70 के दशक की पत्रकारिता का ‘सच्चा झूठ’

एक जमाने तक हिंदी में कला और सिनेमा लेखन के पर्याय जैसे रहे विनोद भारद्वाज ने हाल में ही एक उपन्यास लिखा है- ‘सच्चा झूठ’, जो 70 के दशक की पत्रकारिता को लेकर है. वह पत्रकारिता का वह दौर था जब साहित्य और पत्रकारिता में फर्क नहीं किया जाता था, जब बड़े बड़े साहित्यकार पत्रकारिता की दशा-दिशा निर्धारित कर रहे थे. लेकिन क्या वह पत्रकारिता का स्वर्ण काल था? यह जानने के लिए आपको उपन्यास पढना पड़ेगा. फिलहाल, उपन्यास को लेकर लेखक का वक्तव्य पढ़िए- मॉडरेटर 
================================================================

कुछ साल पहले मेरे चित्रकार मित्र मनजीत बावा जब कोमा में चले गये और एक दिन अखबार में इस खबर की उपेक्षा करते हुए पेज थ्री की सारी रंगीनियत के बीच हाथ में वाइन लिये एक पार्टी में एक सुन्दरी के साथ मैंने उनकी तस्वीरें देखीं, तो विचलित हो कर मैंने अपने पहले उपन्यास सेप्पुकुके तीन अध्याय लिख दिये। फिर उन्हें भूल गया। तीन-चार साल बाद दूरदर्शन की पत्रिका दृश्यांतरके प्रवेशांक के लिए सम्पादक अजित राय ने जब उस उपन्यास का एक चैप्टर छापने के लिए काफी जोर दिया, तो मैंने पुराने तीनों अध्याय भूल कर पूरा उपन्यास पूरा कर दिया। वाणी प्रकाशन के उत्साही मित्र अरुण माहेश्वरी ने उसे फौरन छाप दिया, तो मेरे मित्र और हिन्दी के अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे चर्चित समकालीन हिन्दी लेखक उदय प्रकाश ने जनसत्तामें इस उपन्यास की एक गम्भीर समीक्षा में कई महत्त्वपूर्ण सवाल उठाये। उसका अंग्रेजी अनुवाद मेरे टाइम्स के पुराने साथी ब्रज शर्मा ने किया और मुझे जब पेंग्विन और हॉर्पर कॉलिंस दोनों प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने ऑफर भेजे, तो मेरा हौसला बढ़ा। कला की दुनिया पर मैं लिख चुका था पर हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया पर लिखना बर्रे यानी शहद के छत्ते में हाथ डालने जैसा है। मैंने दिनमानसाप्ताहिक में जब नौकरी शुरू की, तो वहाँ हिन्दी के तीन सबसे बड़े साहित्यकार मेरे कोलीग थे। मैंने इतने बड़े साहित्यकारों की जटिल मनोवैज्ञानिक ईर्ष्या को काफी हैरानी से करीब से देखा। बाद में अपनी साथी तीन महिलाओं की ईर्ष्या को भी मैंने देखा पर इस साहित्यिक ईर्ष्या के सामने वह भी फीकी थी। सच्चा झूठमें यही दुनिया है और उसका निर्मम विश्लेषण है। अमेरिकी लेखक हेमिंग्वे ने उपन्यास के चरित्रों के बारे में पते की बात की है। मैंने जब अपने दोनों उपन्यास पूरे कर लिये, तो हेमिंग्वे की यह बात इंटरनेट पर पढ़ने को मिली, “”People in a novel, not skillfully constructed characters, must be projected from the writer’s assimilated experience, from his knowledge, from his head, form his heart and form all there is of him”  दिनमान के जब बन्द होने की अफवाह जोरों पर थी, तो सम्पादक और प्रसिद्ध कवि-लेखक रघुवीर सहाय के साथ मैं बात कर रहा था कि अब हम क्या करेंगे? सेंस ऑफ ह्यूमर दिखाते हुए एक प्रस्ताव छोले-भटूरे का खोमचा लगाने का भी था। मैंने कहीं पढ़ा है कि मलयाली के एक चर्चित और अच्छे कवि मछली बेच कर अपना घर चलाते हैं। अंग्रेजी के एक बड़े प्रकाशक ने मुझे हिन्दी में एक सेक्स गाइड लिखने का ऑफर दिया, यह कह कर कि रॉयल्टी भी मिलेगी। अरुण जी मुझे क्षमा करेंगे वह तो नियमित रॉयल्टी दे रहे हैं पर हिन्दी के अधिकांश प्रकाशक रॉयल्टी को ले कर बदनाम रहे हैं। मैं मनोविज्ञान का छात्र था, फ्रॉयड और विलहेम राइक आदि सभी को पढ़ा था। प्रकाशक ने कहा एक नमूने का चैप्टर लिखिए, मेरे दादाजी उसे पढ़ना चाहते हैं। मैंने सेक्स और फैंटेसी नाम से एक चैप्टर लिखा। मित्र प्रकाशक ने मुझे बुला कर एक चेक दिया और कहा, “खेद है कि हम इसे नहीं छाप पायेंगे। अंग्रेजी में हम ये सब बेचते हैं। पर दादा जी कह रहे हैं कि हिन्दी में हमारे घर की बहू-बेटियाँ भी यह सब पढ़ेंगी।पर इस तरह के लेखन के खतरे भी हैं। ओरहान पामुक ने ‘इस्तांबुलकिताब लिखी, तो उनकी माँ ने उनसे बोलना बन्द कर दिया।
            आप देखेंगे, मेरे नये उपन्यास में इस सच्ची घटना का बिलकुल दूसरी तरह से इस्तेमाल है। मैंने दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य का शायद दो प्रतिशत भी नहीं पढ़ा होगा पर विश्व सिनेमा की सभी सर्वश्रेष्ठ फिल्में मैंने कई बार देखी हैं। इसलिए मेरी लेखन शैली पर सिनेमाई भाषा का जबरदस्त असर है। हिन्दी में सेक्स शब्द से ही पाठकों और समीक्षकों को बुखार आ जाता है। पर मैं कभी सेक्स का ग्राफिक चित्रण नहीं करता हूँ। उसका उल्लेख खास तरह से होता है। मिसाल के लिए एक प्रसंग में उपन्यास में एक कम पढ़ी-लिखी लड़की हमारे इंटेलेक्चुअली स्मार्ट नायक को मास्टरबेशन के बारे में टिप्पणी कर के लगभग बेहोश कर देती है। यह एक तकनीक है। वाणी प्रकाशन के सम्पादकीय विभाग में मेरे नाम के एक वरिष्ठ मेहनती सहयोगी विनोद भारद्वाज हैं। उन्होंने मेरे उपन्यास के प्रूफ पढ़ कर कहा आपके उपन्यास में पठनीयता तो है। मैं इसे एक अच्छा सर्टिफिकेट मानता हूँ। आप इसे खरीद कर पढ़िए। मेरी एक थ्योरी है कि मुफ्त में दी किताबों को लोग रद्दी की टोकरी में डालने में देरी नहीं करते हैं।
            मैं वाणी प्रकाशन के अदिति सरीखे योग्य युवा प्रतिनिधियों को स्थापना दिवस पर मन से बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ।

‘सच्चा झूठ’ नामक उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify WooCommerce Orders and Products Export Responsive Interactive Table CardLab – Prepaid Card Selling WordPress Plugin WooCommerce Delivery Schedular – Delivery Date & Time Slots Download File Name for WooCommerce WC Marketplace Vendor Filter CTL Arcade – WordPress Plugin WPHobby WooCommerce Mini Cart B2B Marketplace Split Cart for WooCommerce Rating Stars Messages for WooCommerce