युवा कवि रवित यादव की गद्य कविताएँ

युवा कवि रवित यादव की कुछ गद्य कविताएँ पढ़िए। वे पेशे से वकील हैं और संवेदनशील कवि, जिनका अपना मुहावरा है और कविता की अपनी ठोस ज़मीन। आज अरसे बाद उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए-

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1— न्यायप्रिय

वहाँ उसके पास अपना एक कमरा था जो धीरे-धीरे खुद को खाली कर रहा था। वह जितना खुद को खाली कर रहा था, उसमें रहने वाले को उतना सवाली कर रहा था। उस कमरे के हर कोने में उसकी याद की एक किताब थी, जिसके पन्ने धीमे-धीमे पीले पड़ रहे थे। वह अब उन किताबों को नही पढ़ पा रहा था। वह इस बारे में परेशान और चिंतित भी होता जा रहा था। कुछ किताबें ही तो बचीं थीं अब उसके पास, क्यों फिर वह उनसे भी एक दूरी बना रहा था। दरअसल वो सारी किताबें किसी की याद की किताबें थी और याद का दोहराव उसे भूलना लगता था और वह उसे भूलना नही चाहता था। शायद यही कारण था। हाँ, यही कारण था।
उसे पता था कि उस रोशनदान से जो कमरे की दूर वाली दीवार पर उसकी जीने की उम्मीद का एक छोटा सा टुकड़ा था उससे अब कभी कोई सूरज की पहली किरण उसके बिस्तर तक नही आएगी, न ही कोई सुनहली शाम उसके घुटते दम के कमरे में कोई आराम की रात छोड़ जाएगी। वह बेहद अजीब सी स्थिति होती है जब आप सुबह, दोपहर, शाम और रात में कोई फ़र्क कर पाने में असमर्थ नज़र आने लगते हैं पर जब भी शीशे में खुद को देखते हैं तो स्थितियों को बदल पाने में समर्थ नज़र आते हैं। आप तमाम चीज़ों से नाउम्मीद हो सकते हैं, पर आपका चेहरा हमेशा आपको एक उम्मीद देता है। वह चेहरा ऐसी ही उम्मीदों का एक चेहरा है, उसे भरोसा है कि वह किसी भी तरह की तनहाई, ख़ामोशी, उदास-सी शान्ति, बेक़रारी, चीज़ों की कमी, किताबें, तसवीरें, दुनिया से दूरी, काम की कोशिश, अन्त का इन्तज़ार इन सारे भावों से एक दिन बाहर निकल ही आएगा, बस उसे एक बात का डर है की जब तक वह उस चमकीली जीवन की गर्म सतह पर आएगा, क्या कुछ भी बच रह पायेगा? क्या वह अपने वर्तमान को अपने भविष्य में अपने अतीत की लूटी पिटी गौरवगाथा के अलावा कुछ और कह पायेगा? क्या उसके भविष्य का भूगोल, उसके अतीत के खंडहर इतिहास को बचा पायेगा?
उसे पता है कि उस आईने में खुद को देखते हुए, डूबते हुए उसने अभी जो कुछ लिखा है, शायद वह वैसा कभी नही रहा है। उसने उम्मीद के कंधे से खुद को उतार भी लिया है। उतरने के लिए गहराई बहुत थी और कोई सीढ़ी नही थी। उसे फिर कूदना ही पड़ा था। इस कूदने में वह चोटिल हो गया था। आप देखेंगे तो चोट के कोई निशान नही दिखेंगे। बस खून के कुछ थक्के बन गए है। पहले कुछ दिन लाल और बाद के दिनों में काले। इन्हें छुपाने के लिए वह अब फुल शर्ट पहनता है और बाहें भी नही मोड़ता । थ्री फोल्ड शर्ट की बाहों में वह सुंदर दिखता है, पर अब वह किसी को आकर्षित नही करना चाहता। वह उन उधमी बच्चों की तरह हो गया है जो एक उम्र के बाद बेहद गंभीर हो जाते हैं।
वह जब छोटा था तो पेप्सी, समोसों और गोलगप्पों के प्रति बहुत रोमांचित रहता था पर अपने बड़ों में वह उस उत्सुकता को शून्य पाता था। वह सोचता था कि कोई ऐसा कैसे हो सकता है जिसे इस सब की भूख नही, प्यार नही, लालच नही, उत्साह नही । आज जब वह खुद उस जगह पर खड़ा है तो वह उस उदासीनता को समझ रहा है।
“मनुष्य के चित्त में उत्साह से उदासीनता तक के सफर में कितनी त्रासदियों का हाथ होता हैं, कितने प्रियों को खो देना होता है, न चाहते हुए भी व्यक्तियों की अनुपस्थितियों को स्वीकार करना होता है। कितनी ही उदासियाँ मिलकर कितने ही उत्साहों की हत्या रोज करती हैं। उदासियों को ऐसी हत्याओं में महारत हासिल हो जाती है। उनके मारे का कोई सबूत आप किसी भी अदालत में पेश नहीं कर सकते। उदासी कभी किसी उत्साह की हत्या की सजा नही भुगतती। एक बेहद उत्कृष्ठ सीरियल किलर की तरह। आप उसे जीवन भर चोर पुलिस की तरह ढूँढते रहते है और अंत में आप पाते हैं कि वह तो हमेशा से आपके ही अंदर थीं। अगर आपको यह पहले पता चल जाता तो क्या आप खुद को उन गुनाहों की सजा दे पाते? शायद नही। शायद हाँ। जो लोग समय से पहले आत्महत्या कर लेते हैं, अपने जीवन को खत्म कर देते है, शायद उन्हें उन उदासियों के पते का पता चल जाता है। शायद वे अपने उत्साहों की हत्या की सजा अपनी उदासियों को देने के लिए खुद को ख़त्म कर लेना उचित समझने लगने हैं। वो शायद न्यायप्रिय है पर लोग उन्हें कायर कहने लगते हैं।”
2— खिड़की की दुनिया 
वह वहीं बैठा रहा अंदर । कुर्सी पर । टेबल पर पाँव रखे हुए। घड़ी की तरफ़ देखता हुआ। भले ही हमारे समय का हमें आभास रहता है फिर भी घड़ी देखना एक आदत सी बन जाती है, वक्त-बेवक्त खिड़की के पास बैठने की आदत की तरह। हर बार किसी घुटन से बचने के लिए नही, कभी-कभी बस ऐसे ही। कभी हाथ में चाय लिए, कभी खाली हाथ। कभी अकारण ही। लगता है खिड़की से कोई और दुनिया खुलती है। हर बार एक नयी सी। खत, ख़्वाब और ख्यालों की। ख़्वाब जिन्हें खिड़की के पास खड़े होकर वे साथ देखते थे, ख़त जिन्हें डाकिया महीने में दो बार फेंका ही करता था, और ख़्याल उन पर किसी का बस नही चलता था वो तो बस चले आते थे। हवा में तैरते हुए। कभी खिड़की न खुली हो तो वो ख्वाब कबूतर की तरह अपने पंख फड़फड़ाते थे। ये खिड़की मेरे दफ़्तर की खिड़की से अलग है। उतनी ऊंची खिड़की से सिर्फ वकील और अर्दली ही दिखते हैं, कभी कभी उनका मुंशी भी जो खुद को वकील ही समझता है, समझाता है वो भी दिख जाता है। हालाँकि उन खिड़की से आप झाँक सकते हैं यहाँ यह सुविधा नही है। सामने देखने के लिए दो जोड़ी पेड़ और एक मुट्ठी भर आसमान, वो भी इन खाँचो से, पर मुझे इससे शिकायत नही होती, ये मेरी अपनी खिड़की जो है। “कभी कभी सोचता हूँ कि सबसे पहले खिड़की जैसा कुछ किसी औरत ने ही सोचा होगा, ज़मीन की बंदिशों को वे शायद आसमान में तोड़ने के ख़्वाबों से भर जाती होंगी।” यह बात जरूरी नही की सही ही हो, मुझे खिड़कियों का इतिहास ठीक से नही पता पर क्या फर्क पड़ता है। जिसने भी सोचा अच्छा सोचा। किताबों की तरह ये आपको कहीं भी ले जा सकती हैं। वहाँ आंखें खुली रखनी पड़ती हैं और यहाँ बंद करके भी काम चल जाता है। तो चलिए मैं अपनी आंख बंद करता हूँ और चलता हूँ। ख्वाब क्या देखूँगा नही बताऊँगा, बैठे-बैठे अब मैं किसी के पास चला जाऊँगा। आप भी जाइए। खिड़की खोलिए। कोई तो होगा जो कहीं आपका इन्तेजार करता होगा।

3— दो बारिशों के दरमियान 

पिछली बार जब आसमान ने इन बूँदों को धरती तक भेजा था तब इन्हें महसूस करने, इनसे बात करने, इनसे बचने के लिए वह पैंट की तहों को ऊपर करके चलने तो कभी फिर बेफिक्र होकर खुद को भीगने देने की इच्छाओं से भरते हुए खुद को बारिश में जैसे घुलते हुए महसूस किया करता था। हर बारिश में वह कुछ लिख लिया करता था। वह बारिश का पानी जमा तो नही कर सकता था पर उनसे अपनी सूखी दवातों को भर लिया करता था। लिखने में ये बारिश उसके बड़ी काम आया करती थी। वह हर गड्ढे में जमा पानी पर अपने पैर मार दिया करता था, कभी उनके पास खड़े होकर उनमें बनते झिलमिल प्रतिबिम्बों को अपने कैमरे में कैद कर लिया करता था। कभी उनमें खुद की शक़्ल भी देख लिया करता था और फिर किसी को उसे ऐसा करते देख लेने पर उनकी नजरों से झेंपता हुआ, बचता हुआ, मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ जाया करता था। वह ऐसे ही अधूरी ख्वाहिशों के बीच ज़िन्दगी को गुलज़ार किया करता था। वह लिखता था कि “बारिशें पूरी बह चुकी थी, मगर कुछ दीवारों पे अब भी सीवन सी थी, पलकें देखीं तुमने मेरी? कोई जवाब तब भी नही आता था। कोई जवाब अब भी नही आता है। पर वह पूछना नही छोड़ पाता था। भीनी-भीनी बारिश में भीगी-भीगी मिट्टी की खुश्बू को अंदर तक गहरे उतर जाने दिया करता था। सोचता था कोई तो होगा कहीं जो इस सब को ऐसे ही महसूस किया करता होगा। और उस ‘कोई’ की तलाश में हर बारिश में ऐसे ही ख़त लिखा करता था और भेज दिया करता था, उस पते पर जो उसने जाते वक्त टेबल पर रखे कागज़ पर लिख कर छोड़ दिया था। वह जनता था कि उसे जवाब लिखना नही आएगा, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि आप खतों को सिर्फ लिखते जाते हैं, बिना इस बात की फ़िक्र किये की आपको उसका जवाब कभी नही आएगा। आप यह बात समझने लगते हैं कि जिन जगहों पर जवाबों की ज्यादा जगह नही होती है वहाँ सवाल करते रहना बेमानी हो जाता है। इस तरह कहीं न कहीं प्रेम भी एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था है, आपको हमेशा एक भ्रम में रखता है कि आपके सवाल हमेशा सुने जाएंगे, पर उनके जवाब चुनावी भाषणों में ही आएंगे। इतने शोर में आप उन्हें ठीक से सुन भी नही पाएंगे। आप महज एक नारा बनकर रह जाएंगे। किसी मेनिफेस्टो में कुछ जगह घेरे खड़े रह जायेंगे। सत्ता स्थापना के बाद सड़कों में किसी फल की ठेलिया में संतरों के साथ लिपटे नजर आएंगे। कुछ कुछ इसी तरह से वह उस तक अपनी बात पहुँचा दिया करता था। आज फिर बारिश हुई। आज फिर एक याद आयी। आज फिर वह भीगने को हुआ। आज फिर दिल उसकी याद में मोमबत्ती बनकर जलता रहा। जलते जलते फिर बुझ गया। बुझने के बाद के धुएं में वह खो गया। यह सब इतना धीमे हुआ कि सब अगल बगल रहे पर किसी को उसकी गुमशुदगी का इल्म तक नही हुआ। कोई उसकी तलाश में नही है । वह भी अब किसी का इंतजार नही करता। कुछ चुप्पियाँ रही जाती हैं बस जो बारिश तोड़ने की कोशिश कर रही है। पर इन्हें पता नही है कि-

“चुप्पियाँ, क़ब्रों की तरह होती है शब्दों को इतने गहरे दफ़न करतीं हैं की उनकी चीखें तक नही सुनाई देती । ” ख़ैर, अभी उठा हूँ नींद से तुम्हारा ख़्वाब देखकर । ख्वाब में बारिश थी, वह थी, उन दोनों ने एक दूसरे की आँखों मे अंतिम बार एक दूसरे को देखा भी। पर मलाल है कि उन आँखों मे एक दूसरे की कोई पहचान अब शेष नही थी। इतनी रिक्तिता के बाद भी कुँवर नारायण की कविता सा मन है उसका, इतना कुछ था आज करने को उसके पास पर उस कोई की याद में डूबा रहा। सतह पर जब आया भी तो बाहर बारिश थी सो डूबता रहा । दो मौसमों की बारिश के बीच कितना कुछ बदल गया। कुछ नही बदला तो मेरा ये इस तरह से तुम्हे लिखना। हर बारिश में।

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