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सुशील कुमार भारद्वाज की कहानी ‘जनेऊ’

 

सुशील कुमार भारद्वाज ने अपने लेखन से इधर ध्यान खींचा है. उनकी इस कहानी ने मेरा भी ध्यान खींचा. पढ़कर देखिये- मॉडरेटर

रात में लोग सारी चिंताओं को दरकिनार कर सिर्फ गहरी नींद में सोना चाहते हैं. दिनभर की शारीरिक और मानसिक थकान को बिस्तर में ही छोड़ एक नई ऊर्जा के साथ नई सुबह में नई जिंदगी नए तरीके से शुरू करना चाहते हैं. लेकिन यह सुख आज मालिनी के नसीब में नहीं है. आँखों से नींद रूठ गई है. क्योंकि आज जिंदगी उसे धूल भरे अतीत के पन्नों में झाँकने के लिए मजबूर कर गई है. उस अतीत के पन्ने को, जिसे वह छूना नहीं चाहती है. वह तो सिर्फ हर गुजरते हुए दिन के साथ आगे ही बढना चाहती है. लेकिन आज वह बेबस है. उसकी सारी बुद्धि नाकाम हो गई है. वह लोगों पर हँसती थी कि सोने के लिए दवाई खाने की क्या जरूरत है? देह्तोड़ मेहनत तो करो! फिर देखो, नींद कैसे आती है. लेकिन आज पति से नींद की गोली मांगकर खाने के बाबजूद उसे नींद नहीं आ रही है. उसे सिर्फ याद आ रही है सुबह की घटना, जब वह सिर्फ असहाय मूरत बनी बैठी रही. गालियाँ सुनती रही. अपमानित होती रही. आज तक किसी ने उससे तेज आवाज में बात करने की हिमाकत नहीं की. हाथ उठाना तो बहुत दूर की बात थी. लेकिन आज प्रेम ने घर में घुसकर वह सबकुछ कर दिया जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की थी. उसकी चोटी खींचकर प्रेम ने कुर्सी में बैठा दिया था और वह कुछ न कर सकी जबकि कॉलेज में विद्यार्थी कौन कहे? किसी प्रोफेसर की भी हिम्मत उससे बात करने की नहीं होती थी. और यह सब होता रहा उसके पति के सामने. वह पति जो रिटायर्ड प्रोफेसर ही नहीं है बल्कि राज्य में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा प्राप्त पदाधिकारी भी है. कई आयोग का मेम्बर भी है. आखिर क्या हो गया पद, पैरवी और पैसा का? लोग तो कहते हैं कि धन और शानोशौकत की हवा में जाति –धर्म का बैरियर टूट जाता है. लेकिन आज वह अपनी जाति की ही वजह से पिटता रहा. दनादन थप्पड़ खाता रहा. क्या वह सिर्फ जाति का असर था जिसके भरोसे प्रेम सबकुछ आसानी से कर गया? हां. शायद वह सवर्णवादी मानसिकता ही थी जिसके आगे एक दलित का इज्जत रिरियाता हुआ नज़र आया. मालिनी को नज़र आया वह कच्चा-सुता जिसे ‘जनेऊ’ कहा जाता है. जिसकी सौगंध खाकर वह एक-एक शब्द बोल रहा था. मालिनी की आँखें फटी की फटी रह गई. लग रहा था जैसे उस जनेऊ के एक-एक धागे से असंख्य अदृश्य किरणें निकल रही थीं जिसने उन दोनों दम्पतियों को जकड़ रखा था. बेबस और लाचार कर रखा था. और प्रेम घंटे भर के तमाशे के बाद शांति से बगैर कोई खरोंच लिए–दिए वहां से चला गया.

मालिनी को याद आने लगी 5 जून 1974 का वह दिन– जब चिलचिलाती गर्मी से बेपरवाह लोग राज्य के सुदूर इलाके से पटना आए थे. दोपहर के बाद चार लाख से अधिक लोग गाँधी मैदान में जमा हो गए थे सिर्फ और सिर्फ जेपी को सुनने के लिए. सम्पूर्णक्रांति का साक्षी बनने के लिए. उस क्रांति का साक्षी बनने के लिए जिसका उद्देश्य सिर्फ इंदिरा गाँधी की सरकार को गिराना नहीं था. बल्कि इसी बहाने राजनैतिक, आर्थिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति को सम्पूर्ण क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना था. वर्षों से चली आ रही जड़ हो चुकी परम्पराओं को तोड़ कर एक नया समाज बनाना था. जात-पात,तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लेना था. उस महायज्ञ की साक्षी मालिनी भी बनी थी. गाँधी मैदान के पूर्वी छोड़ पर वह अपने प्रोफेसर के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. देख रही थी क्रांति के विस्फोट को. देख रही थी अद्भुत दृश्य को. लाखों की संख्या में लोग अपना जनेऊ तोड़ रहे थे और नारे से गाँधी मैदान गूंज रहा था-

“जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।

समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो।”

स्वतंत्रता सेनानी जय प्रकाश नारायण अपनी दुनियां में खोए हुए थे भले ही उनके बारे में अफवाहें फैलती रहती थी. कांग्रेस पार्टी तो अक्सर उन्हें अपने निशाने पर ही रखती थी. शायद उन्हें तख्तापलट कर डर उन्हीं से सबसे ज्यादे था. जब विश्विद्यालयों में गिरते शिक्षा स्तर पर चिंता जताते हुए कुछ विद्यार्थियों ने आंदोंलन का नेतृत्व करने का आग्रह जेपी से किया तो उन्होंने भी कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमती दे दी. उन्हें भी अपने ऊपर लगे आरोपों का जबाब देने के लिए एक मंच मिल गया था. लेकिन इस आंदोलन ने जिन किसी की भी जिंदगी बदली उनमें से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी एक थे. वे दोनों अलग–अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के होने के बाबजूद एक होते चले गए. प्रोफेसर साब भी पूरे दिल से मालिनी को अब श्रृंगार रस पढ़ाते-पढ़ाते श्रृंगार रस में डुबोने भी लगे थे. मालिनी को भी इस रस का ऐसा स्वाद लगा कि माता-पिता से जिद्द कर पहले वह होस्टल में रहने लगी फिर बेरोक-टोक सैदपुर में अकेले रह रहे प्रोफेसर के घर भी आने-जाने लगी. बात ऐसी नहीं थी कि प्रोफेसर साब अकेले थे. उनके पीछे उनकी पत्नी, दो बच्चे और माता-पिता गंगा के उस पार उत्तरी बिहार के एक छोटे से गाँव में किसी तरह गुजरबसर कर रहे थे. लेकिन उन्होंने हमेशा स्वयं को सबके सामने कुँवारा ही बताया. वो तो महज एक संयोग था कि मालिनी ने प्रोफेसर साब को रंगे हाथों पत्र पढ़ते पकड़ लिया तो राज खुला कि पिताजी ने घर बुलाया है -पत्नी की तबीयत बहुत खराब है. भूचाल आ गया था उसदिन. जिसे शांत करने में प्रोफेसर साब को पसीना छूट गया था. और मालिनी ने ऐसी चुप्पी साध ली थी कि प्रोफेसर साब की सारी बुद्धि रिरियाती नज़र आई. अंत में अपनी बात साफ़ –साफ़ कहने के सिवाई कोई चारा नहीं बचा- “अच्छा तुम्हीं बताओं कि इसमें मेरी क्या गलती है? बारह साल कोई शादी की उम्र होती है?…. और शादी के कुछ ही दिनों के बाद तो वह अपने मायके चली गई… मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी, तब जाकर कहीं ससुराल गया… वह भी कुछ ही दिनों के लिए. और बाद में पता चला कि मैं बाप भी बन गया. जिंदगी इतनी जल्दी बदलती चली जाएगी मुझे नहीं पता था. जबकि वो मेरे साथ कभी रही ही नहीं तो फिर मैं क्यों मान लूँ कि वो मेरा ही संतान होगा जबकि वो तो कईयों से हंसी–ठिठोली करती है. ऊपर से शक्ल न सूरत. मुझे तो घिन आती है. न रहने-सहने का सऊर न बोलने-चालने का ढ़ंग. पूरा का पूरा गोबर का चोथ. वो तो घरवालों की बात थी कि उसे घर में लाकर बैठा दिया हूं. और जब कभी घर जाता हूँ तो मजबूरी में उसके साथ सो लेता हूं. वर्ना कहाँ मैं प्रोफेसर और कहाँ वो अनपढ़ गँवार देहाती औरत… कहती है मैं ही उसका देवता हूँ जैसे मैं रखूँगा वैसे ही रहेगी. दोनों बेटे के सहारे ही वह पूरी जिंदगी गुजार लेगी. लेकिन मैं तो नहीं न गुजार सकता? सभा-सोसायटी में कैसे मैं उसे ले जा सकता हूँ? इज्ज़त-प्रतिष्ठा भी कोई चीज होती है कि नहीं?”

इतना कुछ बोलने के बाबजूद भी मालिनी सिर्फ हूँ-हां करके वहां से चली आई. और कई दिनों तक वह प्रोफेसर साब से मिली तक नहीं. अपने कमरे में ही सिमटी रही. दुनियाभर की चिंताओं से घिरी रही. दुनियादारी और झूठ-फरेब की कहानियां पढ़ती और सुनती रही. सच और झूठ की परिभाषा खोजती रही? अपने जीवन की चिंता में वह गलती रही. जिसके प्रेम में घरवालों से लड़कर अलग हुई वही झूठा निकला तो वह किस पर भरोसा करे? कष्टकारी मानसिक द्वंद्व के बाद वह अपने घर लौटने की बात सोचने लगी. अभीतक घरवालों को कोई विशेष जानकारी इस रिश्ते की नहीं थी. सोचने लगी -पता नहीं बाद में क्या होगा? जब वह माँ से घर लौटने की बात की तो माँ बहुत डर गई. किसी अन्होनी के डर से उसका आवाज थरथराने लगा. उसकी कुशलता जानने के लिए तरह –तरह के सवाल कुरेदती रही लेकिन वह जबाब इतना ही देती रही कि “अब आगे कॉलेज करने की विशेष जरूरत नहीं है. वह सीधे परीक्षा में बैठ सकती है. फिर फिजूल में घर से बाहर क्या रहना?” अंत में माँ बोली-“पापा से बात करती हूं. जल्द ही तुम्हें वापस लिवा लावेंगें”. मालिनी को कुछ तसल्ली मिली. वह अपना सामान समेटने में लग गई. हर गुजरतेदिन के साथ उसका दर्द नासूर बनके चुभता था. जिंदगी में सबकुछ उसे बेकार लगने लगा. बरसता हुआ हर बारिश का बूंद उसे पिघलता हुआ घाव नज़र आता था. एक दिन उसके पिता आए और सारा कागजी खानापूर्ति करने के बाद अपने साथ वापस ले गए. होस्टल छोड़ने के पहले वह अकेले में खूब रोई. खुद को खुद ही दिलासा देती रही. और सबकुछ भूलकर नई जिंदगी जीने का प्रण करती रही. कभी दुबारा प्रोफेसर का नाम नहीं लेने का प्रण करती रही. लेकिन कभी उसके मुँह से प्रोफेसर के लिए बददुआ नहीं निकली. चेहरे के भावों को नियंत्रित करना सीख गई थी लेकिन दिल और दिमाग के अंदर मचे कोहराम कभी उसे चैन से नहीं रहने देते थे. घर में अक्सर अपनी चंचलता से धमाल मचाने वाली मालिनी अब वह नहीं रही. जिंदगी को स्वीकारना सीख गई थी. गिलाशिकवा करना भूल गई थी. कम बोलना सीख गई थी. जिंदगी में सुखी रहने के मंत्र- कम खाना, गम खाना और कम बोलना सीख गई थी. लेकिन एकांत में कभी-कभी खूब रोती थी. कभी-कभी वह प्रोफेसर के साथ बने अपने रिश्ते पर खुद ही हँसती भी थी. कहती- “जिंदगी में एक प्यार भी नसीब नहीं हुआ. मिला भी तो शादीशुदा-बालबच्चों वाला एक प्रोफेसर”.

जब कभी घरवाले उससे पूछते -“सबकुछ ठीक तो है न? इतनी शांत क्यों रहती हो? देह गलते जा रहा है. खुद पर ध्यान दिया करो. सिर्फ पढ़ाई–लिखाई से ही सबकुछ नहीं होता है…..” तो बीच में ही उनलोगों की बात काटते हुए साफ झूठ बोल जाती- “होस्टल में अकेले रहने की आदत पड़ गई है न! एकांत ही अच्छा लगता है. क्या और क्यों किसी से बेकार में बकबक करूँ?”  घरवाले उसके जबाब पर कंधा उचकाते और मुँह बनाते हुए शांति से आगे बढ़ जाते.

उस दिन जब मालिनी परीक्षा फॉर्म भरने विश्वविद्यालय पहुंची तो प्रोफेसर दरवाजे पर ही दिख गया. मालिनी का चेहरा अचानक अजीब तरीके से खिल उठा. लगा जैसे बहुत बड़ी खुशी मिल गई हो. लेकिन पल भर में ही वह संयत हो गई. नजर दायें-बायें घुमाकर शांत भाव से आगे बढ़ गई. प्रोफेसर मालिनी के इस व्यवहार से विचलित हो वह चक्कर पर चक्कर लगाने लगा ताकि वह उससे एकांत में बात कर सके. और जब विभाग के अंदर एक बार मौका मिला तो बेचैन हो- “तुम्हारा ये व्यवहार मुझे कुछ समझ नहीं आया? तुम होस्टल छोड़कर भी चली गई बिना कोई सूचना दिए?”

-“मुझे आपसे पूछकर कोई काम करना चाहिए? कौन होते हैं आप मुझसे सवाल करनेवाले?” – मालिनी ने सख्त आवाज में जबाब दी.

इस अप्रत्याशित जबाब से पहले तो प्रोफेसर साब बुरी तरह उछल पड़े. चेहरे का भाव बदल गया. फिर खुद को नियंत्रित करते हुए- “आप जो कह रही हैं वह शायद सही ही कह रही हों. लेकिन मुझे लगता है कि आपको एक बार मुझसे बात करनी चाहिए. भावना में बहकर लिया गया कोई भी निर्णय सही नहीं होता है. शांति से एक बार विचार करने में कोई बुराई नहीं है. कोई जोरजबर्दस्ती की बात तो है नहीं.”

– “झूठ-फरेब पर खड़ी रिश्ते की ईमारत ठहरती ही कितनी देर है जो आगे कुछ बात करूँ?”- सख्ती से मालिनी बोली.

शांतभाव से अपनापन दिखलाते हुए प्रोफेसर- “अभी जो कुछ भी तुम बोलोगी मैं सुनने को तैयार हूँ. तुम्हारे सारे गुस्से को झेलने के लिए तैयार हूँ. यदि तुम हाथ भी चला दोगी तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा क्योंकि मैं तुम्हारे अंदर चल रहे दर्द को महसूस कर सकता हूँ. तुम्हारी जगह कोई और भी होती तो वो भी शायद ऐसे ही पेश आती.”

इतना सुनते ही मालिनी का चेहरा रूआंसा हो गया और वह फुट फुट कर रोने लगी. प्रोफेसर ने जेब से रूमाल निकालते हुए मालिनी की ओर बढ़ाया और कंधे पर थपकी देते हुए शांत रहने के लिए कहा -“हिम्मत से काम लो. ऐसे बच्चे की तरह नहीं रोते. मैं तुम्हारे साथ हूँ न! फॉर्म का काम कर लो तो मैं तुम्हारे साथ गंगा किनारे चलता हूँ. वहीं आराम से बातें होगीं. फिर जो उचित लगे वही करना.”

मालिनी फॉर्म भरकर चुपचाप विभाग के आगे खड़ी हो गई. विभाग में तब तक कई और प्राध्यापक आ चुके थे तो प्रोफेसर साब चुपके से अपना बैग ले अपने साथियों से कुछ कहकर वहां से निकल पड़े. कॉलेज से कुछ दूर कालीघाट पर ठंढ़ी हवा चल रही थी. मालिनी गंगा के पानी को देखते देखते प्रोफेसर के साथ घाट किनारे एक पत्थर पर बैठ गई तब प्रोफेसर ने कहना शुरू किया -“मालिनी! बातचीत का कोई न कोई तो सिरा होना ही चाहिए. लेकिन दु:ख इस बात का है कि पता नहीं -मेरी कौन-सी बात तुम्हें सच लगेगी और कौन-सी तुम्हें काँटे की तरह चुभेगी जो तुम्हारे गुस्से को और बढ़ा दे. …… लेकिन मैं क्या करूँ? सच को कहीं न कहीं तो बयां करना ही होगा.” मालिनी का हाथ पकड़ते हुए -“देखो! ये सच है कि मेरी शादी हो चुकी है. मेरे दो बच्चे हैं. लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं है. मेरे लिए वे सिर्फ और सिर्फ बंधन के रिश्ते हैं जिसे मुझे निभाना ही पड़ेगा अब चाहे जैसे भी हो. लेकिन जिनसे मुझे कोई सुख ही नहीं उसका ढ़िंढ़ोरा क्यों पीटूँ और किस-किस के पास पीटूँ?  उससे फायदा ही क्या मिलना है? यदि तुम मेरे इतने पास नहीं होती और मेरे घर नहीं जाती तो क्या तुम मेरे बारे में यह सबकुछ जान पाती? नहीं ना? हर इंसान का अपना दर्द होता है? हर दुखी इंसान अपने टूटे सपनों को दिल में दबाकर अंधेरी रात में रोता है? तकिये को गीला करता है. मेरे भी कुछ सपने हैं. मैं कब तक समझौता करूँ? कब तक मैं खुद को तिल-तिल कर मारता रहूँ? क्या मैं इंसान नहीं हूँ? मुझे अपने तरीके से जीने का हक नहीं है? मैं क्यों माता-पिता से मिले सामाजिक रिश्ते के बंधन की गुलामी करूँ? और ऐसा तो कहीं नहीं लिखा है कि पुरूष दूसरी शादी नहीं कर सकता? मेरी एक पत्नी गाँव में रहे पैतृक सम्पत्ति पर हक जमाए. खाए-पीए और जिए. लेकिन तुम्हें मैं अपने साथ रखने के लिए तो तैयार हूँ. तुम पढ़ी-लिखी हो, मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल तो सकती हो. तुम्हें सभा-सोसाइटी में ले जाने में मुझे कोई हिचक तो नहीं. बच्चे जन्माना और उसी की परवरिश में जिंदगी गुजार देना ही सबकुछ तो नहीं? पढ़ाई का सदुपयोग करना. जीवन को समृद्ध करना, अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना भी जरूरी है. जन्म लेने वाला हर जानवर भी अपनी मौत तक के सफर को किसी न किसी तरीके से तय कर ही लेता है फिर मनुष्य और जानवर में फर्क ही क्या रह जाता है? यूं भी प्रेम में त्याग का महत्व है स्वार्थ का नहीं. फिर भी मेरे नौकरी के पैसे पर तुम्हारा हक रहेगा. पेंशन-अनुकम्पा सारी सुविधाएं तुम्हें दे सकता हूँ. अपनी पहुँच के सहारे तुम्हारे उज्जवल भविष्य के लिए जो कुछ भी संभव होगा, करने को तैयार हूं…… और तुम्हीं बताओ कि एक इंसान को किसके साथ रहना चाहिए जिससे प्रेम हो या जिससे सिर्फ सामाजिक बंधन का रिश्ता हो?”

– “सबकुछ मानती हूँ लेकिन झूठ का क्या?”

– “मैनें झूठ कब बोला? तुमसे मैंने कब और क्या कहा? तुम मुझसे कभी कुछ पूछी जिसका जबाब मैंने नहीं दिया या आनाकानी की? तुम  इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार होकर भी मूर्खों की तरह बात करती हो? कान देखने की बजाय कौआ को देखती हो? लोग तो बहुत कुछ कहते हैं लेकिन वही तो सच नहीं? अब विशेष क्या कहूँ? तुम बच्ची तो हो नहीं? अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो. मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि -जिंदगी में तुम्हारा साथ मिल जाए तो बहुत ही खुशी होगी और मैं चाहूँगा कि तुम भी अपने पैरों पर खड़ा हो अपनी एक पहचान बनाओ………..”

प्रोफेसर साब अपनी बात पूरी कर पाते उससे पहले ही एक झटका लगा. लगा जैसे किसी ने उन्हें गंगा में धकेलने की कोशिश की. मालिनी अचानक हुए हमले को समझ पाती उससे पहले ही उसकी नजर प्रोफेसर की गर्दन पकड़े अपने चचेरे भाई पर गई, जो दरभंगा हाउस में ही पीजी की पढ़ाई कर रहा था. किसी तरह उसकी नज़र इन दोनों पर पड़ी और और वह आक्रामक रूप में अपने साथियों के साथ आ धमका. मालिनी कुछ सोच पाती. कुछ कह पाती उससे पहले ही वे लोग प्रोफेसर चौधरी को पीटते पीटते घाट से सड़क तक ले गए. मालिनी अवाक् होकर सिर्फ सारा तमाशा देखती रह गई. बहुत ही कम समय में पूरा नज़ारा ही बदल गया. प्रोफेसर चौधरी सड़क पर बेल्ट से मार खाता रहा. माँ –बहन की गाली सुनता रहा. हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता रहा. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था अशोक राजपथ पर. एक भीड़ थी जिसके लिए यह सब तमाशा था. कॉलेज के बच्चे थे जिनकी नज़रों में वे चरित्रहीन थे. जो इसी के लायक थे. वो तो शुक्र था कि उधर से थाना की गाड़ी गुजरी और मजमा समाप्त हुआ. प्रोफेसर साब को पीएमसीएच में ईलाज के लिए भर्ती करवाया गया.

उस घटना के बाद से मालिनी का घर से निकलना भी लगभग बंद हो गया. वो सिर्फ भाई के बाईक पर ही बैठकर पटना साईंस कॉलेज में परीक्षा देने आती थी. लेकिन परीक्षा के आखिरी दिन मालिनी का भाई बाहर में इंतजार ही करता रह गया लेकिन मालिनी वापस नहीं आई. वह पूरे कॉलेज में एक-एक कोना ढ़ूंढ आया लेकिन वो नहीं मिली. घर में सब परेशान थे कि आखिर जवान लड़की चली कहाँ गई? घरवालों ने शक के आधार पर प्रोफेसर को ढ़ूढ़ना शुरू किया तो पता चला कि वह तो एक सप्ताह पहले ही छुट्टी लेकर चार वर्षों के लिए अवैतनिक अवकाश पर चला गया है. निराश हो घरवालों ने थाना में सिर्फ गुमशुदगी की एक रपट लिखवा दी, और समाज में अपनी इज्ज़त बचाने के लिए तरह-तरह की कहानियां गढ़ ली.

कोई चार वर्षों के बाद मालिनी फिर पटना में दिखाई दी. तब तक काफी कुछ बदल चुका था. वह प्रोफेसर के साथ शादी के बंधन में बंध चुकी थी तो अपने परिवार से सारे रिश्ते खो चुकी थी. पिता ने शर्म से आत्महत्या कर ली थी तो माँ बिखरते परिवार की चिंता में बिस्तर पकड़ चुकी थी. बीपी के कारण दो बार पैरालाइसिस का अटैक हो चुका था. छोटी बहन की शादी की बात बार-बार बिगड़ जा रही थी. भाई ने धमकी दे रखी थी कि घर में यदि किसी ने मालिनी से कोई संबंध रखा तो वह भी बाबूजी की तरह मौत को गले लगा लेगा. बच ही क्या गया था? भाई अक्सर कहता था – “जमींदार घराने की लड़की होकर भी उसने कोई लाज-लिहाज नहीं की. एक चौधरी के साथ चली गई. जिसका छुआ घर में कोई खाता तक नहीं उस अछूत को अपने हाथों खाना बनाकर खिला रही है. छी: छी:… अपनी राजनीति चमकाने के लिए गांधीमैदान में बूढ़े जेपी ने जनेऊ तोड़ने का नारा दे दिया तो क्या हम अपना संस्कार भूल जाएंगे? नेता का क्या है? वह तो डोम-चमार के घर भी जाकर खा लेता है. तो क्या हम भी वही काम कर लें?…….समानता का मतलब क्या है? अपना संस्कार छोड़ देना? दूसरे को अपनी तरह उन्नत बनाने की बजाय खुद को ही अवनत कर लेना? नैतिकता की तिलांजलि दे अनैतिकता को ग्रहण कर लेना? प्रोफेसर से शादी कर लेना? वह भी शादीशुदा और दो-तीन बच्चों के बाप से? क्या यही संस्कार है? वाह रे जेपी! बहुत खूब कहा तुमने भी.”

हाँ, अनैतिकता के सहारे कितनी नैतिकता की बात की जा सकती है? जैसे सत्ता पाने वाले नेता लूट-खसोट में जुट गए. आरक्षण की आड़ में जातिवाद का नंगा नाच कर गए. वैसे ही कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ाई की जगह चोरी-चमारी को प्रोत्साहित कर गए. तब न शान से बच्चे परीक्षा में चोरी करते थे. और कहते थे-

“चोरी की सरकार है

चोरी ही अधिकार है.”

वैसे भी जेपी को कोई कितना और क्यों दोष दें? चाल तो चालबाज नेताओं ने चली जो एक बुजुर्ग होते स्वतंत्रता सेनानी को अपने नापाक मंसूबों को फलीभूत करने के लिए इस्तेमाल कर लिया.

 मालिनी प्रोफेसर के साथ एक नई दुनियां में रहने लगी. लेकिन दुर्दुराने वालों की भी कमी नहीं थी. उसे दुःख तो तब होता था जब अपना काम करवाने के लिए लोग अच्छी –अच्छी बात बोलकर आ जाते थे और काम होते या बिगड़ते ही जाति-सूचक गाली भी देते थे और मुफ्त की सलाह भी. इनसब से परेशान हो उसने लोगों से मिलना छोड़ दिया. खुद को कमरे तक सिमटती चली गई. सामाजिक आयोजनों में जाना छोड़ दी. अब वह सिर्फ खुद को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ाई करने लगी. परिवार में पति-पत्नी के अलावे तीसरा कोई था भी तो नहीं. शुरू में मालिनी को बच्चे की इच्छा नहीं थी जिसकी वजह से वह बार-बार गर्भपात करवाती रही और बाद में डॉक्टर ने ही जबाब दे दिया. बाद में तो, वो एक कुत्ता भी पाल ली और उसी के सहारे एकांत में मन बहलाने लगी.

वर्षों बाद जेपी के सिपाही जब राज्य में सत्तारूढ़ हो गए तो राजनीतिक फायदा प्रोफेसर चौधरी को भी मिला. विश्विद्यालय में वह विभागाध्यक्ष तो बने ही विभिन्न कमेटियों के भी सदस्य बने. और जब राज्य में व्याख्याताओं की बहाली होने लगी तो मालिनी को भी एक नौकरी किसी तरह मिल ही गई.

लेकिन माँ की मृत्यु होने पर लगभग 25 वर्षों के बाद जब मालिनी अपने घर गई तो काफी कुछ बदल चुका था. न घर वैसा था न घरवाले. रिश्तों की गर्माहट में उतार-चढ़ाव इतना अधिक था कि वह समझ नहीं पा रही थी कि वह वहां आकर खुद को सम्मानित महसूस कर रही है या अपमानित. भाई के खस्ताहाल घर में वह बहुत कुछ मदद करना चाह रही थी लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं था. मीठी बातों में फंसा सारी मदद वापस कर दी जा रही थी. बहनों ने शुरू में, एक लम्बें अरसे बाद मिलने पर बहनापा दिखलाया था. लेकिन एक-दो दिन के बाद ही उस व्यवहार में भी कहीं-न-कहीं रूखापन आ गया. रिश्तों की गर्माहट और आत्मीयता क्षीण होती लगी. नकली मुस्कुराहट, जरूरत से ज्यादे मिलता भाव कहीं न कहीं उसके मन को कचोट रहा था. कुछ भी स्वाभाविक नहीं लग रहा था. कभी–कभी तो लगता था कि घर का एक–एक कोना उसे धिक्कार रहा है. पिताजी की कराहें सुनाई पड रही हो. पिताजी की तस्वीरों में उनका निराश चेहरा नज़र आता था. भाई के बच्चे थे तो बहनों की भी छोटी–बड़ी कई संताने थीं. सभी अपनी माँओं को दुलारती, फुसलाती, झगड़ती थी लेकिन मालिनी के आते ही सब शांत हो जाते थे. कोई मालिनी के पास बैठना नहीं चाहता था. कभी वह बच्चों से अपनापन दिखलाने के लिए रुपए देने की कोशिश करती तो न बच्चे लेते न उनकी माँ लेने देतीं. बच्चों में इस नए रिश्ते के प्रति कोई खास दिलचस्पी भी नहीं थी. सिर्फ शिवानी कभी-कभार उससे दो-चार बातें कर लेती थी. शिवानी उसकी सबसे छोटी बहन की बेटी थी. शिवानी अपने माता-पिता के साथ गाँव में ही रहती थी क्योंकि उसकी माँ की शादी सुदूर गाँव में हुई थी. मालिनी के प्रोफेसर से शादी कर लेने के बाद जो सबसे बड़ी समस्या आई थी वह थी शिवानी की माँ की शादी. सारी कोशिश और अधिक दहेज देने के लिए तैयार रहने के बाबजूद उसके रिश्ते को किसी अच्छे परिवार में संस्कार और जाति के नाम पर स्वीकार नहीं किया गया था. भाई रिश्ते की तलाश करते करते थककर बैठ गया था. वो तो दूर के एक रिश्तेदार ने गाँव में ही किसी बेरोजगार से शादी कर देने का प्रस्ताव दिया, जो कि माँ को जँच गई और घर के सारे सदस्यों के इच्छा के विरूद्ध जाते हुए शादी करवा दी. आस-पास के कई लोगों ने भी माँ को समझाने की बहुत कोशिश की. लेकिन माँ कहती रही- “मेरे मर जाने के बाद इसे कौन देखेगा? भाई-भतीजे के भरोसे कैसे छोड़ दूँ? शादी हो जाएगी तो कम से कम अपने घर में तो रहेगी? कहने को उसे भी तो अपना एक घर-परिवार होगा? दु:ख की घड़ी में मुझे ताना तो नहीं देगी? बेरोजगार है लड़का, गरीब तो नहीं? खेतीबाड़ी से कम-से-कम पेट तो पाल सकता है?बाँकी नसीब को कौन जानता है? पढ़ी-लिखी है. कोई ढ़ंग की नौकरी-चाकरी देख ले. फिर शहर में ही रहे न? कौन उसे मना करता है?  अब किसी की गलती की वजह से दूसरे की जिंदगी बर्बाद तो नहीं की जा सकती न? जो हो गया उसके लिए रोने से क्या मिलेगा? जो संभव है. वश में है. वही क्यों नहीं किया जाए?”

शिवानी मौसी से दस दिन में ही इतनी घुलमिल गई कि मालिनी जब उसे अपने पास कुछ दिन रखने की बात कही तो वह बहुत खुश हो गई. माँ-बाबू जी से मौसी के पास रहने की जिद्द करने लगी. शिवानी के पिता उसके जिद्द के सामने झुक गए और वह मौसी के साथ रहने लगी.

शिवानी को तो खुला राज मिल गया था. दस बजे तक मौसा-मौसी कॉलेज चले जाते थे और वह बंद कमरे के अंदर या तो दिनभर सोती थी या दिनभर टीवी देखती रहती थी. खाने-पीने की भी पूरी छूट थी. शाम में मौसी कुछ -न-कुछ हमेशा लेती ही आती थी. कभी-कभी उसे अकेले में डर भी लगता था लेकिन यहाँ पर उसे मन लग गया था. न भाई से लड़ना न माँ की मार. जब शिवानी अपने पिता के साथ अपने गाँव उत्तर बिहार जाने को तैयार नहीं हुई तो मौसी उसका नाम पास के ही स्कूल में लिखवा दी. अब तो लगभग तीनों एक ही साथ घर से निकलते और शाम में एक ही साथ लौटते थे.

समय कब निकल गया पता ही नहीं चला? शिवानी कॉलेज में पहुंच गई. उसके शरीर ही नहीं मन में भी बहुत बड़ा बदलाव आ गया. बचपन से मिली स्वतंत्रता ने उसके विचारों को भी स्वच्छंद बना दिया. उसे तो अब मौसी की बात भी अच्छी नहीं लगती थी. उसे ब्वॉयफ्रेंड से घंटों बात करने पर रोकटोक करना बिल्कुल पसंद नहीं था. लेकिन मौसी परेशान थी कि लड़की दिनभर ऑरकुट जैसे सोशल मीडिया में लगी रहती है. जाने किस-किस जान-अंजान से दिन भर चैट करती रहती है. सिगरेट और शराब की बोतल जिस दिन कॉलेज से लौटने के बाद मौसी डाईनिंग रूम में देखी उस दिन उसके आँखों के आगे अंधेरा छा गया. सदमे से वह एक ही जगह खड़ी की खड़ी रह गई. सिर्फ उसके आंखों से आंसू बहने लगे. लगा जैसे लड़की उसके हाथ से निकल चुकी है. उसके पीठ पीछे अब घर में क्या-क्या होता है? कहना मुश्किल. और शिवानी के मुँह से जब शराब की गंध आ ही रही थी तो विशेष शक-सुबहा की बात ही कहाँ शेष रहती है? कॉलेज जाने के बदले शिवानी कहाँ किसके साथ घूमती रहती है? कौन जानता है? अब वो ये बात किससे कहे? कितनी बदनामी होगी? लोगों को कहते देर न लगेगी कि दूसरे की लड़की को बिगाड़ दी? अपने स्वार्थ में बर्बाद कर दी?  मालिनी को अपने कॉलेज के दिन याद आने लगे. उसका शरीर ऊपर से नीचे तक कांपने लगा कि -क्या यह लड़की मेरी ही तरह घर में बागी बनेगी? घर-परिवार के इज्ज़त को आग में झोंकेगी? मेरी ही तरह जिंदगी भर कष्ट भोगेगी?

मालिनी का चेहरा सख्त हो गया – “नहीं, नहीं! मेरे जीते जी तो शिवानी अब दूसरी मालिनी नहीं बन सकती है. मैं अपने ऊपर अब दाग नहीं ले पाऊँगी. मैं इसकी शादी यहीं कहीं करवा दूँगी अपनी बेटी कहकर. क्योंकि अब ये ग्रामीण परिवेश में निर्वाह नहीं कर पाएगी और सारी बातें भी दब जाएंगी. शायद यही मेरा पश्चाताप भी हो. शायद सारे भाई-बहनों का प्यार इसी बहाने वापस पा सकूँ. मैं इतना किसके लिए कमाती हूँ? एक लड़की की ब्याह तक नहीं करवा सकती? इतना भी अपने बहन के लिए नहीं कर पाऊंगी तो भला ऐसी जिंदगी का क्या लाभ?”

और वह तब से एक अच्छे सजातीय लड़के की तलाश में जुट गई. कोई डेढ़ वर्ष की तलाश के बाद एक नौकरीपेशा लड़का मिला जो कम ही पैसे में शादी के लिए भी तैयार हो गया. लड़का के घरवाले उनके सामाजिक और राजनीतिक रसूख से ही प्रभावित हो गए थे. इतना बड़ा घर-परिवार और एकलौती बेटी. आज नहीं तो कल सबकुछ लड़के का ही तो हो जाएगा. और राजनीतिक संपर्क का फायदा भी कहीं न कहीं जीवन में तो मिलेगा ही. लड़का नौकरी कर ही रहा है, लड़की भी कर ही लेगी. फिर दहेज के चक्कर में क्या पड़ना? तब तक शिवानी भी थर्ड ईयर में आ चुकी थी. और मौसी के कुछ दबाब और नियंत्रण में भी. उसे भी लगने लगा कि पता नहीं उसके माता-पिता उसकी शादी किसी नौकरीपेशा वाले से करवाने में सक्षम भी होंगें कि किसी किसान के हाथों ब्याह देंगें?शिवानी को भी भौतिकवादी दृष्टिकोण से फायदा ही फायदा दिखा इसलिए भी वह मौसी के हाँ में हाँ मिलाने लगी और अपने कुछ गतिविधियों पर भी नियंत्रण करने लगी.

तीन महीने की तैयारी के बाद शिवानी की शादी हो गई. लेकिन उसे ससुराल में वह आजादी नहीं मिली जो उसे मौसी के यहां मिली हुई थी. मौसी के यहां नौकरानी घर का काम करने व खाना बनाने आती थी लेकिन ससुराल में तो अचानक ही खाना बनाने, बर्तन धोने और कपड़ा धोने की जिम्मेदारी भी आ पड़ी. जिससे उसे काफी परेशानी होने लगी. ऑरकुट पर लगे रहने, चैट करने या लम्बे समय तक फोन पर बात करने की वजह से ससुराल में अक्सर ही उसे ताने सुनने पड़ते थे. मामला बिगड़ता ही चला गया. और आखिरकार एक दिन शिवानी घर में हंगामा करके अपने मौसी के पास लौट आई. मौसी शिवानी को समझाने की बजाय शिवानी के ससुराल वाले को ही भला-बुरा कहने लगी. घर में नौकर आदि रखने की सलाह देने लगी. कई बार तो वह शिवानी के पति प्रेम को ही दहेज-प्रताड़ना आदि के नाम पर केस करने की भी धमकी दे चुकी थी. प्रेम को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह कहे तो क्या कहे? उसे लगने लगा जैसे उसकी जिंदगी उलझ गई हो. एक क्लर्क एक प्रोफेसर के स्टेटस की बराबरी कैसे कर सकता है? उसे तो ऐसी शादी ही नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था? वह दु:खी हो निराशा में अपनी जिंदगी जीने लगा.

और उस दिन अहले सुबह प्रेम मालिनी के घर अचानक ही बहुत गुस्से में पहुंचा. शिवानी को खोजा तो पता चला वह शहर से कहीं बाहर दोस्तों के संग घूमने गई हुई है. उसका गुस्सा और सातवें आसमान पर पहुँच गया. उसने हाथ में लिए अखबार को मालिनी और प्रोफेसर चौधरी के सामने टेबुल पर पटकते हुए कहा– “तुम्हारी इतनी बड़ी हिम्मत कैसे हुई? तू मेरे घर में घुसने का साहस कैसे किया था रे हरामी की औलाद?” इस अप्रत्याशित घटना से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी की आँखें फटी की फटी रह गई. प्रोफेसर साब जबतक कुछ समझ और बोल पाते उससे पहले ही प्रेम ने उन्हें दो थप्पड़ रशीद कर दिया. मालिनी ज्योंहि वहां से हिलने की कोशिश की प्रेम ने उनकी चोटी कसकर खींचा और कुर्सी में लाकर पटक दिया. कहता रहा- “अरे रंडी! तेरी शादी नहीं हो रही थी जो इस चौधरी के लिए मर रही थी. तेरे बाप की औकात नहीं थी तेरी शादी कराने की जो इस नीच के साथ जाति भ्रष्ट कर ली और मेरी भी कर दी. आज तो तू उससे भी अधिक गुनाहगार लग रही है…” वह उसे दांत पर दांत चढ़ा कर एक से एक भद्दी गालियाँ देता रहा. लगा जैसे कोई शीशे को खौलाकर उसकी कानों में उड़ेल रहा हो. और प्रेम अपनी जनेऊ खींच दोनों हाथों को जोड़े सौगंध खाता रहा कि वह अब शिवानी को एक पल के लिए भी अपने पास नहीं रखेगा. वह उसे तलाक दे देगा. तलाक शब्द सुनते ही मालिनी की आँखें बंद हो गईं और आंसू उसके आंखों के कोरों से बहने लगी. वह अब क्या बोल रहा था? कुछ भी उसे सुनाई नहीं पड़ रही थी. अंत में प्रेम अपने अंदर का सारा जहर उगलने के बाद शांत पड़ गया, मालिनी को ही आदेश देते हुए बोला – “प्यास लगी है. पानी पिलाओ.” मालिनी धीमी कदमो से उठी और एक प्लेट में मिठाई और एक गिलास में पानी लेकर सामने टेबल पर रख दी. पानी तो पी लिया लेकिन कुटिल मुस्कान के साथ उसने कहा- “आज धोखा नहीं दी होती, तो शायद ऐसा दिन देखने को नहीं मिलता. सोचा था तुम्हें कभी बेटे की कमी महसूस होने नहीं दूँगा. तुम्हें एक बेटे से भी बढकर मानूंगा लेकिन तुमने वह हक खो दिया. कितना आश्चर्य है कि तुमने इस दलित चौधरी को सामंती चौधरी बनाकर मेरे घर में घुसा दिया. तुम्हें रत्तीभर भी शर्म नहीं आई….. खैर, आज से हमलोगों का रिश्ता खत्म. मान लूँगा कि शिवानी मेरे लिए मर गई. यूं भी मेरे घर में उसका सामंजस्य संभव नहीं है. जल्द ही मैं तलाक के पेपर भिजवा दूँगा. तुमलोग भी शांति से रहो और मैं भी.”

प्रोफेसर चौधरी से मुखातिब हो– “प्रोफेसर साब! जिंदगी और राजनीति में बहुत बड़ा फर्क होता है. लेकिन स्वार्थी लोगों के दिमाग में ये बात आती कहां हैं? झूठ-फरेब पर खड़ा रिश्ता ज्यादे समय टिकता ही कहां है? आप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन मेरी अंतरात्मा इसे कबुल नहीं करती है. रिश्ते का आखिरी प्रणाम!” कहते हुए उसने हाथ जोड़ दिया और चुपचाप वहां से हमेशा हमेशा के लिए फिर न कभी लौटने के वादे के साथ चला गया. मालिनी और प्रोफेसर चौधरी दरवाजे से उनकों जाते देखते रह गए. लगा जैसे बहुत कुछ समाप्त हो गया. हाथ से कुछ निकलता जा रहा है. रोकने की इच्छा होने के बाबजूद वे रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. तब से मालिनी कुर्सी में जो बैठी, तो  दिनभर अखबार के उस खबर को देखती रही जिसमें प्रोफेसर चौधरी को पासी जाति के आधार पर विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की बात छपी थी.

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