संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने आज अपने स्तंभ में सतीश शाह को याद किया है। वाणी त्रिपाठी जब टीवी और फ़िल्मों में अभिनय करती थीं तो उन्होंने उनके साथ अभिनय भी किया था। उन्होंने बहुत आत्मीयता से याद किया है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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सतीश शाह का जाना मेरे लिए वैयक्तिक तौर पर अपूर्णीय क्षति है। 2000 के आस-पास जब मैं मुंबई स्थानांतरित हुई रंगमंच और फिल्में करने के लिए तो पहले कुछ साल मैंने लगातार सतीश जी के साथ काम किया। पिछले 25 साल से उनके साथ सतत संबंध बना रहा। जब वे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी समिति के सदस्य बने तो लगातार हमारी बातें होती रहीं क्योंकि मैं उनसे अक्सर इस बात पर चर्चा किया करती थी कि इस इंस्टीट्यूट को सबसे ज्यादा शैक्षणिक प्रभाव और प्रगति की आवश्यकता है। और ये बात मुझे हमेशा याद रहेगी सतीश जी हम जब शूटिंग कर रहे होते थे तो अक्सर यूनिट में मेरे जैसे लोगों के लिए घर से खाना भिजवाया करते और उनकी सुशील पत्नी मधु भी हम सबको बिल्कुल अपने परिवार का सदस्य समझती थी। जो भी साल मैंने उनके साथ गुज़ारे वो मेरे लिए अविस्मरणीय हैं।
भारतीय सिनेमा और टेलीविज़न ने अपने सबसे सहज, सच्चे और आत्मीय कलाकारों में से एक को खो दिया है। उनका जाना केवल मनोरंजन जगत की क्षति नहीं, बल्कि उस हँसी की भी विदाई है जो बिना शोर, बिना दिखावे के हमारे जीवन का हिस्सा बन गई थी। उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़, और उनकी सरलता — भारतीय दर्शक संस्कृति का अभिन्न अंश बन चुकी थी। वे उन विरले कलाकारों में से थे जो हँसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर कर देते थे।
25 जून 1951 को बॉम्बे (अब मुंबई) में जन्मे सतीश शाह बचपन से ही अभिनय के प्रति आकर्षित थे। उन्होंने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII, पुणे) से अभिनय में औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया, जहाँ से उन्हें अपने शिल्प की गहराई समझने का अवसर मिला।उनकी पहली फ़िल्म थी ‘अरविंद देसाई की अजीब दास्तान’ (1978) — और यहीं से शुरू हुआ वह सफर जिसने भारतीय दर्शकों को पाँच दशकों तक हँसी, व्यंग्य और आत्मीयता दी। पर सतीश शाह का असली परिचय बना ‘जाने भी दो यारो’ (1983) से — जहाँ उन्होंने भ्रष्ट म्युनिसिपल कमिश्नर डी’मेलो की भूमिका निभाई। यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा में राजनीतिक व्यंग्य की क्लासिक मिसाल है, और शाह का किरदार उसकी आत्मा का हिस्सा बन गया। 1980 के दशक में जब भारतीय टेलीविज़न अपने स्वर्ण युग की ओर बढ़ रहा था, सतीश शाह उसके सबसे चमकदार सितारों में शामिल हुए। ‘ये जो है ज़िंदगी’ (1984–86) में उन्होंने 55 से अधिक किरदार निभाए — हर हफ्ते एक नया चेहरा, नई आवाज़, नई चाल और नया अंदाज़।
इतनी विविधता और निरंतरता शायद ही किसी अभिनेता ने भारतीय टेलीविज़न इतिहास में दिखाई हो। फिर आया 2004 — और उसके साथ ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’। इस शो में सतीश शाह का किरदार इंद्रवदन साराभाई भारतीय सिटकॉम इतिहास का एक मील का पत्थर बन गया। उनकी व्यंग्यात्मक बुद्धिमत्ता, हास्य की शालीनता और पारिवारिक भावनाओं के बीच संतुलन ने इस किरदार को कालातीत बना दिया। इंद्रवदन का व्यंग्य केवल मज़ाक नहीं था — वह शहरी मध्यवर्गीय जीवन की सूक्ष्म सच्चाइयों का बयान था।
सतीश शाह ने हिंदी सिनेमा में ऐसी जगह बनाई जहाँ उन्होंने नायक की नहीं, बल्कि कहानी की आत्मा बनने का विकल्प चुना। उनकी फ़िल्मों की सूची भारतीय सिनेमा की यात्रा जैसी है — ‘जाने भी दो यारो’, ‘हम आपके हैं कौन..!’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’, ‘कल हो ना हो’, ‘मैं हूँ ना’, ‘ओम शांति ओम’, ‘भूतनाथ’, और ‘रा.वन’ — हर दशक में उन्होंने बदलते दर्शक-स्वाद के साथ खुद को ढाला।
उनके किरदार हमेशा कहानी के केंद्र में न होकर भी कथा की धड़कन रहे। वह पुलिस अफसर हों, चाचा, प्रोफेसर, या मज़ेदार पड़ोसी — सतीश शाह हर किरदार को इंसानियत से भर देते थे। उनकी उपस्थिति सीन को जीवंत बना देती थी, और कई बार सबसे छोटे संवाद में भी वे सबसे गहरी मुस्कान छोड़ जाते थे। सतीश शाह का हास्य कभी सतही या तंज़ भरा नहीं था। वह रोज़मर्रा की स्थितियों से उपजता था — जीवन की विडंबनाओं से, रिश्तों की उलझनों से, और मानवीय व्यवहार की मासूमियत से। वे दर्शकों को हँसाने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करते थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही थी — कि वे कभी “किरदार निभाते” नहीं दिखते थे; वे उसे जीते थे।
उनकी अदाकारी में दिखावे की जगह संवेदना थी, और मज़ाक की जगह ममता। सिनेमा और टीवी के अलावा, सतीश शाह रंगमंच से गहराई से जुड़े रहे। उन्होंने 1970–80 के दशक में कई नाट्य प्रस्तुतियों में हिस्सा लिया और थिएटर को अपने अभिनय का विद्यालय माना। बाद के वर्षों में वे युवा कलाकारों के मार्गदर्शक भी बने, और अक्सर कहते थे — “कॉमेडी आसान नहीं होती, क्योंकि उसमें सच्चाई छिपी होती है।” उनकी यह मान्यता कि हँसी आत्मा की भाषा है — उनके पूरे काम में प्रतिध्वनित होती है। अपने सहकर्मियों, मित्रों और विद्यार्थियों के बीच सतीश शाह एक उदार, विनम्र और स्नेही व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। सेट पर उनका माहौल हमेशा हल्का, सहज और हँसी से भरा रहता था। उनके सह-कलाकारों का कहना है कि उनके साथ काम करना “सीखने और हँसने का एक साथ अनुभव” था। वे हमेशा दूसरों के सुख-दुःख में शामिल रहते, और शोहरत के बावजूद ज़मीन से जुड़े इंसान बने रहे।
सतीश शाह का योगदान केवल सिनेमा या टीवी तक सीमित नहीं था — उन्होंने यह स्थापित किया कि हास्य भी गहराई रखता है, और कि “मनोरंजन” समाज का दर्पण हो सकता है। वे भारतीय दर्शकों के उस सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं जहाँ हँसी का अर्थ हल्कापन नहीं, बल्कि संवेदनशीलता है। सतीश शाह का जाना भारतीय मनोरंजन जगत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं। उनका चेहरा अब परदे पर नहीं दिखेगा, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी हँसी और उनके संवाद आने वाली पीढ़ियों तक गूँजते रहेंगे। वे उन दुर्लभ कलाकारों में से थे जो मनोरंजन को मर्यादा में रखते हुए अमरता तक पहुँचे। उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यह है — कि उन्होंने हमें सिखाया, हँसी भी एक जिम्मेदारी होती है।

