पारमिता षाड़ंगी उड़िया साहित्य जगत में एक स्थापित सुपरिचित नाम है। अपनी आंचलिक पहचान के साथ ही वे हिंदी कथाकार कवयित्री और उड़िया हिंदी अनुवादक भी हैं। देश की मुख्य धारा की सम्मानित पत्र पत्रिकाओं में उनकी कहानियां कविताएं और अनुवाद प्रकाशित होते रहते हैं । कई भाषाओं में उनके साहित्य का अनुवाद भी जा चुका हैं। पारमिता को उनके कथा संग्रह “ संबित के पास जब मैं नहीं थी ” पर महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की ओर से पुरुस्कृत भी किया गया है। पारमिता का एक कविता संग्रह “ इज्या ” नाम से प्रलेक प्रकाशन से आया है। इज्या का अर्थ है, ‘अग्नि’। पारमिता इस पुस्तक की भूमिका में लिखतीं हैं, ‘मैं शब्दों की उंगली पकड़ती हूं ,वे रास्ता दिखाते हैं ,निकाल लेते हैं मुझे त्रिशंकु अवस्था से यत्न से।’ ‘अनकही’ से शुरू होकर ‘शब्द निशब्द का’ तक यह संग्रह पैंतालीस कविताओं की सुरम्य यात्रा है। जिसमें प्रेम की असहाय पीड़ा है तो स्त्री मन का उद्दाम प्रवाह भी। वास्तविकता की कटु समीक्षा है तो स्वप्नों की मीठी अंगड़ाई भी- “कुछ तो करना पड़ेगा
ढूंढना होगा शब्दों के पीछे
छिपे हुए अर्थ को
जरूरी नहीं कुछ
तोड़ना या गढ़ना
अब इतिहास की नीरवता के
पास जाओ
रफू कर लो उसके फटे हुए
कपड़ों को ….. “- ज्योत्स्ना मिश्र
====================
कुछ मेरी पसंद की कविताएं ;
1
“अनकही “
वहाँ दीवारों पर
कुछ न कुछ लिखा था
पसंद नापसंद करने को
नहीं था विकल्प वहाँ
अवसादों से घिरा
वह उदास शहर
किए जा रहा था समझौता
उसकी नीरव भाषा को
पढ़ नहीं सकती थी मैं
और वह घोषणा किए जा रहा था
शब्दों की मृत्यु की
ऐसी कोई बात नहीं
जो पहले से बताई नहीं गई
क्या सच में
शब्दों की अब कोई
आवश्यकता नहीं
इसलिए शायद इतना
खामोश था यह शहर
अब किसी बागीचे से तोडूंगी
शब्दों को
रखूंगी सहेज कर अदिति की अंजुरी में
में कर रही हूं पलायन
एक अन्य बगीचे की ओर
यहां तो लटक रहे हैं शब्दों के शव l
घोड़े की लगाम खींच कर
देखा ऊपर आकाश में
उड़ रही थी शब्दों की खाल
और यह शहर
डूब रहा था
एक शुष्क
शब्द कोष के अंदर
2
‘इतिहास ‘
वह था एक जर्जर
घर का ,उपेक्षित कमरा
इतिहास के किसी एक गर्वित
दुर्ग में , जो सबसे उच्च होने
के भ्रम में था
मगर उसे पता नहीं था
सहर में सूखी घास का एक
जंगल फैलने लगा था
जिसकी शोणित धार
अपने आप में घिसकर
हत्या करने लगी है
सपनों की
पूजा के योग्य पत्थर तो
स्वार्थ के अर्घ्य लेकर
टूटने लगा है
ओस को लपेट कर सुबह
अपनी लज्जा को समेटने लगी है
अंधेरा भी खुद में उलझ कर
और एक अंधेरे को बुलाने लगा है
कुछ तो करना पड़ेगा
ढूंढना होगा शब्दों के पीछे
छिपे हुए अर्थ को
जरूरी नहीं कुछ
तोड़ना या गढ़ना
अब इतिहास की नीरवता के पास जाओ
रफू कर लो
उसके फटे हुए कपड़ों को
सुन लो उसके टूटे शब्दों की
गुहार को,
देखना अर्थ सारे निकल आएंगे
फिर तुम देखना
ये रात अब बेकार की जिद नहीं करेगी
3
‘पिता’
पद्म पत्र जैसा बचपन
एक बिंदु बारिश की
छलकता प्यार उनका
मेरी मासूमियत के सामने
घन मेघ जैसे गंभीर वह
मैं चल रही थी
अंधेरे से उजाले की ओर
उनके बांए हाथ में बैठे हुई
जैसे आकाश के तारे ,
बाजार के खिलौने
सोते वक्त उनकी कही हुई
सारी कहानियां मेरी ही हैं
वो जो आधा डर,आधा साहस भी मेरा है
अब वो
एक और जन्म ले चुके हैं
टूटे हुए शरीर को लेकर
फिर भी मालिक हैं वो
अपने सिंहासन के
कृष्णकाय बंशीधर
अपनी द्वारका के
समृद्ध हैं वह
मेरे भीतर
किसी सुरक्षित दुर्ग की
सुरंग जैसे
ले जाते हैं
भिन्न एक पृथ्वी का
आलोकित इलाका
जहां मैंने ढूंढ लिया है
ईश्वर से भी अधिक
ईश्वर को
4
‘ वापसी ‘
तुम ने बदल कर
बिस्तर में डाल दिया था
कुछ मुहूर्तों को
उनमें से एक को पहन लिया तो
बीत गए इंतजार के पल
कोशिश तो कितनी की
प्यार के अनुभव को
भुलाने के लिए
पर क्या करें ?
यहां तो बहुत ही कठिन
प्रश्नपत्र मिलता है
समाधान करने के लिए
धीरे धीरे बीतने वाला समय
कभी कभी
फंस जाता है
धागों की तरह
अंधेरी कोठरी में
उदास झरोखे
इंतज़ार करते हैं
किसी की वापसी का !
क्या सचमुच कोई कभी
वापस आया है ?
किसी के इंतज़ार को
सफल करने के लिए
द्वापर से कलियुग तक
खाली तारीखें बीतने लगीं हैं
कैलेंडर में
जो चला जाता है वो क्या
खाली समय है !
सब को जाना पड़ता है
जब जिसकी बारी आती है
मैं जा रही हूं
मेरे पांव की आहट
बिल्ली जैसी
हे झरोखे !
इंतज़ार की चौखट को लांघ कर
तुम भी आगे निकल जाओ
ठीक एक गुब्बारे जैसे
क्योंकि सबको पता है
बहुत ही कठिन प्रश्नपत्र मिलता है यहां
समाधान करने के लिए
5
आहुति
सुनसान दोपहर में
आहट पवन की
पीछे मुड़कर देखा
एक छाया ,तुम्हारी स्मृति की
केले के पेड़ के फटे हुए पत्तों से
आधा छिपता ,आधा दिखa
गुम्बद मंदिर का
चेष्टा एक मूर्ति गढ़ने की
मगर
जिद्दी नदी का चंचल पानी
मिटाने न लगे पद चिन्ह मेरे
कमजोर नज़र
धुंधलेपन को खींच कर
बाहर निकालने की कोशिश !
किंतु
वह भी तो अभिन्न अंश मेरे अंग का
स्वप्न तो जैसे
कठपुतली के वर वधु
उलझ जाते हैं उस पतली सी डोर में
बीते दिनों का पन्ना पलट कर
प्रवेश कर रही हूं
तुम्हारे भीतर
बीते हुए एक मुहूर्त के लिए
में ढूंढ नहीं पा रहीं हूं
खुद को
तुम को
फिर भी पार करती जा रही हूं
प्रति ध्वनि के पद चिन्ह
जी रही हूं
मैं एक इज्या
शब्दों से भरे एक पृष्ठ में
पुराना एक
अल्पविराम हो जैसे !

