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यह सामा-चकेवा का मौसम है

कार्तिक मास के बढ़ते चाँद के साथ मिथिला-तिरहुत के लोगों की स्मृतियों में सामा चकेवा आ जाता है. भाई-बहन के प्रेम के इस पर्व पर यह लेख लिखा है मुकुल कुमारी अलमास ने- मॉडरेटर
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कार्तिक माह का शुक्लपक्ष जब भी आता है और मैं दिन-दिन बढ़ते चाँद को देखती हूँ, बचपन और अपने गाँव की यादों में खो जाती हूँ। ये वो दिन होते थे जब छठ पूजा के साथ ही सामा-चकेवा खेलने की शुरुआत हो जाती थी। आज जब भी उन दिनों की याद करती हूँ दिल से एक आह निकलती है, आँखों से कुछ बूँदें टपकती हैं और किसी अपने अनमोल ख़जाने के लूट जाने सा एहसास होता है। हम गाँव से कटे विस्थापितों की यही त्रासदी है कि हम शहर को छोड़ना भी नहीं चाहते और गाँव की स्मृतियों को भूला भी नहीं पाते। उन दिनों हमारे मिथिलांचल में सामा-चकेवा एक ऐसा त्योहार हुआ करता था जो एक तरफ भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक होता था वहीं दूसरी ओर मिथिलांचल की लोक संस्कृति की अनोखी झलक पेश कर सभी को अभिभूत भी कर देता था।
आज चालीस-पैंतालीस साल गुजर जाने पर भी उसकी स्मृति इतनी ताजी है कि लगता है कल ही की बात हो। आज भी उन पलों को मैं कल्पना में साकार कर उसे पल-पल जी लेती हूँ और अपने बचपन की सैर कर आती हूँ। बाबुजी बिहार सरकार के प्रशासनिक अधिकारी थे अतः गाँव में रहने का मौका कम मिल पाता था पर छुट्टियों में गाँव आना होता था। जब भी बाबुजी का तबादला होता था तब वे लंबी छुट्टी ले लेते थे और ऐसे समय हमें भी काफी दिनों तक गाँव में रहने का मौका मिलता था। तो बचपन में जिस  ग्रामीण संस्कृति को देखा-भोगा वह आज मेरे जीवन की धरोहर है। सोचती हूँ अगर कभी मुझ पर भी ईश्वर प्रसन्न हो जाएँ और वरदान माँगने को कहें तो क्या मैं अपने बचपन में बिताए दिनों को फिर से जीने के अलावा कुछ और माँग पाऊँगी!
बचपन की उन यादों में सामा-चकेवा खेलने की याद सबसे स्पष्ट याद है। यह मिथिलांचल का एक बहुत प्राचीन लोक नाट्य है या फिर इसे गीतिनाटिका कहें। यद्यपि हमलोग बचपन में इसे एक त्योहार की तरह ही मनाते थे जो छठ के खरना से शुरू हो कार्तिक पूर्णिमा तक चलता था। आज मिथलांचल में भी शायद इसे लोग भूलते जा रहे हैं और सुना है इसे बहुत कम घरों में मनाया जाता है, पर उन दिनों यह भाई बहन का एक विशिष्ट त्योहार होता था जो उत्साह और उमंग से लबरेज़ होता था। जिस संयुक्त परिवार में हम रहते थे सब मिला कर कमोबेश दस-पन्द्रह बहनें होती थीं कोई न कोई बुआ सामा-चकेवा के समय घर में जरूर आ जातीं थीं, जो अभिभावक की भूमिका में होती थीं। । सब मिल कर मिट्टी की मूर्तियाँ बनाती थीं जिसमें मुख्य होते थे सामा, चकेवा, बृंदावन, चुगला, सतभैया, ढोलिया, भरिया,खंजन चिड़िया, खड़रिच, वनतीतर, झांझी कुत्ता, भैया बटतकनी, मलिनियाँ इत्यादि । चुगला की मूर्ति में सन( पटुआ ) का प्रयोग किया जाता था और वृन्दावन को बनाने में एक खास प्रकार के लंबे तृण या घास का। जब ये मूर्तियाँ सूख जातीं तो उन्हें सुंदर रंगों से रंगा जाता सिर्फ चुगला को छोड़ कर, जिसके लिए हम काले रंग का प्रयोग करते थे। इन सभी मूर्तियों को एक बांस के चंगेरा (टोकड़ी) में रखा जाता, एक चौमुख दीप जलाया जाता और रात के भोजन के उपरांत घर की सभी औरतें एक जगह इकठ्ठी होतीं और लोकगीतों का सिलसिला चलता, जिसमें भगवान के गीतों से शुरुआत होती और फिर सामा- चकेवा का गीत होता। बादमें चौमुख दीप जला और सामा-चकेवा के चंगेरा को ले सभी बहनें गीत गाते हुए घर से निकलतीं-
डाला ले बहार भेली, बहिनो से फलाँ बहिनों,
फलाँ भइया लेल डाला छीन, सुनु गे राम सजनी।
एक सार्वजनिक स्थान जो अधिकतर  कोई कुआँ का भिंड़ा होता या फिर हमारे पुस्तैनी दलान के सामने लगा बड़ा सा आँवला का पेड़, वहाँ सभी इकट्ठा होते। आसपास की और सखी-सहेलियाँ भी अपने-अपने सामा-चकेवा को लेकर आ जातीं। फिर वृन्दावन में आग लगाया जाता, हम गाते –
वृन्दावन में आगि लागलै,
किओने मिझाबए हे,
हमरो से फलाँ भइया,
अगिया मिझाबए हे।
चुगला में लगा पटुआ जलाया जाता और सब उसकी निंदा करते और गाते-
धान-धान-धान, भइया कोठी धान,
चुगला कोठी भुस्सा,
चाऊर-चाऊर-चाऊर,
भइया कोठी चाऊर,
चुगला कोठी छाउर (राख) ।
सभी गीतों में भाई की वीरता और उसकी शक्ति का बखान होता और चुगला को दुत्कारा जाता। एक गीत आज भी कानों में गूंजता रहता है-
सामा खेलए गेलौं फलाँ भइयाक अँगना
आहे कनियाँ भउजो लेल लुलुआय ।
समा-चकेवा के गीत गाने में बुआ लोग सिद्धस्त होतीं और हम सब बच्चे बस उनकी नकल करते। माँ और चाची लोग साथ नहीं आतीं क्योंकि यह मुख्यतः लड़कियों का त्योहार होता था या फिर मायके आई ब्याहता का। इसीलिये कोई बुआ मायके आई हुई है तो उन्हें छूट होती और वह हर चीज में हमारी अगुआई करतीं। यह सिलसिला लगभग सप्ताह भर चलता फिर कार्तिक पूर्णिमा के दिन सामा के ससुराल जाने का यानि विसर्जन का दिन आ जाता। दिन से ही तैयारी शुरु हो जाती। सबसे पहले खेतों में लगे धान की नई फसल को काट कर लाया जाता जिसके दाने अभी पूरी तरह से पके नहीं होते । उस धान को तैयार कर आँगन में ही ओखली-मूसल से चुड़ा तैयार किया जाता जो हरे-हरे दिखते। कुछ मिठाई भी मँगाया जाता या फिर घर में ही तैयार कर लिया जाता जैसे भुसवा, कसार, लड्डू आदि। बाँस के चंगेरी को खूब सजाया जाता जिसमें भाई लोग हमारी मदद करते। सामा अब अपने ससुराल जा रही है यह उसी की तैयारी है। शाम को अंतिम बार गीत गाया जाता और फिर चौमुख दीप जला कर और वह चंगेरी उठा कर भाई आगे-आगे चलता और बहनें गीत गाते हुए पीछे-पीछे। सारे गाँव की लड़कियाँ और महिलाएँ किसी तालाब किनारे या फिर किसी जोते हुए खेत में इकट्ठी होतीं। सारा वातावरण ज्योतिर्मय हो जाता। वहाँ बहन अपने-अपने भाई को चुड़ा और मिठाई देतीं जिसे फांफर(झोली) भरना कहा जाता, भाई उस प्रसाद का कुछ भाग फिर बहन को वापस करता। इसके बाद भाई अपने घुटने से सामा-चकेवा और सभी मूर्तियों को तोड़-फोड़ कर वहीं खेत में फेंक देता। बहन अपने-अपने भाई के  सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना करती। सामा की विदाई पर सब बहनों की आँखें नम हो आती  और –
साम चके, साम चके अइह हे
जोतल खेत में बसीह हे
– गाते हुए सब वापस लौट आतीं। इस तरह लगभग दस दिनों से चले आ रहे त्यौहार का समापन हो जाता।
आज जब सामा चकेवा के इतिहास को जानने के लिए कुछ पुराने साहित्य और किंवदन्तियों को खंगालने की कोशिश करती हूँ तो जो जानकारी मिल  पाती है उसमें कई विरोधात्मक पक्ष उजागर होते हैं। कहीं पर सामा और चकेवा की जोड़ी को भाई और बहन के रुप में प्रस्तुत किया गया है तो कहीं पर पति-पत्नी के रुप में। वास्तव में यह शरद ऋतु का एक गीतिनाट्य है जिसके माध्यम से मिथलांचल की बालिकाओं और वृद्धाओं का मनोरंजन होता था। इस गीतिनाट्य की विशेषता यह है कि इसमें जीते-जागते पात्र न होकर मिट्टी की मूर्तियां होती हैं और उसके माध्यम से बालिकाएं सूत्रधार बन स्वयं उन मूर्तियों से कथा के अनुसार व्यवहार करवाती हैं। इसकी कथा अति प्राचीन है और कहा जाता है कि इसकी चर्चा पदम पुराण और स्कंधपुराण में है । मूल कथा पर मतभेद है। स्कंदपुराण की कथा अनुसार सामा यानि श्यामा श्री कृष्ण की पुत्री थी और चकेवा यानि चारुवक्र उसका पति था। एक दुर्जन व्यक्ति ने श्री कृष्ण और उसके पति से चुगली कर दी कि श्यामा किसी मुनि के प्रेम में है। श्री कृष्ण ने नाराज हो कर श्यामा को पक्षी बन जाने और वृन्दावन में भटकने का शाप दे दिया। श्यामा का भाई शम्ब जो उससे अत्यधिक प्रेम  करता था अपनी बहन श्यामा के कष्ट को देख बहुत दुःखी हो गया और अपने प्रयासों से कार्तिक पूर्णिमा की रात को उसे शाप मुक्त करा, उसके  पति के पास  पहुँचा आया। इसी घटना की याद में मिथलांचल की महिलाएं सामा-चकेवा नामक त्योहार मनाती हैं। जिस व्यक्ति ने श्री कृष्ण से श्यामा की शिकायत कर उसके चरित्र को कलंकित करने की कोशिश की थी उसका नामकरण चुगला के रुप में किया गया। उसकी एक अजीब सी आकृति बना, उसके मुँह पर कालिख पोत कर उसे मिथला की महिलाएं आज भी जलाती हैं।
    पदमपुराण के अनुसार श्यामा-चकेवा को बहन-भाई माना गया है और चुगला उनके पवित्र प्रेम पर कुठाराघात करने वाला कलुषित प्रकृति का व्यक्ति। अब तथ्य चाहे जो भी हो सामा-चकेवा लोक नाटिका का प्रतिपाद्य विषय तो भाई-बहन के पवित्र, मधुर और आदर्श संबंध की स्थापना ही है। संक्षेप में कहें तो भाई की वीरता और उसकी उदारता का वर्णन, बहन की आत्मीय और प्रगाढ़ प्रेम का चित्रण,चुगला की भर्त्सना और अन्ततः श्यामा के ससुराल जाने के साथ वियोगजन्य दुःखों की अभिव्यंजना, बस यही सब समाया है इस गीतिनाट्य में।
   कुछ लोगों का कहना है की शरद ऋतु के आगमन के साथ हिमालय में जब ठंढ़ बढ़ जाती है तो रंग-बिरंगे पक्षियों का समूह मिथलांचल की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। इस सामा-चकेवा त्यौहार में भी सामा और चकेवा को पक्षी रुप में ही प्रस्तुत किया जाता है साथ ही अन्य कई तरह के पक्षी भी मिट्टी से बनाये जाते हैं
तथा एक अंतराल के बाद सामा की विदाई कर दी जाती है इस आशा के साथ कि अगले साल वह फिर अपने मायके आए। संभवतः इस त्यौहार का संबंध हिमालय से आने वाली इन्हीं शरदकालीन पक्षियों से हो क्योंकि यह त्यौहार भी सिर्फ नेपाल के कुछ भाग और मिथलांचल में ही मनाया जाता है।
  इतिहास क्या कहता है यह तो शोध का विषय है परंतु इसमें कोई शक नहीं कि सामा-चकेवा त्योहार या फिर इसे लोकनाटिका कहें या गीतिनाट्य, में मिथलांचल की समृद्ध संस्कृति का बहुआयामी झलक मिलता है। जरुरत है अपनी इस विरासत को संजोने की। कहीं ऐसा न हो कि आधुनिकता की दौड़ हमारी इन लोक संस्कृतियों को सदा के लिए मिटा दे। मैं ने तो अपने यादों की मंजूषा में उसे सँजो रखा है और ईश्वर से कामना करती हूँ कि सामा-चकेवा की भाँति सदैव सभी भाई बहनों का पवित्र प्रेम अक्षुण्ण रहे।

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