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ईशान त्रिवेदी की कहानी ‘सीय स्वयंवर कथा सुहाई’

ईशान त्रिवेदी फ़िल्म निर्देशक रहे हैं, फ़िल्मों टीवी के लिए पटकथाएँ लिखते रहे हैं, उनका एक उपन्यास प्रकाशित होने वाला है। लेकिन आजकल जानकी पुल के पाठकों के लिए उनकी एक के बाद एक कहानियाँ आ रही हैं। हर कहानी में उनके लेखन का एक नया ही रूप आता है। यह नई कहानी है-मॉडरेटर

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अरमान पांडे को रह रह कर अहसास होने की विचित्र और भीषण बीमारी है। इन एहसासों की कोई ख़ास उम्र नहीं होती लेकिन वो जब तक उसके भीतर खदबदाता है तब तक उसे जूडी का बुखार सा चढ़ा रहता है। जैसे आज सुबह अरमान बाहर निकल रहे था कि माँ ने कहा जब छुट्टी वाले दिन भी बाहर जा ही रहा है तो लगे हाथों घर के दो चार काम निपटाते आना।

कहीं जाना तो था नहीं। बस यूँ ही मल्लीताल के बाजार में तफरा-तफरी। दुर्गा पूजा वाला ऑटम सीजन चल रहा है। चरों तरफ सैलानी ही सैलानी। कंधे से कन्धा छिल रहा है। दाएँ से बचो तो बायाँ भिड़ जाता। अगर किसी को शौक ही था घिसंदड़ी का तो बात अलग वरना हर लोकल भीड़ भड़क्के से बच के ऊपर की सड़क से नीचे उतर रहा था। अरमान ने भी ऊपर की सड़क पकड़ी। अभी सौजू की पकौड़े जलेबी वाली दुकान आयी भी नहीं थी कि अरमान को एक अहसास ने धर दबोचा। लगा कि मोक्ष का रंग चमकीला बैंगनी होता है। अरमान को तो ढंग से ये भी नहीं पता था कि मोक्ष होता क्या है। कई बार ऐसा होता है कि अरमान के दिमाग में बस शब्द भर आते हैं। जैसे मॉडर्न एंटीक स्टोर में वो जब जाता है तो वहां कुछ रखा होता है जो उसे अपनी तरफ खींचता है। अरमान उसे उठा के उलट पुलट के देखता है। वो क्या है? सौ साल पुरानी किसी मशीन का हिस्सा? या कोयले से चलने वाले इंजन की हेडलाइट? या फिर कुछ और ही भलती सी चीज़? एकदम ‘अपरिचित’ भी कभी कभी कितना खींचता है। अरमान ने रुक कर मोक्ष को गूगल किया। मुक्ति, छुटकारा, विमुक्त होना। हाँ, इतना तो पता था। लेकिन चमकीला बैंगनी रंग? अरमान ने मुड़ कर चारों तरफ देखा। ओरिएंटल बैंक के सामने एक छोटी सी बच्ची गैस भरे गुब्बारे बेच रही थी। गुलाबी, नीले और पीले। क्लब जाने वाली चढ़ाई जहाँ शुरू होती है वहां एक बड़ी सी छतरी के नीचे मैगी का स्टाल था। छतरी लाल और सफ़ेद थी। छतरी के नीचे काली साडी पहने एक औरत अपने दो चिल्ल पौं मचाते दो बच्चों को मैगी खिलाने की कोशिश कर रही थी। मोक्ष का चमकीला बैंगनी अगर कहीं था तो वो फिलहाल तो अरमान की नज़रों से ओझल था।

अरमान ने अपने पोर पोर को झटका और थोड़ा और नीचे उतर के सौजू की दूकान तक आ गया। सुबह सुबह माँ ने चीनी वाले परांठे बना दिए थे तो मन में जगह नहीं थी जलेबी पकौड़ों के लिए। आगे बढ़ ही रहा था कि किसी ने आवाज़ लगायी – “पांडे साहब!” इस आवाज़ को नैनीताल में कौन नहीं जानता। बड़े बाज़ार की रामलीला में पचीसियों साल राम से लेके रावण खेलने के बाद अब खुद रामलीला करवाते हैं। जानकार लोग कहते हैं कि शायद इतनी कलात्मक रामलीला दिल्ली में भी नहीं होती। चौपाइओं को कुमाउँनी लोक धुनों में कहा जाता है, ज़ुबान हिंदुस्तानी और मैदानों में रामलीला के नाम पे जिस तरह की फूहड़बाज़ी होती है वो सब यहाँ नहीं होता। ना तो यहाँ बरेली के बाजार में नाचने वालियों का झुमका गिरता है और ना ही जनक के दरबार में पोतड़ों पे चिम्मट बजवाते भांड परशुराम का धनुष उठाते हैं। जलेबी के कुरकुरे टुकड़े जोशी जी की खिचड़ी दाढ़ी पे अटके हुए थे। अरमान का दिल किया कि वो उन्हें झाड़ दे।

“यार कहाँ कहाँ रहते हो तुम?” – जोशी जी के लिए ५ साल का बच्चा भी यार ही था। जोशी जी अरमान के बौज्यू के दोस्त थे। पहले घर भी आते थे लेकिन बौज्यू की मौत के बाद बस एक बार आये थे। बौज्यू के मरने के बाद माँ को सब कुछ इतना सूना सूना लगने लगा कि ‘कैसे भी हो बस अरमान की शादी हो जाए’ – यही एक बात जब घर में घूम फिर के होने लगी तो अरमान ने माँ को समझाया कि हर चौथे दिन रिश्ते मत मंगवाओ। बार बार ‘ना’ करना अच्छा नहीं लगता। इसी रिश्तेबाज़ी के चक्कर में जोशी जी का भी हुआ था आना एक बार घर में। किसी दूर के रिश्ते की भानजी के लिए आये थे। जब मेरे चेहरे पे रुखड़ापन नज़र आया तो बोले – “चिल्ल मार यार! हम तो बोझी के हाथ का बना खाने आये बल। ” फिर माँ को अलग से समझा के गए ये रिश्ते विश्ते छोडो लड़के से पूछो जो कोई है उसके मन में तो। माँ ने जोशी जी के जाते ही अरमान को धर दबोचा। अब अरमान क्या ये बताता कि एक तो थी पड़ोस वाली चिंटी जिसकी जब शादी हुई थी पिछले साल तो बड़ा चहक चहक के लड्डू दबाये थे तीन तीन दिन। तब ना दिखा था अपने बेटे का उतरा हुआ चेहरा?  दूसरी थी वो जिसके साथ अरमान ट्रैकिंग पे गया था। पिंडारी ग्लेशियर। अगर प्यार कहो उसे तो बस उतना चला जितनी दूर का सफर था। हैं और भी दो तीन। छुटकिस्से। कैसे बताये अरमान कि ‘अहसास’ उसके साथ क्या क्या करते हैं। वो उसे कहीं और ले जाते हैं। उस जगह से दूर जहाँ उसे होना चाहिए। अपनी ये बीमारी खुद समझ में नहीं आती अरमान को तो माँ को क्या समझाये?

“तू भी भी तो नाटक करता है?” – हाथ में पकड़ा खली दोना फेंकने के लिए जोशी जी कोने में रखे तेल के खाली कनस्तर तक गए और फिर वापिस आके नए खेप में छनती जलेबियों की तरफ देखने लगे। जोशी जी ने कभी शादी नहीं की। कहते हैं अल्मोड़ा में कोई लड़की थी।

“नाटक?” – अरमान को कुछ समझ नहीं आया।

“वो कुछ किया था ना कॉलेज में जब पढता था तू? क्या नाम था नाटक का?” – और फिर सवाल का जवाब सुने बगैर जोशी जी ने अरमान की बांह पकड़ के खींचना शुरू कर दिया।

***

पहली नज़र में रिहर्सल हॉल ऐसा लग रहा था जैसे मॉल रोड के सैलानी रस्ता भूल के आपधापी मचाने यहीं आ गए थे। लेकिन जोशी जी अंदर घुसते ही सब कुछ तुरत फुरत तरतीब से हो गया। वानर सेना और राक्षस सेना एक कोने की तरफ पीछे चली गयी। राम और लक्ष्मन अपने अपने व्हाट्सएप छोड़ के कमरे के बीचों बीच हाज़िर हो गए।  एक कोने में बैठी हारमोनियम पे सुर बांधती सीता चुप हो गयी। जोशी जी ने आते ही सबको उस उदासीनता से देखा जो सिर्फ पहुंचे हुए लोगों को नसीब होती है। अरमान ने पाया की सबकी नज़रें उसी पे हैं।

***

बड़े बाजार की रामलीला में रावण का पार्ट करने वाले ज़हूर आलम कटपीस का धंधा करते हैं। फ्लैट्स के पीछे वाली मस्जिद से सटी उनकी दुकान है। ज़हूर आलम की दो खासियत थीं। एक तो ये कि वो नुक़्ते वहीं लगते थे जहाँ उन्हें लगना चाहिए। और दूसरी ये कि रिहर्सल वाले हर दिन ताज़े छने हुए समोसे लेकर आते थे। रामलीला अरण्य काण्ड तक पहुँच चुकी थी। मारीच स्वर्ण मृग बन कर धोखा दे चूका था और राम लक्ष्मण उसका आखेट करने के लिए जा चुके थे। आज सीता का अपहरण होना था लेकिन रावण को डेंगू हुआ पड़ा था। वो भी ग्रेड थ्री। ज़हूर आलम ने सीता स्वयंवर तक तो जैसे तैसे कलाकार धर्म निभाया लेकिन अब प्लैटलेट्स तेज़ी से नीचे जा रहे थे और उनके नुक़्ते भी छितर बितर हो रहे थे। उन्हें हॉस्पिटल में दाखिल करवा दिया गया था।

***

दस सर वाले मुकुट में कुछ था जो अरमान के सर में गड़ रहा था। एक बार जब अरमान ने मुकुट उतार के रख दिया तो जोशी जी बुड़बुड़ पे उतर आये। पिछले दो घंटे में रिहर्सल करने के दौरान अरमान को इतना समझ में आ गया था कि जोशी जी गुस्सा नहीं करते। उनका हथियार था बुड़बुड़ाना। कुछ समझ में नहीं आता था कि वो क्या कह रहे हैं। और आप लाख जानना चाहें कि उनकी बात आपको समझ में आ जाये लेकिन जो समझ में आता था वो बस इतना कि वो बेहद खीजे हुए हैं। ये बुड़बुड़ाना गुस्से से ज्यादा आतंकित करने वाला था।

जिन्हें ये पता था वो इस बुड़बुडाने पे ‘हैं?’ ‘क्या?’ या ‘कुछ कहा आपने जोश्ज्यू?’ नहीं कहते थे। ऐसा करने पे उनका बुड़बुड़ाना ‘भड़भड़ाने’ में बदल जाता जो ज्यादा खतरनाक होता और पूछने वाले की ज्यादा कवायद होती। अरमान आज की रामलीला के लिए रावण का रिप्लेसमेंट था। अरमान ने प्रतिरोध किया था लेकिन एक हद तक। जोशी जी का विरोध करने का मतलब था खुद को एक ऐसे किस्से में बदल लेना जिसे शहर कभी भूलेगा नहीं। खतरा था कि आप इंसान कम और चौक चौराहा ज्यादा हो जाएंगे।

फिलहाल सीन ये था कि अरमान को समझा दिया गया था कि उसे ४ लाइन्स संवाद के तौर पे और दो चौपाई गा कर बोलनी हैं। अरमान जब कॉलेज में पढता था तो उसने दो नाटक किये था। वो भी सिर्फ इसलिए कि उनमें से एक नाटक की हेरोइन वो लड़की थी जो दूद दूर से अरमान को अच्छी लगती थी। नाटक के दौरान जब थोड़ी नज़दीकी हुई तो पता चला वो लड़की लड़की कम और पजामा ज्यादा थी। जब खुद कॉलेज में पढ़ाने लगा तो सब छूट गया। लाइन्स तो अरमान ने तुरंत पकड़ लीं लेकिन चौपायिओं के सुर उसके हाथ नहीं आये। तय किया गया कि वो सिर्फ ‘लिप सिंक’ करेगा और परदे के पीछे से खुद जोशी जी चौपाइयां गायेंगे। ये प्रॉब्लम तो सॉल्व हो गयी लेकिन अरमान की हंसी का क्या किया जाय। माता सीता को अपने कन्धों पे लादने से पहले जब साधू रावण उन्हें लक्ष्मण रेखा से बाहर आकर भिक्षा देने के लिए ललकारता है और अपने असली रूप में आता है तो उसे दो बार अट्टहास लगाना था।

जोशी जी ने एक बार और कोशिश की – “एक बार फिर से!”

“हा हाहा हो हहह हो” – अरमान की हंसी कैसी भी हंसी के नाम पे कलंक थी। इस हंसी में एक शुरुआत और एक अंत तो था लेकिन बीच में बेचारगी और रुदन भी था। ये गरूर में चूर रावण का अट्टहास नहीं हो सकता था।

पांच बार असफल हो चुके जोशी जी ने इस बार तकनीकी समाधान की ओर रास्ता किया।

“देखो सबसे पहले सांस भरो… ऐसे… हू हू हूSSS… और अभी सांस छोड़नी नहीं है… इसी को और आगे ले जाना है … लेते जाना है … लेते जाना है … मुंह खोल के  …. हा हा हा SSS… ऐसे  … हू हू हूSSS हा हा हा SSS… अब कर के बताओ… “

अरमान ने इस बार जैसा हंसा उस में सिर्फ और सिर्फ खालिस रुदन था।

“पांडे जी लगता है आप जीवन में कभी हँसे नहीं” इतनी सी दो टूक बात कह के जोशी उस तरफ चले गए जहाँ हारमोनियम और तबले वाले बैठे थे।

“इस से नहीं होगा… इतने सारे काम पड़े हैं और ये पांडे का छ्योड़ो हंसने के नाम पे रोता है मेरा यार!”

जोशी जी का बुड़बुड़ाना अब शब्दों में साकार हो रहा था और ये संकेत था एक ऐसे तूफ़ान का जो सब कुछ लील जाता है। कुच्चू को ये पता है। सीता बनने का ये उसका तीसरा साल है।

“सर, आप बाकी काम कीजिये… मैं इन्हें बाहर ले जाके रिहर्सल करवाती हूँ  …”

जोशी जी बुड़बुड़ाते हुए हाथ झटकते हैं जैसे कह रहे हों दफा हो जाओ सब लोग।

बांये से तीसरा वाला सर थोड़ा लचक रहा है। अरमान को डर है कि कहीं वो बाकी के सरों से क़लम ना हो जाए। कुच्चू आके सामने खड़ी हो जाती है।

“हाय आय ऍम कचनार पंत… आय ऍम प्लेइंग सीता… मेरे साथ रिहर्सल करेंगे बाहर चल के? जोशी जी से पूछ लिया मैंने… “

“अह… यहाँ किसी के पास थोड़ा… फेविकोल होगा क्या?”

“फेविकोल?”

“ये वाला सर  … कहीं गिर ना जाये  …”

“नहीं गिरेगा… जब से मैं सीता बनी हूँ… ये ऐसा ही है … तीन साल से…”

***

हॉल से बाहर जाके रिहर्सल एकदम से शुरू नहीं हुई। अंदर रिहर्सल हॉल में जब अरमान ने अपने को रावण के दस सरों से जुदा करने की कोशिश की थी तो जोशी जी ने कहा था एक रोल करने के लिए अच्छे एक्टर्स क्या क्या नहीं करते और तुम्हें एक गत्ते के मुखौटे से प्रॉब्लम हो रही है। मैं चाहता हूँ कि जब तक आज रात रामलीला ख़तम नहीं हो जाती तब तक तुम रावण के इन दस रूपों को जियो। उसके अहंकार को, उसकी ज़िद को, उसके ब्राह्मणत्व को, उसके स्वार्थ को, उसकी ईर्ष्या को। घुट्टी बना के पी जाओ इन रूपों को। कुछ ऐसा करो कि रात में जब सैकड़ों लोगों के सामने तुम आओ तो उन्हें अरमान नहीं रावण दिखना चाहिए। और फिर उन्होंने दुनिया भर की मिसालें दे डाली कि अलाना रोल के लिए फलाना एक्टर ने क्या क्या कुर्बानियां दीं। जब ये मिसालें ख़तम हुईं तो अरमान को लगा उस से ज्यादा स्वार्थी व्यक्ति इस दुनिया में ढूंढें नहीं मिलेगा जो महज़ अपने दो कौड़ी के सर के दर्द की खतिर दुनिया को असली रावण से साकार होने के अवसर को छीनना चाहता था।

कुच्चू नरम थी। उसने भी झेला होगा जोशी जी का झक्कीपना तो बाहर निकलते ही वो अरमान को पीछे नंगी चट्टान वाले कोने में ले गयी।

“हम पांच मिनट इधर रहेंगे। तब तक आप अपने ये दस सर उतार के रख दीजिये।”

अरमान ने मुखौटा उतार के अपनी टांगों के सहारे टिका दिया। कुच्चू ने अपने मोजों में फँसायी सिगरेट निकाली और सुलगा ली।

“आप सिगरेट नहीं पीते मुझे पता है  … इसलिए …” – धुएं का पहला भभका गले के अंदर गया और कुच्चू के चेहरे पे मोक्ष बन के पसर गया। इस मोक्ष का रंग गुलाबी था। ठंड में गालों पर खिलने वाले गुलाबों की तरह। इधर उधर की बातें होती रहीं। कुच्चू काफी बड़बड़िया थी। अरमान ने जब कॉलेज पढ़ाने के लिए ज्वाइन किया था तो वो लास्ट ईयर में थी। उसे ये भी पता था कि कौन कौन सी लड़कियां अरमान सर पे मरा करती थीं। और फिर नंगी चट्टान के नीचे खड़े खड़े ५ मिनट से आधा घंटा हो गया। जोशी जी ज़रूर किसी पचड़े में फंसे होंगे इसलिए अभी तक दोनों की खबर लेने किसी को भिजवाया नहीं था। रिहर्सल में सबके लिए चाय आयी थी। चाय वाले लड़के को अंदर जाते हुए देखा तो कुच्चू दौड़ के दो चाय झपट लायी। अदरक वाली चाय का एक घूँट अंदर गया भी नहीं कि कुच्चू के मोजों से दूसरी सिगरेट निकल आयी। अरमान को पता चला कि कुच्चू की माँ और उसकी माँ बचपन की दोस्त हैं। शादियों के बाद ज्यादा आना जाना नहीं रहा लेकिन बौज्यू के जाने के बाद दोनों के तार फिर से जुड़े। अरमान को याद आया कि हाँ कोई आती तो हैं। कॉलेज से लौट के आता है तो कई बार उन्हें माँ के साथ बैठे देखा है। कुच्चू कुछ कहने कहने को थी लेकिन नहीं कहा। सफ़ेद गाढ़े बादल पहाड़ियों से उतर रहे थे। नंगी चट्टान को धोती धूप थोड़ी सिलेटी होने लगी थी।

***

अरमान की हंसी में कोई फर्क नहीं आया। बल्कि अब वो ऐसे सुरों से भी बाहर जा चुकी थी जिन्हें इंसानी कहा जा सके।

“आप गा नहीं सकते  … हंस नहीं सकते  … जब जोशी जी खुद परदे के पीछे से आपके लिए गा रहे हैं तो हंस भी सकते हैं आपके लिये  … नहीं क्या?” – अपनी टीचरइ फेल होते देख कर कुच्चू को अब और सिखाने का मन नहीं था।

“कोई और नहीं मिल सकता क्या?” – अरमान के लिए ये सबसे बेस्ट ऑप्शन था।

“आप दोगे ये सजेशन अंदर जाके जोशी जी को? – कुच्चू ने जिस तरह से खिसिया के कहा उस से ये ऑप्शन ही ख़तम हो गया।

“कोई लड़की उठायी है आपने कभी? या वो भी नहीं किया कभी?” – जैसे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचती है वैसे ही कुच्चू के पंजे भी अब रियायत छोड़ रहे थे।

“कोई मिली ही नहीं उठाने के लायक!” – अरमान ने तमक के जवाब दिया तो कुच्चू की आँखों में कुछ उभरा। जैसे उसे जंग खाये बंद ताले की चाबी मिल गयी थी।

“तो समझिये मिल गयी आज  … पूरी ड्रामेबाज़ी चहिये  … “तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा॥”  …. आपसे तो होगा नहीं गाना  … कोई बात नहीं  … जोशी जी हैं ना! फिर वो दो बार अट्ट हास करता है  … हू हू हूSSS हा हा हा SSS… हू हू हूSSS हा हा हा SSS… चलिए ये भी नहीं होगा  … कोई बात नहीं  … अपने जोशी जी हैं ना! फिर वो… “

अरमान तेज़ी से नीचे झुका,  कुच्चू की कमर को घेरा और कन्धों तक उठा लिया। कुच्चू चीख रही थी। कुच्चू हंस रही थी। पहड़ियों से उतरते बादलों में सूरज की चौंध थी। चीड़ के जंगलों की हरियाली थी। झील का नीलापन था जो सूरज की चौंध और जंगलों की हरियाली के साथ आइस पाइस खेलता हुआ बैंगनी हुआ जा रहा था। अरमान को लगा वो मोक्ष के बहुत नज़दीक है। बस ज़रा सा हाथ बढ़ाना था। थोड़ा सा दूर और चलना था। चीखती और हंसती कुच्चू अब नीचे आ रही थी।  वो गिर रही थी। मोक्ष बस हाथ भर की दूरी तक आके कुदक गया कहीं और। कुच्चू सिर्फ गिरी नहीं धड़ाम से गिरी। कौली मिट्टी और घास बलिश्त भर ऊपर उछली और अरमान की सांसें गले में ही अटक गयीं।

***

चोट तो लगी ही थी लेकिन कुच्चू ‘कोई बात नहीं – कुछ नहीं हुआ’ कह के उसे पचा ले गयी। ना तो अंदर रिहर्सल हॉल में किसी को पता चला और ना ही अरमान को उतना झेंपने दिया कि दोनों के बीच बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो थम जाता। इस बीच जोशी जी को याद आया कि कुछेक आठ नौ साल पहले जो विभीषड का रोल करता था उसे ढूँढा जाये। पहले तो उन्हें उसका नाम याद नहीं आया और जब आया तो उनके फ़ोन में उसका नंबर नहीं था। राम और लक्ष्मण नए थे। लेकिन तबलची के पास नंबर था। फ़ोन लगाया तो पता चला वो तो हल्द्वानी कचहरी में अपना एक केस लड़ने गया है और अभी तक उसका नंबर नहीं आया।

जोशी जी का मानना था कि उन्हें आज तक कचनार से अच्छी सीता नहीं मिली। इसलिए उसके सौ तो नहीं लेकिन दर्जन भर खून तो वो माफ़ कर ही देते थे। कई बार उन्हें शक भी हुआ था कि कचनार सिगरेट पीती है। जब भी ऐसा होता कि उन्हें कचनार के मुंह से सिगरेट का भभका आता उनकी बरसों से दबी हुई खुद की तलब झंझावाती होने लगती। इस बार चाय के साथ नाश्ता भी आ गया था सबके लिए।

***

मोजों में फंसी आखिरी सिगरेट भी उसके होठों से लग चुकी थी।

“घर में पता है तुम सिगरेट पीती हो? – अरमान ने प्रेम टिक्की से आयी बन टिक्की का एक टुकड़ा तोड़ के चुभलाया। उसकी चाय एक पथ्थर के ऊपर रखी थी।

“मैं गांजा भी पीती हूँ  …” – कुच्चू ने ऐसे कहा जैसे कोई बहुत बहादुरी की बात हो – “घर में उगाती भी हूँ…”

“क्या?” – अरमान ने पथ्थर पे रखी अपनी चाय उठा ली।

“गांजा… बेस्ट ग्रेड… आप आओगे तो दिखाऊंगी… ” – अरमान के मुंह पे लगे बन के चूरे को हल्की ऊँगली से झाड़ के कुच्चू हंसने लगी। अरमान को लगा वो उसके खाने के बेहूदेपन पे हंस रही है।

“नहीं नहीं… वो नहीं … मैं तो मम्मी का … उन्हें लगता है ये लड़की इन पौधों के आगे पीछे क्यों मंडराती रहती है… किसी दिन पता चल गया कि ये तो… जान ले लेंगी मेरी…”

“क्या होता है गांजा पीके?” – अरमान ने उसे छेड़ा।

“आय फील हैप्पी… “

“हम्म्म  …” – कुछ भी कर के खुश रहने से उसका क्या विवाद हो सकता था।

थोड़ी देर तक दोनों अपनी अपनी चाय सुड़कते रहे। कुच्चू ने पास पड़े एक बड़े से सूखे पत्ते से हवाई जहाज बनाने की कोशिश की लेकिन वो बार बार लचक के खुल जाता था।

“आप तो उठाते भी कमाल का हैं और गिराते भी कमाल का हैं!”

“सॉरी  …”

“सॉरी मुझे नहीं तुलसीदास को बोलिये  … ओरिजिनल रावण को डेंगू हो गया है और सीता जी की कमर लचकी पड़ी है  … अब क्या सीधे अरण्य काण्ड से उत्तर काण्ड पे चले जायें?” – अरमान जितना सुन नहीं रहा था उतना सोच रहा था। कचनार कितना अच्छा नाम है। चिंटी के घर के पीछे वाली चढ़ाई पे कितने ही पेड़ हैं कचनार के।

***

आदिकालीन विभीषण को कचहरी से नयी डेट मिल गयी तो वो तुरंत टैक्सी पकड़ के नैनीताल के लिए रवाना हो गए। जोशी जी खुद से ऐसी खबर अरमान को नहीं देना चाहते थे इसलिए वो किसी काम का बहाना मार के खिसक लिए और बताने की ज़िम्मेदारी कुच्चू पे छोड़ गये। कुच्चू ने बाहर निकल के नंगी चट्टान के पास बैठे अरमान को बड़ी ही सहजता से बता दिया कि आपसे नहीं होगा।

“रिप्लेसमेंट का रिप्लेसमेंट मिल गया है… अब आपको छुट्टी  …”

“ठीक है फिर… अपनी फ़जीहत करवाने से बच गया मैं… “

“वैसे नुक़्ते आपके भी सही जगह पे लगते हैं  …”

अरमान ने चेहरे पे एक फुसकी सी मुस्कराहट आने दी और उठ खड़ा हुआ।

“मिल के अच्छा लगा तुमसे…”

“सेम हियर…”

कुच्चू ने हाथ बढ़ाया। अरमान ने अपने हाथ में ले लिया।

“घर आके तुम्हारा वाला गांजा पीता हूँ कभी…”

“ओह शिट!” – कुच्चू को अचानक से कुछ याद आया।

“क्या हुआ?”

“बस एक मिनट रुकिए… मैं आती हूँ बस …”

कुच्चू जाने के लिए मुड़ी तो अरमान ने रोक लिया।

“कुच्चू!”

कुच्चू ने पलट के देखा। अरमान कुछ फंसा फंसा सा लग रहा था। पहाड़ियों से उतरे बादल अब धुंध हो चुके थे। कचनार कभी दिखती तो कभी गायब हो जाती। डर लगा कि कहीं खो ना जाये। क्या मोक्ष की तलाश में ऐसे खतरे भी होते होंगे। कि मिला तो मिला नहीं तो बाकी सब किस्सा?

“तुम्हारा रिश्ता आया था मेरे लिए…”

“जानती हूँ … आपने मना कर दिया था…”

अरमान का मन किया कि कहे गलती हो गयी। तुमसे पहले मिल लेता तो कभी मना नहीं करता। माँ ने भी कहा था मिल तो ले एक बार। बिना मिले कैसे ना कर देता है। कुच्चू पलट के अंदर चली गयी। लौट के आयेगी तो मन की बात कह ही देगा अरमान।

दो मिनट में ही कुच्चू वापिस लौटी। अपने बैग में कुछ खदड़ फ़दड़ ढूंढती। फिर एक बड़ा सा लिफाफा निकाल के अरमान को थमा दिया।

“माँ ने बोला था पांडे आंटी को जाके दे आना  … दो दिन से बैग में ही पड़ा है  … मेरी शादी का कार्ड  … २९ नवम्बर  …”

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