प्रवीण झा की कहानी ‘कॉड फ़िश’

प्रवीण झा अनेक विधाओं में लिखते हैं और क्या खूब लिखते हैं। बहुत दिनों बाद उन्होंने एक कहानी लिखी है, एक अलग मिज़ाज की कहानी। आप भी पढ़िए-

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समंदर के किनारे सूखती सैकड़ों कॉड मछलियाँ। वहीं तट से लगा एक पुराना जहाज, जो अब शराबखाने में तब्दील हो चुका है। यह आर्कटिक वृत्त का एक वीरान द्वीप है, जहाँ वही आते हैं जो स्वयं से भाग रहे हों। जिनके जीवन का रस इन मछलियों की तरह निचोड़ा जा चुका हो। मंजीत आज वहाँ किसी का इंतज़ार कर रही थी, जिसे अब तक तो आ जाना चाहिए था। उसे अब इस इंतज़ार की आदत हो गयी थी। तीस वर्ष की उम्र, तीन शादियाँ, और यह चौथा संबंध। ऐसे व्यक्ति से, जिसे वह पहली बार मिलने जा रही है।

जिस बीयर का गिलास हाथ में लिए वह बाहर खड़ी थी, उसे दुबारा भरने जब वह अंदर गयी तो देखा कि एक उसके ही उम्र की लड़की एक अधेड़ पुरुष का गला चाट रही है। वह व्यक्ति अपना सर कुर्सी की पीठ पर लटकाए ऊँघ रहा है। उसे यह दृश्य अतीत में ले गया। ओंटारियो से एक पचास-पचपन उम्र के व्यक्ति के साथ वह पहली दफ़े अपने पिंड में ब्याही गयी। मंजीत ने उसके शरीर को तीन महीने चाटा, और चौथे महीने वह चल बसा। मोहाली के डाक्टरों ने कहा कि उसे कोई ऐसी बीमारी थी, जो लाखों में एक को होता है। मंजीत को शुबहा था कि वह विषकन्या है। यह बात जाँचने के लिए उसने अपने ही एक दोस्त को राजी किया, और एक रात उसे सर से पाँव तक चाट गयी, मगर वह नहीं मरा। उसे लगा कि डाक्टर ठीक ही कह रहे होंगे। शायद उसने मुर्दे से ही ब्याह किया था। मंजीत ने अपनी अनलिखी डायरी में पहली पाँती दर्ज की- ‘कनेडा ठंडी जगह है, वहाँ के लोग ठंडे होते हैं’। वह कनेडा तो नहीं जा सकी, अपने यार मस्तान के घर कभी-कभार चली जाती। मस्तान ऑस्ट्रेलिया से भाग कर आया था, यूरोप का दलाल बना था।

“तेरी आँखें बड़ी सेक्सी हैं”, मंजीत ने मस्तान से पंजाबी में कुछ यूँ कहा।

“मर्दों की आँख भी भला सेक्सी होती हैं?”, मस्तान ने उसके गले में हाथ डाले गांजे की सोंट लेते कहा।

“हाँ! क्यों नहीं? मुझे तो लगती हैं”

“मंजीत! तू एक मरद को खा गयी। अब दूसरी को खाने का इरादा है?”

“ये ड्रग्स और गांजे तो यूँ ही तुझे खा जाएँगे।”

“तू जो आँखें कह रही है न? वह इसी का कमाल है”

“बस आँखें ही हैं। बाकी तू काहे का मरद? पूरी रात गोश्त की तरह पड़ा रहा। कूल्हे सूख कर धँस गए हैं।”

मंजीत की दूसरी शादी मस्तान से वहीं गुरुद्वारे में हुई, और वह भी साल भर में दुनिया छोड़ गया। मंजीत की यादों में ये दो मुर्दे अब तस्वीरों में भी नहीं बचे। पहले का तो नाम भी याद नहीं। बस इतना याद कि उसकी तोंद फूली थी, और जाँघ सूखी। वह चलता तो अपनी हथेली से पीठ को सहारा देता। कनेडा का पासपोर्ट दिलाता तो मंजीत के अरमान पूरे होते, मगर मुर्दे क्या नागरिकता दिलाएँगे?

पिंड के लड़के छेड़ने लगे थे कि दो शादियाँ कर मंजीत जवान हो गयी, मगर किसी में यह हिम्मत नहीं कि उसे छू भी ले। दो साल में दो मर्दों को खा गयी, तो बाकियों की क्या औक़ात? मस्तान के गांजे के साथ वह भी सिगरेट फूँकने लगी, मसूड़े काले हो गए, होंठ फूल गए। जवानी आने का मतलब तो उसे मालूम ही था, मगर उसमें उन दोनों मुर्दों की कोई भूमिका न थी। यह कुदरती जवानी थी, जो यूँ ही अनायास आए जा रही थी।

इन स्मृतियों से निकल कर मंजीत ने शराबखाने में देखा कि एक उसकी ही उम्र की युवती ने स्कर्ट के नीचे जालीदार स्टॉकिंग पहन रखी है। वह कुर्सी पर जाँघे फैला कर उल्टी बैठी है और उसके अंत:वस्त्र उस कुर्सी से झाँक रहे हैं। उसके तिरछे बैठा एक सुनहरे लंबे बालों वाले साठोत्तर बुजुर्ग की नज़र वहीं टिकी है। मंजीत की हँसी छूट गयी कि यह बुड्ढा भला किस दुनिया में है। इन मुर्दों को मरने से पहले इश्क होता क्यों है? अगर वह युवती अपनी जाँघें लेकर उसकी गोद में बैठ ही गयी तो वह क्या कर लेगा?

मंजीत की तीसरी और आखिरी शादी एक ऐसे ही व्यक्ति से हुई। वही उसे यूरोप लेकर आया। उसे मालूम था कि मंजीत दो को डस चुकी है, मगर फिर भी उसने पैसे देकर ब्याह किया। मंजीत के भाई के जलंधर में पढ़ाई की फ़ीस भरी, बाप को कड़क नोटों की गड्डी दी, और बदले में शादी से पहले ही मंजीत के शरीर को टटोल गया बुढऊ। जैसे हाट-बाज़ार की सब्जी जाँच रहा हो।

“क्या हुआ अंकल जी? आपको तो पता ही है कि दो शादियाँ हो रखी है। आपके तो पोते-पोती हैं। मुझमें अब क्या ढूँढ रहे हो?”

“ऐसी बात नहीं। मुझे पता है कि तेरी भी ख़्वाहिशें होंगी। मैं सब पूरी करूँगा।”

“अंकल जी। बुरा मत मानना। आपको भी मालूम है कि मैं यह शादी क्यों कर रही हूँ।”

“यूरोप जाने के लिए? मालूम है। मगर मैं क्यों कर रहा हूँ? मालूम है?”

“नौकर रखना होगा। और क्या?”

“नौकर न कह अब। घर का काम तो कर लेगी?”

“हाँ। सब कर लूँगी। बस आप पार लगा दो, वरना पिंड के छोरे खा जाएँगे।”

मंजीत के तीसरे पति दो रात दवाई लेकर उसके साथ सोए, और जैसे ही वह अपने कृत्रिम घुटनों के साथ कराहते उसकी कमर पर बैठे, उसने कहा, “अंकल जी! आप रहने दो। दो पाप पहले ही चढ़ चुके”

अपनी हमउम्र पोतियों के साथ बैठ मंजीत उन्हीं का रेस्तराँ संभालती है। रसोइया पुर्तगाली है, मगर उसे मेहमानों के स्वागत के लिए भारतीय कुर्ते में खड़ा कर देते हैं। मंजीत अपने होठों पर सिगरेट से पड़ी पपड़ियों को लिपस्टिक से ढकती है, और अपनी तोंद को किसी बेल्ट से कस कर पेटीकोट ऊपर चढ़ा लेती है। कुदरती मुहाँसों और धब्बों को भी रोज अलग-अलग तरह ढकती है। कसी हुई ब्लाउज को पीछे बाँधते रेशमी धागे, झालरदार पल्लू वाली साड़ी, माथे पर बिंदी। अंग्रेज़ी में यस-नो से ज्यादा नहीं, मगर नॉर्वेजियन पर पंजाबी रंग डाल कर फर्राटे बोलती है।

“अंकलजी! आप मेरा ओवरटाइम तो जोड़ते ही नहीं। इस हफ्ते भी तीन घंटे हो गए।”, मंजीत ने अपने मैनेजर पति से कहा

“तू लिख कर दे दे। मैं सब जोड़ दूँगा।”

“बर्गन वाले घर का क्या हुआ? आपने कहा था भाड़े मेरे खाते में आएँगे”

“वह तो प्रभजोत के नाम है। मैं तेरे लिए दूसरी खरीद दूँगा।”

“कब? चार दिन की तो ज़िंदगी बची है आपकी। मेरा रिकॉर्ड तो आपको मालूम ही है।”, मंजीत ने गले लगाते हुए उनके जाँघ पर शरारती हरकत की। उनके चेहरे पर मुस्कान आयी और आँखें छोटी हो गयी।

न जाने कितनी बार मंजीत ने उनको नहलाया-धुलाया, मालिश की, मगर उनके शरीर का एक रोआँ न हिला। मंजीत ने अपनी डायरी में दर्ज़ किया- ‘नॉर्वे ठंडी जगह है। नॉर्वे में लोग ठंडे होते हैं’।

बड़ी मशक़्क़त से आखिर एक डेटिंग साइट पर परमिंदर से मुलाक़ात हुई। मंजीत ने आर्हता तय कर रखी थी कि आदमी यूरोप के किसी गरम जगह से ही हो। परमिंदर स्पेन के दक्षिण एक द्वीप पर किसी होटल में हमाली करता था। बीवी-बच्चे पंजाब में थे, मगर अब तो उन्हें देखे कई साल हो गए। वहीं एक बेल्जियम की स्त्री के साथ कुछ साल बिताए, जो गर्मियों में एम्सटरडम के किसी मसाज केंद्र में काम करती। परमिंदर ने कहा कि जब तक थोड़ी-बहुत जवानी बची है, वहीं जाकर कमा ले, स्पेन में क्या रक्खा है?

मंजीत शराबखाने में कृत्रिम अंधेरे के लिए लगायी चिक हटा कर बाहर झाँक रही थी। जहाज आकर लग गया था। परमिंदर इसी जहाज से आया होगा। वह गुसलखाने में थोड़ी देर चेहरे पर कुछ मामूली शृंगार करने निकल गयी। थोड़ा मस्कारा, थोड़ा ग्लॉस। जींस को कमर तक ले आयी, कान से टॉप निकाल लिए, बाल खोल कर आगे लटका लिए। जब बाहर निकली, तो एक पतली काया वाला सिख शराबखाने के दरवाजे पर खड़ा होकर अंदर झाँक रहा था। जब वह पीछे मुड़ा, मंजीत को हँसी आ गयी। न जाने उसने अपनी डायरी में क्या दर्ज़ किया। शायद धँसे हुए कूल्हों को। मुड़े हुए घुटनों को। झुके हुए कंधों को।

उसने बाहर निकल कर कहा, “हेलो जी! परमिंदर! फ़ोन क्यों नहीं किया?”

“यहाँ तो नेटवर्क ही नहीं आता। ये कहाँ बुलवा लिया आपने? अंदर चल कर बैठें?”

“शराबखाने में क्या रखा है? आप होटल चलो, थोड़ा आराम कर लो। आपको पता है ये मछलियाँ क्यों सुखाते हैं?”

“पता नहीं जी। तेल निकालते होंगे? सूखी मछली खाते होंगे?”

मंजीत ने उन मछलियों को एक बार ग़ौर से देखा। सागर से निकली उन मछलियों में एक बूँद पानी न बचा था। मगर वे भोग्य थी। उनका बाज़ार लगा था। दुनिया भर में निर्यात हो रहे थे। उसका तेल पिला कर डाक्टर इलाज कर रहे थे। एक सिगरेट सुलगा कर मंजीत उन मछलियों के बीच खुद को तलाशने लगी।

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