रख्माबाई: हिंदू कानून और बाल विवाह

19वीं सदी के उत्तरार्ध तथा 20 वीं सदी के पूर्वार्ध में स्त्री से जुड़े मुद्दों को लेकर सुरेश कुमार लगातार लिखते रहे हैं। यह लेख उन्होंने रख्माबाई पर लिखा है, जिन्होंने स्त्री अधिकारों को लेकर उल्लेखनीय लड़ाई लड़ी थी-

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उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत का शासन महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया था। विक्टोरिया के शासन आने से पितृसत्ता का दायरा थोड़ा कमजोर हुआ था। विक्टोरिया शासन ने आते ही उच्च श्रेणी या परदादार स्त्रियों के लिये जानना स्कूल खोलने का काम किया। स्त्री शिक्षा का जैसे-जैसे प्रसार हुआ, स्त्रियों में अपने अधिकारों को प्रति एक ललक और चेतना विकसित होने लगी थी। उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध स्त्री चिंतन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है। आठवें दशक में स्त्रियों ने बाल विवाह और बेमेल विवह की पुरजोर मुख़ालफ़त करना शुरु कर दी थी। 19वीं सदी के आठवें दशक में रख्माबाई के संघर्ष ने बाल विवाह पर एक नये सिरे से बहस की शृरुआत कर दी थी। आठवें  दशक के हिंदू विचारक और हिंदी के संपादक रख्माबाई के केस से सकते में आ गये थे। कुछ संपादकों ने कहा कि रख्माबाई उच्च श्रेणी की हिंदू औरत नहीं है, वह शूद्र वर्ग की बढ़ई जाति की महिला है। इसलिये वह अपने पति को तलाक आदि दे सकती है। आठवें दशक में रख्माबाई ने बाल विवाह के मसले पर हिंदू कानून की कलई खोल कर रख दी थी। इस लेख में रख्माबाई और उनके संघर्ष चिंतन पर विचार विमर्श किया गया है।

रख्माबाई का जन्म 22 नवम्बर 1864 में महाराष्ट्र में हुआ था। इनके पिता का नाम जनार्दन पाडुरंग था और माता का नाम जंयती बाई था। जयंती बाई के पिता का नाम हरिशचन्द्र यादो जी था। जंयती बाई का जन्म 1848 में हुआ था। सन् 1864 में जयंती बाई का विवाह जर्नादन पाडुरंग में हुआ था। रख्माबाई जब ढाई साल की थी तब इनके पिता पाडुरंग की पीलिया रोग के कारण मृत्यु हो गयी थी। जर्नादन पाडुरंग ने मृत्यु से पहले अपनी सारी सम्पत्ति अपनी पत्नी जयंती बाई के नाम करवा दी थी। जयंती बाई प्रगतिशील विचारो की महिला थी। इन्होंने पुरोहितो और पोथाधारियों काी व्यवस्था को चुनौती देते हुये विधवा पुर्नविवाह किया था। जयंती बाई उच्च श्रेणी की हिंदू महिला नहीं थी। ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था के अनुसार वे शूद्र वर्ग की बढ़ई जाति से आती थी। यह तथ्यपरक बात है कि पिछड़े और दलित समाज में विधवा के पुनर्विवाह पर कभी रोक नहीं रही है। पिछड़े और दलित समाज के लोग अपनी विधवा पुत्रियों की पुनर्विवाह कर दिया करते थे। इतिहासविद् सुधीर चन्द्र ने ठीक ही लिखा है- ‘अपने पहले पति की मृत्यु के छह वर्ष बाद जयन्ती बाई ने सखाराम अर्जुन नामक एक विधुर से विवाह कर लिया था। वे लोग सुतार बढ़ाई जाति के थे, जिसमें विधावाओं के पुनर्विवाह की अनुमति थी।’  यहाँ देखा जा सकता है यदि जयंती बाई द्विजों की बेटी होती तो उनका पुनर्विवाह संभव नहीं था। यह तथ्य बताते है कि पिछड़े और दलित समाज के लोग स्त्री  मुद्दों पर प्रगतिशील की भूमिका निभाते आये हैं। जयंती बाई ने अपने पुनर्विवाह से पहले अपने पूर्व पति से मिली सारी सम्पत्ति बेटी रख्माबाई के नाम करवा दी थी।

 उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के भारतीय समाज बाल विवाह, बेमेल विवाह और वृद्ध विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों में पूरी तरह से जकड़ा हुआ था। रख्माबाई बाल विवाह की कुरीति का शिकार  हो गई थी। जब रख्माबाई की उम्र ग्यारह साल की थी, तभी उनका विवाह दादाजी भीकाजी से इस शर्त पर कर दिया गया था कि दादाजी भीकाजी पढ़-लिख कर एक अच्छा इन्सान बनेगा। और, भीकाजी के पढ़ाई लिखाई का खर्च रख्माबाई के सौतेले पिता उठाएँगे। दादाजी भीकाजी रख्माबाई और उनके परिवार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। क्योंकि दादाजी भीकाजी का पढ़ाई-लिखाई से कुछ लेना-देना नहीं था। वह गलत संगत में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर बैठा था। दादा जी भीकाजी रख्माबाई का घर छोड़कर अपने मामा के साथ रहेना लगा था। दादा जी के मामा का नाम धर्मानारायण था। वे खासे संपन्न परिवार से थे। उन्हे भौतिक वस्तुओं से ज्यादा लगाव था जिसकी चपेट में दादाजी भीकाजी भी आ गया था। धर्मानारायण चरित्र से अच्छे व्यक्ति व्यक्ति नहीं थे। उन्होनें पत्नी के रहते हुये भी रखैल रख रखी थी। यह बात रख्माबाई को एकदम अच्छी नहीं लगी होगी कि उनका संबंध जिस परिवार से है, उस परिवार के व्यक्ति रखैल रखे। दादाजी भीकाजी अपने मामा की बुरी संगत में पड़कर काफी बीमार हो गया था। उसने यह भी तक ख्याल नहीं रखा कि वह एक प्रतिष्ठित परिवार का दामाद है। रख्माबाई लिखती हैं- ‘1876 में हुये इस विवाह के कुछ ही महीने बाद … वह अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ने लगा। उसने स्कूल छोड़ दिया, मेरे पिता और नाना के निर्देशों की अवज्ञा करने लगा, और बुरी संगत में पड़ गया। परिणामतः तपेदिक का शिकार होकर तीन वर्ष तक बिस्तर में ऐसी स्थिति में पड़ा रहा कि लगता था मानो बचेगा नहीं। लेकिन भगवान की कृपा से वह धीरे-धीरे ठीक होने लगा।’ (देखें,रख्माबाई: स्त्री अधिकार और कानून लेखक सुधीर चन्द्र, पृ. 194)

  रख्माबाई के विवाह के ग्यारह वर्ष बीत जाने के बाद भी पति-पत्नी ने एक दूसरे को दाम्पत्य जीवन का सुख नहीं दिया था। अपने पति के घर रख्माबाई नहीं जाती थी। क्योंकि दादाजी के पास अपना घर नही था। वे खुद अपने मामा नारायण धर्मा के घर पर रहते थे। रख्माबाई एक दो बार उनके मामा के घर गयी थी। इसके बाद नारायण के घर नही गई। इसके कई कारण हो सकते है। इनमें से एक कारण यह भी रहा होगा- नारायण धर्मा चरित्र से ठीक व्यक्ति नहीं थे। भीकाजी के मामा नारायण धर्मा ने रख्माबाई पर कुदृष्टि डाली हो। क्योंकि इस समय बाल वधुओं के यौन शोषण की भी घटनायें घट रही थी। बाल विवाह स्त्री के यौन शोषण का पुरूषों के लिए बड़ा कारगर उपाय था।

  रख्माबाई के सौतेले पिता सखाराम चाहते थे कि रख्माबाई की शिक्षा में कोई व्यवधान नहीं पड़े, इसलिए रख्माबाई को दादा जी के साथ भेजने से उनके पिता ने मना कर दिया था। दादाजी उन पर बार-बार यह दवाब बनता रहा कि रख्माबाई को उसके साथ भेज दिया जाये। दादाजी की नज़र रख्माबाई की संपत्ति पर थी। वह इसीलिए जी रख्माबाई को अपने घर लाने के प्रयास में लगा हुआ था। उसके काफी प्रयासों के बावजूद रख्माबाई उसके साथ आने के लिये तैयार नहीं हुई। आखिर में, दादाजी भीकाजी ने मार्च 1884 में रख्माबाई को अपने घर लाने के लिये अदालत में उन पर केस कर दिया। दादाजी की तरफ से कई कानून पत्र भी रख्माबाई के पिता के पास भिजवाए गए। इन पत्रों में इस बात पर जोर दिया गया था कि उसकी पत्नी को उसके पास भेज दिया जाय। इतिहासविद् सुधीरचन्द्र ने लिखा है- ‘19मार्च को उसने अपने वकीलों -मैसर्स चाँक एंड वाकर- के माध्यम से सखाराम अर्जुन को एक पत्र भेज कर माँग की कि मेरी पत्नी को मेरे पास आकर रहने की अनुमति दी जाए क्योंकि मेरा हक है कि परीक्षण की अवधि काफी लम्बी खिंच गइ है।’ ( देंखे, रख्माबाई: स्त्री अधिकार और कानून: 33) दादाजी भीकाजी ने रख्माबाई के पिता सखाराम को कई पत्र दूसरों के नाम से भी भिजवाए थे। सखाराम अर्जुन के सामने सिर्फ दो रास्ते थे या तो रख्माबाई को दादाजी के घर भेजे या फिर वे कानूनी लड़ाई लड़े। सखाराम को रख्माबाई की चिंता थी। उन्होनें रख्माबाई की समस्याओं को ध्यान में रखकर दादा जी के पत्र का उत्तर लिखा- ‘सज्जनो आपके 19 तारीख के पत्र के जवाब में मैं आपको सूचित करना चाहता हूँ कि रख्माबाई, जिसका आपके पक्ष में उल्लेख किया गया है, को आपके मुवक्किल श्री दादाजी भीकाजी की इच्छा या माँग के खिलाफ मेरे घर में रोककर नहीं रखा गया है। वह दोनों तरफ के संबंधियों की सहमति से मेरे घर में रह रही है। जिसका कारण आपके उक्त मुवक्किल की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ है।’(देंखे, रख्माबाई: स्त्री अधिकार और कानून: 205-6)

 यह सर्वविदित है कि दादाजी भीकाजी कुछ काम नहीं करते थे। सखाराम ने दादाजी भीकाजी के सामने यह शर्त रख दी कि यदि दादाजी भीकाजी अपनी पत्नी को रखने के लिए घर का इंतजाम कर ले तो रख्माबाई को ले जा सकते हैं। दादाजी भीकाजी ने रख्माबाई को लाने के लिए कुछ लोग भेजे थे। रख्माबाई ने उनके साथ जाने से इंकार कर दिया था। रख्माबाई की यहीं से स्त्री स्वंतत्रता की लड़ाई शुरू होती है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध की बहुत बड़ी घटना थी कि जब किसी स्त्री ने अपने निठल्ले पति के साथ जाने से मना कर दिया था। दादाजी ने कुछ समय बाद फिर से रख्माबाई को अपने साथ रहना के लिए दबाव डाला। लेकिन रख्माबाई ने यह कहते हुए मना कर दिया कि दादाजी भीकाजी का स्वस्थ ठीक नहीं है, मैं उनके साथ अपना जीवन व्यतीत नही कर सकती हूँ।

 अब रख्माबाई का मुकदमा अदालत में था। रख्माबाई के वकील एफ.एल. लैथम, मेरी तैलंग और जे0डी0 पैरवी कर रहे थे। ये तीनों वकील उस समय के बड़े कानूनविद् माने जाते थे। रख्माबाई को ब्रिटिश कानून से बड़ी उम्मीद थी। वे इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि ब्रिटिश कानून ही उन्हें इस दुष्ट पति से मुक्ति दिला सकता है। दादा जी के वकीलों ने इस मुकदमे को वैवाहिक पुर्नस्थापन (रेस्टीटयूशन) का मुकदमा बनाना चाहा था। गौरतलब है कि रख्माबाई और दादा जी का विवाह होने के बाद भी उनका समागम नही हुआ था। इसलिए इस मुकदमे को वैवाहिक पुर्नस्थापना का मुकदमा जज ने मानने से इनकार कर दिया था। इस ऐतिहासिक मुकदमे की सुनवाई जज पिनी कर रहे थे। जज पिनी इस मुकदमे का फैसला जल्द से जल्द करना चाहते थे। वे दोनों पक्षों के विचार जाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि रख्माबाई को पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। जज पिनी ने कहा- ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि इन परिस्थितियों में एक युवा महिला को उस पुरूष के पास जाने के लिए बाध्य करना जिसे वह नापसन्द करती हो ताकि -वह पुरूष उसकी इच्छा के खिलाफ उसके साथ सहवास कर सके एक बर्बर, क्रूर और घृणित कृत्य होगा…।’(देंखे, रख्माबाई: स्त्री अधिकार और कानून: 54)

 रख्माबाई स्त्री अधिकारों की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही थी। उन्हें विजय प्राप्त होनी ही थी। जज पिनी ने इस मुकदमा का ऐतिहासिक फैसला सुना दियाकानून के अनुसार, मैं वादी को उसके द्वारा मांगी गई राहत प्रदान करने के लिए, और इस बाईस वर्षीय युवा महिला को उसके साथ उसके घर में रहने का आदेश देने के लिए ताकि वादी उक्त महिला के साथ उसके मासूम बचपन में हुए अपने विवाह को परिणति तक पहुँचा सके, बाध्य नहीं हूँ।’(देंखे, रख्माबाई: स्त्री अधिकार और कानून: 55) जज पिनी के इस ऐतिहासिक फैसले की प्रतिक्रिया ब्रिटिश भारत और इग्लैण्ड दोनों देशों मे खूब हुई। जज पिनी के इस फैसले कुछ विद्वानों ने स्त्री मुक्ति से जोड़कर देखा तो कुछ ने इस फैसलों को विवाह संस्था पर हुए कुठाराघात के रूप में देखा। लेकिन मेरा मानना है कि यह फैसला स्त्री अधिकारों की सबसे बड़ी जीत का था।

रख्माबाई के पति दादाजी भीकाजी ने जज पिनी के फैसले को चुनौती देते हुए बंबई उच्च न्यायालय में फिर से मुकदमे की अपील दायर कर दी थी। अपना पक्ष रखने के लिये दादाजी भीकाजी ने मैकफर्सन नामक एक नया वकील नियुक्त किया था। इस मुकदमे की सुनवाई न्यायधीश सर चार्ल्स सर्जेंट और सर लिटिलटन होल्योक बेली ने की थी। जज पिनी ने जो फैसला सुनाया था उसको उस फैसले को इन दोनों न्यायाधीशों ने पलट दिया। इस के बाद यह मुकदमा जज फैरन की अदालत में गया। इस मुकदमा को लेकर रख्माबाई की दादा भीका जी से लम्बी कानूनी लड़ाई चली। अंततः रख्माबाई यह मुकदमा हार गई। और उन्हें अदालत ने यह सजा दी कि वे अपने पति के घर जाए या फिर जेल। जज के इस आदेश के बावजूद भी रख्माबाई अपने पति के साथ जाने से इंकार कर दिया। रख्माबाई ने पंडिता रमाबाई को लिखे पत्र में अपना इरादा जाहिर किया था -‘मेरी प्रिय सखी जब तक यह पत्र तुम तक पहुँचेगा मैं राज्य की जेल में होऊंगी, क्योंकि मैं न्यायाधीश फेरॅन के आदेश को स्वीकार नहीं करती हूँ और नहीं कर सकती हूँ।’ अंततः रख्माबाई और दादाजी भीकाजी के बीच समझौता हुआ कि रख्माबाई दादाजी भीकाजी के अदालत में खर्च हुये रुपयों की भरपाई करे। दादा भीकाजी ने भरपाई के रुप में रख्माबाई से दो हजार रुपये का प्रस्ताव रखा था। उन्नीसवीं सदी उत्तरार्ध में दो हजार रुपया एक बहुत बड़ी राशि थी। रख्माबाई ने दो हजार रूपया देकर अपनी आजादी खरीदी थी। दादाजी भीकाजी ने रूपये मिलते ही फौरन दूसरी शादी कर ली थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रख्माबाई के केस ने बालविवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया था। इस केस से हिंदी के कई लेखक और संपादक सकते में आ गये थे। धर्मदिवाकर’ पत्रिका के संपादक पंडित देवीसहाय शर्मा बालविवाह के पक्षधर थे। उन्होंने बाल विवाह को न मानने वाली रख्माबाई का प्रबल विरोध किया था। रख्माबाई के मुकदमे से सबक लेकर अंग्रेज गर्वमेन्ट बालविवाह को लेकर कानून बनाना चाहती थी। लेकिन पंडित देवी सहाय शर्मा नहीं चाहते थे कि बाल विवाह को रोकने के लिए अंग्रेज सरकार कानून बनायें। ‘धर्मदिवाकर’  पत्र में पंडित देवी सहाय शर्मा ने लिखा था – आजकल इस बात का यहां बड़ा भारी आन्दोलन हो रहा है। जब से बंबई की रहने वाली रुक्माबाई नाम की एक नव शिक्षिता ने अपने विवाहित पति का त्याग किया है, तभी से कई एक नाम के देश हितैषी नब शिक्षित लोग खड़े होके इस बात का घोर आन्दोलन कर रहे हैं कि ‘‘हिन्दू समाज से वाल्यविवाह उठ जाए औ बिधबा बिवाह शुरु हो जाए, सहज में हिन्दू लोग यह काम नहीं करेंगे, अतएव गवर्मेन्ट उक्त बात का कोई कठिन नियम बनाके जारी कर दे’ आजकल के धर्मभ्रष्ट कईएक नवीन मतवालम्बी बंगले के ब्राह्म,दक्षिणके सुधारखाती औ गये बीते आर्य समाजी तो पहले इस बात पर मुंमुंडाये बैठे थे परन्तु अब कई एक विलायत के इंग्रेज पादरी भी इस बात पर जोर देने लगे हैं।’ 19वी सदी के अंतिम दशकों में बालविवाह के कानून ने हिन्दू सुधारकों के सकते में डाल दिया। वे इस कानून का विरोध भी नहीं कर सकते और न ही इसका खुलकर समर्थन कर सकते थे। पंडित देवी सहाय शर्मा जैसे विद्वान इस कानून को हिन्दू धर्म में हस्तक्षेप के रुप में देख रहे थे। इसीलिए रख्माबाई के मुकदमा को हिन्दू धर्म और कानून पर कुठाराघात के रुप में देखा गया था। पंडित देवीसहाय शर्मा ने रख्माबाई पर कई प्रकार के लांक्षन भी लगाये और उनके चरित्र पर हमला भी किया। इतना ही नहीं उनको लेकर जातिगत टिप्पणी भी की। और’ यह सिद्ध किया कि दलित और पिछड़ी जाति की स्त्रियां चरित्रहीन होती है। सन् 1885 में पंडित देवीसहाय शर्मा ने रख्माबाई के संबंध  में लिखा थातेली तमोली बढ़ई लुहार आदि निकृष्ट जाति की स्त्रियां यदि एक पति को छोड़ और किसी की कर लें तो कुछ नवीन बात नहीं है, प्रायः गंवई गांव और नगरों में यह बात हुआ करती है, किन्तु उनका यह व्यवहार देख उच्च जातीय लोगों की सिवाय घृणा के उन का कुछ भी असर नहीं होता।… जिस रुक्मा का विचार उपस्थित है, वह भी जाति की बढइन् है, सुतरां उसने अपनी कुलप्रथा के अनुसार जो यह काम किया है अर्थात एक को छोड़ द्वितीय करना चाहा है यह कुछ नवीन बात नहीं है, हाँ इतनी बात अवश्य है, के रुक्मा धनी पुरुष की लड़की है। जो स्वयं धनबती है, सिवाय इस बात के कुछ नवीन अंग्रेजी शिक्षा की उसे चाट लग गई,और बडे बड़े नबीन मतधारियों के साथ उसका संग सहबास भी हो चुका है, अतएव और भी सोने में सुगन्ध हो गयी। बस! यही कारण है; कि उक्त बात पर इतना हौरा उपस्थित हुआ नही तो कुछ नवीन बात नहीं थी, परन्तु हम उन महापुरुषों की बुद्धि पर अत्यन्त शोक करते है, जो एक बढ़इन का दृष्टान्त देख पवित्र हिन्दु समाज की अन्यान्य स्त्रियों के लिए भी गवर्नमेन्ट से आईन बनाने की प्रर्थना करते है।’  पंडित देवीसहाय शर्मा की सोच से पता चलता है कि वे अपनी सोच में स्त्री को लेकर किस हद तक नीचे जा सकते थे। देवीसहाय शर्मा के विचार स्त्री विरोधी ही नहीं जातिवादी भी थे।

रख्माबाई अपने पति दादाजी भीकाजी से मुक्त होने के बाद डाक्टरी की पढ़ाई के लिये इंग्लैंड चली गई। रख्माबाई को प्रथम महिला डाक्टर होने का गौरव प्राप्त है। आठवें दशक में रख्माबाई ने स्त्री समस्या को लेकर गहन विमर्श तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। रख्माबाई के केस ने लाखों स्त्रियों की पीड़ा को सामने रखने का काम किया था। रख्माबाई के केस ने बता दिया था कि बाल-विवाह के चलते स्त्रियों का जीवन कितना नर्क बन गया था। रख्माबाई ने बाल-विवाह को स्त्री के गुलामी का कारण और एक अनर्थकारी प्रथा माना था। रख्माबाई ने वैवाहिक मुद्दों पर खुलकर विचार विमर्श किया है। वे विवाह संबंधी कानूनों में बदलाव करना चाहती थी। रख्माबाई ने बेमेल विवाह के बिल्कुल खिलाफ थी। उनका मानना था कि विवाह के समय लड़को और लड़की की उम्र ज्यादा अन्तर नहीं होना चाहिए। रख्माबाई को रानी विक्टोरिया से बड़ी आस थी कि वे स्त्रियों को बाल विवाह और विधवा जीवन के कारागार से आजाद करवाएँगी। रख्माबाई ने स्त्री हक के लिए संघर्ष ही नहीं किया बल्कि स्त्री अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी है। रख्माबाई की स्त्री अधिकारों के लिए लड़ी गई पहली कानूनी लड़ाई थी।

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 [लेखक हिंदी नवजागरण के गहन अध्येता है। आजकल इलाहाबाद में रहते है। इनसे 8009824098 पर संपर्क किया जा सकता है।]

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