कनुप्रिया गुप्ता की कहानी ‘स्ट्राबेरी फार्म’

कनुप्रिया गुप्ता अमेरिका के न्यू जर्सी में रहती हैं। छोटी छोटी कहानियाँ लिखती हैं। यह उनकी नई कहानी है- मॉडरेटर

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शाम के धुंधलके का असर था या आस पास चारों तरफ फैले स्ट्राबेरी के बाग का रंग ,सब कुछ लाल हो रहा था, सूरज जो धीरे धीरे लौट जाना चाहता था,और रात जो आराम से आना चाहती थी,वो और वैसी कई शामें हमने डूबते हुए देखी थी पर वो शाम आँसुओं में डूबी हुई थी,दर्द में तकलीफ़ में ,उसके दर्द में जिसे ऐसी शामें बेहद प्यारी थी।

शायना नाम था उसका अपने नाम की ही तरह सुंदर वो हिरण के बच्चों की सी कोमल थी उस शाम से पहले और उस शाम के बाद भी उतनी ही प्यारी थी पर उसकी आँखों से वो चंचलता चली गई थी।

स्ट्राबेरी के बागों में बड़ी हुई उस लड़की को स्ट्रॉबेरी सख़्त नापसंद थी,कहती थी इतने प्यारे रंग और खुशबू के पीछे की ये खटास मुझे नहीं भाती… लाल तो प्रेम का रंग है इसे मीठा होना चाहिए,लाल के साथ कुछ भी खट्टा ,कड़वा या निराशा भरा जुड़ भी कैसे सकता है’ और ये कहकर वो खिलखिला देती।

हम इस स्ट्रॉबेरी के चक्कर में  बाग के पचासों चक्कर लगाते और स्ट्राबेरी को लेकर उसकी नापसंदगी पर हँसते खिलखिलाते,उसके बाबा मेरे पापा के स्ट्राबेरी फार्म में देखरेख का काम करते थे,हम शामों को वहां स्ट्राबेरी खाने जाया करते,फार्म में कुछ और भी फल लगे थे और ये अघोषित सा नियम था कि वो कोई भी दूसरा फल खा लेती पर स्ट्राबेरी को हाथ तक न लगाती।

उस शाम जब वो आई तो लाल रंग की फ्रॉक और खुले बालों में बेहद खूबसूरत लग रही थी हम कुछ दोस्त फार्म में बैठे थे और उसके आते ही मंत्रमुग्ध से उसे देख रहे थे,उस शाम स्ट्राबेरी का सारा लाल रंग उसके गालों पर उतर आया था,और सम्मोहन का काला रंग हमारी आंखों में उतरा था शायद,हमने अपनी मुट्ठियों में भरी स्ट्राबेरी ज़मीन पर फेंक दी और उसकी तरफ बढ़ चले ।

हममे से एक ने उसका हाथ पकड़ा उसने बड़े आराम से वो हाथ छुड़ा लिया,वो आम सी बात थी हम बचपन से एक दूसरे के साथ खेलते बड़े हो रहे थे,पर उस दिन वो हाथ छोड़ने के लिए नहीं पकड़ा गया था उसके लाल गाल,सुराही सी क़मर,उसके उभार सब पकड़े गए ,उसकी आँखों में आँसू थे उसने मेरी तरफ कातर नज़रों से देखा था,सीधा मेरी आँखों में ,मैंने कुछ देर के लिए अपने हाथों को रोक लिया पर उन दूसरे हाथों को न रोक सका और जब तक मैं कुछ समझ पाता मैं फिर उन सबमें शामिल था।

उसके लाल गाल शाम के धुंधलके में चमकने चाहिए थे पर वो काले हो रहे थे आंसुओं से भीगे गाल ,जिन आंखों को चांदी से चमकीला होना था वो लाल थी,उनमें गहरी झील नहीं थी उनमें ज्वालामुखी थे वो गुलाब सी लड़की जब मसल दी गई तो उसने अपने खरोंचे जा चुके बदन को बोझ की तरह उठाया और वो लाल रंग की फ़्रोक जिसे पहनकर वो आई थी उसे अपने जगह जगह से खून की बूंदे बरसाते शरीर पर लपेट लिया,वो आंसुओं से भीगे गाल लिए मेरी आँखों मे देखती हुई वहाँ से चली गई,हममे से किसी ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश पर वो इस बार हाथ झटककर जा चुकी थी।

उसने मेरी आँखों में देखकर चीखते हुए कहा था- तुम भी मन के खट्टे निकले उस एक पल में उन आंखों में अपने लिए निराशा, घृणा और हिकारत सब एक साथ देखा मैंने…

शायद मैंने उसकी कोई उम्मीद तोड़ दी थी,वो आंखें वो नाउम्मीदी मैं कभी न भूल सका, उस दिन के बाद मुझे ख़ुद पर कभी विश्वास न हो सका,किसी का विश्वास इस हद तोड़ देने के बाद मैं ख़ुद पर विश्वास कर भी कैसे सकता था।

वो चली गई फिर कभी नहीं लौटी, कभी भी नहीं।

 उसके बाद मेरे पिता के लगाए फार्म में कभी स्ट्राबेरी नहीं उगी…

हमने ख़ुद वो स्ट्राबेरी का फार्म उजाड़ दिया था…वो खूबसूरत जगह बेजान हो गई थी।

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