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  • निर्मल वर्मा को फिर से बूझना: योगेन्द्र यादव

    कल इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में प्रसिद्ध समाजवादी राजनीतिक चिंतक योगेन्द्र यादव का एक लेख प्रकाशित हुआ जो निर्मल वर्मा के निबंधों को लेकर था। जिसमें उन्होंने इस तरह की बातें लिखी हैं कि हमें निर्मल वर्मा जैसे विचारक को फिर से क्यों बूझना चाहिए? और अब जाकर ही ऐसा क्यों करना चाहिए? क्योंकि वह हमें ऐसे सवाल पूछने के लिए मजबूर करते हैं जिनसे ‘प्रगतिशील’ आधुनिक भारतीय बचते रहे हैं। क्योंकि इस चुप्पी और उदासीनता से पैदा हुई रिक्तता के कारण हमारे राष्ट्रवाद को नकली तत्वों ने हथिया लिया है। क्योंकि निर्मल वर्मा इन प्रश्नों को इस तरह से प्रस्तुत करते हैं जो तीखे भी होते हैं और रचनात्मक भी। क्योंकि जब तक हम इन असहज प्रश्नों का सामना नहीं करते, तब तक हम अपना राष्ट्रवाद पुनः प्राप्त नहीं कर सकते। कल से इस लेख को लेकर सोशल मीडिया पर पक्ष-प्रतिपक्ष सक्रिय हैं। हमारे लिए इस लेख का अनुवाद किया है जाने-माने पत्रकार, लेखक, अनुवादक भुवेन्द्र त्यागी ने। भुवेन्द्र त्यागी 25 से अधिक किताबों के अनुवाद कर चुके हैं। आइये उनके अनुवाद में निर्मल वर्मा पर यह विचारोत्तेजक लेख पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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    अगर हम अपने सकारात्मक राष्ट्रवाद को बूझने के लिए निर्मल वर्मा (1929-2005) की शरण में जाएं, तो उन्हें इसके लिए एक अप्रत्याशित विचारक माना जाएगा। कई लोग तो उन्हें इस काम के लिए अनुपयुक्त समझते हैं, क्योंकि उनके विचारों को संकीर्ण विचारधारा के राष्ट्रवाद वाले कुछ लोग हथिया सकते हैं। इसीलिए हमें इस अक्टूबर को उनकी 20वीं पुग्यतिथि से पहले विचारक निर्मल वर्मा को फिर से बूझने की जरूरत है।

    समकालीन भारत में विचारों पर मंथन के लिए निर्मल वर्मा एक परिचित नाम नहीं है। उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। जो लोग उन्हें जानते भी हैं, वे आमतौर पर उन्हें सिर्फ कथाकार और उपन्यासकार मानते हैं। और जिन्होंने उनका सामाजिक और राजनीतिक लेखन पढ़ा भी हो, वे नहीं जानते कि उसे किस तरह लिया जाए। हालाँकि वह वास्तव में कोई अनजाने भारतीय नहीं थे। वह हिंदी में 20वीं सदी के बेहतरीन कथा लेखकों में से एक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता थे। उन्होंने पांच उपन्यास, एक दर्जन कहानी संग्रह, नाटक और यात्रा वृत्तांत लिखे। एक दर्जन यूरोपीय क्लासिक्स के अनुवाद भी किए। उन्हें एक ‘विचारक’ के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य रूप से एक साहित्यिक लेखक के रूप में याद किया जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में, हिंदी में लिखने का उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ, हालांकि वह अंग्रेजी में भी उतने ही माहिर थे। बाद में जाकर उनका झुकाव भाजपा की ओर हो गया और उन्हें हिंदुत्व समर्थक करार दिया गया। उन्होंने इस तरह के आक्षेपों को अपनी अवमानना माना, लेकिन मंदिर और मंडल विवादों पर अपने विवादास्पद विचारों के कारण वह इन आक्षेपों के घेरे में आते रहे।

    साहित्यिक आलोचकों ने उनके कथा और अन्य साहित्यिक लेखन के बारे में तो बड़े पैमाने पर लिखा है, मगर उनके चिंतनशील निबंधों के 10 संग्रहों पर किसी का ध्यान नहीं गया। यह महत्वपूर्ण विरोधाभास है क्योंकि उनके निबंध केवल उनके साहित्यिक अस्तित्व का विस्तार नहीं हैं। जैसा कि आलोक भल्ला ने उनके अंग्रेजी निबंधों के एकमात्र संग्रह इंडिया एंड यूरोप: सलेक्टेड एसेज (2000) की प्रस्तावना में लिखा हैः निर्मल वर्मा के कथा साहित्य और निबंधों में एक स्पष्ट अंतर है। निर्मल का कथा साहित्य अप्रमाणिक रूप से आधुनिकतावादी था। यह ‘आपसी भरोसा खो चुके लोगों के बीच शुष्क मौन की खोज’ है। लेकिन उनके चिंतनशील निबंध आधुनिकता के प्रति मोहभंग की अभिव्यक्ति हैं।
    एडवर्ड सईद के ओरिएंटलिज्म के प्रकाशन से भी पहले निर्मल वर्मा के पहले निबंध संग्रह शब्द और स्मृति (1976) ने प्राच्य ज्ञान की भारतीय आलोचना की आधारशिला रख दी थी। इसी पुस्तक के एक पथप्रदर्शक निबंध अतीतः एक आत्ममंथन में अनुमान व्यक्त किया गया था कि अतीत से जुड़ाव का भारतीय तरीका बहुत अलग है और यह इतिहास से बदतर नहीं है। यही तर्क बाद में आशीष नंदी ने दिया। कला का जोखिम (1981), इतिहास स्मृति आकांक्षा (1991) और साहित्य का आत्म सत्य (2005) में उनके निबंधों को व्यापक अर्थों में सांस्कृतिक आलोचना कहा जा सकता है। वे साहित्य, कला और रचनात्मकता से सराबोर हैं।

    उनके समस्त चिंतनशील लेखन से एक मौलिक प्रश्न उभरता है: क्या हम भारतीय सभ्यता को उस आंतरिक विघटन से बचा सकते हैं, जो उसने औपनिवेशिक द्वंद्व के परिणामस्वरूप अनुभव किया था? शताब्दी के ढलते सालों में (1995) और दूसरे शब्दों में (1999) जैसे निबंध संग्रहों में उन्होंने इस प्रश्न को राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सभ्यता और यूरोप के साथ भारत के द्वंद्व के जरिए सीधे प्रस्तुत किया। यूरोपीय साहित्य और कला के बारे में उनके पठन और समझ की गहराई 20वीं शताब्दी के हिंदी लेखकों में बेजोड़ थी। हेडलबर्ग विश्वविद्यालय में उनका 1988 का व्याख्यान इंडिया एंड यूरोप: रीजंस ऑफ रेज़ोनेंस (भारत और यूरोपः प्रतिश्रुति के क्षेत्र के रूप में प्रकाशित हिंदी संस्करण) औपनिवेशिक द्वंद्व के सूक्ष्म अन्वेषण और ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ अध्ययन के युग में एक स्वतंत्र स्वर बनाए रखने के लिए विशिष्ट है। उनके साक्षात्कारों का दो खंडों का संग्रह संसार में निर्मल वर्मा (2024) का प्रकाशन विचारक निर्मल वर्मा की समग्र छवि प्रस्तुत करने में सहायता करता है। उनके इस प्रकार के विशिष्ट लेखन के बावजूद मुझे एक भी विद्वतापूर्ण पुस्तक या कोई विस्तृत निबंध नहीं मिला, जो उथले विवाद से परे हो और उनके विचारों की एक गंभीर रूपरेखा या आलोचना प्रदान करता हो। इस रिक्तता को दूर करने की आवश्यकता है।
    राजनीतिक पक्षपात इस रिक्तता को भरने के आड़े आता है। निर्मल वर्मा के जीवन-चक्र ने उनके जीते जी ही काफी विवाद पैदा कर दिया था। शुरू में वह साम्यवादी थे, लेकिन चेकोस्लोवाकिया में अपने एक दशक के प्रवास के दौरान इस विचारधारा से उनका मोहभंग हो गया। हालांकि उनकी कहानियां राजनीतिक वाद-विवाद से दूर रहीं, लेकिन उनके निबंधों ने धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और आधुनिक विकास के आदर्शों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया, जो उस समय आस्था-पुंज थे। उन्होंने बौद्धिक प्रेरणा के लिए भारतीय परंपराओं- बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस (विवेकानंद से अधिक),  श्री अरविंद और सबसे बढ़कर महात्मा गांधी (जवाहरलाल नेहरू नहीं) की ओर रुख किया। आपातकाल और फिर ओबीसी के उनके विरोध तथा बाबरी मस्जिद विध्वंस और पोखरण परमाणु परीक्षणों पर उनकी दुविधा ने उनका बौद्धिक अलगाव करा दिया। दिलचस्प बात यह है कि वामपंथियों ने तो उन्हें नकार दिया और उन पर प्रहार किया, लेकिन दक्षिणपंथियों ने कभी भी उनके विचारों को स्वीकार नहीं किया।

    हमें निर्मल वर्मा जैसे विचारक को फिर से क्यों बूझना चाहिए? और अब जाकर ही ऐसा क्यों करना चाहिए? क्योंकि वह हमें ऐसे सवाल पूछने के लिए मजबूर करते हैं जिनसे ‘प्रगतिशील’ आधुनिक भारतीय बचते रहे हैं। क्योंकि इस चुप्पी और उदासीनता से पैदा हुई रिक्तता के कारण हमारे राष्ट्रवाद को नकली तत्वों ने हथिया लिया है। क्योंकि निर्मल वर्मा इन प्रश्नों को इस तरह से प्रस्तुत करते हैं जो तीखे भी होते हैं और रचनात्मक भी। क्योंकि जब तक हम इन असहज प्रश्नों का सामना नहीं करते, तब तक हम अपना राष्ट्रवाद पुनः प्राप्त नहीं कर सकते।
    सांस्कृतिक या कहा जाए तो सभ्यतागत मुद्दे निर्मल वर्मा के बौद्धिक अन्वेषण के केंद्र में हैं। वह स्वतंत्रता के बाद के भारतीय राष्ट्र-राज्य को भारतीय सभ्यता के उत्तराधिकारी के रूप में देखते हैं, एक आधुनिक राज्य के रूप में जिस पर विकास के प्रमुख पश्चिमी प्रतिमान का विकल्प बनाने की जिम्मेदारी है। भारत की एकता और उसकी क्षेत्रीय अखंडता के बारे में उनका अटूट सरोकार इस व्यापक गैर-कट्टरपंथी सरोकार में निहित है। उनका उत्तर स्पष्ट नहीं है। वह अक्सर संकेत देते हैं कि हिंदू राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संरक्षक हैं। फिर भी ये सवाल बरकरार हैं: हम भारत की एकता और अखंडता के लिए राष्ट्रवादी सरोकार को कैसे निर्मित करते हैं और कैसे इसका दावा करते हैं? धर्मनिरपेक्षता की उनकी आलोचना निर्मम और कभी-कभी अतिशयोक्तिपूर्ण भी होती थी, फिर भी इसने हिंदू सांप्रदायिकता की आलोचना करने के लिए भी तर्क दिए। यह हमें आत्मनिरीक्षण करने के लिए बाध्य करता हैः क्या धर्मनिरपेक्ष राजनीति जान-बूझकर भूलने की बीमारी में शामिल नहीं थी?
    निर्मल वर्मा ने भारत की जीवित परंपराओं की एक गहरी, बेशक थोड़ी रोमानी हिफाजत की पेशकश की। इन परंपराओं की उनकी पुष्टि जातीयता से ग्रस्त नहीं है; उनके लिए भारतीय सभ्यता एक ऐसे ब्रह्मांड के अभिन्न दृष्टिकोण को जारी रखती है जो मनुष्यों को विश्व के केंद्र में नहीं रखता है। यह सोच आधुनिक पश्चिम ने खो दी है। निर्मल वर्मा ने अपनी बौद्धिक गुलामी के लिए पश्चिम के प्रति बौद्धिक समर्पण हेतु बंगाल पुनर्जागरण के दिग्गजों सहित आधुनिक भारतीय विद्वानों की क्रूर आलोचना की। आप कह सकते हैं कि भारतीय सभ्यता की उनकी गाथा हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म को समायोजित करती है, लेकिन वह भारत में इस्लाम की भूमिका पर अस्पष्ट है। भारतीय समाज में जातिगत असमानता के सवाल से वह इनकार नहीं करते, मगर स्पष्ट रूप से असहज ज़रूर दिखते हैं। फिर भी वह हमारे लिए एक बड़ा सवाल छोड़ते हैं: क्या उपनिवेशवाद की हमारी आलोचना उसके राजनीतिक और आर्थिक परिणामों तक ही सीमित है? या हम भारतीय अस्तित्व पर उपनिवेशवाद के बौद्धिक और सांस्कृतिक परिणामों को देखने के लिए तैयार हैं? और अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम उस सांस्कृतिक विषमता का सामना कैसे नहीं कर सकते, जो राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद से भारतीय मानस को आकार दे रही है? हम इस निरंतर सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का जवाब कैसे देते हैं जो हमारे राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक संस्थानों में घुस गया है?
    निर्मल वर्मा अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने इस तरह के सवाल पूछे और उन्हें आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवियों के हाशिए पर धकेल दिया गया। ए. के. सरन, जे. पी. एस. उबेरॉय, रमेश चंद्र शाह, दया कृष्ण, धरम पाल और निश्चित रूप से आशीष नंदी के नाम भी जहन में आते हैं। उनमें से कुछ के विपरीत, निर्मल वर्मा ने इन प्रश्नों को अपने समय के मुद्दों से जोड़ा, कभी-कभी विवादास्पद रूप से भी। उनके जवाबों को एक नए राष्ट्रवाद के अंतिम उत्पाद के रूप में लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन उनके सवालों को हमारे राष्ट्रवाद पर पुनर्विचार करने के लिए शुरुआती बिंदु के रूप में नहीं लेना एक बड़ी चूक होगी।

    (लेखक स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं। ये उनके विचार व्यक्तिगत हैं)।

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    पत्रकार, लेखक और अनुवादक भुवेंद्र त्यागी के विविध विषयों पर 3,000 से अधिक लेख, फीचर, रिपोर्ताज, साक्षात्कार और समीक्षाएं प्रकाशित हो चुके हैं। आकाशवाणी, विविध भारती और बीबीसी से 250 से अधिक वार्ताएं, कार्यक्रम और साक्षात्कार प्रसारित। विविध विधाओं की 40 पुस्तकें प्रकाशित। दैनिक भास्कर मुंबई में संपादक।

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