मौत के साये में जीवन कथा

आशुतोष भारद्वाज की पुस्तक ‘मृत्यु कथा’ पर यह टिप्पणी लिखी है दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय की शोधार्थी अनु रंजनी ने। बस्तर में चल रहे संघर्ष को लेकर यह अपने ढंग की अकेली किताब है। हम दूर बैठे लोगों को वह जीवन बहुत करीब से दिखाती है जिसको हम नक्सल समस्या कहते हैं। आप यह टिप्पणी पढ़िए-

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इस किताब के भीतर बहुत कुछ है, जिस पर बात जल्दी ख़त्म न हो। जिस विषय पर यह लिखी गई है उस पर मेरी समझ भी अत्यल्प है। पढ़ कर जो लगा, उसे भी पूर्ण रूप से एक बार में कह पाना मुश्किल है। कुछ बातों को लिखते हुए, बहुत सी बातों के छूट जाते हुए, एक पाठकीय टिप्पणी –

 ‘मृत्यु-कथा’, पहली बार जब इस नाम से परिचित हुई तो मालूम नहीं था कि इसके भीतर क्या होगा? इतना पता था कि दण्डकारण्य में लेखक ने बतौर पत्रकार कुछ वर्ष बिताएँ हैं, उसी का लेखा-जोखा है इस पुस्तक में। जब पढ़ना शुरू किया तो आरंभ में ही नक्सलियों का उल्लेख आया। यह शब्द पहली बार जब कानों में गया था तब मैं शायद सात या आठ बरस की रही होऊंगी। घर में लोगों को बात करते सुनी थी कि पापाजी की चुनाव में ड्यूटी लगी है और उन्हें जिस जगह भेजा गया था वह बहुत ख़तरनाक जगह है, क्योंकि वहाँ बहुत से नक्सली रहते हैं। जगह का नाम- ‘बाराचट्टी’ । मैंने अपनी माँ से पूछा था तब कि नक्सली मतलब क्या होता है? उन्होंने जो भी बताया उसमें से मेरे मन में केवल यह बात बस गई कि नक्सली बहुत ख़तरनाक होते हैं, वे जंगलों में रहते हैं, बारूद बिछाए रहते हैं और पुलिस पर हमला करते हैं। अतः बालमन ने यही माना कि चूंकि पुलिस का काम तो हमारी रक्षा करना होता है, तो जो उनपर हमला कर रहा वह तो बहुत ख़राब है। हाल के कुछ बरस पहले तक यही धारणा बनी रही। इसका कारण बीच-बीच में न्यूज चैनलों पर यह देखना भी था कि नक्सली हमले में इतनी-इतनी संख्या में पुलिस कर्मी शहीद हुए। बीए के अंतिम दिनों में समकालीन हिन्दी साहित्य के तहत जब नक्सलबाड़ी आंदोलन से परिचय हुआ तब संबंधित पूर्वग्रह टूटे। लगा कि सीधे-सीधे आर-पार की स्थिति का मामला नहीं है। हम किसी एक को एकदम ख़राब और दूसरे को एकदम सही नहीं कह सकते। इसी तरह के पूर्वग्रह को तोड़ने का नायाब काम करती है ‘मृत्यु-कथा’। यह किताब मुख्यत: नक्सलियों, स्थानीय आम जनों तथा सरकार, इन तीनों के विभिन्न पहलुओं के इर्द-गिर्द घूमती है,जिसका एक पत्रकार जंगल में रहते हुए तटस्थ दस्तावेजीकरण करता है।

               नक्सलियों का जीवन कितना जोखिम तथा उधेड़बुन वाला रहता होगा! इनका पार्टी में शामिल होना और हमेशा बने रहना कितना चुनौतीपूर्ण होता है इसका कई जगह उल्लेख आया है, जिसमें सबसे पहला नाम है कोरसा जोगा का। कोरसा जोगा, एक ऐसा व्यक्ति जो कई वर्षों तक नक्सलियों के साथ काम करता रहा, एके 47 ताने रहा, लेकिन जब प्रेम हुआ और उस प्रेम के साथ बाक़ी जीवन बिताने की इच्छा जगी तो उसकी परिणति हुई अपनी पार्टी के लोगों के द्वारा ही हत्या। यहाँ लेखक का यह सहज सवाल है कि “किसी नक्सली में यह अकस्मात परिवर्तन कैसे आता है? पार्टी छोड़ने और नया जीवन शुरू करने की हसरत समझी जा सकती है, लेकिन कोई गुरिल्ला सहसा अपनी विचारधारा त्याग अपने पुराने दोस्तों के ख़िलाफ़ हथियार ले कैसे खड़ा हो जाता है? कैसे उनके ख़ुफ़िया राज़ दुश्मन को बता देता है? इन्सान अपने अतीत को इस क़दर ख़ारिज कर देगा, उन आदर्शों से निर्मित हुआ अतीत जिनके लिए उसने खुद को इतने बरस क़ुर्बान किया था?” यह पूरी घटना इस ओर ध्यान ले जाती है कि क्या यह परिवर्तन अकस्मात ही था या लंबे समय से कोरसा जोगा के अवचेतन मन में यह प्रक्रिया चल रही थी जो समय पाकर यकायक प्रकट हो गई?

                 जंगलों में रहने वाले आम जनजीवन की स्थिति कितनी बुरी है, जो उनके भविष्य को इतने बुरे तरीके से प्रभावित करता है, इसका वर्णन विभत्स है। जंगलों में न शिक्षा है, न रोजगार और न स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था। यानी जीवन जीने के लिए जो बुनियादी ज़रूरतें हैं वह भी उन्हें मुहैया नहीं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि जहाँ भी उन्हें जीवनयापन की थोड़ी सहूलियत महसूस होगी उस ओर वे अपना रुख करेंगे। चाहे नक्सली उन्हें अपनी ओर शामिल करना चाहें या फिर सरकार उनका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहे। लेखक ने एक जगह यह ज़िक्र किया है कि किसी को आकस्मिक चिकित्सा पड़ने पर इलाज के लिए जंगल पार भोलापटनम ले जाना होता है। जहाँ तक जाने में पूरा दिन चलना होता है, वह भी मरीज़ को खाट पर लिटा कर, साथ में बकरी के गले रस्सी डाल उसे भी ले चलते हैं।  स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के पहले या  पहुँच कर मरीज़ ख़त्म हो गया तो क्या करते हैं? इस सवाल पर यह जवाब आना कि “फिर क्या, बकरी तो फिर भी बिकेगी। ख़ूब सारी शराब आ जाती है।” स्वत: कफ़न कहानी की याद दिला देती है जहाँ माधव और घिसू अपने घर की औरत के मरने पर कफ़न के लिए मिले पैसे से बढ़िया व्यंजन और शराब का लुत्फ़ उठाते हैं।  इन पात्रों पर असंवेदनशीलता का आरोप लगाया जाता है लेकिन ज़रा सोचिए कि जिसने सारी उम्र बदहाली में गुजारी हो, जिसने कभी बढ़िया भोजन न किया हो,  क्या उसका मनोविज्ञान यह नहीं बनेगा कि जब मौक़ा मिले वे उस पर टूट पड़ेंगे। यही स्थिति तो जंगल में रहने वालों की है। जिनके पास कोई व्यवस्था नहीं, वे इतना कष्ट सह कर जंगल के बाहर आएँ और जिस कार्य से आएँ वह हो भी न , उससे एक खीझ, झुंझलाहट उत्पन होना स्वाभाविक है। ऐसे में वे थोड़ी सी राहत चाहेंगे ही ।

             सत्ता की राजनीति कितनी घृणित हो सकती है, होती है, इसके कई उदाहरण यह किताब प्रस्तुत करती है । ख़बर बन जाए केवल कि वे नक्सलियों को ख़त्म करने के लिए ज़ोर-शोर से काम कर रहे, इसके लिए किसी की भी मृत्यु हो, उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता । आमलोगों की हत्या कर इसे “सबसे बड़ी माओवादी मुठभेड़” बता देना बहुत सरल है । नक्सलियों का भी जंगलवासियों के प्रति व्यवहार उनके लिए तोड़ने वाला ही है । लेखक बताते हैं कि “दण्डकारण्य में कम घर होंगे जिनके परिवार का कोई सदस्य इस हिंसा में बलि या युद्ध में भागीदार न हुआ हो। माओवादियों ने बयान दिया है कि कलक्टर के साथ अन्तरराष्ट्रीय नियमानुसार युद्ध-बन्दी का बर्ताव होगा। जंगल का निवासी इतना ख़ुशकिस्मत नहीं । न मालूम कितने आदिवासियों को माओवादी बन्दी बनाने के बाद मार देते हैं, कभी लाश को कुल्हाड़ी से चीर देते हैं । फिर भी सरकार इसे युद्ध नहीं, महज़ ‘कॉन्फ़्लिक्ट’ बतलाती है।” स्पष्ट है कि इसमें आम जंगलवासियों की स्थिति दोनों ओर से पिसने वाली है । इसके साथ ही यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रायः हमारी चेतना में यह बिठाने की कोशिश की जाती रही है कि  नक्सली भारत के दुश्मन हैं इसलिए सत्ता से उनकी नहीं बनती, इसलिए वे पुलिसकर्मियों पर हमला करते हैं। इस किताब में एक जगह भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच का उल्लेख है । उन समूह में से एक की रुचि महेन्द्र सिंह धोनी में है, वह यह भी कहता है कि “अगर क्रान्ति को सफल होना है तो भारत को आज जीतना होगा, ……….. मैंने कहा था न कि क्रान्ति के लिए भारत को जीतना ही होगा “। यह वाकया उनलोगों के लिए तमाचा की तरह लगता है जो नक्सलियों को देशद्रोही बताते हैं। सत्ता की निर्ममता, उसके स्वार्थ का एक रूप यह भी सामने आता है कि अपने हक़ के लिए धरने पर तक़रीबन पाँच हज़ार लोगों को किस प्रकार छल से अपने फायदे के लिए कुछ स्थानीय नेतागण इस्तेमाल करते हैं। 33 रुपए रोज़ की कमाई, यह अपने आप अचंभित करने वाला है और फिर भी उनसे उम्मीद करेंगे कि वे सामान्य मनुष्यों सा व्यवहार करें। क्या सरकार उनसे सामान्य मनुष्यों जैसा बरताव करती है? स्पष्टत: जवाब ना है।

                 इस के साथ ही लेखक छत्तीसगढ़ तथा बिहार-झारखंड में नक्सलियों की आबादी का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए उन विभिन्न कारणों का उल्लेख करते हैं जिन कारणों से दोनों-तीनों राज्यों में नक्सलियों की आबादी में अंतर है ।

                 इन सबमें जंगल में रहने वाली स्त्रियों की स्थिति भी हमारे सामने खुलती हैं, नक्सलियों के जीवन में स्त्री-पुरुष संबंध की क्या स्थिति है, इसका उल्लेख भी कई जगह आता है ।

                संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि परिस्थितियाँ, कारण चाहे जो हों, नियति में सबसे अधिक हिंसा और मृत्यु ही है। अपने उसूलों को सही मानना, उसकी बरकरकारी के लिए हर तरह के उपाय दोनों लोग करते रहे हैं । हिंसा दोनों ओर से होती रही है, इसका सबसे विभत्स उदाहरण महेंद्र कर्मा की हत्या का वर्णन पढ़ते हुए लगता है, जब लोग शव पर भी नृत्य कर रहे थे ।

               जंगल की विभिन्न ज़िन्दगानियों के साथ जिस तरह लेखक अपनी भीतरी यात्रा को भी जगह-जगह पर दर्ज करते हैं वह अत्यंत रोचक और नायाब है । अपने जीवन का एक लंबा वक्त कोई व्यक्ति जंगल में बिताता है, वह भी यह जानते हुए कि जंगल से बाहर निकल पाना शायद सम्भव हो भी या न भी। ज्यादा संभावना न की ही होगी, फिर भी लेखक दृढ़ता से वहाँ बने रहते हैं । यह उनका साहस और अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्धता ही थी कि गाँववालों के द्वारा उन्हें बंदी बना लिए जाने के बाद भी वे लिखते हैं “लेकिन जंगल के अप्रत्याशित जोखिम के सामने शहर का सुरक्षित जीवन मरियल और मुरझाया हुआ लगता है। जंगल एक जानदार चीता । शहर एक पिलपिला केंचुआ ।”  इसके साथ ही हम शायद इसका अंदाज़ा भी न लगा पाएँ कि जब कोई व्यक्ति यह कह रहा कि “ इस राज्य में पन्द्रह दिन हुए, लगभग हरेक रात एक नये और अजनबी बिस्तर पर । पाँच रातें चलती कार में बीती हैं ।” इस में क्या कुछ अनुभव हुआ होगा । यह बतौर पाठक हम पर भी सवाल उठता है कि अपनी आराम कि ज़िंदगी जीते हुए भी, यदि किसी कारण अपना कमरा छोड़ दूसरे कमरे में कभी सोने की  जरूरत पड़े तो हम बड़े आराम से यह कहते फिरते हैं कि ‘यार बेड बदलने से रात भर ठीक से सो नहीं पाए ।’  जंगल में रहते हुए लेखक जहाँ भी अपनी कोई बात या भावना का ज़िक्र करते हैं उससे एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति सामने आता है, मसलन अपने रायपुर के घर में एक मेंढक (जिसका नाम इतना प्यारा रखा गया, टूटू जी) की याद हो आना और फिर उससे हुई दोस्ती की कहानी बताना । इसके अलावा जब यह जानने को मिलता है कि लेखक जंगल में हैं और महीने भर में उनकी बहन की शादी होने वाली है, घरवाले जानते भी नहीं कि वह जीवित हैं या नहीं? इस कचोट के बाद जब यह सामने आता है कि जंगल से बाहर निकल आने के बाद पहला फोन घर पर करते हैं और उनकी बहन अपने भाई की आवाज़ सुन रोने लगती है,  यह पूरा वाकया अतिमार्मिक है।

            इन सबके साथ लेखक की शैली पर भी ध्यान जाना वाजिब है । जंगल के जीवन को बताए हुए जिस तरह बीच-बीच में कई किस्सों को हिस्सा बनाया गया है वह बहुत ही रोचक है, मसलन, बनारस की कथा ( शायद ही कभी किसी का इस पर ध्यान गया हो कि अंतिम संस्कार के लिए जो अनिवार्य वस्तुएँ हैं उनकी खरीदारी कैसे होती होगी!),  कवि जगन्नाथ की प्रेम कथा और गंगा के संबंध का विवरण, विभिन्न मिथकों का उदाहरण, जैसे कि रामनामी समुदाय के बनने की कहानी,  शिव को गौरी के अलावा भी प्रेम हुआ था, यह कथा भी पहली बार इसी पुस्तक से जानने को मिली । यह हम सबके लिए नयी बात है क्योंकि हमारे समाज में यही प्रचलित है कि इतना प्रेम करने वाला शायद ही कोई और होगा, यहाँ लड़कियाँ वाकई कृष्ण और राम को न चाह कर शिव जैसे पति की चाह रखती हैं।

अनु रंजनी

 

 

 

 

एक बात और इस पुस्तक के बारे में कहना ज़रूरी कि यह किताब बहुत ही धैर्य की मांग करती है, क्योंकि इसमें पाठक को कोई उत्साह या ख़ुशी नहीं मिलेगी, बल्कि हर कदम पर किसी न किसी के मृत्यु से सामना होते रहेगा और आप को इसके साथ जीते जाना होगा…

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