तकनीक ने हिंदी भाषा को बाज़ारवाद का एक नया रूप दे दिया: अरूण मित्तल

ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज(सांध्य) में आधुनिक तकनीकी युग में हिंदी भाषा के उपयोग का बदलता परिदृश्य विषय पर मातृभाषा व्याख्यानमाला का तीसरा व्याख्यान आयोजित हुआ, जिसमें मुख्य वक्ता थे डॉक्टर अरूण मित्तल। कार्यक्रम के आरंभ में संयोजक डॉक्टर लालजी ने मातृभाषा के महत्व और व्याख्यानमाला के आयोजन के प्रयोजन के बारे में बात की।कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉक्टर हिंदी विभाग में असोसिएट प्रोफ़ेसर पदम परिहार ने डॉक्टर अरूण मित्तल का सुंदर परिचय प्रस्तुत किया। बताया कि वे प्रबंधन के साथ कविता की दुनिया में बहुत सक्रिय हैं और इनकी 300 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक रचनाओं को पुरस्कार भी मिला है। प्रस्तुत है रपट-

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विद्वान का वक्ता का स्वागत करते हुए कॉलेज के प्राचार्य प्रोफ़ेसर मसरूर अहमद बेग ने यह उल्लेखनीय बात की कि मैनेजमेंट के प्राध्यापन से जुड़े होने के बावजूद अरूण मित्तल भाषा की सेवा करने का काम कर रहे हैं।

प्रमुख वक़्ता  अरूण मित्तल जी ने अपनी बातचीत की शुरुआत में इस बात को उठाया कि तकनीक ने भाषा के प्रयोग को किस हद तक प्रभावित किया है। इसमें साध्य प्रमुख है और साधन गौण। लेकिन उन्होंने इसके सकारात्मक पहलुओं के ऊपर भी चर्चा की। तकनीक ने भाषा के, विस्तार का काम किया है। इसके माध्यमों ने साहित्य का विस्तार किया है।

उन्होंने कुमार विश्वास के हवाले से कहा कि अगर यूट्यूब न होता तो उनकी रचनाएँ जनमानस तक पहुँची। लेकिन उन्होंने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि लिखने के नाम पर कुछ भी लिखा जा रहा है। कमेंट, शेयर और लाइक के लिए लिखा जा रहा है। साधना नहीं साध्य प्रमुख होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि सोशल साइट्स पर जो कविताएँ हैं उनमें से 80% कविताएँ कविताएँ नहीं हैं। वे कमेंटरी हैं कविताएँ नहीं। तकनीक ने हिंदी भाषा को बाज़ारवाद का एक नया रूप दे दिया।

अब छपना आसान हो गया है। पाठकों को कुछ नहीं पता होता। यह लिखने वाले का दायित्व होता है कि क्या परोसना है। यह भाषा की समृद्धि के लिए बहुत ज़रूरी है। लिखने के पीछे परिश्रम नहीं दिखाई देता।

तीसरे दौर के रूप में उन्होंने ओ॰टी॰टी॰ की बात की। जिसके कारण भाषा में अश्लीलता बढ़ गई है, आक्रामकता, फूहड़ता का जोर है। यह बाज़ारवाद का प्रतीक है। ख़राब भाषा के लिए पाठक नहीं लेखक उत्तरदायी होता है।

इसमें एक चौथा दौर भी है जो बहुत सकारात्मक है। कुछ नए रचनाकारों ने हमारी पारम्परिक रचनाओं को पाठकों के लिए सहेजने का काम किया। बहुत सी वेबसाइट, ब्लॉग परम्परा से पाठकों को परिचित करवाने का काम कर रहे हैं। इंटरनेट पर बहुत सी साइट्स ने पुरानी रचनाओं को सहेज कर आगे की पीढ़ी के लिए बढ़ाने का काम किया है।

अरूण मित्तल ने नई वाली हिंदी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इसने किताबों की पहुँच को तो बढ़ाया है लेकिन यह भाषा को समृद्ध नहीं कर रहा है। किताबों से पाठक सीखता है लेकिन इन किताबों से निराशा ही मिलती है। हमें यह देखना चाहिए कि भाषा को कैसे समृद्ध करें न कि यह देखना चाहिए कि बाजार में क्या चलता है।

सवाल जवाब का सत्र भी चला और विद्यार्थियों ने इसमें हिस्सा लिया।

हिंदी विभाग की प्राध्यापिका डॉक्टर राजकुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि अरूण मित्तल जी ने तकनीकी दौर में हिंदी के ऊपर बहुत सारगर्भित व्याख्यान दिया। यह एक रोचक और गंभीर व्याख्यान से प्राध्यापक-विद्यार्थी सभी लाभान्वित हुए।

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