‘सौंदर्य जल में नर्मदा’ आनंद कुमार सिंह की नहीं बल्कि साहित्य की काव्य-सम्पदा है

आनंद कुमार सिंह का कविता संग्रह ‘सौंदर्य जल में नर्मदा’ बहुत अलग तरह का कविता संग्रह है, इसमें नर्मदा नदी को लेकर कवि की लिखी गई कविताएँ हैं। इसी संग्रह पर टिप्पणी लिखी है युवा लेखिका प्रियंका नारायण ने-

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सौंदर्य जल में नर्मदा

क्रमवार ख़ोज और सिलसिलों के बीच इन आंखों ने कभी शिद्दत से नर्मदा का सौंदर्य देखना चाहा था,दिल ने महसूस किया था और सांसों ने छूना चाहा था उसे। कहते हैं जब कोई स्त्री किसी पुरुष से प्रेम करती है तब प्रकृति उसे पलकों की आड़ दे देती है। जानते हैं क्यों??… नहीं न!… क्योंकि वो आंखें समंदर होती हैं…पुरुष पार नहीं पा सकता प्रकृति के उस घातक सौंदर्य से…।नर्मदा का सौंदर्य भी कुछ ऐसा ही है और पार न ही पा सके आनंद जी भी। शोण के प्रेम में पगी नर्मदा ख़ुद तो ठहरी वैरागी लेकिन जिसने भी उसकी त्रिवलियों की थिरकन, आंखों की भंगिमा देखी, उसका राग जग गया-

“विंध्य के महावनों से निकली

यही मेकल की तनया

चंचल लड़की- सी वनवासी

आ रही गदबदी सामने”

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“यह मेकल की कन्या

चंचल वनवासी लड़की

नहा रही रेवा के रव में।”(८)

विंध्य और सतपुड़ा के बीच त्रिभंगी मुद्रा में प्रवाहित होती इसी नर्मदा के सौंदर्य में डूबे आनंद कुमार सिंह और गढ़ने लगे नर्मदा का सौंदर्य रूप-

“चारों ओर खड़े हैं जंगल एकांत

मौन अमुखर शिलाओं में

जम गए हैं गीत अंधकार के

रुप से तिरछे अजान नैन

फैले हुए कान तक सम्भ्रम में

चितवते हैं सारे अस्तित्व को”(८)

“सौंदर्य जल में नर्मदा”- आनंद कुमार सिंह की ही नहीं बल्कि यह साहित्य की ‘काव्य-सम्पदा’ है। ‘सम्पदा’ इसलिए क्योंकि

“नर्मदा के धारा के दोनों तट

शताब्दियों से ढ़ोते रहे हैं

आदिम मनुष्यों की इच्छाएं,

संघर्ष, कोलाहल, किटकिटाहटें आदिम भय

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हिडिम्बा के पूर्वजों के गण्डे

जमकर हो गए हैं पत्थर

अलम्बुसा की पीठ पर पड़े हैं

पत्थरों के अण्डे” (२)

आदिम सम्पदा और स्मृतियों को संजोए हुए “सौंदर्य जल में नर्मदा” एक तरफ़ तो पर्यावरणीय(वर्तमान में बेहद प्रासंगिक) विषय-वस्तु को नितांत भिन्न रूप में सामने रखती है तो दूसरी तरफ़ ‘वोल्गा से गंगा’ की यात्रा’ करने वाली हमारी सभ्यता की नींव की भी याद दिला देती है। यहां कालिदास की उज्जैनी परम्परा भी सांकेतिक रुप में है तो कहीं लोक कथाएं तो कहीं स्कन्द पुराण का पुन्: आख्यान भी। मार्कण्डेय हैं तो शंकर की सौंदर्य लहरी भी। ‘वेगड़’ की ‘परिक्रमा’ है तो इन सबके समानांतर मोम की तरह “परम्परा से सटती परम्परा से हटती” (२४)नर्मदा के प्रेम में पिघलता हुआ स्वंय आनंद कुमार जी का अपना व्यक्तित्व

“बस एक अपांग की चंचलता से

बहती रहती है धारा नदी की

अमृत कमनीयता की

विदग्ध करती उदग्र मन को

चिर पिपासु” (१)

यहां कहीं कामना की वर्तुल लपटों में जलती “गुंजते-चरमराते बसन्त की लहर में/एकवस्त्रा नर्मदा उज्ज्वल पयोधरा”(९) है तो कहीं वसंत की लपट से संत्रस्त हो, कामना के अधूरे शिखर पर खड़ी “उदास और अकेली /तरसती है आत्मा की ज्वाला पहनकर/निर्धूम निराकार”(३२) स्त्री- पुरुष प्रेम के छल, विछोह व अधूरे विन्यासों का वितान रचती है।

कहा था न कि जब गुलाबी शाम काही-स्लेटी होती हुई रात में ढ़ल जाती है,मिलन-विरह के दीप जल उठते हैं, घंटे-घड़ियाल बज उठते हैं तब घने वन प्रदेश की नदी कहां गुम हो जाती है? वो नदी धीमे से कवि की नींद में उतरती है, फिर और धीमे ठोस होती है और फ़िर अंत में शब्दों में मूर्त हो जाती है-

“यह रुप बिखरा राशि जल में सर्वदा

क्या सो रही

सौंदर्य जल में नर्मदा?”

या फ़िर

” रुप की माधुरी को माधवी कलश में भरे हुए

अतन्द्रित मदालसा

यौवन की ज्वाला में

चेतना का अगुरु भरे हुए

खींचती हो करुणा नयन को आर्द्रमन

जड़ता से भीतर से रात-दिन”(३२)

आनंद कुमार सिंह की आस्था, श्रद्धा व अभिभूत होने का भाव नर्मदा के प्रति पूर्ण समर्पण तक पहुंचा हुआ जान पड़ता है, लेकिन कहते हैं न कि जो गुण मार्ग दिखाती है वहीं कभी-कभार भटका भी देती है। संग्रह के ‘भाव-पूंज’के स्तबक प्रशंसा के पात्र हैं लेकिन कभी- कभार नावीन्यता का सन्निवेश करने से चूक जाते हैं। हालांकि अगले ही पल ये चुपके से लौट भी आते हैं। मार्कण्डेय के ज्ञानमय उत्तर से शुरू होती हुई कविता कब डैम प्रोजेक्ट पर आकर अचंभा में डाल जाती है पता नहीं चलता-

“मार्कण्डेय महर्षि ज्ञानमय उत्तर देते हैं प्रश्नों के।”

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बांध बनाकर अभियंता गण रोक रहे हैं उस अनंत को

जो करुणा से आप्लावित हो धारण करता सृष्टि मात्र को

अवरोधित कर एक अनामत विप्लव मान तरंगिणी रेवा

जड़ता की विद्युत धारा को मात्र स्वार्थ से खोज रहे हैं।”(३०)

मंगलाचरण, नर्मदा सूक्त-४०कविताएं, उपसंहार, नदी सूक्त-१०कविताएं और परिशिष्ट को क्रमवार रखकर संकलित की गई है- सौंदर्य जल में नर्मदा। काव्य में कई स्थल ऐसे हैं जहां शब्द- विन्यास, शैली वह अभिव्यक्ति में शुद्ध काव्य के अग्नि पुष्पों की चमक है तो कुछ में नील पंखुड़ियों का सौंदर्य-

“बहती करुणा की महद्धार

झरती मर्त्यों के हित उदार

सदियों से बहती दुर्निवार रेवा मा!”

(मंगलाचरण)

लेकिन कई बार समकालीन पाठक इस संग्रह पर भाषा व अभिव्यक्ति को लेकर दुरुहता का प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। एक तो भाषा तत्सम प्रधान है तो कई स्थानों पर यह क्लीष्ट हो गई है, लेकिन देखन वाली बात यह है कि यहां निर्वाह किस विषय का किया जा रहा है- एक आदिम संस्कृति प्रधान नदी नर्मदा का। वास्तव में यहां आपत्ति-विपत्ति के स्थान पर हमें अपनी भाषिक कमज़ोरी को मान लेनी होगी क्योंकि कम- से-कम यहां भाषा हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ या प्रसाद की ‘कामायनी’ को नहीं छू रही है।

वस्तुत: हिन्दी में लेखकों के अपने-अपने शिविर रहे हैं। विचारधाराओं की लंबी राजनीति रही है, जिसमें विषय और भाषा दोनों को ही खांचे- सांचे में डालकर सपाट कर दिया गया है। ऐसे में लगातार ‘सवाल’, ‘प्रश्न’ या प्रतिरोध खड़ा करने का दंभ भरने वाली एक ही भाव-विषय की कविताएं अब गहरी उबासी लेने पर मजबूर कर देती हैं। कहीं न कहीं इनकी एकरसता अवचेतन में साहित्य से दूर हटने को प्रेरित करती है और इस तरह की रचनाओं की निरंतरता ने ही बड़े पाठक वर्ग को दूर भी किया है। ऐसा नहीं है कि ‘सवाल’ होने ही नहीं चाहिए या ‘पक्षधरता’ होनी ही नहीं चाहिए लेकिन क्या उस ‘पक्षधरता’ या ‘सवाल’ में विषय की विविधता या भाषिक परिवर्तन के विस्तार की गुंजाइश भी नहीं होनी चाहिए। क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि कविता या साहित्यिक विधा केवल वोट बैंक, विचारधारायी जड़ता या पार्टी की ‘राजनीति’ या साहित्य में पाठकों के पलायन के बाद स्थान सुरक्षित करने के लिए है।

यूरोप में भी ऐसी कविताओं का दौर रहा है। इंग्लैंड में क्रुद्ध-फुंफकारते कवियों की बाढ़-सी आ गई थी लेकिन इन्हीं कवियों के कंधे पर जब जुआ पड़ा तो वे पटक कर भाग खड़े हुएं। कोलिन विलसन की ‘आउट साइडर’ पर जे.बी.प्रिस्टले ने यूं ही नहीं कहा ही था कि “यदि आउट साइडर अहंभाव के ज़हर से इतना जहरीला हो उठा है, यदि वह केवल घाव करना जानता है, मरहम लगाना नहीं जानता, यदि उसके भीतर घृणा अधिक है और प्रेम कम है, तो हम यह आशा कैसे कर सकते हैं कि वह हमें समाधान के पास पहुंचाएगा।”

आनंद जी के यहां कम से कम इलियट ने ‘दुरुहता’ को लेकर जो व्याख्याएं दी हैं, उसकी नकारात्मक स्थितियां यहां नहीं बन पाती। यहां सामान्य पाठकों को जिस दुरुहता का सामना करना होगा वह भाषायी ‘संकोच’ का परिणाम होगा। इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर काव्य परिवेश साधारणीकृत अवस्था की नहीं है लेकिन इनसे इतर जो सबसे बड़ी बात है वह भाव व भाषा अपने संगुम्फन में खनखनाहट के साथ लय पैदा करती है। साथ ही कवि की भावानुभूति भी स्पष्ट है। उसके पास कहने को कुछ है। वह केवल भंगिमा नहीं बना रहे हैं।

काव्य रचना होते हुए भी किसी शोध पत्र की तरह है यह संग्रह। यहां नर्मदा का अधिकांश पक्ष उजागर हो जाता है। कुछ अलग पढ़ने की चाह हो या प्रकृति के आगोश की कामना तो यह संग्रह आसानी से पढ़ी जा सकती है।

रमेशचंद्र शाह यूं ही नहीं लिखते- “नर्मदा मात्र एक नदी नहीं है। वह एक समग्र अनुभव है” और आनंद कुमार सिंह ने उसे “अक्षरशः अभिनीत” किया है।

” इतिहासों को सीखना होगा

तुमसे समन्वय

वर्ग संघर्ष नहीं वर्ग स्फीत मन ही

इतिहास का नियन्ता है।” (२६)

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