पंकज कौरव और शनि श्रृंखला की आठ कविताएँ

हम ग्रहों-नक्षत्रों के बारे में बात नहीं करते, बल्कि उसकी तरफ उदासीन रहकर अपनी प्रगतिशीलता जताते रहते हैं और यह नहीं देखते कि समाज पर इनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है. पिछले दस-बारह सालों में शनि का प्रभाव समाज पर बढ़ता गया है. जगह-जगह शनि मंदिर बन रहे हैं, शहरों-बाजारों में शनि के नाम पर भीख मांगने वाले बढ़ते जा रहे हैं. क्या हमने कभी तार्किक होकर सोचा है इस बारे में. मौलिक कवि पंकज कौरव की कुछ प्रभावशाली कविताएँ शनि को लेकर पढ़िए. कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना शैली में. शनि का नंबर 8 होता है और कविताएँ भी आठ ही हैं और आज शनिवार भी है. पढ़कर राय दीजियेगा- मॉडरेटर
शनि – 1
 
मुझे छोड़ सब शामिल हैं
तुम्हारे इस तेल के खेल में
 
सिर्फ एक कोल्हू नहीं
सारे बैल
तिल-तिल मरकर उपजाई
सफेद और काली तिल
मूंगफल्ली ही नहीं
सरसों, सूरजमुखी
अरंडी, नारियल
और
वह बादाम भी
जिसके साथ जुड़ा है
याददाश्त मजबूत करने का फॉर्मुला
 
पर क्या तुम
याद रख पाते हो
तेल के इस खेल के सारे नियम?
देख पाते हो
तेल की धार कहां से निकली
और कहां जाकर सूख गई सरस्वती की तरह?
 
क्या तुम्हें पता है
तुम्हारा चढ़ाया हुआ
सारा तेल कहां बिला जाता है?
 
उल्लेखनीय बस इतना है
कि तुम्हारे चढ़ावे के तेल से
कुछ कतरा पाकर
इठला जाती हैं पीपल की जड़ें
फिर उन्हें
किताबों की तरह
चाट नहीं पाती दीमक
 
तो फिर बाकी बचा तेल
कौन चाट जाता है?
 
याद रखना तेल के कुंए
सिर्फ अरब देशों में नहीं
तुम्हारे आसपास भी हैं
वे तुम्हें दिखाई नहीं देते ये और बात है
 
तेल के व्योपारी
इतने अमीर ऐसे ही नहीं बने हैं
उनके अदृश्य तेल के कुंए
अरब के शेख़ों से भी बड़े हैं
 
और देख लेना
आगे यह खेल और भी ज्यादा
रोमांचक होता चला जाएगा
तुम्हारा यह सारा जीवन
और यह पूरा का पूरा युग
एक रोमांचकारी
ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में तब्दील हो जाएगा
 
तुम्हारी सांसें
उस रोमांचक क्रिकेट मैच में
अटकी होंगी
और
ऐन डेथ ओवर्स के वक्त
विज्ञापनों में एक बाबा
बेच कर चला जाएगा
कच्ची घानी का शुद्ध सरसों तेल…
 
 
 
शनि – 2
 
दूर अंतरिक्ष में विचरता
ठंडी गैसों में लिपटा
गोला मानने के अलावा
गर तुम मुझे
लोहा भी मानों
तो कोई हर्ज़ नहीं
 
अगर मैं लोहा हूं
तो तुम्हारी सभ्यता से भी
ज़्यादा पुराना है इतिहास मेरा
 
अपनी डेढ़ आंखों से
सब देखा है मैंने
महाद्वीपों से भी आगे
अपना साम्राज्य फैलाने की तुम्हरी भूख
और
सबका सब हड़पने की
नीयत से हुए
अश्वमेघ यज्ञों का मैं साक्षी रहा हूं
 
जानते हो
तुमने अपने अश्वमेघ यज्ञों में
कभी काला घोड़ा क्यों नहीं छोड़ा?
इसलिए नहीं कि
उस काले घोड़े की
नाल से बनी अंगूठी पहन
शत्रु बलवान हो उठता
बल्कि
तुम्हारे साम्राज्य की कामना में
आड़े आ जाता
मुझसे जन्मे वैराग्य का डर
 
इसलिए सारे सुंदर सफेद घोड़े
तुमने अपने रथ
और बग्घियां सजाने रोक लिए
उधर काले घोड़ों पर सवार
तुम्हारी सेना रौंदती रही संसार
 
सरपट दौड़ते काले घोड़ों की नाल
जब घिस गई
जब भोथरी पड़ गईं
सारी तलवारें
तुम्हारे लंगर
और जहाज़ जब जंग खाकर
पूरी तरह खत गए
तो तुमने उन्हें
कबाड़ में न देकर
बंटवा दी उनकी अंगूठियां
 
रत्नजड़ित स्वर्णाभूषणों से
लदे-फदे तुम लोगों ने
लोहे के छल्लों का
क्या बढिया जाल बिछाया
 
पाषाण युग से लेकर
कई युगों की
इस विकास यात्रा में
तुम्हें भले कोई पछतावा न हो
मुझे है एक
 
गलने पर
लोहे की तरह ज़्यादा मारक
और घातक हो गई है मनुष्यता
खैर
लोहा होकर भी
मैं वह लोहा तो हरगिज़ नहीं
जो
सरिया में ढ़लने पर
भेद कर रख दे
किसी मासूम की योनि…
 
 
 
शनि – 3
 
सबसे पहले मैं
बेदखल हुआ अपने बाप से
फिर होता रहा अपने आप से
साथ ही
श्रेय से बेदखल होता रहा श्रम
ठेकेदारी बेदखल करती गयी मजदूरी
 
इस तरह
वे पहले ठेकेदार हुए
फिर आमदार
फिर खासदार
फिर मंत्री-संत्री
और प्रधानमंत्री
 
हालांकि
बाप से बेदखल
और
संसार में रंग-भेद का
पहला शिकार मैं ही था
लेकिन आखिरी नहीं
 
मेरे बाद और भी पैदा हुए
और
होने की प्रक्रिया में हैं
कहीं किसी गन्ने के खेत में
किसी ईंटों के भट्टे पर
जहां भीतर की आंच में
धीरे-धीरे पकती जाती है मिट्टी
या फिर किसी माल गोदाम में
जहां अन्न का अकूत भंडार
देख शायद खुशी में गाते हैं झींगुर
 
ऐसे ही किसी सम्पन्न
परिवेश में
वे सूर्यवंशी शूरवीर आकर
स्त्रियों पर दिखा सकते हैं
अपना शौर्य
 
लेकिन
कर्ण को त्यागने पर
कुंती को कोसने वालों
पहले यह बताओ
क्या तुमने कभी
सूर्य को गाली दी?
 
क्यों तुम्हे कभी वह ज्ञान
निःसार नहीं लगा
जो ज़रूरत पड़ने पर
कर्ण के काम न आया?
आखिर क्यों
ऐन ज़रूरत के वक्त
खाल के साथ खींच लिए गए
कर्ण के कवच और कुंडल?
 
लेकिन नहीं
सूर्य की संतान होने का पाप
तो सिर्फ हम झेलेंगे
कर्ण कहलायेगा शूद्र
और मैं श्रूड
 
तुम सारी सत्ता हथियाकर
अपने पास रखोगे
और अपने अन्याय के राज्य में
मुझे बताओगे
कर्मफल दाता
वाह मेरे भाग्य विधाता
 
देख लेना एक दिन
इस बेदखल बेटे का श्राप
ज़रूर लगेगा उन्हें
 
जब उनकी सारी
रथ-यात्राएं रुक जाएंगी
तब
अंतिम यात्रा से काफी पहले
उनकी गोद ली हुई संतानें ही
घोंट कर रख देंगी
उनका गला…
 
शनि – 4
 
तीसरा विश्व-युद्ध
अब इतनी जल्दी नहीं होगा
उसके पहले
होंगे कई सारे गृह-युद्ध
 
सारे ग्रह कहर बरपाएँगे
सूरज बरसाएगा
और ज़्यादा आग
यहां-वहां बिखरे
ख़ून के धब्बे धोने
पानी पूरी कायनात में फैल जाएगा
और
तुम्हारा सारा आकाश-पाताल
उलट कर रख देगी हवा
 
साथ ही साथ
अहंकारी होते जाएंगे
कुछ और अधिक अहंकारी
 
बुद्धिजीवी
कुछ और तीक्ष्ण हो जाएंगे
 
मूर्खता
फिर भी रहेगी बहुसंख्यक
वह किसी कैंसर सी फैलती जाएगी
 
और
ठीक उस कयामत के दिन
जैसा होगा सुना था
वह सब हुआ या नहीं
यह देखने
बचेगा ही नहीं कोई
 
यही है मेरा न्याय…
 
 
शनि – 5
 
‘काल पुरुष कुंडली’ में
मेरे हिस्से में हैं
दो खाने
 
दसवां खाना
कर्म का
और
ग्यारहवां खाना
जिसे सब कहते हैं
कर्म-फल-लाभ
 
यह तुमसे किसने कहा
कि
भाग्य ही सबकुछ है
और कर्म का फल अनिश्चित?
 
फिर भी अगर
कोई तुमसे कहे
फल की चिंता छोड़
तुम
बस कर्म करो
 
तो
पास लाकर रख लेना
एक लंबा और मजबूत बांस
और पूरे चालीस दिन तक
उसे खूब सरसों का तेल पिलाना
 
श्रम का उचित
मोल न मिलने पर
काम आने वाला
यही है वह सबसे भरोसेमंद
और कारगर नुस्खा जो लगातार
इकतालीस दिन के उपायों वाली
तुम्हारी ‘लाल किताब’ में नहीं है…
 
 
 
शनि – 6
 
जो जितना टेढ़ा चलेगा
वो अपनी चाल पर
इतराएगा उतना ही
 
सीधा चलने वाला भी
कम नहीं
वह अपने
सीधेपन की महिमा गाएगा
 
लेकिन
शतरंज से भी ज़्यादा अनिश्चित
जीवन के इस खेल में
तुम्हारे सीधेपन का घमंड
और
उनके टेढ़ेपन की अकड़
दोनों की तासीर
धरी की धरी की धरी
रह जाएगी
 
जब इस लंगड़े शनि का
ढ़ाई घर चलने वाला घोड़ा
अपने खाने से बाहर आएगा…
 
 
शनि – 7
 
तुम्हारी आकांक्षाएं
बस निर्विघ्न
पूरा होना चाहती हैं
 
वे तपना नहीं चाहती
अभ्यास में
समाना नहीं चाहती
किसी छोटे से व्यास में
तुम्हारा मन हमेशा
सफलता चाहता एक ही प्रयास में
 
तभी तो
मेरे आने की ख़बर सुनकर
घबरा जाता है तुम्हारा मन
 
एकदम पास आ जाने पर
वह निरापद नहीं हो पाता
बस एक अवसाद से घिर जाता है
 
और
मेरे अगले गंतव्य
से भी गुज़रने तक
उसे नहीं मिलती
कोई भी आश्वस्ति
मेरे पूरी तरह चले जाने की
 
तुम्हारे लिए
होगी यह ‘साढ़े साती’
मेरे लिए है
तुम्हारा-मेरा साथ
और तुम्हारे मन से
मिलने का मौका…
 
 
 
शनि – 8
 
अपने बाप का
हरएक चक्कर लगाकर
लौटूंगा मैं तुम्हें मिलाने
अपने आप से
 
पहली दफा
मैं आऊंगा जब तुम
खुद एक बाप बनने की
जुगत में होगे
 
उस वक्त
तुम जीविका, जीवन या प्रेम
किसी की भी खोज में
लगे हो सकते हो
 
हो सकता है प्रेम में रहो
या कि
विरह में भी हो सकते हो
 
मुमकिन है
उस वक्त तुम
किसी स्त्री के खो जाने पर
रो भी रहे हो
 
या ठीक उसी वक्त
कोई स्त्री रो रही हो सकती है
किसी पुरूष से मिले धोखे पर
जो अंतत: मिलना ही था
जैसा कि
किसी न किसी रूप में
तुम उसे धोखा देते भी आए हो
 
पर तुम्हारी ऐसी सभी पीड़ाओं में
मैं ही रहूंगा
 
फिर मैं लौटूंगा
जब होने को होंगी
तुम्हारी संतानों की भी संतानें
तुम्हारी नौकरी तब
अवसान पर होगी
महंगाई आसमान पर होगी
पेंशन के टेंशन में
तुम्हारे निवेश बौने रह जाएंगे
लेकिन तुम
रिटायरमेंट को ठेंगा दिखा
ओवरटाइम कर रहे होगे
 
तीसरी बार लौटने पर
अगर तुम मुझे इस धरती पर मिले
तब शायद तुम
मिलोगे किसी वृद्धाश्रम में
या कहीं किसी अस्पताल में
थोड़ा और जीने की चाह में
अपनी आखिरी सांसे गिनते हुए
 
तुम्हारे लिए कम
यह मेरे लिए ज़्यादा दुखद है
हरबार मैं आता हूं
तुम्हें जीवन के व्यापार से निकालने
लेकर आता हूं वैराग्य की भेंट
लेकिन
औसतन हरएक बार ही
वापस नहीं जा पाता खाली हाथ…
(शनि-6 में प्रस्तुत संवाद शनि की ढैया से प्रेरित है जबकि शनि-7 का संवाद शनि की साढ़े साती पर केन्द्रित वही शनि-8 का संवाद पाश्चात्य ज्योतिष में सेटर्न रिटर्न की अवधारणा पर आधारित है. इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर शनि तब-तब बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ता है जब वह साढ़े उनत्तीस वर्ष में सूर्य की परिक्रमा पूरी कर रहा होता है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके सेटर्न रिटर्न की गणना उसकी जन्मतिथि के अनुसार अलग-अलग होती है. टर्निंग थर्टी के तौर पर मनोविज्ञान में भी एक ऐसा ही सिद्धांत है लेकिन उसका ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है.)
 

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