अमितेश कुमार का एक सुन्दर लेख भोजपुरी कवि दिनेश भ्रमर पर. बहुत कुछ सोचने को विवश करने वाला- मॉडरेटर
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हिंदी साहित्य के हाशिये पर ऐसी बहुत सी प्रतिभायें रहती है जिसकी हिंदी साहित्य की मुख्यधारा न तो कभी शिनाख्त करती है न करना चाहती है. इतिहास और आलोचना के किसी ग्रंथ में इनका जिक्र नहीं होता लेकिन वे अपने समय में और भाषा के समय में पूरी ठसक से मौजूद होते हैं. साहित्य का वृत इस परिधि के बगैर नहीं बनता. ऐसे ही एक कवि दिनेश भ्रमर ने अपने जीवन के पहचत्तर वर्ष पूरे किये जिसका उत्सव उनके शहर, जिले और प्रमंडल के साहित्यकारों ने मनाया. इस अवसर पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका विमोचन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने किया जो उक्त कवि के बाल्यावस्था में सहपाठी रहे हैं. गीतामृत नाम से प्रकाशित इस पुस्तक में दिनेश भ्रमर के ऊपर संस्मरण, लेख हैं और उनकी कवितायें भी हैं. इस संकलन में एक लेख इंपले का भी है. यह किताब पूरी तरह से स्थानीयता को समेटे है सीमाओं में भी संभावनाओं में भी. दिल्ली और उसके बाहर के हिंदी जगत को कम से कम इस आयोजन की सूचना और कवि परिचय मिले इस हेतु किताब में संकलित यह संस्मरण नुमा आलोचनानुमा लेख.
शाम है…बारात में लगने वाली पारंपरिक महफ़िल लगी हुई है, चारों तरफ़ नीरव स्तब्धता है और उसको चीरते हुए एक बुलंद आवाज गा रही है और लोग तन्मय हो कर सुन रहे हैं:
अंजुरी भर जो फूल दिये तुमने
बेहतर है डलिया भर फूलों से
एक कोने में सिमटा बैठा मैं गीत का थोड़ा थोड़ा मतलब समझ रहा हूं, गीत गाने वाले के गले पर मुग्ध हो रहा हूं. ऐसा अवसर इसके पहले या उसके बाद भी कई बार मिला. इन कई अवसरों को एक सुनियोजित लेख में संजोने और उस शख्सियत पर लिखने का मौका मिल रहा है लेकिन मैं लिख नहीं पा रहा हूं.
कितना मुश्किल है कभी कभी लिखना…जबकि मैं लिखना चाहता हूं ऐसे जैसे ये मेरा श्रेष्ठ लेख हो जाये. उनकी कितनी ही छवियां एक साथ दिमाग में आ रही हैं लेकिन इनको शब्दबद्ध कैसे किया जाये! इनकी बेतरतीबी को कैसे संवारा जाये. फैसला मुश्किल हो रहा है. न जाने पहले भी मैंने कितनी ही बार सोचा होगा कि उन पर कभी इस तरह लिखा जायेगा. कितने ही ड्राफ़्ट बनाये होगे, व्यक्तित्व के कुछ चुनिंदा पहलुओं को चुना होगा, कवितायें छांटी होंगी उल्लेख के लिये, लेकिन अभी सब फ़ेल हो रहा है…क्या मैं उनके पर्सनैलिटी कल्ट में उलझ रहा हूं …
बड़काचाचा जी…उन्हें हम इसी नाम से बुलाते हैं. लंबे, सीधे, धवल केश, कुर्ता, पाजामा, हाथ में बैग, मुंह में पान पराग जिसका स्थान बाद में पान ने लिया. उनके साहित्यकार रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण उनका वह रूप था जिसमें वह संघर्ष के दिनों में जूझते मेरे परिवार के लिये एक मजबूत सहारा बनके खड़े हुए थे. लगभग हर समय. मैंने उनके जीवन और कृतित्व को निकट से देखा. मेरी साहित्यिक अभिरूची विकसित करने में अवचेतन में उनकी भूमिका है. हमारे घर शुरू शुरू में वे जब भी आते साहित्यिक चर्चा ही अधिक होती. कभी कविता पाठ या बगहा के साहित्यिक माहौल की चर्चा भी होती. बहुत सारे बिंब है, अनुभव है, किस्से है जिनमें उनकी विविध छवियां दर्ज है. शब्दों में उन्हें बयान करना मेरे लिये कठीन है.
मैउनके कवि रूप पर अलग से बात नहीं कर सकता क्योंकि मैंने उनमें एक


