• कथा-कहानी
  • शुभ्रा पंत कोठारी की कहानी ‘बादलों का गुच्छा’

    आज पढ़िए शुभ्रा पंत कोठारी की कहानी। शुभ्रा दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र पढ़ाती हैं। कविताएँ लिखती हैं। यह उनकी पहली कहानी है और स्त्री-मन की भावनाओं को लेकर बहुत संवेदनशील कहानी है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    “मैं तो वही अनुसरण करती रही जो समाज और मेरी परिस्थितियाँ मुझे सिखाती रहीं…”

    अन्विता कुछ सोच में डूबी अपने कमरे की खिड़की के बाहर रोज़ की तरह आसमान से बतिया रही थी। एक चाय की प्याली, एक किताब और वही सन्नाटा जो दिनभर उसके साथ चलता है। कमरे में हल्की धूप आ रही थी और दीवार से सटा बुकशेल्फ़ उसका सबसे करीबी साथी था।

    वहीं से झाँकती एक किताब पर उसकी नजर चली जाती है, वर्जीनिया वुल्फ़ की “A Room of One’s Own”

    पन्ना पलटते ही उसकी आँखों के सामने उसकी ही लिखी एक पंक्ति तैर जाती है:

    “ऐसा तो नहीं है कि आप जीवन में जो निर्णय लें वह सही हो

    पर यह भी तो सही नहीं कि आपको ये स्वायत्तता प्राप्त ना हो के आप निर्णय लें।

    जीवन जब कदम कदम पर इम्तिहान लेता है,

    तो सही-गलत सिर्फ़ निर्णय पर आधारित नहीं रहता।”

    उसे एकाएक नदी की याद आ गई — वो नदी जिससे मिलने वो शहर छोड़ के भाग जाती थी पहाड़ों के पास, उस कल कल करती, बहती नदी से अपनी उलझने साझा करती और अक्सर सोचती कि शायद  कोई बादल हो जो इस पानी को अपने साथ ले जाए और बारिश में बदल दे…वो बिना कुछ कहे तैयार हो गई — जैसे एक आंतरिक पुकार उसे बुला रही हो। गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयी थीं और कोपल ने भी रट लगायी थी घूमने की। इस घर में आजकल दो आवाज़ें ही टकराती थीं एक उसकी और दूसरी कोपल की, तीसरा जो था वो पिता और पति का रिश्ता निभाने दो चार महीने में कभी आता था। अन्विता ने कोपल के कान में कुछ फुसफुसाया, नन्ही बच्ची झूम उठी और झट से अपनी मम्मी के गालों को चूमने लगी। बचपन की सोच कितनी सरल होती है और भाव कितने तरल होते हैं, अन्विता मन ही मन बुदबुदायी और कुछ बूँदें आँखों से छलक नदी में बह गयीं। आँखें फिर बिस्तर पर पड़े मोबाइल पर घूमीं और उसे याद आया की रिश्तों की एक क़तार है जिसे ये सूचना देनी होगी और अपनी इस छोटी सी ख्वाहिश पर पति की अनुमति की मुहर लगानी होगी। उसे अब ख्वाहिश नदी से विशाल और बहती हुई नज़र आने लगी। उसने बरामदे से आसमान की ओर देखा, और सोचा –

    “जैसे बचपन में जब चलना सीखते हैं

    तो कोई नहीं रोकता और गिरने का भरपूर मौका दिया जाता है ताकि स्वतंत्र रूप से चलना आ जाए ,

    ऐसे ही जीवन में क्यों ना कोई साथ मिले जो कहीं दूर से खड़ा होकर प्रेरणास्रोत बन सके।”

    वो पंक्तियाँ जो कभी डायरी में अधूरी रह गई थीं, आज पूरी हो रही थीं। बादलों के गुच्छे उसके  निर्णय की उड़ान पर मुहर दे रहे थे। दुनिया की दौड़ में आज भी स्त्री अपने छोटे बड़े निर्णय लेने के लिए उस पुरुष पर आश्रित क्यूँ है जो निर्णय लेने में साझेदार कम हाहाकार ज़्यादा मचाता है। बचपन से किसी ना किसी रूप में उसे अपने सपनों को घर के पुरुषों के निर्णयों के नीचे कुचलना पड़ा, हर बार एक ही वजह से उसकी उड़ान रुकी और वह था उसका स्त्री होना, अन्विता मन ही मन बुदबुदायी। उसने अपनी डायरी के पन्ने पलटे और एक पन्ने पर नज़र टिक गयी ।

    “शायद ये लिखना आसान है पर पाना मुश्किल।

    एक स्त्री की द्रष्टि से देखूँ तो जब तक खिड़की के बाहर उस व्यक्ति को दूर खड़ा पाऊँ,

    तब तक वह क्षितिज के समान और दूर चला जाता है।

    और जो रह जाता है वह शून्य ही उसका आइना और उसकी ढाल कहलाता है।”

    एक लहर दौड़ गयी, छपाक से जैसे उसके मन को एक पुरानी याद ने गीला कर दिया। उसके कॉलेज के उन्मुक्त दिन, जब नया नया उड़ना भरना सीखा था और कितने छोटे बड़े निर्णय स्वयं के लिए स्वयं ही लिए, बिना किसी की स्वीकृति लिए। दिल्ली जैसे शहर के चढ़ते गिरते क्रम को विश्वविद्यालय के गलियारों से घर की चौखट तक वो समझने लगी थी। दिल्ली का जुलाई का मचलता, महकता मान्सून और इधर बीएड के परिणाम के इंतज़ार ने अन्विता को और बेक़रार कर दिया। मेघ थे, बारिश थी पर मल्हार का सुख नहीं। शाम का वक्त गुजरता नहीं था, उसने घर के पास बने पार्क में जाना शुरू किया। पार्क में एक छोटी सी झील थी जो उसे एक नदी होने का झूठा दिलासा देती और वो अपने तीन दोस्त एक डायरी, कलम और गानों के साथ उलझ जाती। ज़्यादातर यादों का हिस्सा वो बन जाता है जो अंतर्मन को छू जाए।

    आज अंतर्मन से छटककर वो गठरी खुल गयी जो अन्विता ने बीस साल पहले मन के भीतर बांध के छुपा दी थी। झील के सामने रोज़ एक शख़्स बैठा रहता, पानी के भँवरों को घूरता और फिर आसमान में भँवर बना कभी कुछ लिखता और कभी मिटाता। पहले कुछ दिन अन्विता को ये सब बड़ा अटपटा लगा, मानो रोज़ उसी समय वह दोनों आसमान के गुच्छों से खेल रहे हों। फिर क्या था कुछ दिनों ये सिलसिला चला और अन्विता की डायरी शब्दों से भरने लगी । खुद से बातें करता वह जादूगर, एक समा बांधने लगा और इस लड़की को वो सिखाने लगा जो शायद किताबें ना सिखा सखी। दूर से वह दोनों एक दूसरे को पढ़ने लगे और हवा में मुस्कुरहटें भेजने लगें। सर हिलाकर एक दूसरे का एहतराम करने लगे। कभी हाथों के इशारों से ज़िंदगी को सलाम करने लगे। एक महीने बाद अन्विता ने निर्णय लिया की आज तो वह उस प्रेरणास्त्रोत से मुख़ातिब होगी और अपना मन साझा करेगी क्यूँकि अब शायद  शिरकत ना हो और नौकरी से थक कर वह शाम घर पर ही ज़ाया कर दे । बौछार हो रही थी, घर से मम्मी ने टोका, “चप्पल पहन कर मत जा, फिसल जाएगी, बाहर कीचड़ ही कीचड़ है”,  पर उसपर धुन सवार थी शायद वो प्रेमिका का इत्र लगा चुकी थी और ढेर सारे अहसासों की चाँद बालियाँ पहन खुद को आइने में देख आने वाला पूरा वृतांत महसूस कर रही थी। देर को पीछे छोड़ते, वह समय के साथ पार्क की ओर तेज चलने लगी। आज उसका सफ़ेद सूट भी बादलों के गुच्छों से बातें करने लगा और बौछार से उसे हल्की तरंग का नशा होने लगा। बहुत सारे सवालों का आलाप मन में गूंज रहा था-

    “इतनी सारी आवाज़ों के बीच वो सुरीले सुर के समान कौन होगा,

    इस ज्वालामुखी शहर में जिसकी तासीर ने मुझे ठंडा किया,

    या यूँ कहें की शोर भरे शहर में वो मेरा सन्नाटा बन गया,

    क्यूँ बिना वजह वो जाने कौन सी वजह बन गया,

    मानो उन बादलों के गुच्छों से वो मेरे लिए एक कहानी बुन गया।”

    पार्क पहले की तरह भरा हुआ था, हवा की चाल पर बौछार थिरक रही थी, मानो दिल्ली इश्क़ में झूम रही मल्हार गा रही हो। अन्विता ने आज पाँव में चप्पल पहनी, जूते ना पहने क्यूँकि उसे अब फिसलने का डर नहीं था, मन ही मन फिसल चुकी थी और बेपरवाह किसी सिरे पर खड़ी थी। उसकी मम्मी नहीं जानती थी की वो तो जूतों पहने पहले ही फिसल गयी थी। झील आज संतूर बजा रही थी और उसपर अनेकों भँवर कश्मकश को बढ़ाए जा रहे थे।

    “क्या जादूगर जादू दिखाकर चला गया? आज पहली बार सामने कोई नहीं था, पर ये तो उसका रोज़ का अभ्यास था,हो सकता है की हल्की बारिश ने उसकी गति धीमी कर दी हो? हो सकता है कुछ देर बाद वो शख़्स फिर से बादलों के गुच्छे बुनता दिखे?” एक भँवर से दूसरे भँवर, अन्विता के मन में सवालों के भँवर गूंजने लगे। एक महीने से इस झील के सामने बैठे शक़्स ने उसे इतना आकर्षित किया की उसने आसपास के पेड़ और पौधों से, पक्षियों से, बच्चों से राब्ता ही नहीं रखा। प्रतिदिन उस व्यक्ति के प्रति उसका आकर्षण बढ़ता गया और दूर से वो भी अन्विता को खुद से मिलवाता रहा। धीरे धीरे वो खुद को समझने लगी और खुद को बेख़ौफ़ आइने में देखने लगी थी। शिक्षिका के रूप में पहला ही इंटरव्यू था, जो बेझिझक और बढ़े ही आत्मविश्वास के साथ उसने दिया। पहली नौकरी मिलने में उस शख़्स की कितनी बढ़ी भूमिका थी ये आज अंविका उसे बताना चाहती थी। क्या वो सचमुच लेखक था, क्या वो जानता था कि वह अन्विता को प्रेरित कर रहा था? क्या था उसका नाम, जादूगर या कृतिकार? अन्विता सोच में डूब गयी।

    एक बच्चा पास से दौड़ते हुए गया, और झील  में पत्थर उछाल दिया। लहरें ज़ोर से लहराईं — जैसे कोई जवाब दे रही हों की वो लौटकर नहीं आएगा । अन्विता की आँख से आँसू भी उन लहरों में मिल गए, उसे अब आसपास सिली हवा की खुशबू महसूस हुई। उसने बादलों की ओर आँख गड़ायी —

    “क्षण भर की गीली मिट्टी की खुशबू फिर सूखी रेत में तब्दील हो जाती है।

    कहाँ मिलता है ऐसा बादल जो खुले आसमान की तपती धूप में चाँद का साथ ना छोड़े?

    चाँद के घटते-बढ़ते क्रम को समझे और बिना परखे या जज करे साथ चलता रहे।”

    घर लौटकर वो अपनी किताबों के पास लौटी। एक अनजान व्यक्ति के वियोग ने उसकी घबराहटों को तीव्र कर दिया जैसे किसी प्रेमी का शहर छोड़ कर जाना हो। उस कृतिकार ने उसे एक कृति में तब्दील कर दिया था, एक नवीन कृति, जो बेख़ौफ़ निर्णय लेने में सक्षम हो गयी थी। अन्विता लगातार कई दिन उन बादलों के गुच्छों की तलाश में झील के पास गयी। और एक दिन उसने यह निर्णय भी ले ही लिया की इस कृति को वो एक बादल के गुच्छे के  साथ रंग  लेगी।

    “वो फिर कभी नहीं आया लेकिन उसकी हंसी जैसे मेरी डायरी के पन्नों में अटक गयी थी, हर पंक्ति से मुझे देखकर मुस्कुराती रहती”

    समय गुजरता गया, ज़िंदगी इम्तिहान लेती रही, शादी के बाद हर स्त्री की तरह उसका भी विस्थापन हुआ। शहर वही था पर घर नया था, परिस्थितियाँ स्थितियाँ नयी थीं और सफ़र भी नया था। मौसम और मिज़ाज सब अलग थे जैसे उसका अपना शहर बादल गया हो। ये भँवर अंविका को बार बार तोड़ रहा था, यहाँ कोई जादूगर नहीं, जो छड़ी घुमाए और सब सही हो जाए। हर बार वो बिखरती और हर बार खुद को फिर जोड़ती, यहाँ उसे समझने वाला कोई साथ ना था सिवाय उसकी डायरी के जो उसके अंदर के बादलों के गुच्छों को बाहर ले आए।

    “काल के हर खंड में विखंडित होना और फिर से मिट्टी से लेस हाथों से ख़ुद की संरचना करना आसान नहीं है, इसलिए हम खुद को हर परिस्थिति में झोंक देते हैं और फिर इंतज़ार करते हैं एक ब्रह्म मुहूर्त का जब वह लालिमा सभी दुखों का अंत करके एक नया सूरज उगाए।”

     

    आज फिर वो पुरानी यादें, एक कैन्वस की तरह सामने आ गयी। अन्विता ने तड़के तय किया की चाहे कैन्वस यही सही पर इसकी कृति मेरी सोच और मेरे चयन से रंगी जाएगी। कोपल के पंखों को उड़ान देगा मेरा कैन्वस। उसने कलम उठायी और अपनी डायरी में लिखा-

       “हर व्यक्ति की मन ही मन ये चेष्टा रहती होगी कि वह बचपन फिर जिया जा सके;

    जहाँ उसे कोई परखने वाला ना हो, जहाँ कोई उसे बिखरता हुआ ना छोड़े।”

    अन्विता ने वर्जीनिया वुल्फ़ के उपन्यास “अ रूम ओफ़ वन ओन” के पन्ने पलटे और खुद से वादा लिया की उन्मुक्त गगन के बादलों के गुच्छों को वो अपने कलम से पिरोएगी, जिस निर्णय को वो अपने परिवार और रूढ़िवादी सोच की वजह से दबाती रही उस निर्णय से वो अब अपना कमरा सजाएगी जहां हर किताब उसका हिस्सा होगी उसका साथी बन उसे गले से लगाएगी।

    कोपल उसके पास आई, “मम्मा, आप इतनी किताबें क्यों पढ़ती हो?” अन्विता ने मुस्कुरा कर कहा,

    “क्योंकि इनमें वो जगह है जहाँ मैं सिर्फ़ ‘मैं’ होती हूँ, किसी की बेटी, वाइफ़, बहू या माँ नहीं।”

    “और ये बादलों के गुच्छे क्या कहते है?” बेटी ने मासूमियत से पूछा। अन्विता बोली,

    “सच हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा,

    और हमारी विडम्बनायें हमें हालात के गोते लगाना सिखाती रहेंगी।

    लेकिन बादलों के गुच्छे बुलाते हैं कि सफेद प्रयास अभी बाक़ी हैं…”

    उसने कोपल को फिर आश्वासन दिया पहाड़ों में घूमने का और अन्विता फिर से कमरे की खिड़की के पास जा बैठी, डायरी उसकी गोद में थी और कलम उसके हाथ में। बाहर आकाश में बादल थे — घने और शांत।

    “जीवन का रहस्य इन बादलों के गुच्छों के पीछे कहीं छुपा है।

    नीचे ज़मीनी हक़ीक़तें, ऊपर शांत अश्वेत सौरमंडल

    और बीच में मेरी-तेरी सोच और अरमानों से लदे ये गुच्छेदार बादल,

    शायद ये शून्य हैं, पर फिर भी पूर्ण।”

    कोपल ने खिड़की के पास आकर पूछा, “मम्मा,क्या मैं भी एक दिन अपने रूम में कहानी लिख पाऊँगी?”

    अन्विता ने आकाश की ओर इशारा किया और कलम उसके हाथ में थमा दी—

    “यहीं से शुरू होता है — तुम्हारा कमरा, तुम्हारा गगन, और तुम्हारा ‘बादलों का गुच्छा’।”

    4 thoughts on “शुभ्रा पंत कोठारी की कहानी ‘बादलों का गुच्छा’

    1. बहुत सुन्दरता से सरल रखते हुए जिस प्रकार से इस्त्रि के मन कि व्यथा , सामाजिक बंधन , मानसिक जटिलता के उपरांत स्वयं को स्वतंत्र , सशक्त शक्ती रूप में फिर से खोज कर प्राप्त करने कि यात्रा को शुभ्रा पंत कोठारी ने शब्दों में पिरोया है वह सराहनीय है प्रशंसनीय है।इस छोटी सी प्यारी सी अभिव्यक्ति पर मेरी बधाई एवं शुभ कामनाएँ।-प्रशांत धवन

    2. प्रिय लेखिका,

      आपकी पहली कहानी पढ़कर मन अभिभूत हो गया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हर उस स्त्री की आवाज़ है जो अपनी उड़ान के लिए आकाश ढूंढ़ रही है। आपने ‘अन्विता’ के माध्यम से एक ऐसा पात्र रचा है जो न केवल आत्मविश्वास और स्वतंत्रता की मिसाल है, बल्कि हर पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है।

      आपकी लेखनी की सबसे ख़ास बात यह है कि उसमें एक सादगी और काव्यात्मकता है जो सीधे दिल में उतरती है। शब्दों की बुनावट इतनी सुंदर है कि पढ़ते-पढ़ते दृश्य आँखों के सामने सजीव हो जाते हैं। हर भाव, हर दृश्य, हर सोच इतनी सहजता से शब्दों में ढलती है कि पाठक खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगता है।

      आपने इस कहानी के माध्यम से न सिर्फ एक पात्र को उड़ान दी, बल्कि हर ‘कोपल’ के लिए एक उम्मीद भी जगाई — कि उसकी माँ उसे बचपन से ही आत्मविश्वास देना शुरू करे, जैसे अन्विता ने किया। क्योंकि हर कोपल इंतज़ार में है कि कोई उसे बताए, “तुम उड़ सकती हो।”

      आपका यह पहला प्रयास अत्यंत सराहनीय है। कृपया लिखना कभी बंद मत कीजिए। आपकी कहानियाँ और आपकी सोच न जाने कितनी स्त्रियों को उनके पंख याद दिला सकती हैं। आप लिखती रहिए, उड़ान देती रहिए, और हम सबको प्रेरित करती रहिए।

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