यतींद्र मिश्र की किताब ‘अख्तरी’ पर अंकिता जैन की टिप्पणी

यतींद्र मिश्र के संगीत विषयक लेखन-संपादन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह उन लोगों को संगीत से, उसकी शास्त्रीयता से जोड़ता है जो आम तौर पर संगीत के शास्त्र को जानने समझने वाले नहीं होते हैं। उनके द्वारा संपादित किताब ‘अख्तरी’ पर युवा लेखिका अंकिता जैन की इस लिखत में भी इस बात को रेखांकित किया गया है- मॉडरेटर

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मेरे जैसे किसी संगीत प्रेमी किंतु संगीत व्याकरण का अ-ब-स-द भी ना जानने वाले ने यह किताब क्यों पढ़नी चाही इसका उत्तर किताब में यतीन्द्र जी द्वारा लिखे एक लेख में मिलता है। वे लिखते हैं – “बेगम अख़्तर को मात्र एक गायिका या अभिनेत्री मानकर देखने से संगीत के इतिहास को पूर्णता नहीं मिलती। उनकी जैसी महिला के जीवन में यह देख पाना, इतिहास, संस्कृति और समाज की निगाह से बड़ा प्रासंगिक है कि एक तवायफ़ की दुनिया से निकलकर आने वाली लड़की, किस तरह समाज के बने-बनाये बन्दोबस्त में अपने रहने के लिए, अपनी तरह से तोड़फोड़ करती है और बाई के लिबास से गुज़रकर बेगम बनने का बाना अख़्तियार करती है।”

उपर्युक्त पंक्तियाँ इस किताब को पढ़ने के लिए एक वाजिब वजह हैं तब भी जब आप संगीत ज्ञाता ना हों। यह सच है कि मुझे इतिहास की तारीख़ें याद नहीं रहती लेकिन यह भी सच है कि मैं देश-दुनिया के सारे इतिहास से गुज़रना चाहती हूँ। उसे जानना देखना चाहती हूँ।

किसी भो देश का इतिहास सिर्फ उसके शासकों के बारे में लिखे-पढ़े जाने से पूरा नहीं होता। संस्कृति, संगीत एवं कला का इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है। कितनी ही कहावतें, कितने ही लोक गीत ऐसे हैं जो किसी स्थान विशेष से जुड़े इतिहास के बारे में हमें जानकारी दे देती हैं।

बेग़म अख़्तर को जानना भी इतिहास के उस अध्याय को जानने जैसा है जिसके पन्ने पलटते हुए आपके आसपास का सारा माहौल संगीतमय हो जाए। दर्द-विरह-मिलन-तड़प जैसे कई भाव आपके भीतर उमड़ने लगें और आप किसी दूसरी ही दुनिया मे विचरने लगें।

किताब तीन हिस्सों में बंटी है। पहले भाग में कई संगीत अध्येताओं एवं संगीत प्रेमियों द्वारा लिखे गए लेख हैं। यह सभी लेख पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मैं खा तो ‘भात’ ही रही हूँ लेकिन हर प्लेट में रखे भात का स्वाद एकदम नया है, लाजवाब और रसीला, स्वादिष्ट। हर लेख बेग़म अख़्तर पर ही है लेकिन हर लेख का ट्रीटमेंट अलग है। प्रत्येक लेख अख़्तरी के जीवन से जुड़ी कोई नई बात बताता है या पुरानी ही बात को नए स्वाद में लपेटकर। मैंने एक दिन में एक ही लेख पढ़ा ताकि हर लेख का स्वाद नया बना रहे। ऐसा करना सुखद रहा। ऐसा करते हुए मैं एक लेख पढ़ती और फिर पूरा दिन बेग़म अख़्तर को सुनती। यह किताब संगीत के कुछ और करीब ले गई।

इस किताब को पढ़ने से पहले मेरे लिए बेग़म अख़्तर का अर्थ ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’, या ‘हमरी अटरिया पे आओ साँवरिया’ जैसे कुछ चुनिंदा गीतों या गज़लों से ही था।

संगीत से मेरा बस इतना नाता रहा है कि मेरे दादाजी सिरहाने हारमोनियम रखकर सोते थे,  पिताजी बाँसुरी रखकर सोते हैं और मैं कुछ महीने वायलिन सिरहाने रखकर सोई।

पिताजी के छः भाइयों में शायद ही कोई ऐसा हो जिन्होंने किसी ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा ना रहे हों। बचपन में पिताजी हमारे लिए कुछ बाल कविताएँ और भजन लिख देते, ख़ुद ही उनकी धुन तैयार करते और हम उन्हें किसी प्रतियोगिता में गाकर फर्स्ट प्राइज़ जीत लाते।

1995 से 1998 तक भौंती में बिताए तीन सालों में पिताजी की रात दो बजे तक ख़ूब संगीत मंडली जमी जिसमें पिताजी हारमोनियम बजाते, और उनके कुछ मित्र जो तबला, मंजीरा और ढोलक बजाते। हम बच्चों की भूमिका साथ में अलापने और नाचने की थी। भौंती छूटा और संगीत मंडली भी। लेकिन रेडियो, फिर टेप में कैसेट्स द्वारा और फिर कम्यूटर, इंटरनेट द्वारा संगीत सुनने का सिलसिला चलता रहा।

इस सबके बाद भी मैं संगीत के मामले में अनाड़ी हूँ। सरगम के सात सुरों के अलावा संगीत से जुड़ी कोई आधारभूत जानकारी नहीं। संगीत की व्याकरण के मामले में मैं निल बटे सन्नाटा हूँ। कौन गायक किस घराने का, कौन से राग में कौन माहिर, राग की पहचान, इस सबके मामले में मैं अनपढ़ हूँ। पर बचपन से संगीत से रहा विशेष लगाव और संगीत समझने की इच्छा ही इन किताब को पढ़ने का कारण बनी।

इस किताब को पढ़ने से पहले तक बेग़म अख़्तर मेरे लिए उनकी कुछ चुनिंदा गज़लों तक ही सिमटी हुई थीं। हाँ एक बार कोक स्टूडियो में फरीदा ख़ानम द्वारा ‘आज जाने की ज़िद ना करो’ सुनते वक़्त यह ख़याल ज़रूर आया था कि काश आज बेगम अख़्तर जीवित होतीं और कोक स्टूडियो में उनकी गज़लों के साथ सजी महफ़िल का मज़ा मिल पाता। कोक स्टूडियो में परोसे जाने वाले शुद्ध संगीत से बेहद लगाव है जिसने इस ख़याल को जन्म दिया था। बहरहाल यह ऐसी ख़्वाहिश है जो पूरी नहीं हो सकती।

बेगम अख़्तर का किरदार कैसा था, उनकी शख़्सियत कैसी थी, कैसा जीवन बीता यह सब जानने की कभी कोशिश नहीं की। एक रवैया रहा है जितना ज़रूरी है उतना ही काम करो। शायद इसी वजह से उनके जीवन में नहीं झाँका। क्या करना था? उनकी आवाज़ से यदा-कदा सुख तो मिल ही रहा था। लेकिन यतीन्द्र जी द्वारा संपादित यह किताब जब आई और दो-चार जगह इसके बारे में पढ़ा तो दिलचस्पी बनी। और पढ़ना शुरू किया।

इस किताब को पढ़कर समझ आया कि जिन बेग़म अख़्तर के ‘गीत’ मैं सुनती रही हूँ असल में वे गज़ल, दादरा, कजरी में बंटे हुए हैं।

बेग़म अख़्तर से जुड़े संस्मरण, उनके साथ हुई बातचीत सब कुछ कथेतर होते हुए भी कथा सी दिलचस्पी बनाए रखता है। नरेंद्र सैनी जी द्वारा लिखा गया लेख जिसमें बेग़म अख़्तर का काल्पनिक साक्षात्कार है, शिवानी जी का लेख जिसमें उन्होंने अख़्तरी को कितनी साफ़गोई से तवायफ़ के तमगे से अलग रखते हुए एक स्त्री के जीवन संघर्ष का ब्यौरा दिया है, ममता कालिया जी का लेख जिसमें वे अपने निजी जीवन से कितनी सहजता से बेग़म अख़्तर के गीतों को जोड़ती हैं, सुशोभित का लेख जिसे पढ़ते हुए आप जलसाघर देख लेने के लिए मचल उठते हैं। इसके अलावा भी जितने लेख हैं सभी ख़ास हैं।

मेरी राय में साहित्य का अहम हिस्सा बन जाने वाली इस किताब को सभी साहित्य प्रेमियों को पढ़ना चाहिए।

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पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। 

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