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  • छठ के बहाने सूर्य की कथा

    आज छठ है। शाम के समय डूबते सूर्य को अर्ध्य अर्पित किया जाएगा। इस अवसर पर बीएचयू में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के शोध छात्र अविनाश कुमार राय ने सूर्य पूजा पर लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    दीपावली के उत्सव के बाद व्यक्ति पुनः अपने कामों की ओर लौट पड़ता है। वहीं बिहार व पूर्वांचल में जो व्यक्ति दीपावली पर घर नहीं आ पाता है वह छठ के लिए घर की तरफ चल देता है। यहां दीपावली के उत्सव के बाद निस्तबधता नहीं बल्कि दुगुना उत्साह हवा में बयार की तरह बहती है। छठ की तैयारी में दिन वैसे बीत जाता है जैसे माचिस की तिली कुछ ही क्षणों में जल के बुझ जाती है। गली गली में छठ मईया के गीत बजने से गांव घर मनसायन  लगता है।गलियों में दउरी- सूप बेचने वालों की जोह रहती है।पर अब कुछ लोग बांस से बने सूप न लेकर तांबे के सूप को तवज्जो दे रहे हैं जिससे इनकी भी संख्या घटी है। जिसका कारण बाजार का गणित है। जहां छठ से दो दिन पहले अलग ही रौनक रहती है। हर व्यक्ति अपने झोले में उन फलों को समो लेना चाहता है। जिन्हें छठ के सूप में जाना है। यहां से इस पर्व के उत्साह व आस्था की झलक भी  मिलती है। लोक पर्व छठ में सूर्य की मुख्य आराधना होती है।आगे के लेख में सूर्य से जुड़े कुछ पहलुओं को विस्तार से देखते है…..

    भारतीय संस्कृति के उत्स काल से ही सूर्य एक महान देवता तथा महान कवि के रूप में प्रतिष्ठित है। हमारी कल्पना में इसी सूर्य या आदित्य से भारत वर्ष के सर्वाधिक कवित्व पूर्ण देवव्यक्तित्व विष्णु का विकास हुआ है। विष्णु अपने मूल रूप में द्वादश मास के द्वादश आदित्यों में से एक हैं।विष्णुरूप सूर्य के भीतर मधुदाता रूप, कविरूप और प्रेमीरूप भारतीय मनीषा प्रारंभ से पहचानती है -कुबेरनाथ राय

    भारत में सूर्य पूजा प्राचीन समय से होती रही है। विद्वानों का मानना है कि सूर्य पूजा प्रागैतिहासिक काल में भी होती थी। सूर्य पूजा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि मिस्र आदि देशों में भी होती रही है। ऋग्वेद में सूर्य के बारे में कहा गया है कि वह एक श्वेत अश्व है जो उषा लाता है। वह अपने रथ पर सवार होकर आकाश में परिभ्रमण करता है।पर वैदिक काल तक सूर्य प्रतिमा का आविर्भाव नहीं हुआ था। रामायण तथा महाभारत में सूर्य के मानवीय स्वरूप का उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक साहित्य-संहिता , ब्राह्मण, उपनिषद, गृह्य एवं धर्म सूत्रों आदि में सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है।बाद के समय सूर्य पूजा करने वालों के नाम पर एक संप्रदाय का उदय हुआ जिसे सौर संप्रदाय कहते है।इसको मानने वाले लोग माथे पर लाल चंदन लगाते हैं, लाल पुष्पों की माला पहनते हैं तथा गायत्री मंत्र का जाप करते हैं।

    बाद के समय में विदेशी प्रभाव के कारण सूर्य पूजा में कुछ बदलाव भी हुआ। आर जी भंडारकर ने लिखा है कि मग नामक ईरानी पुरोहितों के कारण ऐसा हुआ। वहीं अभिलेखों से सूर्य पूजा के प्रमाण कुमारगुप्तकालीन मंदसौर लेख में मिलता है।जिसमें वर्णन आता है कि दशपुर की तन्तुवाय श्रेणी(रेशम बुनकर)ने शिल्प से प्राप्त धन से सूर्य का एक मंदिर बनवाया तथा क्षतिग्रस्त होने पर पुनः मंदिर का पुनर्निर्माण भी करवाया था।इस लेख का प्रारंभ सूर्य की स्तुति से होता है।आगे भी सूर्य पूजा अलग अलग राजाओं के समय होती रही है।जिसकी सत्यता उनके समय बने मंदिर हैं।और ये मंदिर भारत के सिर्फ एक छोर पर स्थित नहीं है।बल्कि अलग अलग छोरों पर सूर्य के मंदिर हैं।कश्मीर में ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा बनवाया गया मार्तण्ड सूर्य मंदिर जिसके आज सिर्फ ध्वंसावशेष बचे है।वहीं गुजरात के सोलंकी शासकों के द्वारा बनवाया गया मोढेरा का सूर्य मंदिर जिसकी स्थापत्य कला आज भी श्रद्धालुओं को मोहित कर लेती है। जो यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में अस्थायी सूची में शामिल है।वहीं उड़ीसा के कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर जिसका निर्माण गंग वंश के नरसिंह देव ने कराया था।जिसमें सात घोड़े सूर्य के रथ को खींचते ऐसा अंकन भी हुआ है। जो वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में भी शामिल है।

    इतिहास से इतर भारत में सूर्य पूजा का वृहद रूप बिहार व पूर्वांचल में होने वाली छठ पूजा में देखने को मिलता है। छठ महापर्व जो कार्तिक मास की षष्ठी को मनाया जाता है।कार्तिक मास हिन्दू धर्म में बड़ा महात्म्य है। चूंकि छठ लोक पर्व है तो लोक में कार्तिक मास के समय क्या होता है? इसे कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘सूर्य और अतिसूय’ में कुछ यूं लिखते है:धरती पर कार्तिक मास परिश्रम का पवित्र मास है,’मर्द’ और ‘बलीवर्द’ दोनों के लिए।एक और स्वर्ण – धान्य खेत -पथार में लगा है, कटने के लिए सुनहली फसल तैयार हो गई है, और दूसरी ओर खेतों में बुआई चालू है, पानी पटाया जा रहा है, चास-कोन-पटेला हो रहा है। शस्य के वपन की तैयारी हो चुकी है।अब गेहूं -चने-जौ के बीज हराई में डाले जा रहे हैं।अगले मास मार्गशीर्ष में धरती का धान घर की बखार में पहुंच जाएगा तथा खेत खेत में नारायण की नयी अन्नवती ज्योति का अवतरण होगा।हरित वर्ण वाली अन्नवती ज्योति! परन्तु इसके लिए कार्तिक में मर्द और बलिवर्द दोनों को खटना है। दोनों को शारदताप बर्दाश्त करना है।

    शरद का आतप बड़ा ही प्रखर होता है।गोसाईंजी ने लिखा है कि इस आतप अर्थात धूप का जहर रात्रिकाल में चन्द्रमा खींच लेता है – ‘शारदाताप निसि ससि अपहरई। तो भी यह शरदकालीन मध्याह्न सूर्य तीसरा नेत्र खोलकर  हंकड़ते हुए रुद्रव्रृषभ जैसा ज्येष्ठ सूर्य नहीं।उस समय तो आसमान का चेहरा इतना रोबीला हो जाता है आंख मिलाने का साहस नहीं होता। ज्येष्ठ- सूर्य तो ‘डिक्टेटर’ है, पर कार्तिक-सूर्य लोकतंत्र का तेजस्वी नेता है, जो दोपहर को हांक -डांट से काम कराता है, सुबह -शाम  कुशल- मंगल बड़े मजे में पूछता है। शरद प्रात में सौम्यकांत मुख वाला सूर्य मुझे बड़ा ही मिलनसार लगता है, गोया अभी पूछ बैठेगा-” कैसे हो? सब ठीक है न!”

    ऐसे रम्य कार्तिक वातावरण में छठ की पूजा तो होती है।जिसमें सूर्य की विशेष अराधना तो होती ही है।साथ ही साथ इस पूजा में प्रयोग होने वाला भोग से लेकर खाद्य सामग्री सब खेत खलिहान में सहज ही सुलभ होते हैं।इसलिए इस पर्व जैसा कोई दूसरा पर्व ही नहीं है।सूर्य की कथा तो उसे प्रत्यक्ष कृषि सभ्यता से ही जोड़ती है।यह कथा कुबेरनाथ राय के निबंध ‘सूर्य कवि है: सूर्य नायक है’ में मिलती है।कथा कुछ इस प्रकार है -सूर्य है एक सोलह वर्ष का किशोर।एक दिन वह प्रातराश करके नित्य की भांति आकाश की परिक्रमा करने लगा तो उसकी दृष्टि पड़ी  धरती के ऊपर ,एक श्यामल नदी तट पर जहां दो अपूर्व रूपवती ब्राह्मण कन्याएं स्नान करके अपने केश सुखा रही थीं। सिर से एड़ी तक फैली अपूर्व झलमलाती स्वर्ण कुंतल केश राशि और सद्यस्नाता अन्तर्वास रहित भास्वर अंग-कान्ति देखकर सूर्य रूपमुग्ध हो गया। उन कन्याओं की आँखें आम की फाँकों जैसी थीं। उनके दाँत हीरे जैसे थे। सूर्य के किशोर मानस में प्रथम प्रथम पंचशायक का निर्मम प्रवेश हुआ। सूर्य अनमना सा रहने लगा। वह न तो खाता पीता था, न हँसता-बोलता था। यह वयः सन्धि पर का प्रथम पूर्वराग था। माँ ने देखा, माँ को चिन्ता थी, और साथ ही उपचार भी सोच डाला कि एक सुन्दरी बहू लाकर ब्याह देने पर सूर्य सब भूल जाएगा। माँ ने एक ऐसी कन्या ढूँढ़ निकाली जो चंद्रज्योत्स्ना से भी गोरी थी, जो अपनी आभा से आंगन घर को उज्ज्वलतर बना रही थी, और इस ‘गौरी’ (प्रत्येक कन्या ही आठ वर्ष की अवस्था में गौरी हो जाती है। अतः यहाँ ‘गौरी’ का अर्थ ‘पार्वती’ नहीं बल्कि ‘कन्या’ है) को ब्याहने सूर्य की बारात गई। सारे देवता गए, सारे तारागण गए, सारे सप्तर्षि गए, और गौरी को ब्याह करके सूर्य अपनी बारात और दुल्हन के साथ घर लौटा। गौरी नाव द्वारा पतिगृह लायी गई (बांग्लादेश और असम के अनेक भागों में यातायात का साधन नौका है)। वह रोती थी तो मोती चूते थे, हँसती थी तो हीरे बरसते थे। नाव भी पुरानी थी, डाँड़ मन्दार की टूटी लकड़ी थी और माँझी बूढ़ा था। तो भी नाव किसी तरह सूर्य के दरवाजे के पास अंतरिक्ष-घाट लगी। और सूर्य की माँ ने आकर बहू का वरण किया उसी स्थल पर जहाँ रात और दिन के आने-जाने का तोरण द्वार बना है और ये दोनों प्रातः संध्या मात्र क्षणभर के लिये मिलते हैं और परस्पर अभिवादन करके विपरीत दिशाओं में चले जाते हैं। यहाँ सूर्य से लोग पूछते हैं-“सूर्य, क्या-क्या ससुराल से लाये हो?” तो वह उत्तर देता है- “पिता के लिए हाथी, भाई के लिए घोड़ा, माँ के लिए शंख-वलय, सिन्दूर और माधव कन्या जैसी दासी (यह बहू)।” बहू को सोने की चौकी पर बैठाया गया, रूपे की चारपाई पर सुलाया गया, सोने की थाल में ‘जेवना’ परोसा और माणिक की कटोरी में दही-चीनी और मिष्ठान्न दिया गया। पर बहू ने कुछ खाया नहीं। ऊंगली से बोर कर दही को होठों से लगाया और रोती रही। उधर वरण-भात (बारा भात) का उत्सव चलता रहा और वर कोड़ी-कोड़ी पान खाकर पीक थूकता रहा। बहू ने रोकर सूर्य की घाय से कहा- “माँ, मुझे नैहर जाने दो।” धाय ने कहा- “ससुर से पूछो।” ससुर ने कहा- “सास से पूछो।” सास ने कहा- “ननद से पूछो।” ननद ने कहा- “देवर से पूछो”, देवर ने कहा- “रसोई घर के भण्डारी से पूछो।” भण्डारी ने कहा – “जाओ, स्वामी का हुकुम लाओ, तो मैं चौदह मन ‘पाहुर’ (सौगात) का प्रबन्ध चुटकी बजाते कर दूँगा।” बहू ने जब जाकर सूर्य से पूछा तो उत्तर मिला- “बेकार का रंग मत दिखा। पड़ी रह यहीं। नहीं तो देख, वही ‘चैला’ है, उठाकर चार ‘चैला’ पीठ पर दूँगा।” बेचारी गौरी रोती रही सोने की चौकी पर बैठकर और रूपे की पलंग पर लेटकर। सोने की थाली में ‘जेवना’ यों ही पड़ा रहा। दही- गौरी का दाम्पत्य जीवन चलने लगा। परन्तु सूर्य उन दो ब्राह्मण कन्याओं को भूला नहीं। इसीलिए रोज प्रातः गौरी के शयन कक्ष से बाहर आकर वह दिन आसमान में भटकता रहता है और हृदय को दग्ध करता रहता है और संध्या को उन्हीं दो कन्याओं की स्मृति लेकर घर लौटता है। नीचे वे दो कन्याएँ सुन्दर वर प्राप्ति के लिए तप कर रही हैं, और ऊपर सूर्य विरहदग्ध होता रहता है। की ही तरह प्रेमी निकला और धरती की कुँवारी कन्या ‘हाला-माला’ (हलराती कुछ दिन बाद गौरी को सन्तान हुई। नाम रखा गया ‘लाउल’ । वह भी बाप दुर्वा की माला) के प्रेम में पड़कर रोज धरती पर उतरने लगा। अन्त में ‘लाउल’ और ‘हाला-माला’ का विवाह सम्पन्न हुआ। हाला-माला की संतान हुई। पुत्र-प्रसव होने पर उसने पति से कहा-

    आज जाओ, कल आना

    नित्य प्रति देख जाना

    प्रति वर्ष देख जाना

    इस प्रकार व्रत-कथा का अन्त हो जाता है।इस कथा के प्रतीक कृषि सभ्यता से जुड़ते है। गौरी है ‘धूप’। किशोर सूर्य अर्थात प्रात: अरुण सूर्य का विवाह इसी ‘धूप ‘से होता है।इसी का बेटा है ‘लाउल ‘जो किरण का प्रतीक है।

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