दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी लक्की कुमार मिश्रा ने बहुत अच्छा लेख लिखा है। एलियनेशन पर लिखा यह लेख हम सबको पढ़ना चाहिए। जेन जी को समझने में मदद मिलेगी- मॉडरेटर
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तुम्हें लिखते हुए
मेरी दोस्त,
कैसी हो? उम्मीद करता हूँ कि तुम अभी इस दुनिया की क्रूरता से बची हुई होगी। किसी की आँखों में खुद का चेहरा बनते हुए देखना, यह कोई मामूली बात नहीं है। इन दिनों तुम्हें तुम्हारे जीवन में प्रेम मिला, मैं बहुत खुश हूँ और साथ ही यह उम्मीद करता हूँ कि एक दूसरे का स्पर्श तुम लोगों में नए रूप धारण करने की क्षमताएँ विकसित करता होगा। तुम्हारे लिए सच में खुश हूँ।
अगर अपनी बात कह पाऊँ, तो कहूँगा कि बहुत अकेला हो गया हूँ। अजनबीयत की चाबुक में मेरी गर्दन फँसी है। घुटन होती है। हर चीज में अर्थ खोजता हुआ, खुद को निरर्थक पाता हूँ। सब कुछ अँधेरे में है।
इन दिनों एलियनेशन पर बहुत कुछ पढ़ रहा हूँ। हाँ, जानता हूँ, तुमने मुझे पढ़ने से मना किया है। मैं भी कोई अपने शौक से नहीं पढ़ता, यह सब मेरी मजबूरी हो गई है। जब भी इस पर सोचता हूँ तो फिल्म टैक्सी ड्राइवर का वह सीन याद आता है। ‘ट्रेविस बिकल’ और ‘हायरिंग मैनेजर’ के बीच संवाद होता है, जहाँ ट्रेविस बिकल टैक्सी ड्राइवर की नौकरी के लिए हायरिंग मैनेजर से बात कर रहा होता है और मैनेजर ट्रेविस बिकल से पूछता है, “So what do you wanna hack for Bickle?”
और उसके बाद जो अपने काम करने की वजह ‘ट्रेविस बिकल’, ‘मैनेजर’ को बताता है, बस वही वजह मेरे पढ़ने की भी है। ट्रेविस बिकल कहता है, “I can’t sleep nights.” यह संवाद दिखाता है कि ट्रेविस बिकल इसलिए काम नहीं करना चाहता क्योंकि वह काम करना चाहता है। वह इसलिए काम करता है क्योंकि वह रात को सो नहीं पाता। अगर तुम समझ पाओ, तो इस संवाद में बहुत बड़ी ट्रेजेडी है। मैं भी इसलिए नहीं पढ़ता हूँ कि मुझे पढ़ना है। मैं कुछ और नहीं कर सकता हूँ, इसलिए मुझे पढ़ना पड़ता है। यही मेरे जीवन की ट्रेजेडी है। मैं दूसरों की तरह पढ़ने को कभी भी एक रोमांटिक अहसास की तरह नहीं देख पाता और मैं मानता हूँ कि यह मेरी दृष्टि का दोष नहीं है। पढ़ने मैं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं मानता। कितना कुछ तो था करने को, देवता भी हुआ जा सकता था, लेकिन हमने विचारों का गुलाम हो जाना चुन लिया। नीत्से कहता हैं, “If there are gods, how can I bear not to be one?” और मैं यह सहन कर रहा हूँ, देवता न हो पाने का दुख।
खैर, मैं तुम्हें बता रहा था कि एलियनेशन के बारे में इन दिनों पढ़ रहा हूँ। यह पूरी तरीके से पश्चिमी विचार है, जिसे अलगाव, अकेलेपन को चिन्हित करने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। तुम्हें पता ही है, हीगल इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की नजर से समझने की कोशिश करता है। वही शीलर मनुष्य के साथ प्रकृति के अपने संबंध से दुराव को एलियनेशन कहता है। फिकटे कहता है कि मनुष्य के भौतिक और आध्यात्मिक आयाम के बीच का अंतर ही इस एलियनेशन को पैदा करता है और उसकी कही यह बात मुझे बहुत हद तक पते की बात लगती है। जिस आधुनिकता का हम बाजा बजाते फिरते हैं, उसी ने हमारा बहुत नुकसान भी किया है। ईश्वर का मर जाना दरअसल उस शक्ति पुंज का बुझ जाना था, जो हमें और हमारे जीवन को ऊष्मा प्रदान करता था। तर्क ने जब आस्था को विस्थापित किया, तो इससे समाज ने भौतिक प्रगति तो की, मगर इसने मनुष्य के भीतर खालीपन पैदा किया, जिसकी रिक्तता को पाटना संभव नहीं है। जब ईश्वर मरा, तो वह अकेले नहीं मरा, उसके साथ मनुष्य भी मरा। मेरी नजर में तो ईश्वर का मर जाना ही मनुष्य का मर जाना है, क्योंकि मनुष्यता की सारी परिभाषाएँ तो धर्म ने ही दी हैं। वह नैतिकता, वह आचरण, सब कुछ, जो हमें बाकी जंतुओं से अलग करता है, वह सब कहाँ से आया? उस ‘ralm of the good’ को जान लेने की प्रेरक शक्ति भला कहाँ से आई? विश्व के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग धर्म ने मनुष्य को सभ्य बनाया। मैं यहाँ धर्म का कोई हिमायती नहीं बन रहा, लेकिन मैं सब कुछ भूल जाना भी नहीं चाहता, किसी भेड़ की तरह। हालाँकि, सब कुछ भूल जाना एक शक्ति ही है। आधुनिकता के रीजन (reason) ने हमें मशीन बना दिया है।
एलियनेशन को बहुत ही अलग अलग तरीकों से समझने की कोशिश की गई, लेकिन मार्क्सवाद तथा अस्तित्ववाद ने ही इसे मुख्य रूप से समझने का प्रयास किया है।
मार्क्स ने अपनी आर्थिक तथा दार्शनिक पांडुलिपि (1849) में इसे वैज्ञानिक ढंग से समझने की कोशिश की है। मार्क्स का मानना है कि पूँजीवादी व्यवस्था से पहले मनुष्य से उसके उत्पाद का सीधा संबंध होता था। मनुष्य अपने उत्पाद के साथ खुद का जुड़ाव महसूस करता था, परंतु पूँजीवादी व्यवस्था में मनुष्य और उसके उत्पाद के बीच का संबंध लुप्त हो गया। अब एक आदमी जो उत्पाद का निर्माण करता है, वह यही नहीं जान रहा होता कि वह किसके लिए यह सब कर रहा है। वह किसी अजनबी के लिए उत्पादन करता है। मनुष्य अपने उत्पादन से पुनरुत्पादित होता है। मसलन एक सूत कातने वाले व्यक्ति का जीवन मूल्य, उसका व्यक्तित्व एक फैक्ट्री मे काम करने वाले मजदूर से अलग हो सकता है। इस भिन्नता का कारण यह है की वह दोनों अलग अलग कार्य क्षेत्रो से जुड़े हुए है यह अलग कार्यक्षेत्र उनके भीतर अलग अलग मूल्य तथा अलग अलग व्यक्तित्व का सृजन करते है। अब इस स्तिथि में यह उत्पाद – उत्पादक संबंध एक लेन देन की प्रक्रिया में परिणित हो जाता है। इसी आपसी लेनदेन को कहा जाता है कि मनुष्य अपने उत्पादन से पुनरुत्पादित होता है।
मगर इस पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य अपने उत्पाद से पुनरुत्पादित नहीं होता। श्रमिक का उत्पाद उसका उत्पादन नहीं रहता है, बल्कि वह किसी और के लिए है और इस पूरी प्रक्रिया में मनुष्य की स्वतंत्रता का लोप होता है, क्योंकि यहाँ अब वह अपने उत्पादन और श्रम को लेकर स्वतंत्र नहीं है। एक किस्म की बाध्यता है। इसे ऐसे समझिए कि एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाला व्यक्ति यह जानता ही नहीं है कि वह अपनी सेवाएँ किसे दे रहा है। हो सकता है कि उसके पास अपने ग्राहक का नाम पता हो, लेकिन क्या इतना काफी है? किसी दूसरे देश में बैठा व्यक्ति किसी दूसरे देश के व्यक्ति के लिए अपनी सेवाएँ देता है और इस व्यवस्था में बने रहना उसकी मजबूरी है। अपने उत्पाद, अपने श्रम से पूरी तरह से कट जाना ही इस अजनबीपन या एलियनेशन का कारण है।
वही अस्तित्ववादी चिंतकों में हाइडेगर और सार्त्र ने इस समस्या पर गंभीरता से विचार किया है। हाइडेगर के यहाँ तो खासकर उसकी किताब बीइंग एंड टाइम (being and time-1927) में एलियनेशन का बार बार जिक्र होता है। हाइडेगर जीवन जीने के दो तरीकों का उल्लेख करता है, ऑथेंटिक एग्जिस्टेंस (authentic existance) और इनऑथेंटिक एग्जिस्टेंस (inauthentic existance)।
ऑथेंटिक एग्जिस्टेंस (authentic existance) में शामिल है जीवन जीने का ऐसा तरीका, जो पूरी तरह जागरूकता के साथ जिया जाता है। यहाँ व्यक्ति समाज या दूसरों के दबाव में आए बिना अपने फैसले लेते हैं। यहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सभी निर्णय के लिए, चाहे वह अच्छे हों या बुरे, स्वयं जिम्मेदार होते हैं और वह अपनी क्षणभंगुरता को स्वीकारते हैं। इनऑथेंटिक एग्जिस्टेंस (inauthentic existance) में शामिल है जीवन जीने का ऐसा तरीका, जहाँ व्यक्ति भीड़ चल में जीते हैं, जिसे हाइडेगर ‘das man’ या ‘they’ कहता है। इनऑथेंटिक एग्जिस्टेंस में मनुष्य केवल सतही बातें, दिखावा, दूसरों की नकल करने में ही अपना जीवन बिता देता है। वह अपने जीवन की सच्चाई से भागता है। वह जीवन के गहरे अर्थों को नजरअंदाज करता है और इसी अप्रामाणिक, इनऑथेंटिक लाइफ में ही एलियनेशन पैदा होता है। सार्त्र अपनी किताब बीइंग एंड नथिंगनेस (being and nothingness-1943) में दूसरों की उपस्थिति को ही नरक कहता है। “Hell is other people”, यह प्रसिद्ध वाक्य इसी किताब का हिस्सा है। ध्यान रहे, लोगों का उपस्थित होना जीवन को नरक नहीं बनाता, अपितु जीवन को जीने के क्रम में जहाँ केंद्रित विचार ही लोग और उनकी प्रदत्त मान्यताएँ हो जाएँ, हमारे जीवन के सभी क्रियाकलाप लोगों को ध्यान में रखकर हों। मसलन, कोई गाड़ी अपनी सुविधा के लिए न खरीदकर उसके मूल विचार में अपने पड़ोसी से प्रतिद्वंद्विता हो, तब इस स्थिति में सार्त्र दूसरों की उपस्थिति से अपने जीवन का नरक होना कहता है।
वही मार्क्यूज, जो कि एक नव वामपंथी विचारक है, वह मार्क्स से असहमत है। वह एलियनेशन को उत्पादक और उत्पादन संबंधों में नहीं देखता है। वह इसे एक मानसिक रोग की तरह देखता है। उसका मानना है कि एलियनेशन आधुनिकता की अनिवार्य शर्त है।
वह विचार रखता है कि अगर यह मसला केवल उत्पादन और उत्पादक संबंधों का होता, तो क्यों भला यह समस्या सबसे अधिक समृद्ध वर्ग के लोगों में होती? आत्म निर्वासन की प्रवृत्ति ज्यादातर समृद्ध लोगों में देखी जाती है। परंतु मेरा व्यक्तिगत मत है कि मार्क्यूज मार्क्स को अस्वीकारते हुए भी उसी के मत का स्वीकार ही प्रस्तुत कर रहा है। मेरे मत में मार्क्यूज का इस समस्या को समाजशास्त्रीय दृष्टि से न देखने का आग्रह पूरी तरह निराधार है, क्योंकि केवल इस तथ्य से कि यह समस्या समृद्ध व्यक्तियों में ज्यादा होती है, इसे उत्पादक और उत्पादन संबंध से पूरी तरह पृथक नहीं कर देता। मेरे विचार में तो यह तथ्य इस बात की और अधिक पुष्टि करता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। एक दूर दराज के गाँव में रहने वाले श्रमिक का उत्पादन एक शहर का व्यापारी खरीदता है। अब वह उत्पाद श्रमिक का न होकर व्यापारी का हो जाता है। ध्यान रहे, उत्पादन केवल उसी का नहीं होता, जिसने प्राथमिक रूप से उसका सृजन किया। अलग अलग स्थान पर एक ही उत्पादन के साथ अलग अलग उत्पादकों के दावे चढ़ते जाते हैं। इस स्थिति में एक ही चीज, जो श्रमिक व्यापारी को देता है, वह श्रमिक का उत्पादन है, परंतु जब वह व्यापारी श्रमिक के उत्पाद को बाजार में किसी और को देता है, तो अब वह श्रमिक का उत्पादन न होकर व्यापारी का उत्पादन है। शायद मार्क्यूज अलग अलग समय पर उत्पाद के अलग अलग उत्पादक की स्थिति को समझने में असमर्थ है। अगर इस स्थिति को समझ लिया जाए, तो समृद्ध लोगों में भी यह समस्या इसलिए होती है कि वे भी उस उत्पादन से सृजित उत्पाद के साथ अपना सीधा संबंध स्थापित नहीं कर पाते। अर्थात, समृद्ध लोगों में भी यह समस्या उत्पादक और उत्पादन संबंध से ही सृजित है। हाँ, यह जरूर है कि आगे चलकर यह एलियनेशन एक मानसिक विकार का रूप अवश्य धारण कर लेता है। इस विचार का प्रभाव पश्चिमी साहित्य पर देखा भी जा सकता है, जिसमें काफ्का, दोस्तॉयव्स्की, कामू, सार्त्र सेमऊअल बकेट आदि महान साहित्यकारों के नाम हैं। इस समस्या का निरूपण साहित्य में इसीलिए है, क्योंकि यह समस्या जीवन की प्रमुख समस्याओं में से एक है। यह उस यात्रा की निरर्थकता का बोध है, जिसका गंतव्य ही कोई नहीं है।
यह अब जीवन की एक अनिवार्य शर्त के रूप में ही मौजूद है। जीवन मे बने रहने के लिए अब सीसिफ़स तो होना ही पड़ेगा, जिसे एक भारी पत्थर को पहाड़ की चोटी पर ले जाना है। यह जानते हुए कि उस भारी पत्थर को लुढ़ककर फिर नीचे आ ही जाना है। ऐसा होने पर सीसिफ़स को बार बार बस यही दोहराना है और जीते जाना है।
मेरी दोस्त मे तुमसे फिर भी कहूँगा इससे हमें अपने जीवन में आस्था नहीं खो देनी चाहिए। जीवन वही है जो जीने और रोने दोनों के लिए पर्याप्त है।
तुम्हारा 23 साल का बूढ़ा दोस्त
मिलन मिश्रा
(लक्की कुमार मिश्रा )

