ईशान त्रिवेदी की कहानी ‘स्टील का बिल्ला’

एनएसडी के ग्रेजुएट, फ़िल्मों-टीवी की दुनिया के वरिष्ठ पेशेवर ईशान त्रिवेदी के छोटे छोटे क़िस्सों का मेरे ऊपर ग़ज़ब जादू हो गया है। हर बार एक ताज़ा अहसास से भर देती हैं उनकी कहानियाँ। जैसे इसी कहानी को लीजिए- मॉडरेटर

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मेरे घर कामरेड सुरजीत सिंह आ रहे थे। सी पी एम् की सेंट्रल कमिटी के तीन सदस्य का ये जांच मुहिम था कि क्या हमारा क़स्बा दो दशक के आन्दोलनों के बाद इस लायक हो चुका है कि वहाँ से इलेक्शन लड़ा जाए। दिल्ली के कामरेड्स का आना हमेशा की तरह इस बार भी घर में काफी उथल पुथल मचा रहा था। कस्बे के कम्युनिस्टों को लग रहा था जैसे क्रांति अब बस होने ही वाली थी। माँ की तमाम चीख चिल्लाहट के बावजूद एस्प्रेसो कॉफ़ी मशीन खरीदी गयी थी जो ऐसी आवाज़ें निकलती थी जैसे सूखे कुँए के भीतर विक्रमादित्य के दो चार वेताल चिंघाड़ रहे हों। माँ को पूरा शक़ था कि हर रोज़ ५ लिटर दूध की कॉफ़ी के साथ साथ पापा कैंची सिगरेट भी मुफ्त में पिला रहे थे। मेरे बचपन का ये वो काल खंड था जहाँ मेरी दिलचस्पी यू एफ ओ (उड़न तश्तरी) से हट कर लड़कियों में हो चली थी। उनकी आँखों, उनकी ज़ुल्फ़ों, उनके होठों में मुझे उड़न तश्तरियों से ज्यादा रहस्य नज़र आते थे। ढेला के उस पार लाल पलाश के जंगलों में मेरे साथ यू एफ ओ ढूंढने वाला और मेरा सबसे करीबी दोस्त दिनेश मेरी इस नयी दिलचस्पी से ख़ासा नाराज़ रहता था। “भोड़ीवाले! तू बदल गया।” मैं झेंपता – “नहीं यार वो तो वैसे ही …” “नहीं यार क्या!? उसके चबूतरे पे क्या उसे लसोड़े का अचार बनाना सिखा रहा था तू!?” क्या बताता मैं उसे? कि जब वो अपनी पिन्नी सी आँखें उठा के मुझ से कहती है कित्ती खबसूरत लगती है न डायना पामर, तो न जाने क्या क्या होता है मुझे। और वो टंकी के पीछे वाली रेनू। पता ही नहीं चलता कि वो शरमा के मुस्कुरायी या मुस्कुरा के शरमायी। और वो बड़े गंज वाली अलका। पास से गुज़रो तो कभी रूहअफ्ज़ा सी महकती है तो कभी बाजरे की रोटी जैसी। ये वो रहस्य थे कि अगर सुलझे नहीं तो मैं पागल भी हो सकता था। पापा की तमाम कोशिशों के बावजूद कि इतने बड़े बड़े लोग आ रहे हैं तो कस्बे में एक जलसा भी हो, सेंट्रल कमिटी ने इस प्रस्ताव को ये कह के खारिज कर दिया कि कामरेड सुरजीत सिंह को आगे भी जाना है और टाइम बिलकुल नहीं है। कामरेड सुरजीत के साथ प्रकाश करात, सुमीत चोपड़ा और येचुरी थे जांच कमिटी में लेकिन उनका काफिला और भी बड़ा होगा ये पक्का था। ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़ कर लौटे और खेतों के ट्यूब वेल की मोटी धार में नहाना पसंद करने वाले सुमीत पिछली बार जब आये थे तो उन्हें माँ के हाथ से बने ब्रेड रोल्स बहुत भाये थे। “ऐसा करें गीतो? कॉफ़ी तो रामपाल सीख ही गया है बनाना .. तुम बस ब्रेड रोल्स.. हो गया…” लोहे के बम्बे में नहाने का पानी गरम करती माँ ऐसी दहकी कि बम्बे को किसी अंगार की ज़रुरत नहीं थी। २५ लोगों के लिए ब्रेड रोल्स बनाने का मतलब था दुनिया भर के झंझट। इसके पहले कि बहसा बहसी शुरू हो धरमपाल प्रिंटिंग प्रेस का लड़का ताज़ा ताज़ा छापे बिल्ले लेके आ गया। गत्ते वाला बिल्ला तिकोना था और मोटे पेपर वाला गोल। दोनों पर लाल हंसिया हथोड़ा। उस दिन पार्टी के सभी मेंबर्स को ये बिल्ले अपने सीने पे लगाने थे। अच्छा ख़ासा जमावड़ा होना था उस दिन। गत्ते वाले तिकोने बिल्ले को उँगलियों से सहलाते हुए पापा ने बताया कि दुअन्नी का एक पड़ा है ये वाला। मेरा दिल किया कि अपने और दिनेश के लिए एक एक बिल्ला मांग लूं लेकिन बेफालतू का लेक्चर सुनने का मूड नहीं था। आज सन्डे था। पिछले इतवार पलाश के जंगलों में हमने कुछ सनसनीखेज सुराग खोजे थे। कुछ सिलेटी चट्टानों पे किसी ने एक लोमड़ी जैसी कुछ बनायीं हुई थी जिसकी दुम पे एक चक्का सा बना था। पास ही में खायी हुई मछलियों के कंकाल थे। हमारे इलाके में न तो चक्के वाली ऐसी लोमड़ियाँ थीं और ना ही ढेला में ऐसी मछलियां। तीन दिन पहले कुछ झंझावाती सा भी घटा था मेरे जीवन में। टंकी पीछे वाली रेनू क़स्बा छोड़ के चली गयी थी। उसके पापा जो कस्बे के ढोर अस्पताल में डॉक्टर थे, उनका कहीं ट्रान्सफर हो गया था। वो शरमायी सी मुस्कराहट या मुस्कुराती शरमाहट अब हमेशा हमेशा के लिए एक ऐसा रहस्य बन चुकी थी जो चक्के वाली लोमड़ी से भी ज्यादा गूढ़ था।

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कामरेड सुरजीत का काफिला वाकई में बहुत बड़ा था। ऊपर छत से खड़े होके मैंने नीचे झाँका तो लाल झंडों का वो सैलाब ठीक वैसे हिल रहा था जैसे सर्दियों की सुबह नए दिन की नयी उम्मीदों का सफ़ेद धुआं हर घर से उठता है। आसमानी पगड़ी और सफ़ेद खद्दर की बंडी – भव्य थे कामरेड सुरजीत। लेकिन बंडी पे लगा स्टील का वो चमचमाता बिल्ला जिस पे लाल हंसिया हथोड़ा ऐसा सज रहा था कि नज़रें हटती ही नहीं थीं। उस पल उस दिन अगर मुझे कुछ चाहिए था तो बस वो बिल्ला। क्या मैं उसे बंडी से नोच लूं और भाग जाऊं? क्या पापा से कहूँ कि अगर मेरी माँ ने इतना मर मर कर ब्रेड रोल्स बनाये हैं तो क्या कामरेड सुरजीत मुझे वो बिल्ला नहीं दे सकते? मुझे पता था इनमें से कोई भी विकल्प खतरों से खाली नहीं था। तमाम वाद विवाद के बाद मैंने पाया कि सही तरीका ये होगा कि मैं चुंगी के पास जाके खड़ा हो जाऊं। काफिला वहाँ कुछ देर के लिए रुकेगा और तब मैं कामरेड सुरजीत की गाडी तक जाके उनसे वो बिल्ला मांग सकता हूँ। वहाँ पापा का खतरा नहीं और हो सकता है कि अगर मैं मुठ्ठी बाँध कर उन्हें लाल सलाम कहूँ तो वो मुझे बिल्ला दे ही दें।

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काशीपुर चुंगी पे पहलवान राम नाथ बैठते थे। पहलवानी उनका शौक था, चुंगी वसूलना रोज़गार और रामलीला में हर साल रावण बनना एक मजबूरी। मैंने जीवन में कई रामलीलाएं देखीं लेकिन इतना उदासीन रावण कभी नहीं देखा। जब वो स्टेज पे होते थे तो उनकी बला से राम उनका अपमान करें या हनुमान लंका में आग लगा के चले जाएँ। बहुत बाद में चल के मैंने जाना कि इसे अंडर एक्टिंग कहते हैं। आज के बहुत से प्रसिद्ध अभिनेता ऐसी ही एक्टिंग करना पसंद करते हैं जहां चेहरे के अकर्मण्य भाव और आवाज़ की निर्पेक्षता उन्हें काफी सारे अवार्ड्स दिलाती है। अगर अफवाहों पे गौर किया जाए तो कहा जाता था कि उन्हें किसी ऐसी से प्यार हो गया था जो शादी शुदा थी और उनकी ये उदासीनता उसी का परिणाम थी। मैं भी तब जैसा मौका मिला (मतलब जैसी कॉस्ट्यूम मिली) बन्दर या राक्षस बन जाता था इसलिए राम नाथ मुझे जानते थे। भरी दोपहरिया में सड़क के कंकर उछाल रहे मैं और दिनेश उनके स्थायी भाव ‘उदासीनता’ को चुनौती देने लगे तो उन्होंने इशारे से हम दोनों को अपने ठेपचे में बुलाया। उनकी आँखों में कोई सवाल नहीं था। भृकुटि भी शायद कुछ मिलीमीटर ही ऊपर गयी थी। लेकिन हमें पता था कि उनका सवाल क्या था। दिनेश ने जवाब दिया – “इस लसोड़े को बिल्ला चाहिए।” लसोड़ा एक छोटा सा बेर नुमा चिपचिपा फल होता है जिसका ज्यादा इस्तेमाल फटी पतंगे चिपकाने में होता है। कुछ कदरदान इसका अचार भी डालते हैं। हमारी तरफ ये फल फल न होके कब एक गाली हो गया इसका एक मज़ेदार किस्सा है लेकिन वो फिर कभी सही। दिनेश का जवाब पूरा हुआ ही था कि मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पीछे कुछ हुआ हो। ज़ह्हहीईन्ग्गग्ग! ज़हिन्न्ग्गग्गग्गग! आवाज़ पहले आयी और फिर हमारे कस्बे के इतिहास में वो हुआ जो किसी ने कभी न देखा था। एकदम रत्ती रत्ती में तौलने वाले पहलवान राम नाथ का चेहरा ऐसा फटा कि फटा ही रह गया। मैंने पलट के देखा तो उड़ती हुई धूल के गुबार में कोई गुलाबी नीली सी चीज़ कौंधी और गायब हो गयी। थेपचा ऐसे हिला जैसे कोई भूकम्प आया हो। मैं दौड़ा, दिनेश दौड़ा, यहाँ तक कि निरपेक्षता के सरदार पहलवान राम नाथ भी दौड़े। सड़क जादूनगरी में बदल गयी थी। एक के बाद एक रंगबिरंगी कारें। उनपे बड़े बड़े नंबर लिखे थे। स्पीड ऐसी जैसी उड़न तश्तरियाँ हों। लेकिन सबसे हैरतअंगेज थीं वो लडकियाँ जो उनपे बैठी थीं। सबके ऊपर चमकदार कनटोपे। सुते हुए जिस्मों पे हाहाकारी कपडे। होठों पे ऐसा रोमांच कि सत्तर फीट दूरी पे भी मुझे भस्म कर रहा था। ये जादुई मंज़र आनन फ़ानन में सिर्फ धूल का गुबार रह गया। अगले दिन अखबार से पता चला कि वो पहली हिमालयन कार रैली थी जिसका रास्ता हमारे कस्बे से होके भी गुज़रता था। कामरेड सुरजीत तिकोनिया वाले रास्ते से निकल गए और वो स्टील का बिल्ला मुझे नहीं मिला लेकिन उस चिपचिपाती गर्मी में कुछ चिपक सा गया था मेरे भीतर। कुछ ऐसा जो हमें अपने गाँव और कस्बों से बाहर खींचता है। कुछ ऐसा जिसपे ढेरों पलाश के जंगल और स्टील के बिल्ले कुर्बान हैं। टंकी पार की रेनू गयी तो ये भी नहीं सोचा कि सैकड़ों शरमाई मुस्कराहटों का कुछ तो जमा जोड़ होना चाहिए था। हम सब वहाँ जाना चाहते हैं जहाँ पीठ के पीछे “ज़ह्हहीईन्ग्गग्ग! ज़हिन्न्ग्गग्गग्गग!” सरसराती हों। ये अलग बात है कि पलट के देखो तो बस धूल के गुबार नज़र आते हैं।

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