अब पुस्तक समीक्षा लिखते हुए डर लगने लगा है

मैंने अपने लेखन की शुरुआत पुस्तक समीक्षा से की थी. विद्यार्थी जीवन में लिखने से पत्र-पत्रिकाओं से कुछ मानदेय मिल जाता था. ‘जनसत्ता’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक, साहित्य संपादक बहुत उदारता से किताबें दिया करते थे. एक तो पढने के लिए किताबें मिल जाती थीं, दूसरे, कम शब्दों में अधिक से अधिक लिखने का अनुशासन आया. मुझे याद है, मेरे प्राध्यापक गुरु दीपक सिन्हा ने उन्हीं दिनों मुझे मलयज की लिखी एक समीक्षा पढने के लिए दी थी. निराला की कविता ‘सरोज स्मृति’ पर थी- ‘दुःख की स्वनिर्भर दुनिया से बाहर निकलने की छटपटाहट’. उन्होंने कहा था कि इसको पढ़कर पुस्तक समीक्षा लिखना सीखा जा सकता है. सच में वह ऐसा ही लिखा था. एक छोटे से लेख में किस तरह उन्होंने छायावाद की फांस को खोला था. अद्भुत.

हर बार कोशिश करता था कि कुछ ऐसा लिखूं कि किताब के बारे में कुछ बारीक बात निकल कर आए, थोड़ी बहुत आलोचनात्मक टिप्पणी भी आए. मुझे याद है अगर किसी किताब की तारीफ अधिक हो जाती थी तो मंगलेश डबराल टोक दिया करते थे. वे ‘जनसत्ता’ में रविवारी संपादक थे. सबसे बड़ी बात है कि उस दौर के लेखक बुरा नहीं मानते थे. मैंने अपने कथा गुरु मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘क्याप’ पर ‘तद्भव’ में लिखते हुए यह लिख दिया था कि उनको ‘क’ शब्द का टोटका है. जब भी वे क शब्द से अपने उपन्यास का नाम रखते हैं तो उपन्यास चल जाता है. लेकिन जरूरी नहीं है कि क नाम से शुरू होने वाला उपन्यास बढ़िया भी हो. मैंने ‘क्याप’ में दोहराव वगैरह कुछ कमियों की तरफ इशारा भी किया. लेकिन वे नाराज नहीं हुए. बहुत खुश हुए. इसी तरह अपने शोध गुरु सुधीश पचौरी की की किताबों की समीक्षा लिखते हुए भी मैं उनकी आलोचना कर दिया करता था. लेकिन वे कभी न तो नाराज होते थे, न बुरा मानते थे.

पिछले चार-पांच साल में. खासकर सोशल मीडिया के दौर में ऐसा फील गुड का माहौल बना हुआ है कि किसी किताब की अगर आपने आलोचना की तो लोग तीर-तलवार लेकर आपके पीछे पड़ जाते हैं. हाल के दिनों में इतनी साधारण किताबों को असाधारण बताया गया है कि आश्चर्य होता है. मैंने साहस करके एक दो किताबों की आलोचना की तो पाया कि लेखक-प्रकाशक-संपादक सब नाराज हो गए. बाद में मुझे भी लगने लगा है कि सब अच्छा कहते हैं तो मुझे क्या पड़ी है बुरा कहने की. अगर अच्छी नहीं लगी किताब तो चुप रह जाओ.

असल में समीक्षा लेखन अब बुरी तरह से पीआर लेखन में बदल चुका है. बिना किताब पढ़े किताब पर लिखने का चलन बढ़ता जा रहा है. अच्छा, बहुत अच्छा, अद्भुत, अविस्मरणीय जैसे शब्दों को कंप्यूटर के कीबोर्ड से इतना टाईप करना पड़ता है कि वे शब्द समीक्षकों के कंप्यूटर के की बोर्ड से घिस जाते होंगे. मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैंने भी ऐसी कई किताबों के लिए इन विशेषणों के प्रयोग किये क्योंकि मैं संपादक-प्रकाशक की नजर में अच्छा बना रहना चाहता था. आज के दौर में आप लेखक से तो वैर मोल ले सकते हैं प्रकाशक और संपादक से नहीं. ये दो ऐसी संस्थाएं बन चुकी हैं जो लेखक के लिए स्वर्ग की सीढ़ी होते हैं. इनसे पंगा लेकर कौन नरक में जाना चाहेगा.

इसका असर समकालीन लेखन पर बहुत गहरा हुआ है. अगर आप अद्भुत, कमाल जैसे शब्द लिखने वाले कुछ समीक्षकों का जुगाड़ कर लें तो एक सफल लेखक बनने में कोई मुश्किल नहीं होती है. उसके लिए आपको लेखन में मेहनत करने की कोई जरुरत नहीं होती है.

सच बताऊँ तो इस धारा के विरुद्ध जाने में अब डर लगने लगा है. यह डर बना रहता है कहीं समाज बहिष्कृत न कर दिया जाऊं. गाँव में रहता था तो लोग सबसे अधिक अपनी जाति के लोगों द्वारा भात काट दिए जाने से डरते थे. उसके डर से जाति सभा के आदेशों का पालन करते थे.

इसीलिए सच बताऊँ तो किसी किताब की समीक्षा लिखने में अब डर लगने लगा है. किसी के लिखे को बुरा कहने में अब डर लगने लगा है. इसलिए चुप रह जाता हूँ. इधर मैंने मलयज के लेख ‘दुःख के स्वनिर्भर दुनिया से बाहर निकलने की छटपटाहट’ पढने की सलाह जिसको भी दी उसने उसको पढना तो दूर खोजने की जहमत भी नहीं उठाई. जब पहले से पता है कि क्या लिखना है तो उसके लिए अलग से तैयारी करने की क्या जरुरत है!

प्रभात रंजन

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