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  • हमने मिथकों को जाना कम और पूजा ज़्यादा है

    हैदराबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थी विश्वजीत पाण्डेय ने मिथकों पर यह लेख लिखा है और भारतीय मिथकों को कई तरह से समझने की कोशिश की है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    मिथक पर विचारकों के विभिन्न राय हैं। मिथक का निर्माण समाज करता है। कई बार सायास तो कई बार ये समाज के बीच विभिन्न ऐतिहासिक और सामाजिक बदलावों के फलस्वरूप स्वयं प्रकट हो जाते हैं। कई विचारकों का मानना है कि मिथकों का निर्माण समाज को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए होता है।

    संसार का नियमन समन्वय की विराट चेष्टा है। अतिवादियों ने हमेशा से चीजों को बिगाड़ा है, उसको समेटकर एक ‘रूप’ देने का काम हमेशा से वृहत हृदयवान ‘समन्वयवादियों’ ने ही किया है। ‘समन्वय’ का अर्थ विरूद्धों का सामंजस्य है। कबीर और गाँधी जैसे महात्माओं का हिन्दू-मुस्लिम दो परस्पर भिन्न संस्कृतियों का समंजन कर दोनों में अपनत्व का सूत्र पिरोना इसी बात का उदाहरण है।

    भारतीय या हिन्दू संस्कृति में पौराणिक व्यक्तियों के सम्बोधन में पुरुष और स्त्री को साथ जोड़कर बोलने की परंपरा रही है। सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण और शिव-शक्ति।

    शिव-शक्ति को ‘अर्द्धनारीश्वर’ भी कहा जाता है। अर्द्धनारीश्वर – जो तीन शब्दों से मिलकर बना है। अर्द्ध+नारी+ईश्वर यानी एक ऐसा ईश्वर जिसका आधा शरीर नारी देह है। अर्द्धनारीश्वर, प्रकृति में स्त्री-पुरुष संबंधों को समझने का सबसे उपयुक्त मिथक है। अर्द्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का एक ही देह में स्थित कल्पित रूप है। कहा जाता है कि एक बार माता पार्वती ने इतने गहरे प्रेम और तीव्रता से भगवान शिव को प्रसन्न किया कि वह चाहने लगी कि वह शरीर और मन में उनके साथ मिल जाएं। फिर शिव का अर्द्धनारीश्वर रूप प्रकट हुआ। स्त्री-पुरुष के परस्पर साहचर्य को समझने के लिए इससे बेहतर कोई अन्य मिथक नहीं हो सकता।

    ‘दिनकर’ लिखते हैं “स्पष्ट ही, यह कल्पना शिव और शक्ति के बीच पूर्ण समन्वय दिखाने को निकाली गई होगी, किंतु इसकी सारी व्याप्तियाँ वहीं तक नहीं रुकतीं। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना में कुछ इस बात का भी संकेत है कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आएँ तो इससे उनकी मर्यादाहीन नहीं होती, बल्कि उनकी पूर्णता में वृद्धि ही होती है।” यानी नारियों में यदि पुरुषों के गुण आ जाए तो वह कुलटा नहीं हो सकती बल्कि ये गुण उसे और पूर्ण बनाता है। शिव पुरुष हैं तो शक्ति प्रकृति हैं। ये भी धारणा भ्रमरहित नहीं है कि पुरुष तेज है और स्त्री शीतल, पुरुष अट्टहास सा प्रबल ध्वनियुक्त है और स्त्रियाँ चाँदनी सा स्मित हास। न तो पुरुष श्रेष्ठ है और न स्त्रियाँ, वे दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं।  एक का दूसरे से मिलन नव सृजन का संकेत है तो ये न स्त्रियों की उपेक्षा से सार्थक हो सकता है और न ही पुरुष के।

    आज से कुछ हजार साल पहले की बात है जब इंसान खेती करना भी नहीं सीखा था। तब पुरुष और स्त्री के बीच कोई दर्शनीय विभेद नहीं था। दोनों साथ ही शिकार करते थे और वन्य पशुओं से रक्षा कार्य वे दोनों मिलकर ही करते थे। स्त्री और पुरुष के बीच में कोई पर-अपर का भाव नहीं था। दोनों एक दूसरे के सच्चे पूरक थे। जब तक कार्यों के आवंटन में कोई भेद नहीं रहा तब तक स्त्रियाँ स्वतंत्र रही और पुरुषों ने स्त्रियों के पैरों में बेड़ियाँ नहीं बांधीं इसलिए स्त्रियों का भयमुक्त आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्त्रियों के जीवन का सबसे त्रासद इतिहास ‘कृषि क्रांति’ के आगमन से शुरू होता है। कृषि क्रांति ने लोगों के जीवन में स्थायित्व लाया, अब लोगों ने घुमंतू और कन्दराओं में छिप कर जीवन जीने के बजाय एक स्थिर अचल निवास में रहना शुरू किया। जहाँ कृषि क्रांति ने मानवों के पेट की समस्या से उबारा और खाने के अतिरिक्त कुछ अलग सोचने और करने का मैदान तैयार किया, पर ये विकास की गाथा की आधी कहानी है। यही वो समय रहा जब पुरुषों और स्त्रियों के बीच की खाई गहरी होती चली गई। अब पुरुष खेती के काम पर ध्यान देता था तथा स्त्रियाँ घर में उसे कूटने और पीसने का काम करती थी। पुरुष उत्पादन करता रहा स्त्रियाँ संग्रहण में व्यस्त रही। पुरुष बाहर के व्यापारों में व्यस्त रहा, स्त्रियाँ घर की देहरी को लीपती रही। पुरुष दर्शन बघार रहा था, स्त्रियाँ घर में पुरुष के दर्शन की राह जोहती रही। पुरुष समाज और धर्म का नियम बना रहा था, स्त्रियाँ उन नियमों के जकड़न में बंधती रही। पुरुष युद्ध करता रहा स्त्रियाँ भोज पकाती रही। पुरुष आविष्कार पर आविष्कार करता रहा, स्त्रियाँ पुरुषों के जूते की पोलिश करती रही। समय दर समय उसे लक्ष्मी और अन्नपूर्णा जैसे रूपकों से सुशोभित करने का काम पुरुष वर्ग करता रहा। स्त्री को लक्ष्मी और सरस्वती की उपमा देना ये पुरुष वर्ग की सबसे भयानक चाल है, यह चाल स्थिति को यथा बनाए रखने के लिए चली गई होगी। इस चाल ने स्त्रियों को धीरे-धीरे निष्क्रिय और अपंग बना दिया। स्त्रियों को परवश बनाने का यह अद्भुत और कुशल षड्यंत्र था, स्त्रियों के कानों को भनक न लगने दी। मनुस्मृति में वर्णित है

    पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने, रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति”

    स्त्री किसी भी वय में खुद की रक्षा करने में अक्षम है, उसे हमेशा एक पुरुष के सहारे की आवश्यकता होती है। मनु कहते हैं स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं होती। आज तक  स्त्रियों की जो दयनीयता है उसमें ऐसे कई पुरुषवादी श्लोक और विचारों का योगदान है जो स्त्रियों को दहलीज को टापने से रोकता रहा। स्त्रियों को वस्तु समझा गया, सबसे सुंदर और अनमोल वस्तु जिसे सबकी नज़र से बचाना अत्यंत ज़रुरी था। स्त्रियों को परदे के भीतर रखा गया, उसे फूल सा कोमल समझा गया, जिसपर धूप का पड़ना उसके माली को बर्दाश्त से बाहर था। स्त्रियों की शुचिता और पुरुषों के खानदान की शुचिता और उसकी इज्जत तथा पगड़ी के सवाल को कब एक कर स्त्रियों की शुद्धता से जोड़ दिया गया और इसे संरक्षित रखने का जिम्मा कब स्त्रियों पर लाद दिया गया इसकी भनक स्त्रियों को युगों-युगों तक लगी ही नहीं और जब लगी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इन सब घटनाओं के पीछे साहित्यकार, इतिहासकार, अर्थशास्त्री सब एक स्वर में स्त्रियों को अर्थ के मामलात से दूर रखने को ही कारण मानते हैं। महादेवी वर्मा ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में लिखती हैं “यदि उन्हें (स्त्रियों) अर्थ संबंधी वे सुविधाएं प्राप्त हो सकें जो पुरुषों को मिलती आ रही हैं तो उनका जीवन न उनके निष्ठुर कुटुंबियों के लिए भार बन सकेगा और न वे गलित अंग के समान समाज से निकाल फेंकी जा सकेंगी, प्रत्युत् वे अपने शून्य क्षणों को देश के सामाजिक तथा राजनीतिक उत्कर्ष के प्रयत्न भर से सुखी रह सकेंगी।”

    सामाजिक न्याय में अर्थ एक बड़ी शक्ति है जो कुरीतियों पर चोट करने में सक्षम हो सकता है और बराबरी का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। जैसे-जैसे समाज भौतिकवादी होता गया और अर्थ की महत्ता बढ़ती गई वैसे वैसे विभिन्न दुराग्रही विचार भी इससे प्रभावित होता गया। आज पूँजी के पास अपार शक्ति है। पूंजीवादी व्यवस्था अपनी अन्यान्य खामियों के साथ समाज में (अर्थ की दृष्टि से) समता लाने की कोशिश कर रही है। हालांकि ये प्रक्रिया भी कम खतरनाक नहीं है। यद्यपि आज इक्कीसवीं सदी का नारा है ‘जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ इसे समाज में स्त्रियों और वंचित वर्ग के हक के लिए एक आंदोलन का रूप दिया जा रहा है।

    अर्थ का संबंध शोषण से जुड़ता है इसको एक और उदाहरण से समझते हैं। साफ सफाई जब तक निजी घर में की जाती रही तब तक ये काम स्त्रियों के जिम्मे रहा जैसे ही इसका बाजारीकरण  हुआ पुरुषों ने इस पर दावा ठोक दिया यहाँ भी स्त्रियों को पीछे धकेल दिया गया। खाना बनाने का काम जब तक घर के सदस्यों के पेट भरने तक सीमित रहा, तब तक पुरुष रसोईघर से दूर ही रहा पर जब इसका भी बाज़ारीकरण हुआ स्त्रियाँ वहाँ भी पीछे कर दी गईं। स्त्रियों के अन्नपूर्णत्व का कोई ख्याल पुरुषों को नहीं रहा। स्त्रियाँ जहाँ भी पारंपरिक रूप से कुशल थी वहाँ-वहाँ पुरुषों ने धावा बोलकर उसके कुशलता में सेंध मारी और हड़प लिया। यह दिखाता है कि अपने अस्तित्व के खतरे को लेकर पुरुष वर्ग इस बात से सदैव डरता रहा है, उसे डर लगता रहा है कि अगर स्त्रियाँ कमाने लग गई तो पुरुष का महत्व क्षीण हो जाएगा। वह स्त्री के सामने रौब नहीं जमा पाएगा। ऐसी समस्या मोहन राकेश के नाटक ‘आधे-अधूरे’ में देखने को मिलती है। नाटक में महेन्द्रनाथ जो बेरोजगार है, उसकी पत्नी सावित्री जो काम कर के घर को चलाती है। सावित्री यहाँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र है यह उसकी आर्थिक सबलता उसे महेन्द्रनाथ की गालियों और मारपीट से नहीं बचा पाती है। यहाँ महेंद्रनाथ के व्यक्तित्व में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता से पुरुष के मन में उपजने वाली ‘इनसिक्योरिटी’ (असुरक्षा) की भावना को नाटककार ने स्पष्ट चित्रित किया है। स्त्रियों की आर्थिक परवशता पर महादेवी वर्मा लिखती हैं “विवश आर्थिक पराधीनता अज्ञात रूप में व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है। दीर्घकाल का दासत्व जैसे जीवन की स्फूर्तिमती स्वच्छंदता करके उसे बोझिल बना देता है, निरंतर आर्थिक परवशता भी जीवन में उसी प्रकार प्रेरणा-शून्यता उत्पन्न कर देती है। किसी भी सामाजिक प्राणी के लिए ऐसी स्थिति अभिशाप है जिसमें वह स्वावलंबन का भाव भूलने लगे, क्योंकि इसके अभाव में वह अपने सामाजिक व्यक्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता।”

    यह परवशता समाज में एक को ऊँचा और दूसरे को नीचा दिखाता है यानी एक दूसरे के समान होने की जमीन में एक गहरी खाई का काम करता है। यह खाई जब तक भरी नहीं जाती तब तक विषमता बनी रहेगी। इस खाई को भरने का काम न नारी कर सकती है और न ही पुरुष, ये काम मानवता का है। ये काम स्त्री और पुरुष दोनों से आग्रह करता है कि दोनों एक दूसरे के साथ आएं। ‘दिनकर’ इस समस्या का समाधान अपने ‘अर्द्धनारीश्वर’ निबंध में देते हैं। वे लिखते हैं “अर्धनारीश्वर की कल्पना में कुछ इस बात का भी संकेत है कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते।” आगे लिखते हैं “किंतु पुरुष और स्त्री में अर्धनारीश्वर का यह रूप आज कहीं भी देखने में नहीं आता। संसार में सर्वत्र पुरुष पुरुष है और स्त्री स्त्री। नारी समझती है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्टा लगेगा। इसी प्रकार पुरुष भी स्त्रियोचित गुणों को अपनाकर समाज में स्त्रैण कहलाने से घबराता है। स्त्री और पुरुष के गुणों के बीच एक प्रकार का विभाजन हो गया है तथा विभाजन की रेखा को लाँघने में नर और नारी, दोनों को भय लगता है।”

    आंबेडकर आदि चिंतकों का मानना है कि ‘श्रम विभाजन’ भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा अपराध है, जो मनुष्यों ने अपनी ही मनुष्य जाति के लिए किया है। इसमें न सिर्फ़ कामों को जातियों में बांटा गया बल्कि कार्यों का लैंगिक विभाजन भी किया गया, जिसके कारण स्त्रियों के कार्य-व्यापार का दायरा सीमित होता चला गया। ‘दिनकर’ इसका अथ यानी प्रारंभ ‘कृषि क्रांति’ में पाते हैं। “नारी की पराधीनता तब आरंभ हुई जब मानव जाति ने कृषि का आविष्कार किया जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहाँ से ज़िंदगी दो टुकड़ों में बँट गई। घर का जीवन सीमित और बाहर का जीवन निस्सीम होता गया एवं छोटी ज़िंदगी बड़ी ज़िंदगी के अधिकाधिक अधीन होती चली गई। नारी की पराधीनता का यह संक्षिप्त इतिहास है।” मनुष्य पृथ्वी पर रहने वाला एकमात्र चिंतनशील प्राणी है पर यह कैसी चेतना जो सजातीय में ही भेद करे। जब हम अपने सजातीय के साथ ही इस तरह का दुर्व्यवहार करेंगे तो हमसे मानवेतर जीव क्या अपेक्षा करेंगे। और वो भला अपेक्षा क्यों करे, हम मानवों से बेहतर स्थिति में तो वे आप हैं। उन्होंने कभी कामों की श्रेणी नहीं बनाई और न ही पर-अपर का कोई भेद किया है। “नर और मादा पशुओं में भी थे और पक्षियों में भी। किंतु पशुओं और पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक परवशता नहीं लादी।” ये कैसी मंत्रणा चैतन्य की? ये कैसा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’?

    हर बात पर अपने धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाला मनुष्य अपनी संस्कृति में निहित दर्शन से किस हद तक कटा होता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। जब हम दर्शन की गूढ़ बातों को अक्षरशः समझने में नाकामयाब होते हैं तो हम उस दर्शन की पोथी पर रोली तिलक लगा कर अगरबत्ती दिखा कर चित्त को खुश कर लेते हैं। इसी कारण रामचरितमानस साहित्य की नहीं धर्म की पुस्तक बन गई है। गाँधी, आंबेडकर का जब मानना मुश्किल बुझाता है तब हम उनकी गगनचुंबी स्टैच्यू बना कर जयंती-पुण्यतिथि मना कर छुट्टी पा लेते हैं। मनुष्यों के सामने दर्शनशास्त्रियों/धर्मनियामकों ने स्त्री-पुरुष के समन्वय पर ‘अर्द्धनारीश्वर’ का एक खूबसूरत उदाहरण हमारे सामने रखा और कहा अर्द्धनारीश्वर यह दर्शाता है कि पुरुष और स्त्री को एक दूसरे का विरोधाभाषी नहीं कह सकते। बल्कि यह विपरीत शक्तियों के सामंजस्य का प्रतीक है। जीवन में शिव और शक्ति का अपना महत्व है। जीवन में सन्यास और गृहस्थ दोनों महत्वपूर्ण हैं। इसे अगर भौतिकता और आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखें तब भी या महादेवी वर्मा की तरह ‘घर और बाहर’ के सवालों से जोड़कर देखें तब भी। विशेष कर इसकी मात्राओं पर ध्यान देने की है, किसी की अधिकता उसे पतनशील बनाती है। मगध में एक कहावत है “ने अति लबलब ने अति चुप, ने अति बर्षा ने अति धूप” चाहे मनुष्य अत्यधिक भौतिक सुखों में लिप्त हो या कोई घोर आध्यात्मिक हो ये न उस मनुष्य के लिए सही है और न ही एक सुखद समाज के लिए।

    फ्रायड (Freud) ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में पुरुष और स्त्री दोनों की प्रवृत्तियाँ होती हैं।*(three essays on theory of sexuality) पूरी तरह न कोई पुरुष होता है न ही स्त्री। फ्रायड ने अपने बायसेक्सुअलिटी के सिद्धांत में बताया था की सभी मनुष्यों में बायसेक्सुअल प्रवृतियां होती है, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव के चलते वो एक निश्चित लैंगिक पहचान के साथ बढ़ते हैं। कार्ल युंग, फ्रायड के समकालीन, इस सिद्धांत को आगे और विस्तार देते हैं इनके विचार में प्रत्येक स्त्री में एक पुरुष और प्रत्येक पुरुष में स्त्री तत्व मौजूद होता है। अर्धनारीश्वर का सम्पूर्ण दर्शन भी यही कहता है। परंतु हम आज सिर्फ़ पुरुष हैं या स्त्री। पुरुषों में स्त्रियोचित व्यवहार उसे समाज में  तुरंत ‘मौगा’ कहकर लज्जित करता है और स्त्री में पुरुषोचित व्यवहार उसे कुलटा बना देता है। आज कोई पुरुष अपनी संवेदना को व्यक्त करने के दौरान ‘भोकार पार कर’ रो भी नहीं पाता है क्योंकि उसे बचपन से बताया गया है कि रोना स्त्रियों का गुण है। और ये गुण अगर कोई पुरुष में आ जाए तो उसे समाज मौगा कहेगा। इन सब बातों ने स्त्रियों को पुष्प-प्लवित-कोमल बनाकर उसकी हड्डियाँ ही तोड़ डाली और पुरुषों को भावनाहीन किया सो अलग।

    ‘लड़कियाँ देर रात बाहर नहीं रहा करती’ अकेले इस मानसिकता ने रेप और स्त्री-हिंसा को जितना बढ़ावा दिया उतना किसी और कारण ने शायद ही। कई एक रिसर्च बताती हैं कि पढ़ी-लिखी और स्त्रियों को ‘समानता का अधिकार’ देने वाली सोसाइटी में रेप की घटना कम देखने को मिलती है। रेप पर गहनता से विचार करने वाली ‘पेग्गी संडे’ रेप के कारण को सिर्फ़ ‘Socio-biological’ न मानकर इसे पुरुष प्रधान समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों के साथ जोड़ कर देखती हैं। स्कैंडेनेवियन देशों में स्त्री असमानता न के बराबर है इसलिए उन देशों में रेप की घटनाएं भी कम होती है। भारत देश के कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जहाँ लड़कियाँ स्वतंत्र होती हैं, उन्हें घूमने फिरने और देर रात आने जाने पर टोका नहीं जाता है। लड़कियाँ जहाँ अकेली सड़कों पर देर रात तक अकेली या अपने मित्रों के साथ भ्रमण करने को स्वतंत्र है, वैसे संस्थानों में रेप की घटनाएं कम देखने को मिलती है। भारत के उत्तर-पूर्व के राज्य जहाँ मातृसत्ता है वहाँ देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले स्त्रियों पर अत्याचार की घटना कम देखने को मिलती है। अगर बाहरी हस्तक्षेप के कारण हुई घटनाओं को हटा कर गौर करें तो पाते हैं कि आदिवासी समाज में स्त्रियों पर अत्याचार बाकी समाजों से कम देखने को मिलता है। आदिवासी स्त्रियाँ घर और बाहर दोनों ही मामलों में पुरुषों से कम बंधी होती है, बरक्स मुख्यधारा के जड़ समाज की स्त्रियों से। आदिवासी समाज में पारंपरिक समाज से लैंगिक समानता अधिक है, वहाँ की स्त्रियाँ पुरुषों के संग कामों में हाथ बँटाती हैं।

    द्विवेदी जी कहते हैं दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है वो उतना ही याद रखती है जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बात यहीं खत्म नहीं होती, हमें जो याद रखना कठिन होता है हम उसकी फोटो खींच लेते हैं या स्क्रीनशॉट ले लेते हैं ताकि दिल (तसल्ली मिल जाना) और दिमाग (ज़रूरी काम का होना) के बीच चल रहे अंतर्द्वंद्व में ‘दिल’ की जीत दिलवा सकें। हमने मिथकों के साथ भी यही खेल खेला है। हमने उन मिथकों को जाना कम और पूजा ज़्यादा है। आज इस देश में ‘अर्द्धनारीश्वर’ मिथक का सहारा लेकर देश में नारी-हिंसा, लैंगिक संवेदीकरण (Gender sensitization) और LGBTQ जैसे मुद्दों पर नए सिरे से बहस शुरू की जा सकती थी।

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    विश्वजीत पाण्डेय

    हैदराबाद विश्वविद्यालय

    7654945778

    pandeyvishwa2000@gmail.com

     

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