जया प्रसाद की पुस्तक ‘श्री सिद्धि माँ’ का एक अंश

नीम करौली बाबा को सब जानते हैं। सिद्धि माँ के बारे में आप जानते हैं? जया प्रसाद की किताब ‘श्री सिद्धि माँ’ आई है, जिसका अनुवाद पेंगुइन से आया है। आइए उसका एक अंश पढ़ते हैं-

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वह बीसवीं सदी का प्रारम्भ था। हिमालय की पहाड़ियों में स्थित अल्मोड़ा एक छोटा-सा सुन्दर शहर है जो उस समय भारत के संयुक्त प्रान्त का हिस्सा हुआ करता था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की औपनिवेशिक आधुनिकता का सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभाव जो तीव्र गति से नैनीताल जैसे नजदीकी शहरों को प्रभावित कर रहा था, अभी तक अल्मोड़ा को स्पर्श नहीं कर पाया था। उन दिनों यह शहर सुधारवादी विचारधारा और सांस्कृतिक धरोहर का केंद्र हुआ करता था। अल्मोड़ा की धार्मिकता और अध्यात्मवाद के प्रतीक प्राचीन मन्दिर आज भी इस क्षेत्र को अलौकिक सजीवता प्रदान करते हैं। यहाँ लगभग ढाई सौ मन्दिर हैं जिनमें नौ देवी मन्दिर तथा अष्ट भैरव मन्दिर प्रसिद्ध हैं। अल्मोड़ा में ही स्थित कटारमल का सूर्य मन्दिर जिसे कत्यूरी राजवंश ने बनवाया था, आज भी यहाँ की प्राचीन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।

अल्मोड़ा में अनेक दिव्य संतों ने समय-समय पर भ्रमण किया जिससे यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा में और भी वृद्धि होती गई। स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है कि शिकागो यात्रा से लौटने के बाद उनका मन एकान्त और शान्ति पाने के लिए व्याकुल हो रहा था। इसी खोज में पदयात्रा करते हुए जब वो अल्मोड़ा पहुँचे तो उन्हें यहाँ पर गहरी मानसिक शान्ति और उच्च कोटि की ध्यानस्थ अवस्था का अनुभव हुआ। इसके लगभग चार दशक बाद वर्ष 1928 में लखनऊ यूनिवर्सिटी के कुलपति श्री ज्ञानेंद्र नाथ की पत्नी श्रीमती मोनिका डे ने सन्यास ग्रहणकर अल्मोड़ा से लगभग अट्ठारह किलोमीटर दूर मिरतोला में उत्तर वृन्दावन आश्रम की स्थापना की। कालान्तर में वो यशोदा माँ के नाम से इस क्षेत्र की एक और आध्यात्मिक विभूति के रूप में प्रसिद्ध हुईं। प्रथम विश्व युद्ध में फाइटर पायलट रहे रोनाल्ड हेनरी निक्सन भी अल्मोड़ा आए थे जो कि माँ यशोदा के शिष्य बने और सन्यास ग्रहणकर स्वामी कृष्णा प्रेम के नाम से विख्यात हुए। वर्ष 1937 में कैलाश पर्वत की यात्रा पर जाते हुए भारत की महान संत माँ आनन्दमयी ने जब अल्मोड़ा में पदार्पण किया तो उनका कथन था, ‘मैं देख रही हूँ कि जटाधारी साधू अपने सूक्ष्म शरीर में धरती से प्रकट होकर अनन्त की ओर जा रहे हैं, इन सभी बातों का यही अर्थ है कि यह भूमि सदैव संतों की तपस्थली रही है।’1 सदियों से अल्मोड़ा साधु-महात्माओं एवं संतों के आकर्षण का केंद्र रहा है। शायद यही कारण था कि अल्मोड़ा की पावन भूमि में पूजनीया श्री माँ का अवतरण हुआ।

वर्ष 1930 के मध्य की बात होगी। अल्मोड़ा के बाज़ार में चहल-पहल हो रही थी। तभी वहाँ के स्थानीय लोगों ने सहसा धोती पहने और कम्बल ओढ़े एक लम्बी-चौड़ी काया के व्यक्ति को नगर के व्यापारी श्री प्यारे लाल साह की दुकान पर देखा। इस आगमन के महत्व का किसी को भान तक न था। ये अभ्यागत स्वयं श्री नीम करोली बाबा थे जो साह जी की सात वर्षीय कन्या सिद्धि को आशीर्वाद देने आए थे। यही नन्ही बालिका सिद्धि कालान्तर में बाबा महाराज की परम भक्त एवं शिष्य बनी।

हिन्दू धर्म की परम्परा के अनुसार एक साधक के जीवन में गुरु की भूमिका सर्वोपरि होती है। गुरु और शिष्य एक घनिष्ठ आत्मीय सम्बन्ध से बंधे, जन्म और मृत्यु के बंधन से परे होते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब महान गुरु अवतार लेते हैं तो उनके पूर्वजन्म के शिष्यों एवं सहचरों का भी अवतरण होता है, और इस दिव्य संचरण में कई जन्मों के आत्मिक बंधन फिर से जागृत हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था जब श्री महाराजजी ने अल्मोड़ा में पहली बार माँ को दर्शन दिए। उसी क्षण जन्म-जन्मांतर की वह ज्योति पुनः प्रज्वलित हो उठी।

महाराज दूरस्थ पर्वतों में भ्रमण के लिए निकल पड़े और माँ का बाल्यकाल सामान्य रूप से व्यतीत होने लगा।

1940 के प्रारम्भ की बात है, जब महाराज नैनीताल के क्षितिज पर प्रकट हुए और उनके आगमन के साथ ही हनुमान भक्ति की एक लहर-सी आ गई। जिसके साथ हनुमान चालीसा और तुलसी रामायण, विशेष रूप से सुन्दरकाण्ड, जिसमें सीताजी की खोज में हनुमानजी द्वारा लंका में जाने का वर्णन है, के संगीतमय गायन से कुमाऊं की पहाड़ियाँ गुंजायमान होने लगीं। कालान्तर में हनुमानगढ़ी2, भूमियाधर, कैंची, काकड़ीघाट में श्री हनुमानजी के मन्दिरों की स्थापना की गई। धीरे-धीरे महाराजजी इस क्षेत्र के घर-घर में पिता तुल्य आध्यात्मिक गुरु माने जाने लगे।

पुस्तक अंश : श्री सिद्धि माँ

लेखिका : जया प्रसाद

प्रकाशक : पेंगुइन (हिन्द पॉकेट बुक्स)

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