अनु सिंह चौधरी की कहानी ‘नीला स्कार्फ’

स्त्री-लेखन की चर्चा में उन लेखिकाओं की चर्चा भी होनी चाहिए जिन्होंने स्त्री-लेखन के दशकों पुराने ‘क्लीशे’ को तोड़ा और स्त्री-लेखन की सर्वथा नई जमीन तैयार की. इस चर्चा में अनु सिंह चौधरी और उनकी कहानी ‘नीला स्कार्फ’ की चर्चा के बिना यह चर्चा अधूरी ही मानी जायेगी. अनु जी की कहानियों में स्त्री होने का वह लोड नहीं है जिसको आम तौर पर स्त्री-लेखन का प्रस्थान बिंदु माना जाता रहा है. समाज और मान्यताएं इतनी बदल गई हैं, उनकी कहानियों को पढ़कर समझ में आता है. और भाषा भी जीवन के अधिक करीब आ गई है. ‘नीला स्कार्फ’ अनु जी की सिग्नेचर कहानी की तरह है. बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कहने की सर्वथा नई शैली की कहानी- मॉडरेटर 
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शांभवी चुपचाप अपना सामान  ठीक करती रही। बिस्तर पर एक जंबो साइज़ सूटकेस पड़ा था और रंग-बिरंगे तह किए कपड़े बिस्तर पर समेट लिए जाने के मकसद बिखरे पड़े थे। तीन महीने की पैकिंग तो बहुत ज़्यादा नहीं होती, लेकिन विदेश प्रवास का हर लम्हा अच्छी तैयारी माँगता है – मौसम और कल्चर के अनुकूल।
वैसे भी शांभवी को सब कुछ क़ायदे से करने का ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर है। कपड़े क़ायदे से तह करती है, पहनती है, वापस रखती है। जो मूर्त है और नज़र आता है, सब सलीके में बंधा हुआ है – जैसे फ्रिज में डाले जा रहे डिब्बे, फल, सब्ज़ी, बर्तन… रसोई की दराज़ें… लिविंग रूम के कुशन्स… गुलदानों में लगे फूल… अमितेश के साथ सात सालों की गृहस्थी।
जो अमूर्त है और दिखाई नहीं देता, सब बेसलीका है – जैसे रिश्ते, मन, सुख, दुख, शिकायतें…
और सलीके से तह किए रखे कपड़ों के बीच एक बेसलीका-सा सिल्क का नीले रंग का स्कार्फ फ़र्श पर लोट-पोट कर किस अमूर्त बेरुख़ी के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत दर्ज करा रहा था? शांभवी की नज़र उस स्कार्फ पर पड़ी तो उसने बस यूँ ही उठाकर मुचड़ी हुई अवस्था में ही अपने हैंडबैग में ठूँस लिया।
ये कमबख़्त स्कार्फ भी न… बेवजह न जाने क्या याद दिला गया था शांभवी को! याद बेरहम कसाई है। बेवजह वक्त-बेवक्त दिल को, लम्हों को, तजुर्बों को चीरने-फाड़ने की बुरी आदत है उसको। कैसी ज़िद्दी होती है यादें कि हमारी पकड़ से कभी इधर, कभी उधर, कभी यहाँ, कभी वहाँ फिसलती रहती हैं और हमारे ही वजूद पर लिसलिसी-सी पड़ी रहती हैं। न पोंछना आसान, न धोना।
इस बार नीले स्कार्फ की डोर यादों के जिस वृक्ष से जा उलझी थी, उस वृक्ष पर लटकी हुई थी एक तारीख़ – २६ दिसंबर की।
शांभवी को अमितेश की उँगलियों में फँसी हुई अपनी एक मुट्ठी में उतर आई पसीने की नरमी की याद सिहरा गई थी अचानक। नीले स्कार्फ ने याद दिलाया कि कैसे सात साल पहले उस बुधवार को अपनी एक हथेली से अमितेश को थामे, दूसरी हथेली में कोल्ड कॉफी के खाली ग्लास में पाइप से बुलबुलों की बुड़-बुड़ भरते जनपथ के चक्कर काटते रहे थे दोनों। कोई और ख़ास वजह नहीं, लेकिन शांभवी को याद है कि २६ दिसंबर वाला वो बुधवार उसकी शादी के बाद के पहले महीने के पाँचवें दिन आया था।
शांभवी को एक और ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर है – तारीखें याद रखने का। चीज़ें, बातें, चेहरे, घटनाएँ – सबको तारीख़ों की गाँठ में बाँधकर मन में रख लिया करती है। इसलिए तारीखें भूल नहीं पाती। इसलिए उसे अच्छी तरह याद है कि नीले रंग का ये सिल्क का स्कार्फ उसने २६ दिसंबर को अमितेश के साथ जनपथ धाँगने के क्रम में खरीदा था।
ये नीला स्कार्फ सिर्फ एक एक्सेसरी हो सकता था, ज़रूरत नहीं। पता नहीं क्यों खरीद लिया था ये नीला स्कार्फ उसने?
पता नहीं क्यों शादी कर ली थी उसने? और ज़ेहन में पता नहीं क्यों ये ख़्याल अचानक आ गया था। लेकिन ज़ेहन में आए ख़्याल अक्सर बेसिर-पैर के ही होते हैं। 
ख़्याल को झटककर, नीले स्कार्फ की याद से जी छुड़ाकर शांभवी वापस अपने काम में लगी ही थी कि बिस्तर के पायताने पड़े लाल जैकेट ने कुछ और याद दिला दिया… नए साल पर १२ जनवरी को मॉल में अमितेश के साथ हुई पहली तकरार…  
बड़ी बेतुकी बात पर लड़े थे दोनों। जैकेट को लेकर। छोटा हैबड़ा हैमैटिरियल अच्छा नहीं है। बड़ा महँगा है। इस लंबी-चौड़ी बहस में पूरे पैंतालीस मिनट निकल गए थे जिसके बाद अमितेश की ज़िद पर शांभवी ने जैकेट खरीदकर सुलह कर ली थी। ये और बात है कि सिर्फ तीन बार पहना था उसने इस जैकेट को। शांभवी को लाल रंग से मितली आती है।
ये सारी बातें उसे आज ही क्यों याद आ रही हैं? इन सारी बातों को वो अपने साथ फ्लाईट पर बिठाकर नहीं ले जाना चाहती, इसलिए शांभवी ने लाल वाला जैकेट वापस हैंगर में टांगकर अलमारी में लटका दिया था।  
इतनी ही देर में ये भी याद आ गया था कि जिस दिन ये जैकेट लिया था, उसी दिन दोनों ने घर के लिए पर्दे भी ऑर्डर किए थे। आसमानी रंग के पर्दों पर सुनहरे रंग की छींट। ‘जैसे शांत-से आसमान से हर वक़्त गुज़रती रहती हो धूप की सुनहरी लकीरें’, अमितेश ने कहा था पर्दे लगाने के बाद। ड्राईंग रूम में अब भी वही पर्दे लटक रहे थे, हालाँकि शांभवी ने अपने कमरे में सफेद रंग की चिक डाल दी थी और अमितेश के कमरे में ब्लाइंड्स लग गए थे।
सिर्फ पर्दों का रंग-रूप ही नहीं बदला था, रिश्तों की सूरत-सीरत भी बदल गई थी। हालांकि दोनों के घर के ऊपर का आसामान तमाम मटमैली अंदरूनी आँधियों के बावजूद बाहर से शांत और साफ़-सुथरा ही दिखता था। बादलों के बीच से धूप भी अपने वक़्त पर निकल आया करती थी। लेकिन आसमान बँट गया था। कमरे अलग हो गए थे। धूप को देखने-समझने के दोनों के टाईम-ज़ोन्स अलग हो गए थे, इतने अलग कि कई बार एक ही कमरे में होते हुए भी दोनों एक जगह, एक स्पेस में नहीं होते थे।
कब तक लौटोगी?” बहुत देर तक बीन बैग पर ख़ामोश बैठे उसे पैकिंग करते देखते हुए अमितेश ने पूछा था। जब बात करने को कोई बात न हो तो सवाल काम आते हैं।
उसी कमरे में बैठा था अमितेश, इस उम्मीद में कि जाने की तैयारी करते हुए शांभवी कुछ कहेगी – कोई चाहत, कोई शिकायत। कोई आदेश, कोई निर्देश। लेकिन जब ख़ामोशी आदत में शुमार हो जाए जो सामने वाले की उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर देना भी फितरत बन जाती है।    
जानते तो होशांभवी ने छोटा-सा जवाब दे दिया। बिना सिर उठाए, बिना अमितेश के चेहरे, उसकी आँखों की ओर देखे। बात करने को कोई बात न हो तो सवालों का कोई मुकम्मल जवाब भी नहीं मिलता।
अमितेश चुप हो गया और सिर पीछे की ओर टिकाए वहीं बीन बैग पर बैठे-बैठे शांभवी के कमरे में बिखरी हुई आवाज़ों से मन बहलाता रहा। लेकिन कपड़े तह करने और सूटकेस में रखने के क्रम में आवाज़ भी भला कितनी निकल सकती है? थककर वो अपने कमरे में चला गया। अपने कमरे में, जिसे वो अब भी टीवी वाला कमरा कहता है। कई महीनों से उस कमरे में अकेले रहते, उसी में सोते-जागते हुए भी।
एक घर में दो लोग साथ-साथ रहते हुए अकेले रहते हों तो भी एक-दूसरी की मौजूदगी की आदत नहीं जाती। किसी का साथ हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत होता है, चाहे वो भ्रम के रूप में ही क्यों न बना रहे। भ्रम में जीना और फिर भी रूमानी ख़्वाहिशों-ख़्यालों को बिस्तरा-ओढ़ना बनाकर हर रात सो जाना ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच होता है। ज़िन्दगी का बेशक न होता हो, शादियों का तो होता है। जो साथ है, उसके बिछड़ जाने का डर और जो बिछड़ गया है उसके एक दिन लौट आने की उम्मीद – शादियाँ इसी भरोसे पर चलती रहती हैं।
तीन महीने के लिए जा रही थी शांभवी, सिर्फ तीन महीने के लिए… इस बिछड़ने को बिछड़ना थोड़े कहते हैं, अमितेश ने अपने-आप को समझाया। लेकिन ऐसा क्यों लग रहा था कि शांभवी लौटेगी नहीं अब? इस तरह चले जाने और फिर एक दिन किसी तरह लौट आने से तो उसका बिछड़ जाना ही बेहतर हो शायद। सोचते-सोचते बहुत उदास हो गया था अमितेश। रास्तों के बीहड़ में खो गए रिश्ते ढूंढकर, उसे खींचकर ले भी आएँ तो उनसे जुड़ी तकलीफ़देह यादों का किया जाए?
शांभवी के कमरे की हालत ने भी बेसाख़्ता उदासी से भर दिया था उसको। मेहंदी का उतरता रंग, गहरा होता दिन, पहाड़ों से उतरती धूप, खत्म होती नज़्म, खाली होता कॉफी का प्याला, तेज़ी से कम होती छुट्टियाँ, मंज़िल की तरफ पहुँचती रेल, किसी छोटे-से क्रश की ख़त्म होती हुई पुरज़ोर कशिश और लंबे सफ़र की तैयारी करता कोई बेहद अज़ीज… इनमें से एक भी सूरत दिल डुबो देने के लिए बहुत है!
शांभवी ने एक लिस्ट फ्रिज पर चिपका दी। बाई, खाना बनानेवाली, बढ़ई, धोबी, प्लंबर, चौकीदार, अस्पताल, किराने की दुकान, यहाँ तक कि होम डिलीवरी के लिए रेस्टुरेंट्स के नंबर भी। एक घर को चलाने के लिए कितने काम करने पड़ते हैं, पिछले कई सालों में ये ख्याल तक न आया था अमितेश को। उसे तो एक महीने पहले बाई का नाम मालूम चला था वो भी इसलिए क्योंकि शांभवी ने नोट लिख छोड़ा था मेज़ पर, प्लीज़ टेल कांता टू कम ऐट थ्री टुडे। एक कर्ट-सा, बेहद औपचारिक-सा नोट। शांभवी की फॉर्मल हैंडराइटिंग की तरह। शांभवी के उस औपचारिक, लेकिन बेहद सौम्य और शांत बर्ताव की तरह जिसके साथ जीने की आदत हो गई थी अमितेश को।
वॉशिंग मशीन चलाते हुए, धोबी को इस्तरी के लिए कपड़े देते हुए, कूड़ा बाहर निकालते हुए, ब्लू पॉटरी वाली दो प्लेटों में खाना लगाते हुए, अपने कमरे की सफाई करते हुए, होली-दीवाली पर पर्दे साफ करवाते हुए शांभवी ऐसी ही रहने लगी थी पता नहीं कब से। ऐसी ही फॉर्मल। कर्ट। औपचारिक। ख़ामोश। अमितेश मानना नहीं चाहता था ख़ुद से लेकिन, इन्डिफरेंट भी। एकदम उदासीन। बेरुख़ी की हद तक।
फिर भी घर चल रहा था… अमितेश के ये न जानते हुए भी कि धोबी इस्तरी के कितने पैसे लेता है। बाई की तनख़्वाह क्या है और दस किलो आटा मँगाना हो तो किसको फोन करना होता है। तीन महीनों के लिए ये सब करना पड़ेगा अमितेश को।
तीन महीने में जाने क्या-क्या करना पड़ेगा! तीन महीने में जिंदगी भर के लिए ख़ुद को शांभवी के बिना जीने के लिए तैयार करना पड़ा तो? यदि शांभवी लौटकर न आई तो?
गाड़ी एयरपोर्ट के बाहर एक तेज़ स्क्रीच के साथ रुकी थी। घर में पसरी खामोशी गाड़ी में भी लदकर आई थी साथ और ब्रेक की आवाज़ ने तोड़ी थी वो ख़ामोशी। उसके बाद गाड़ी के गेट की आवाज़ों ने, फिर बूट से खींचे गए सूटकेस की आवाज़ ने बहुत सारी हलचल पैदा कर दी थी अचानक।
शांभवी शायद कुछ नहीं सोच रही थी लेकिन अमितेश के मन का द्वंद्व पूरे रास्ते नज़र आया था। घर से एयरपोर्ट पहुँचने में वो तीन बार गलत रास्तों पर मुड़ा था। उसका वश चलता तो वो गाड़ी घर की ओर मोड़ लेता। लेकिन उसका वश चलता कब है, ख़ासकर शांभवी पर!
शांभवी तेज़ी से बूट से सूटकेस निकालकर उसे खींचते हुए ट्रॉली की ओर बढ़ गई थी। कोई जल्दी नहीं थी। डिपार्चर में वक़्त था अभी। लेकिन ट्रॉली में सामान डालकर वो अमितेश से बिना कुछ कहे प्रवेश गेट की ओर मुड़ गई। अमितेश ने भी रोकने की कोई कोशिश नहीं की। शांभवी को तब तक जाते हुए देखता रहा जब तक उसके गले में पड़े स्कार्फ का गहरा मखमली नीलापन भीड़ के कई रंगों में गुम नहीं हो गया। अमितेश का मन अचानक उसके घर की तरह खाली हो गया था।
चेक-इन के लिए लंबी कतार थी भीतर। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तो यूँ भी हज़ार झमेले होते हैं। कस्टम क्लियरेंस और अपना सामान चेक-इन करके बोर्डिंग पास लेने के बाद शांभवी लैपटॉप खोलकर एक कोने में बैठ गई।
डिपार्चर में अभी भी समय था। इतनी देर में कई काम हो सकते थे। ई-मेल के जवाब लिखे जा सकते थे, जी-टॉक पर दोस्तों से बात हो सकती थी, फेसबुक पर दूसरों के स्टेटस मैसेज पर कमेंट किए जाने जैसे बेतुके लेकिन अतिआवश्यक काम निपटाए जा सकते थे,  कुछ दिलचस्प ट्वीट के ज़रिए आभासी दुनिया के दोस्तों से बातचीत का कोई तार पकड़ा जा सकता था।
लेकिन शांभवी ने इतने सालों में जब ये सब कभी किया नहीं तो अब पौने दो घंटे में क्या करती? यूँ ही बंद रहने की आदत घर से बाहर पता नहीं कब फ़ितरत बन गई थी उसकी। इसलिए बिना कुछ किए बेमन से ऑफिस के कुछ ई-मेल्स पढ़ती रही, निर्विकार भाव से उनका जवाब देती रही। इधर-उधर सर्फिंग करती रही। फिर पता नहीं कब और क्यों उसने फोटोज़ नाम के एक फोल्डर पर क्लिक कर दिया।
जब हम ट्रांज़िट में होते हैं तो अपनी यादों के सबसे क़रीब होते हैं शायद। या होना चाहते हैं। नॉस्टैलजिया सबसे शुद्ध रूप में घर से बाहर किसी सफ़र के दौरान ही घर करता है।
एक सफ़र से जुड़ती शांभवी की पिछली कई जीवन-यात्राओं की यादें, सब-की-सब यादें इन फोल्डरों में बंद थीं। शादी के पहले की, शादी की, हनीमून की, दोस्तों की, परिवार की और उन तारीख़ों की, जिन्हें साल-दर-साल अपनी याद में दर्ज करती गई थी शांभवी।
शादी के सात साल, सात साल की तारीखें और वो एक तारीख़ जिसने सबकुछ यूँ बदला कि जैसे यही तय था। ये टूटन, ये बिखरन… और बिखरे हुए में जीते चले जाना उस अधूरेपन के साथ, जिसकी कमी अब अमितेश को खल रही थी।
तेरह फरवरी। याद है तारीख शांभवी को। इसलिए याद है कि तीन फरवरी की डेट उसने मिस कर दी थी। कुछ दिनों के इंतज़ार के बाद होश आया तो सेल्फ-टेस्टिंग प्रेग्नेंसी किट ने उस डर पर मुहर लगा दी, जिस डर ने पूरी रात अमितेश को जगाए रखा था।
वी कान्ट। हम इतनी जल्दी नहीं कर सकते शांभू। कमरे में चहल-कदमी करते अमितेश ने बेचैन होकर कहा था। कितना कुछ करना है अभी। यू हैव अ करियर। मुझे अपना काम सेटल करना है। हम तैयार नहीं हैं। वी जस्ट कान्ट। अमितेश बोलता रहा था और शांभवी सुनती रही थी। सुन्न बनी हुई। उसका दिमाग़ नहीं चल रहा था। फिर भी आदतन जिरह की एक कोशिश की थी उसने।
तैयार क्यों नहीं हैं? तुम 32 साल के हो, मैं 27 की। सही उम्र भी है, फिर क्यों?” शांभवी ने पूछा तो, लेकिन उसकी आवाज़ में हार मान लेने जैसी उदासी थी।
शादी को तीन महीने भी नहीं हुए। मैं तैयार नहीं और इसके आगे हम कोई बहस नहीं कर सकते।” अमितेश ने अपनी बात कहकर बहस ख़त्म होने का ऐलान करने का सिग्नल देकर कमरे से बाहर निकल जाना उचित समझा। उसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई, ऐसे कि जैसे ये शांभवी का अकेले का किया-धरा था, ऐसे कि जैसे वही एक ज़िम्मेदार थी और फ़ैसला उसी को लेना था।
फिर दो हफ्ते के लिए अमितेश बाहर चला गया,  शांभवी को दुविधा की हालत में अकेले छोड़कर। अपनी इस हालत का सोचकर खुश हो या रोए, बच्चे के इंतज़ार की तैयारी करे या उसके विदा हो जाने की दुआ माँगे, ये भी नहीं तय कर पाई थी अकेले शांभवी। वे दो हफ्ते जाने कैसे गुज़रे थे…
शांभवी ने अपनी सास को फोन पर खुशखबरी दे दी थी, ये सोचकर कि वो अमितेश को समझा पाने में कामयाब होंगी शायद। अपने चार हफ्ते के गर्भ की घोषणा उसने हर मुमिकन जगह पर दे दी  शायद सबको पता चल जाए तो अमितेश कुछ न कर सके। बेवकूफ़ थी शांभवी। फ़ैसले दुनिया भर में घोषणाएँ करके नहीं, ख़ामोशी से, अकेले लिए जाते हैं।
वैसे भी अमितेश के वापस लौट आने के बाद कोई तरीका काम नहीं आया। वो अपनी ज़िद पर कायम था। दो हफ्ते तक जो उसे बधाई दे रहे थे, उसे ख़्याल रखने की सलाह दे रहे थे, अमितेश के आते ही उन सब लोगों ने अपना पाला बदल लिया था।
माँ ने फोन पर शांभवी को समझाया, “जब प्लानिंग नहीं थी तो तुम्हें ख्याल रखना चाहिए था। तु्म्हें उसके साथ जिंदगी गुज़ारनी है। जिस बच्चे की ज़रूरत वो समझता नहीं, उसे लाकर क्या करोगी? मैं तुम्हें तसल्ली ही दे सकती हूँ बस।”
किसी की दी हुई तसल्ली की ज़रूरत नहीं थी उसे। जो सास उसकी प्रेगनेंसी पर उछल रही थीं और मन्नतें माँग रहीं थीं, उन्होंने भी बात करना बंद कर दिया। शांभवी और किसी से क्या बात करती? तीन महीने में ही शादी में पड़ने वाली दरारों को किसके सामने ज़ाहिर करती? उसकी बात भला सुनता कौन?
दो चेक-अप और एक अल्ट्रासाउंड के लिए अकेली गई थी वो। अल्ट्रासाउंड की टेबल पर उसकी आँखों के कोनों से बरसते आँसू से सोनोलॉजिस्ट ने जाने क्या मतलब निकाला होगा? वो उठी तो सोनोलॉजिस्ट ने पूछ ही लिया, “आप शादी-शुदा तो हैं?”
काश नहीं होती!” ये कहकर शांभवी कमरे से निकल गई थी।
अमितेश शांभवी को लेकर डॉक्टर के पास तो गया लेकिन अबॉर्शन की जानकारी लेने के लिए। डॉ सचदेवा उसके दोस्त की बुआ थीं इसलिए कोई खतरा नहीं होगा, ऐसा कहा था उसने। डॉ सचदेवा ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन चेक-अप के दौरान शांभवी की तरल आँखों ने सबकुछ ज़ाहिर कर दिया। अमितेश ने अबॉर्शन के लिए अगली सुबह की डेट ले ली थी।
उस रात शांभवी की आँखों ने विद्रोह कर दिया था। आँसू का एक क़तरा भी बाहर न निकला और मन था कि ज़ार-ज़ार रो रहा था। इतनी बेबस क्यों थी वो? इस बच्चे को उसके पति ने ही लावारिस करार दिया था और खुद उसके बगल में पीठ फेरे चैन की नींद ले रहा था। शादी जैसे एक तजुर्बे में जाने कैसे-कैसे तजुर्बे होते हैं!
शांभवी अगली सुबह भी शांत ही रही। अमितेश गाड़ी में इधर-उधर की बातें करता रहा। अपने घर के नए फर्नीचर और दीवारों के रंग की योजनाएँ बनाता रहा। अपने नए प्रोजेक्ट की बातें करता रहा। उसके नॉर्मल हो जाने का यही तरीका था शायद। मुमकिन है कि अमितेश भी उतनी ही मुश्किल में हो और इस तरह की बातें उसके भीतर के अव्यक्त दुख को छुपाए रखने की एक नाकाम कोशिश हों। लेकिन दुख भी तो साझा होना चाहिए। जब हम दुख बाँटना बंद कर देते हैं एक-दूसरे से, तो ख़ुद को बाँटना बंद कर देते हैं अचानक।
इसलिए शांभवी वो एकालाप चुपचाप सुनती रही। वैसे भी ये अमितेश की योजनाएँ थीं। इसमें साझा कुछ भी नहीं था। जो साझा थ

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