सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अरुण देव की इस कविता में इतिहास के छूटे हुए सफों का ज़िक्र  है, उनमें  भूले हुए प्रसंग अक्सर पुराने दर्द की तरह उभर आते हैं. उनकी कवि-दृष्टि  वहाँ तक जाती है जहाँ से हम अक्सर नज़रें फेर लिया करते हैं. इस कविता में तहजीब की उस गली का दर्द है जहाँ किसी ज़माने अच्छे-अच्छे लोग सलीका सीखने जाते थे. जिसकी रवायत ने उमराव जान, बेगम अख्तर जैसे फनकार दिए. वक्त के साथ उनकी पहचान बदली और वह गुमनामी, बदनामी की गली बन गई. राम-राज्य की स्थापना में शायद वे ही  सबसे बड़ी समस्या थीं. उन्हें प्रदूषण समझा गया. उनको अपनी परंपरा-गली से खदेड़ दिया गया था ताकि पाक रहे वह नगर. यह एक तरह से वहाँ से तहजीब की भी बिदाई थी. उनकी बेचारगी को किसी ने नहीं देखा, किसी को हर चीज़ को कारोबार में बदलते इस समय में उनकी सुध नहीं आई. सुगम संगीत की उस परंपरा की सुध नहीं आई जिसने कभी इस बस्ती को एक खास पहचान दी थी. अरुणजी की इस कविता को उस कला, उस परम्परा के शोकगीत की तरह भी पढ़ा जा सकता है जो बहुत सारी अन्य साझी परम्पराओं की तरह ही सिमटती जा रही हैं. धर्म और बाज़ार ने  अन्ततः आखेट  भी किया तो उनका जो समय की  मार से बेदम थे.. पहले से ही- जानकी पुल.

सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अयोध्या के पास फैज़ से आबाद इस नगर की एक गली में
तब रहती थीं कुछ खुदमुख्तार औरतें
अदब और तहजीब की किसी पुरानी दरी पर बैठीं
स्त्री–पुरूष के आकर्षण के फीके उत्सव में मटमैली होती हुईं
रोज- ब- रोज

उस गली पर और उन जैसी तमाम गलियों पर
जो हर नगर में सितारों की तरह सजती थीं
और चमकती थीं ख्वाबों में कभी
बीसवीं शताब्दी का कुहासा कुछ इस तरह उतरा
कि टूट कर बिखर गये उमराव जान के घुंघरू
बुझ चले कजरी,ठुमरी दादरा के रौशन चराग
जहां से अब रह-रह आती
बेगम अख्तर की उदास कर देने वाली आवाज़

यह वह समय था जब
दिग्विजय के लिए निकले रथ के उड़ते धूल से
ढक गए थे राम
दसो दिशाओं से रह-रह उठता विषम हूह
और बाज़ार के लिए सब कुछ हो गया था कारोबार

बाज़ार के रास्ते में आ रही थी यह गली

दोपहर की चिलचिलाती धूप में
उस दिन कुछ लोग आ खड़े हुए
सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं
हिल रही थीं सारी पुरानी इमारते

बेनूर खिड़कियों  पर लटके उदास परदों के पीछे
सिर जोड़े खड़ी थीं स्त्रियां
अवांछित,अपमानित और असहाय

ये स्त्रियां अपनी- अपनी मिथिला में
कभी देखती थीं अपने राम के सपने
किसी विद्यापति ने इनके लिए भी लिखी थीं पदावलियां
जिसे जब-तब ये आज भी गुनगुनाने बैठ जाती हैं

उन्हें खदेड़ने के लिए देखेते-देखेते निकल आए बनैले सींग
छुपे दांत और पुराने नाख़ून

उन पर गिरने लगे अपशब्द के पत्थर
हालांकि उनका होना ही अब एक गाली थी
गुम चोट के तो कितने निशान थे वहां

जयघोष में कौन सुनता यह आर्तनाद
शोर में यह चीख

यह अलग तरह की क्रूरता थी
देह से तो वे कब की बेदखल थीं
उन्हें तो दिशाएं तक न पहचानतीं थीं

रात के परिश्रम से श्रीहीन श्लथ देह की झुकी आत्माएं
रह-रह देखती अयोध्या की ओर

वे तमतमाए चहरे
रात की पीली रौशनी में कितनी चाह से देखते थे उन्हें

इन्ही स्त्रिओं ने न जाने कितनी बार
मुक्त किया था उन्हें उनकी ही अंधी वासना से

अब यह स्त्री-पुरूष का आदिम खेल न रहा
कि स्त्री अपने आकर्षण से संतुलित कर ले पुरूष की शक्ति

बगल में बह रहे सरयू ने देखा
सदिओं बाद फिर एक वनवास

इनके जनक थे
बदकिस्मती से रावण भी थे सबके

पर इनके लिए कोई युद्ध नहीं लड़ा गया

राज–नीति के बाहर अगर कही होते राम तो क्या करते.

(सत्य प्रकाश त्रिपाठी के लिए)

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