आपातकाल के 40 साल बाद: मीडिया और मोदी सरकार

एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर पड़े छापे के बाद से यह बहस तेज हो गई है कि उस छापे के माध्यम से सरकार मीडिया को क्या सन्देश देना चाहती थी? इस प्रकरण के बहाने एक सुचिंतित लेख लिखा है अरविन्द दास ने. अरविन्द पत्रकारिता से पीएचडी कर चुके हैं और एक प्रमुख मीडिया संस्थान में काम करते हैं- मॉडरेटर

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मार्शल मैक्लूहन ने एक जगह लिखा है कि नेपोलियन का कहना था कि “ विपक्ष में खड़े तीन अख़बारों से ज्यादा भय खाना चाहिए, बनिस्बत एक हजार संगीनों के (Three hostile newspapers are more to be feared than a thousand bayonets.)”. पिछले दिनों जब सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर छापा मारा तब से मुझे यह पंक्ति याद आती रही. कमियों के बावजूद एनडीटीवी निस्संदेह भारतीय टेलीविजन समाचार उद्योग में आज भी सबसे भरोसेमंद और पेशेवर पत्रकारिता का उदाहरण है.

सवाल है कि मोदी सरकार एनडीटीवी के ऊपर छापा के मार्फ़त क्या संदेश देना चाहती है? प्रथम दृष्टया वह चाहती है कि एनडीटीवी के मालिकों की रीढ़ कमान हो जाए. याद कीजिए कि आपातकाल के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी ने मीडिया के बारे में क्या कहा था. उनका कहना था- भारतीय प्रेस से झुकने को कहा गया तो वह रेंगने लगी!’

वर्तमान में जब कई समाचार चैनल, अख़बार सरकार के एक इशारे पर बिछने को तैयार हैं, वहीं एक हद तक एनडीटीवी पत्रकारिता के मूलधर्म को अपनाए हुए है. सत्ता से सवाल करने की ताकत अभी उसकी चुकी नहीं है. पर मोदी सरकार और उसके कारिंदे सवाल से घबराते हैं. क्या यह महज संयोग है कि सीबीआई के छापे से कुछ दिन पहले एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा बार-बार एनडीटीवी के ‘एजेंडा को एक्सपोज’ करने की बात कर रहे थे जब उनसे उत्तर-पूर्व में बीफ बैन के बाबत सवाल किया गया? अव्वल तो एनडीटीवी के एंकर निधि राजदान को पूछ ही लेना चाहिए था कि संबित किस एजेंडे की बात कर रहे हैं और क्या एक्सपोज करना चाहते थे?

जब ज्यादातर मीडियाकर्मी प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी लेकर ही संतुष्ट हो जाते हो ऐसे में मोदी सरकार से सवाल पूछने की जरूरत क्या है? और इस बात से किसी को आश्चर्य नहीं कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी भले लाख भाषण दें, ‘मन की बात’ कहें इन तीन वर्षों में एक भी प्रेस कांफ्रेंस करने की उन्होंने जहमत मोल नहीं ली है.

जैसा कि प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में लिखा है कि ‘एनडीटीवी के तथाकथित घोटालों को सामने लाना या उसे दुरूस्त करना सीबीआई के छापे का उद्देश्य नहीं है, बल्कि मीडिया की संभावना पर ही प्रश्नचिह्न खडा करना है.’ मोदी सरकार शुरुआती दिनों से ही मीडिया की वैधता पर सवाल खड़े करती रही है. एक मजबूत विपक्षी पार्टी के अभाव में मोदी सरकार मीडिया (जिस भी स्वरूप में वह है) को ही विपक्ष मानती है. यदि इसे वह खारिज करने में सफल हुई तो फिर उसे भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं!

सरकार के मंत्री कभी पत्रकारों को ‘प्रेस्टिटूयट’ कहते हैं तो कभी किसी एंकर के कार्यक्रमों का बॉयकॉट करते हैं. जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद पिछले साल एक इंटरव्यू के दौरान कह गए- “मेरा स्पष्ट मत है कि सरकारों की, सरकार के काम-काज का, कठोर से कठोर एनालिसिस होना चाहिए, क्रिटिसिज्म होना चाहिए. वरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.”

लेकिन वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और एंकर करण थापर कहते हैं: इस सरकार के प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने मेरे कार्यक्रम में आना बंद कर दिया है. एक प्रवक्ता ने स्पष्ट कहा कि “पार्टी आपके सवालों को पसंद नहीं करती और आपके एटिटयूड से भी दिक्कत है.”

पर यदि सरकार पत्रकारों के सवालों को पसंद करने लगे, उसकी पीठ थपथापने लगे तो किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारों के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं मानी जा सकती.

सीबीआई के इस छापे को सरकार की मीडिया नीति, मीडिया की अवहेलना और उसकी वैधता को खारिज करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए. और गहरे स्तर पर इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए आसन्न संकट के रूप में पढ़ा जाना चाहिए.

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