी हैं और शक्ति-पूजक भी। जिसे थोड़ा-सा भी ऊँचा दर्जा मिल गया, उसे हम भगवान बना देते हैं और जो हमसे नीचे दिख गया, उसे जूते की नोक पर रखना अपना अधिकार समझते हैं। इस प्रवृत्ति के नतीजे हर क्षेत्र में दिखते हैं। सिनेमा को लीजिए—एयरपोर्ट पर कोई फ़िल्म स्टार दिख जाए तो लोग बेकाबू होकर दौड़ पड़ते हैं। उनके कट-आउट्स पर दूधाभिषेक आम बात है। राजनीति में तो हालत और भी रोचक है—किसी 25 साल के ‘नवयुवा’ नेता के भी लोग ऐसे पैर छूते हैं जैसे किसी चक्रवर्ती सम्राट के हों।
साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह मानसिकता मौजूद है। गुरुजन के चरण स्पर्श परंपरा का हिस्सा हैं, सम्मान स्वाभाविक है, पर जब वही ‘महान साहित्यकार’ मंच से उतरकर चौकीदार या कनिष्ठ सहकर्मी से बात करने में हिचकते हैं, तो असली चेहरा दिख जाता है। हम व्यक्ति की पूजा करते हैं, उसके कार्य या मानवीय गुणों की नहीं। भारत के अधिकांश गुरुजीयों के घुटने उनके चेलों ने छू-छूकर घिस दिए हैं, मगर वही प्रोफ़ेसर किसी जूनियर से सीधे मुँह बात नहीं करेंगे। इसके उलट अमेरिका में मेरे विभाग के जिन प्रोफ़ेसरों के पास दुनिया की शीर्ष यूनिवर्सिटियों की डिग्रियाँ और पुरस्कार हैं, वे क्लास के बाद खुद कॉफ़ी की लाइन में खड़े मिल जाते हैं और आप उन्हें उनके पहले नाम से बुला सकते हैं —“हाय माइक, हाय बिल, हाउ आर यू?”
मगर भारत में गुरुजी के नाम से पहले ‘सर’, और उसके बाद ‘जी’ जोड़ना एकदम अलिखित नियम है। यही व्यक्ति-पूजा आगे चलकर सत्ता-पूजा में बदल जाती है। सिविल सर्विसेज़ को ही लीजिए—यह नौकरशाही कम, नौकरशाही झाड़ने का खेल ज़्यादा लगती है। समाज ने उन्हें देवता का रुतबा दे दिया है। कहते हैं, सत्ता ख़ुद बुरी नहीं होती, उसे थामने वाला इंसान उसका चरित्र तय करता है। हमारे यहाँ सत्ता को ‘सेवा’ नहीं, ताक़त का प्रतीक माना जाता है। इसलिए नौकरशाह का बेटा ‘वीआईपी’ कहलाता है, और मंत्री का ड्राइवर भी मोहल्ले में रौब जमाता है। इस बीमारी की जड़ें भले ही ब्रिटिश राज की औपनिवेशिक व्यवस्था से जुड़ी हों, मगर असली खाद हमारे अपने समाज ने ही दी है—जहाँ ताक़त की आराधना, सादगी से कहीं ज़्यादा सम्मान पाती है।
तड़-तड़ सैल्यूट
परिवार और समाज की शक्ति-पूजक और व्यक्तिपूजक मानसिकता से निकलकर जब युवा यूपीएससी (IAS/IPS बनने) की तैयारी करते हैं, तो उनके अवचेतन में क्या चलता है — सेवा का आदर्श या सत्ता का सुख? ज़रा यूट्यूब पर जाइए, आपको कई मशहूर UPSC गुरुओं के लेक्चर और शॉर्ट क्लिप्स मिल जाएंगे। एक प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान के गुरुजी अपने एक व्याख्यान के दौरान बड़े गर्व से कहते हैं — “नौकरी तो केवल एक ही है — IAS, बाकी सब तो नौकरियाँ हैं!” यही गुरुजी अपने दूसरे क्लिप में कहते हैं “जब आप मसूरी ट्रेनिंग के लिए जाएंगे न… तब देखना ‘तड़-तड़ सैल्यूट’! लोग आपकी गाड़ी का दरवाज़ा खोलने के लिए भागेंगे!” सवाल है, मास्टरजी, लोग क्यों भागेंगे? और किसलिए?
एक और ‘मास्टर’ हैं जो किसी दूसरी ही दुनिया में रहते हैं। उनके चेले तो ऐसी रील्स बनाते हैं, जिनमें उनकी आँखों से लेज़र लाइट निकलती है और पीछे गाड़ियों का काफ़िला दौड़ रहा होता है — मानो कोई सुपरहीरो ब्यूरोक्रेट जन्म ले रहा हो! क्यों भाई मास्टर लोगों, (मेरा मतलब है अलाना सर, फलाना सर) — आपको क्यों लगता है कि बाकी सारे काम ‘काम’ नहीं हैं? बाकी नौकरियाँ सिर्फ़ नौकरियाँ हैं? आप अपने छात्रों को यह क्यों नहीं बताते कि वे जनता के नौकर बनने जा रहे हैं — Public Servants, न कि Public Masters?
आप खुद सोचिए, जब मास्टर लोग ही ऐसा सपना बेच रहे हैं, तो विद्यार्थी किस उद्देश्य से अफ़सर बनना चाहेंगे? ज़ाहिर है, उनमें से जो अफ़सर बनकर निकलेंगे, उनका ध्यान जनसेवा पर कम और अपने आगे सबको झुकाने पर ज़्यादा होगा। यही वजह है कि कोई एसडीएम साहब पेट्रोल पंप पर किसी को तमाचा मारने में संकोच नहीं करते — क्योंकि बचपन से उनके दिमाग़ में यह भरा गया है कि “बेटा, बड़ा आदमी बनो ताकि लोग तुम्हारे आगे सिर झुकाएँ।”
जनसेवा, समानता और कर्तव्यनिष्ठा जैसी बातें उनके लिए कोचिंग के एथिक्स पेपर तक ही सीमित रह जाती हैं।
मैं ऐसे कितने ही युवाओं को जानता हूँ जो अपना घर-बार, खेत-खलिहान तक बेचकर कोचिंग ज्वॉइन करते हैं — क्योंकि ‘फलाँ गुरुजी’ वहाँ ‘लाल बत्ती का महत्व’ सिखाते हैं।
पर सवाल यह है — क्यों पढ़ना है?
क्यों बनना है IAS?
क्योंकि गुरुजी ने कहा है —
“नौकरी तो केवल एक ही है…”
यह समस्या सिर्फ़ नौकरशाही तक सीमित नहीं है। हमारे समाज में तथाकथित बाबाओं और स्वयंभू गुरुओं की भरमार है, जो अंधभक्तों को मूर्ख बनाते हैं। पर सच कहें तो दोष उनसे ज़्यादा भक्तों का है, जो आँख मूँदकर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं।
कोई ‘चमत्कारी तेल’ बेचता है, कोई ‘नाम लिखने से नौकरी लगने’ का दावा करता है — और करोड़ों की भीड़ उमड़ पड़ती है। साफ़ है, सपनों और अंधविश्वास की माँग इतनी ज़्यादा है कि इन बाबाओं की ‘सप्लाई’ कभी कम नहीं होगी।
जड़ें कहाँ हैं?
अधिकांश लोग इन हालातों के लिए अंग्रेज़ों की मैकालेनुमा प्रशासनिक विरासत को दोष देते हैं। यह सच है कि ब्रिटिश हुकूमत ने पुलिस और प्रशासन को रौब झाड़ने वाली मशीन बनाकर छोड़ा, और औपनिवेशिक शासन ने भारत के समाज में कई ऐसी तब्दीलियाँ की जिनकी छाप आज तक दिखाई देती है मगर केवल ब्रिटिश उपनिवेश को दोष देकर पल्ला झाड़ लेना बहुत आसान काम होगा।
लेकिन अगर ज़रा परतें हटाकर अपने समाज के भीतर झाँकें, तो हमें एक और कड़वा सच मुँह बाए मिलेगा और वह यह कि हमारी समस्याओं की जड़ केवल औपनिवेशिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि भारत की अपनी सदियों पुरानी जातिगत और पदानुक्रमित मानसिकता में गहराई से दबी हुई है। भारतीय समाज मूल रूप से ही ऊँच-नीच पर टिका रहा है—एक वर्ग को विशेष अधिकार, दूसरे को नीचा दर्जा। राजा-प्रजा, गुरु-शिष्य, ऊँच-नीच की धारणाएँ इतनी गहराई से हमारे भीतर बैठी हैं कि हर व्यक्ति अनजाने में एक ‘औकात-मीटर’ लेकर चलता है। परिणाम यह है कि हमारा सम्मान और व्यवहार सामने वाले की सामाजिक हैसियत तौलकर तय होता है।
आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी देश के सैकड़ों गाँवों से दलितों के साथ भेदभाव की खबरें आती हैं। कई जगहों पर आज भी नाई बाल काटने से डरते हैं, क्योंकि लोग उनका हुक्का-पानी बंद कर देंगे। ढाबों पर अलग चाय के कप, मंदिरों में प्रवेश वर्जित, स्कूलों में बच्चों को अलग बिठाना—भले यह सब अब उतनी खुली बेशर्मी से न हो, लेकिन ऊँच-नीच की भावना आज भी मानसिकता में गहराई तक बसी हुई है।
विडंबना यह है कि जो जातियाँ ऐतिहासिक रूप से पिछड़ी रहीं, उनके भीतर भी यह भेदभाव उतना ही, बल्कि कई बार उससे ज़्यादा प्रचलित है। हर समूह अपने से नीचे किसी और को ढूँढ़ लेता है—मानो समाज का हर व्यक्ति किसी को अपने नीचे देखकर ही सुकून पाता है। यही कारण है कि हमारा सामाजिक डीएनए ऐसा बन गया है कि जिसे ज़रा भी शक्ति या पद मिल जाए, वह दूसरों पर रौब झाड़ना अपना स्वाभाविक अधिकार समझने लगता है। सत्ता की कुर्सी मिलते ही यह मानसिकता उड़ान भर लेती है—तब अफ़सर को जनता चींटी नज़र आती है और नेता को कानून खिलौना।
हम अक्सर कहते हैं—“देश के नेता भ्रष्ट हैं, सिस्टम निकम्मा है, अभिनेता समाज बिगाड़ रहे हैं।” पर ज़रा रुककर सोचिए—इन नेताओं को चुनकर भेजता कौन है? क्या हममें से ही किसी ने किसी बाहुबली या अपराधी छवि वाले उम्मीदवार को वोट देकर संसद या विधानसभा नहीं पहुँचाया? आज भारत की संसद में लगभग 44% सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं—जिनमें हत्या, अपहरण, दंगे, और महिला-विरोधी अपराध शामिल हैं। ये माननीय क्या मंगल ग्रह से आए हैं? नहीं—इन्हें तो हमने ही जिताया है।
प्रदेशों में हालात और बदतर हैं। बहुत से विधायकों का पहला परिचय ही ‘स्थानीय गुंडा’ के रूप में होता है। लेकिन हम उन्हें जाति, बिरादरी या निजी स्वार्थ के तराज़ू में तोलकर वोट देते हैं, और फिर शिकायत करते हैं कि शासन खराब है।
इसी दोहरेपन की मिसाल समाज के दूसरे क्षेत्रों में भी मिलती है। फ़िल्मों के तथाकथित ‘अश्लील’ गानों या वेब सीरीज़ के कंटेंट पर नैतिकता की बहसें होंगी, पर वही लोग रात को इन्कॉग्निटो मोड में इंटरनेट की तमाम अश्लील सामग्री चट कर जाते हैं। भारत लगातार पोर्नोग्राफी देखने वाले शीर्ष देशों में बना रहता है—‘दिन में संस्कार, रात में चमत्कार!’
जब तक दर्शक हैं, तब तक तथाकथित ‘अश्लील’ कंटेंट भी बनता रहेगा—ठीक वैसे ही जैसे जब तक हम किसी को देवता बनाकर सिर पर बिठाने को तैयार हैं, तब तक कोई न कोई हमारे कंधों पर चढ़कर सिंहासन का सुख भोगता रहेगा।
सरकार, सिस्टम, नेता और अफ़सर—ये सभी एक दर्पण हैं, जिसमें असल चेहरा हमारे समाज का ही झलकता है। अमेरिकी हास्य कलाकार जॉर्ज कार्लिन ने कहा था – “राजनेता जनता की ही पैदावार हैं; वे समस्या नहीं, समाज समस्या है।”
और अंत में थोड़ा प्रवचन
इन सबके बावजूद उम्मीद की किरणें अब भी मौजूद हैं। इस देश में आज भी ऐसे लोग हैं जो संवेदनशील हैं, बराबरी में विश्वास रखते हैं, अन्याय का विरोध करते हैं, और अपने से कमज़ोर को पहली फ़ुर्सत में धकियाने के बजाय सहारा देते हैं। अफ़सोस बस इतना है कि इनकी तादाद बहुत कम है—और उनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों की चकाचौंध में अक्सर दब जाती है। मगर बहुमत अब भी उसी मानसिकता में जी रहा है: “जैसे ही मौका मिले और सामने वाला कमजोर दिखे, उसे कुचल दो।” हमें, यानी इस समाज को, इसे बदलना होगा।
परिवर्तन की शुरुआत दूसरों से नहीं, खुद से करनी होगी। अगली बार जब कोई नेता सत्ता के नशे में आपको हथेली पर रखकर क़ानून तोड़े, या कोई अफ़सर आपका हक़ छीनकर रौब झाड़े, तो खुद से एक सवाल कीजिए— “क्या ऐसे लोगों को ताक़त कहीं मैंने ही तो नहीं दी?”
क्या हम अपने घरों में बच्चों को यह सिखाते हैं कि चौकीदार को भी उतना ही सम्मान दो जितना प्रिंसिपल को देते हो?
क्या हमने बेटा-बेटी को समझाया है कि कलेक्टर की गाड़ी को सैल्यूट करने से बड़ा काम है ट्रैफ़िक सिग्नल पर सबके साथ लाइन में लगना?
जब तक हम “तड़-तड़ सैल्यूट” और VIP ट्रीटमेंट के सपने बेचना बंद नहीं करेंगे, जब तक सादगी, बराबरी और जनसेवा को मुख्यधारा में नहीं लाएँगे, तब तक न तो सड़कों पर थप्पड़ों की गूँज थमेगी, न सत्ता के सिंहासन से अहंकार का नाद।
हमें बाहुबली बनने की ख़्वाहिश से ज़्यादा, अच्छा इंसान बनने की तमन्ना जगानी होगी। जिस दिन आम हिंदुस्तानी के मन में यह बात घर कर गई, उस दिन नेता और अफ़सर दोनों ज़मीन पर उतर आएँगे।
आख़िर सत्ता का असली मालिक जनता ही है—सिंहासन पर चाहे कोई भी बैठे, ताक़त उस में तब आती है जब लोग उसे सिर पर चढ़ा लें। इसलिए सबसे पहले खुद उस प्रवृत्ति को त्यागिए। आईने में झाँकिए—हम सबके भीतर एक न एक छोटा-सा एसडीएम या मिनी-बाहुबली छिपा बैठा है, जो मौका मिलते ही बाहर निकल आता है।

